Wednesday, September 27, 2017

गोमटेश दर्शन से हो जाती है सारे तनावों से मुक्ति




सादर प्रकाशनार्थ

'गोमटेश दर्शन से हो जाती है सारे तनावों से मुक्ति'

-डॉ अनेकांत कुमार जैन,नई दिल्ली

कर्णाटक के हासन जिले में चेनरैपाटन के पास श्रवणबेलगोला एक ऐसा तीर्थ स्थान है जहाँ जाने मात्र से मनुष्य अनेक शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्त हो सकता है |मानसिक सुख और शांति के लिए द्रव्य,क्षेत्र, काल, भाव सभी की शुद्धि और मंगल आवश्यक है | ऐतिहासिक दृष्टि से यह महज एक संयोग मात्र नहीं है कि हजारों सालों से यह स्थान साधना और सल्लेखना का मुख्य केंद्र रहा है,बल्कि यह इस क्षेत्र की आध्यात्मिक और भौगोलिक पवित्रता का प्रभाव रहा कि साधना के अनुकूल मानसिक और आत्मिक सुख और शांति के लिए यह स्थान समस्त मुनि परंपरा के लिए आकर्षण का केंद्र रहा |

समाधिमरण के यहाँ के शिलालेखीय दस्तावेज इस बात के सबसे बड़े प्रमाण हैं कि जीवन के अंत में मानसिक शांति पूर्वक संयम और साधना के साथ देह विसर्जित करने के लिए इस स्थान को सर्वश्रेष्ठ माना गया |

यहाँ दो पर्वत हैं – १.विन्ध्यगिरी पर्वत २. चंद्रगिरी पर्वत | विन्ध्यगिरी पर्वत की संरचना कुछ इस प्रकार की है कि नंगे पैर वंदना करने से मनुष्य के भीतर के सभी आज्ञाचक्र स्वतः क्रिया शील हो उठते हैं | मनुष्य न अधिक थकता है और न अधिक भार महसूस करता है | श्वास की गति तीव्र होने से अन्दर की धमनियों में रक्त प्रवाह तीव्र हो उठता है जिससे शरीर के सभी अंगों ,प्रत्यंगों में क्रिया शीलता स्वतः बढ़ जाती है |यहाँ की आरंभिक सीढियाँ पर्वत के पत्थर को ही काट कर निर्मित की गयीं हैं अतः वे न तो ज्यादा बड़ी हैं न ज्यादा छोटी अतः उच्च रक्त चाप तथा ह्रदय के रोगियों के लिए धीरे धीरे मध्यम गति से वंदना करने से उनके स्वास्थ्य के लिए ये वरदान है |

श्वासोच्छ्वास स्वतः ही कभी तीव्र कभी मंद हो जाता है उसे करना नहीं पड़ता अतः यह स्वाभाविक प्राणायाम मस्तिष्क के तंतुओं को जागृत कर देता है जिससे सर दर्द तनाव आदि में लाभ होता है |

मध्य में जो जिनालय आते हैं उनमें झुक कर जाना तथा तीन आवर्त पूर्वक वंदना मुद्रा में बैठ कर तीन बार शिरो वंदन करना अपने आप में एक अद्भुत योग है |जिनालयों की प्राचीन विशाल प्रतिमाओं का पवित्र आभा मंडल हमारे आभा मंडल में प्रवेश कर जाता है तथा वह इतना शक्ति शाली होता है कि हमारे आभा मंडल में संग्रहीत नकारात्मक उर्जा को सकारात्मक उर्जा में परिवर्तित कर देता है |

मध्य जिनालयों तथा मार्ग स्थित शिलालेखों में प्राचीन कन्नड़ लिपि में उत्कीर्ण अक्षर विन्यास का दर्शन हमारी मानसिक उलझनों को अनायास ही खींच कर संतुलित कर देता है | उसके अनंतर सीडियां कुछ बड़ी हो जाती हैं जो हमारे उत्कर्ष और पुरुषार्थ की भावना को उठाती हैं |

