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हमारी धार्मिक सभाओं के स्तर और गरिमा का सवाल ?

प्रो अनेकांत कुमार जैन 


हमारे उत्सवों के स्तर और गरिमा का सवाल ?

चातुर्मास में भव्याति भव्य कार्यक्रम होते हैं । प्रायः सभी कार्यक्रमों को ऐतिहासिक और अभूतपूर्व भी बतलाया जाता है । खर्च और वैभव से तो हम भव्यता विकसित कर ही रहे हैं किंतु साथ में यदि इन कार्यक्रमों के गुणात्मक स्तर को भी सुधार लें तो ये वास्तव में ज्यादा प्रभावशाली और सार्थक हो सकते हैं । 

कभी कभी समस्या यह भी हो जाती है कि उस गुणात्मक स्तर का अंदाजा उन्हें तो है ही नहीं जो आयोजक प्रायोजक है ,उन्हें भी नहीं होता है जिनके निमित्त या जिनके लिए ये कार्यक्रम होते हैं । 

कुछ देखी सुनी परिस्थितयां बिंदुबार दे रहा हूँ जिन्हें यदि हम सुधार लें तो धर्म सभा की गरिमा बच सकती है -

1. मंच पर बिना वजह भीड़ और अनुशासन हीनता ।

2. पहले मंच पर मात्र विद्वानों या अतिविशिष्ट आमंत्रित अतिथियों का ही सम्मान होता था । अब दान दातार और उनके परिवार का ,नारियल चढ़ाने आये दूसरे स्थान की समाज का , सेवकों का तथा अन्य अनेक लोगों का सम्मान भी होने से पूरा समय इसी में लगता है ।

3.पहले मंच संचालन कोई विद्वान् या कुशल सद्गृहस्थ या पदाधिकारी ही करते थे अब स्वयं साधु करते हैं - जो बिल्कुल शोभा नहीं देता ।आध्यात्मिक भजन,स्तोत्र,श्लोक,गाथा आदि तक तो फिर भी ठीक किन्तु साधु साध्वियों के द्वारा फिल्मी तर्ज़ों पर गायन आदि भी उनके पद के अनुरूप बहुत गरिमा पूर्ण नहीं लगता है ,चाहे सुर कितना भी अच्छा हो । 

4.कार्यक्रम में भीड़ एकत्रित करने के लिए लॉटरी,कूपन,उपहार की पूर्व घोषणा करना । 

5. कार्यक्रम में व्यसनधारी कलाकारों,कवियों ,सेलिब्रेटीज को किराये पर बुलाना ।

6.फिल्मी गानों ,आधुनिक धुनों पर सिर्फ नाम बदल कर गाना और लोगों को नचवाना और इसे भक्ति कहना ।
 
7. धर्म सभा का मुख्य उद्देश्य दर्शन ज्ञान चारित्र की वृध्दि होता है ,शेष दान संग्रह आदि छोटे उद्देश्य होने चाहिए ,किन्तु इसे ही मुख्य उद्देश्य मानना और कहने भी लगना ,यह तो अतिवाद है । 

8.कार्यक्रम समय पर शुरू और समाप्त न करना । समय खराब करना । जिन्हें आमंत्रित ही नहीं किया या जिनका आना असंभव है उनके नाम भी पोस्टर में छापना । 

9. साधु और विद्वानों को ज्ञान की बात कहने के लिए समय ही न बचना । जबकि इतने तामझाम और मेहनत से जो भीड़ एकत्रित की गई है उसका सही सदुपयोग किया जाना चाहिए उन्हें सही उपदेश देकर ।

10. बोलियों में बहुत अधिक समय लगाना,उसका सीधा प्रसारण करना करवाना आदि । 

वर्तमान में पता नहीं क्या हो गया है ?सभी लोगों में मंच पर और कुर्सी पर बैठने की इतनी ज्यादा लालसा पहले कभी नहीं देखी । सभा में यदि 10%लोग मुख्य कुर्सी और मंच पर ही आना चाहेंगे तो व्यवस्था कैसे बनेगी ? अशिष्टता तो यहां तक देखी जाती है कि आमंत्रित विशिष्ट विद्वान्, अतिथि या वक़्ता मंच पर बोलने के बाद जब वापस अपनी सीट पर बैठने जाता है तो वो उसे खाली नहीं मिलती,लोग उस पर बैठ जाते हैं और उसे बैठने जगह खोजनी पड़ती है और अपमानित होना पड़ता है । 