हम जब उन्हें पार करते हैं तो प्रथम द्वार से ही गगन चुम्बी उत्तुंग बाहुबली की मूर्ती का वीतरागी प्रशांत मुद्रा युक्त चेहरा हमारे समस्त विकल्प जालों को ख़ारिज करता हुआ हमें निर्विकल्प दर्शन की ओर ले जाता है | पुनः एक छोटा सा द्वार हमें झुकाता है और फिर विशाल बाहुबली का दर्शन हमें इतना उठा देता है कि जन्मों जन्मों का मिथ्यात्व एक क्षण में नष्ट हो जाता है और हमें पता लगता है कि यही है – सम्यक्दर्शन | राग स्वतः नष्ट होने लगता है |

बाहुबली हमें अपने वैराग्य के बाहुपाश में मानो खींच लेते हैं | थोड़ी देर को सही पर हम भी वीतरागी हो जाते हैं | उस परिकर में मनुष्य और उसका अहंकार स्वतः ही बहुत छोटा हो जाता है | हर दर्शनार्थी को लगता है कि मैं ,मेरा मान ,मेरा वैभव,मेरा ज्ञान,मेरा कुल,मेरी परंपरा,मेरी परेशानियाँ,मेरा तनाव सब छोटे हैं ,तुच्छ हैं |

वैराग्य और वीतरागता के समुन्दर में गोते लगाता हुआ दर्शनार्थी मानसिक तनाव जैसे तुच्छ रोगों को पास भी नहीं फटकने देता | मूर्ति का विशालकायत्व और शक्तिशाली प्रभाव हमारी जनम जनम की सभी वासनाओं को तिरोहित कर के शुद्धता की प्राप्ति करने में बहुत बड़ा निमित्त बन जाता है |

चंद्रगिरी पर्वत भी अपनी बनावट और अद्भुत शिल्प सौंदर्य के साथ मनुष्यों की उस प्यास को बुझाने का काम करता है जो उसे सांस्कृतिक बोध के अभाव में तड़फा रही है | शब्द,चेतना और कला की बारीकियां जब मनुष्यों के भाव अस्तित्व से लुप्त होने लगती हैं तो इनसे रीता उसका कोरा अध्यात्म उसे त्राण नहीं दे पाता है यहाँ आकर उसे लगता है कि वह आचार्य भद्रबाहु और चन्द्रगुप्त से बातें कर सकता है ,ज्ञान विज्ञान का प्राचीन वैभव देखकर उसका आत्म वैभव जागृत होता है |

संसार ,शरीर और भोगों से विरक्त हजारों ज्ञानियों के चरण हजारों वर्षों से जिस पर्वत पर आचरण का इतिहास लिख रहें हों ,उस पर्वत पर जब हमारे चरण पड़ते हैं तो हम भी कब उस आचरण की गंगा में तैरने लगते हैं ,हमें स्वयं पता नहीं लगता | यहाँ के वसदियों में हजारों सालों तक मन्त्रों के उच्चारण हुए हैं ,आगमों की गाथाएं गाई गयीं हैं ,स्तुतियों के कीर्तिमान रचे गए हैं | यहाँ के एक एक परमाणुओं में वे शब्द ,वे ध्वनियाँ खचित प्रतीत होतीं हैं | जब हम उन वसदियों में प्रवेश करते हैं तो वे शब्द ,वे ध्वनियाँ हमारे कानों में गूजनें लगती हैं |

हम उन शताब्दियों में विचरण करने लगते हैं जब भद्रबाहु ,कुन्दकुन्द,समन्तभद्र ,पूज्यपाद ,नेमिचंद्र आदि महामुनि रहा करते थे | ऐसे वातावरण की अनुभूति करने वाला कभी तनाव में नहीं रह सकता और अवसाद तो आसपास भी नहीं फटक सकता |

Saturday, July 22, 2017

प्राकृत साहित्य में जीवन - डॉ अनेकांत कुमार जैन

प्राकृत साहित्य में जीवन

डॉ अनेकांत कुमार जैन

प्राकृत साहित्य अपने रूप एवं विषय की दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण है तथा भारतीय संस्कृति और जीवन के सर्वांग परिशीलन के लिये उसका स्थान अद्वितीय है। उसमें उन लोकभाषाओं का प्रतिनिधित्व किया जाता है जिन्होंने वैदिक काल एवं संभवत: उससे भी पूर्वकाल से लेकर देश के नाना भागों को गंगा यमुना आदि महानदियों को प्लावित किया है और उसकी साहित्यभूमि को उर्वरा बनाया हैं। प्राकृत साहित्य अथाह सागर है | संसार की अन्य प्राचीन भाषाओँ के साहित्य और सम्पूर्ण प्राकृत साहित्य की तुलना की जाय तो संख्या,गुणवत्ता और प्रभाव की दृष्टि से प्राकृत साहित्य अधिक ही दिखाई देगा कम नहीं |प्राकृत साहित्य को हम मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त कर सकते हैं –
१.    आगम-दार्शनिक-साहित्य
२.    काव्य-कथा-तथा लैकिक साहित्य  
इसी प्रकार जीवन की अवधारणा को भी हम इन दो तरह के साहित्य में भिन्न भिन्न रूपों में देख सकते हैं |आगम-दार्शनिक साहित्य में भगवान् महावीर की वाणी ,आचार्यों द्वारा रचित जैन धर्म दर्शन सिद्धांत को निरूपित करने वाला साहित्य है जहाँ जीवन की परिभाषा करते हुए कहा है कि -
 ‘आउआदिपाणाणं धारणं जीवणं’ अर्थात् आयु आदि प्राणों का धारण करना जीवन है।[1] तथा
‘आउपमाणं जीविदं णाम’ अर्थात् आयु के प्रमाण का नाम जीवन (जीवित) है।[2] जीवन के पर्यायवाची बताते हुए कहा है कि जीवन पर्याय के ही स्थितिअविनाशअवस्थिति ऐसे नाम हैं।[3]
इसी प्रकार काव्य-कथा-तथा लौकिक साहित्य में मनुष्य के जीवन, जीवन मूल्य उसके सौंदर्य तथा विसंगतियों का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया गया है | गाथासप्तशती जैसे ग्रन्थ में ग्राम्य जीवन की सहजता और विवशता का जो चित्रण है उससे बड़े बड़े काव्यशास्त्री भी मोहित हो उठे |
 एक साहित्यकार समाज की वास्तविक तस्वीर को सदैव अपने साहित्य में उतारता रहा है । मानव जीवन समाज का ही एक अंग है । मनुष्य परस्पर मिलकर समाज की रचना करते हैं । इस प्रकार समाज और मानव जीवन का संबंध भी अभिन्न है । समाज और जीवन दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं । साहित्य और जीवन का संबंध तो हमेशा से रहा है और जब तक जीवन हैतभी तक साहित्य है। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने साहित्य और समाज के संबंध को इन शब्दों में व्यक्त किया है- साहित्य और जीवन का क्या संबंध है,यह प्रश्न आज एक विशेष प्रयोजन से पूछा जाता है। वर्तमान भारतीय समाज एक ऐसी अवस्था में पहुँच गया है जिसके आगे अज्ञात संभावनाएं छिपी हुई हैं। विशेषतः हमारे शिक्षित नवयुवकों के लिए यह क्रांति की घड़ी है।[4]
इस सम्भावना और क्रांति की खोज हम प्राकृत के विशाल साहित्य में कर सकते है | विवाह से पूर्व और विवाह के अनंतर पुत्र का जीवन कैसा हो गया इस पर एक पिता के कथन के माध्यम से जो कटाक्ष प्राकृत की इस गाथा में किया गया है उससे आपको प्राकृत की अद्भुत साहित्य संपदा का अंदाजा सहज ही हो जायेगा –
करिणीवेहव्व अरो मह पुत्तो एक्ककाण्डविणिवाई |
हअ सो हाए तह कहो जह कण्डकरण्डअं वरहई ||  (ध्वन्यालोक ३,४)

अर्थात् केवल एक वाण से हथिनियों को विधवा बना देने वाले मेरे पुत्र को उस अभागिनी पुत्रवधू ने ऐसा कमजोर बना दिया है कि अब वह केवल वाणों का तरकस लिए घूमता है |
   