सिर्फ ज्यादा पैसा खर्च करने से और भीड़ एकत्रित करने से और अनुशासनहीनता का लाइव प्रसारण करवाने से कोई भी कार्यक्रम सफल और सार्थक नहीं माना जा सकता है उसके साथ उसकी गुणवत्ता और उसका स्तर ही उसकी वास्तविक गरिमा बढ़ाता है । इस विषय पर बिना किसी दुराग्रह के गंभीरता से विचार करने योग्य है । 

एक बात यह है कि समाज क्या चाहता है ,उसे क्या पसंद है और दूसरी बात यह है कि हम उसे क्या देना चाहते हैं ,क्या सिखाना चाहते हैं । पहली बात में ज्यादा दम नहीं है हमें दूसरी बात का ख्याल रखना चाहिए । धार्मिक उत्सव शिक्षा के उत्सव हैं मनोरंजन के उत्सव नहीं - यह बात हमेशा हमारे जेहन में रहेगी तभी सुधार की गुंजायश भी रहेगी ।

आपको ज्ञात हो न हो ,काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ,वाराणसी में भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत भारत सरकार ने एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जिसका मुख्य विषय था ' भारतीय परंपरा में चातुर्मास' । देश विदेश से बड़े बड़े वक्ता विद्वान् बुलाये गए ।  उस पूरे सेमिनार के दर्जनों विषयों में भी 'जैन परंपरा में चातुर्मास' विषय का नाम तक नहीं था । जबकि जैन परंपरा के चातुर्मास जैसा इतिहास और स्वरूप अद्वितीय है । इस तरह के अनगिनत उदाहरण हैं । 

आपकी कलश स्थापनाओं की ऊर्जा यहां तक क्यों नहीं पहुंची ? आपने बड़े बड़े मंत्री और ऑफिसर बुलाये लेकिन उन्हें जैन चातुर्मास का मतलब नहीं समझा पाए । कार्यक्रम में इतना समय ही कहाँ होता है ? 

क्या हम प्रभावना का सही और व्यापक अर्थ समझ पा रहे हैं ? लंबे जुलूस , बैंड बाजे और बड़े बड़े पांडाल प्रभावना की ए बी सी डी मात्र हैं । इनसे सिर्फ हम खुद प्रभावित होते हैं । दूसरों को तो ट्रैफिक जाम से ज्यादा कुछ नहीं लगता । सोचिये ! अन्य मतों के जुलूस आदि देखकर हम क्या सोचते हैं और कितना प्रभावित होते हैं ? बस उन पर भी वैसा और उतना ही प्रभाव पड़ता है । 

आशा है इन बातों को सकारात्मक आलोचना के रूप में ही लिया जाएगा । जो कुछ हो रहा है वह बुरा नहीं है लेकिन इसी में यदि अनुशासन और सही प्रयोजन की मिश्री भी मिल जाय तो सोने पे सुहागा हो जाएगा । 









टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
आपने एक एक बात चातुर्मास के प्रकरण पर सही लिखी है, आपने जो लिखा यह सब हमारे मन-मस्तिष्क में चल रहा था,आज हम धर्म के मर्म से दूर होते जा रहे हैं, चार्तुमास में सिर्फ हमें धनवर्षा योग ही चाहिए, आज किसी को तत्व सिद्धान्तो को सुनने में रूचि नहीं है, आपने लिखा हमने जबाब दे दिया, आज कोई जागने को तैयार नहीं है, *लिखना भी आजकल ऐसा है, जंगल में मोर नाचा किसने देखा* भाई साहब अनेकांत जी , आज चर्चाओं दिखावे का युग है, युगवीर बनने का युग नहीं है,बस हम अपना लोटा छान लें, किसी को समझाने का राग भैरवी न ही करें तो अच्छा है, आभार आदरणीय प्रोफेसर अनेकांत जी जैन दिल्ली

, अनिल चेतन जैन दशमेश नगर मेरठ
बेनामी ने कहा…
बहुत ही सामयिक व महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं इस पोस्ट में एक ऐसे सम्मानीय व्यक्ति द्वारा जो समाज में एक्टिव रुप से सहभागिता कर रहे हैं काफी लंबे समय से। डाक्टर अनेकान्त जी इस साहस हेतु धन्यवाद के पात्र हैं , क्योंकि उनका उद्देश्य सकारात्मक है। इनमें से ज्यादातर बातें तो बहुत आसानी से ठीक हो सकती हैं,, सिर्फ आयोजकों की थोड़ी सी सावधानी व समझदारी से।

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deepaktupkar ने कहा…
जय जिनेंद्र... आपने ठीक लिखा.....लेकीन कोई बदलना नाही चाहता.....

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