इस प्रकार जीवन और साहित्य का अटूट संबंध है । साहित्यकार अपने जीवन में जो दु:खअवसादकटुतास्नेहप्रेमवात्सल्यदया आदि का अनुभव करता है उन्हीं अनुभवों को वह साहित्य में उतारता है ।इसके जीवंत उदाहरण प्राकृत साहित्य में पग पग पर देखने को मिलता है |




[1] आचार्य वीरसेन ,धवला पुस्तक १४/५,१६/१३/२ 
[2] आचार्य वीरसेन ,धवला पुस्तक १३/५,,६३/३३३/११ 
[3] जीवितं स्थितिरविनाशोऽवस्थितिरिति यावत् ।
       -आचार्य शिवार्य - भगवती आराधना /विजयोदय टीका /२५/८५/९ 
[4] हिन्दी साहित्य: रचना और विचारनन्द दुलारे वाजपेयीपृष्ट-20

Saturday, July 1, 2017

महाकवि आचार्य विद्यासागर की हाइकू का आध्यात्मिक सौंदर्य -डॉ अनेकांत कुमार जैन

महाकवि आचार्य विद्यासागर की हाइकू का आध्यात्मिक सौंदर्य
डॉ अनेकांत कुमार जैन
हाईकू मूलरूप से जापान की कविता है। "हाईकू का जन्म जापानी संस्कृति की परम्पराजापानी जनमानस और सौन्दर्य चेतना में हुआ और वहीं पला है। हाईकू में अनेक विचार-धाराएँ मिलती हैं- जैसे बौद्ध-धर्म (आदि रूपउसका चीनी और जापानी परिवर्तित रूपविशेष रूप से जेन सम्प्रदाय) चीनी दर्शन और प्राच्य-संस्कृति। यह भी कहा जा सकता है कि एक "हाईकू" में इन सब विचार-धाराओं की झाँकी मिल जाती है या "हाईकू" इन सबका दर्पण है।"हाईकू को काव्य विधा के रूप में बाशो (१६४४-१६९४) ने प्रतिष्ठा प्रदान की। हाईकू मात्सुओ बाशो के हाथों सँबरकर १७ वीं शताब्दी में जीवन के दर्शन से जुड़ कर जापानी कविता की युगधारा के रूप में प्रस्फुटित हुआ। आज हाईकू जापानी साहित्य की सीमाओं को लाँघकर विश्व साहित्य की निधि बन चुका है।1
हाइकू मात्र सत्रह मात्राओं में लिखी जाने वाली कविता है और अब तक की सबसे सूक्ष्म काव्य है और साथ ही सारगर्भित भी | हाइकू की लोकप्रियता व सारगर्भिता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज दुनिया कि हर भाषा में हाइकू लिखे जा रहे हैं | कुछ हिंदी विद्वान हाइकू काव्य को विदेशी बताकर आलोचना भी करते हैं पर साहित्य को किसी भाषाक्षेत्र या तकनीक की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता | बल्कि मैं तो यह कहूँगा की जिस प्रकार मारुति कारजापानी होकर भी छोटी होने के कारण हमारे यहाँ आम आदमी तक पहुँच बना ली उसी प्रकार हाइकू भी आम आदमी तक बड़ी सरलता से पहुँच सकता है | क्योंकि इसमे आम और साधारण बातों को ही जो प्रकृति और हमारे जीवन से जुडी होती हैंसुन्दर और विशेष विधि से कम से कम यानी सत्रह अक्षरों में कह दिया जाता है |
हाइकू लिखना गहरी सोचअध्ययन व अभ्यास का परिणाम होता है | हाइकू लिखने वाला कोई भी अपने को पूर्ण रूप से पारंगत नहीं कह सकता |अपनी कला के कारण हाइकू एक अपूर्ण कविता होते हुए भी पूरा भाव देने में सक्षम होता है | हाइकू ऐसी चतुराई से कहा जाता है कि पाठक अथवा श्रोता अपने ज्ञान व विवेक का प्रयोग करते हुए उसके भाव या उद्देश्य को पूर्ण कर लेता है | चूकि पाठक हाइकू को पढने के लिए उसमे पूर्ण रूप से घुसना पड़ता हैवह उसे अपने से जुड़ा व आनंदित अनुभव करता है | हाइकू में किन्ही दो भावविचारबिम्ब या परिदृश्य को मात्र १७ वर्णों में तीन पंक्तियों में दो या अधिक वाक्यांशों में इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है ताकि प्रथम व अंतिम पंक्ति में ५-५ वर्ण व दूसरी पंक्ति में ७ वर्ण हों | दोनों भावोंविचारों या दृश्यों को तुलनात्मक रूप से इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है की वे पृथक पृथक होते हुए भी परस्पर सम्बंधित हों | हाइकू की तीन पंक्तियाँ भावात्मक दृष्टि से दो खण्डों में विभाजित होती है | एक साधारण खंड तथा दूसरा विशेष खंड |
साधारण खंड में विषय वस्तु की आधारभूत भावबिम्बदृश्य या विचार रखी जाती है तथा विशेष खंड में उससे सम्बंधित विस्मित करने वाला विशेष तत्व | दोनों खंड पृथक होते हुए भी परस्पर पूरक होते हैं | दोनों खंड व्याकरण की दृष्टि से स्वतंत्र होने चाहिए | अपनी कविता १७ वर्णों में तीन पंक्तियों में लिख देने से हाइकू नहीं बन जाता बल्कि अच्छे हाइकू की विशेषता है उसमे पाठक को चौकाने वाला तत्व |यहाँ यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की हाइकू में साधारण बात को ही असाधारण तरीके से कही जाती है | हाइकू एक वाक्य का नहीं होता| हाइकू में लयविरामपूर्ण विराम आदि चिन्हों की आवश्यकता नहीं होती | हाइकू मूलतः प्रकृति विषयों पर लिखे जाते हैं पर आजकल जीवन संबधी विषयों पर भी हाइकू बढ़ चढ़ कर लिखे जा रहे हैं | जीवन व ईश्वरीय विषयों पर लिखे हाइकू को अंग्रेजी में सेनर्यू कहा जाता है | वैसे हाइकू और सेनर्यू में विषय के अतिरिक्त और कोई अंतर नहीं है |
तीन पंक्तियों में से दो विषय वस्तु एवं उसके आधारभूत भाव या व्यवहार को दर्शाता है तथा तीसरी विशेष पंक्ति 
जिसमे उससे सम्बंधित विस्मयकारी भाव होता है |3
हाइकू के सन्दर्भ में स्वयं महाकवि आचार्य विद्यासागर जी का मंतव्य है –
हाई कू कृति
तिपाई सी अर्थ को
ऊँचा उठाती
।४३|
दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज इन दिनों (Japanese Haiku, 俳句 ) जापानी हायकू (कविता) की रचना कर रहे हैं  | हाइकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में अक्षरदूसरी पंक्ति में अक्षरतीसरी पंक्ति में अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। महाकवि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने लगभग 500 हायकू लिखे हैंजो अप्रकाशित हैं।किन्तु ये अद्भुत रचना मुझे http://www |vidyasagar |net/hayaku-nov-16/ लिंक पर अनायास ही पढने को मिल गयी  |
आचार्य श्री की हाइकू अन्य रचनाकारों की हाइकू से बिल्कुल ही पृथक नज़र आई | उसका बहुत बड़ा कारण है उनका संयममय जीवन | उनकी अनुभूतियों से निष्पन्न जापानी छंद हाइकू की ये रचनाएँ उन्हें विश्व के एक विशाल पटल पर स्थापित करती हैं | ये रचनाएँ एक नज़र में देखने में छोटी जरूर लगती हैं किन्तु कम शब्दों में इतने गहरे आध्यात्मिक भावों को लिए हुए हैं कि उनकी व्याख्या के लिए शब्द कम पढ़ जाते हैं एक बानगी देखिये –
संदेह होगा,
देह है तो देहाती !
विदेह हो जा
|२|
यहाँ ‘देह’ शब्द का जबरजस्त प्रयोग है | प्रथम पंक्ति है - संदेह होगा - अर्थात्....मिथ्यात्व होगा ,भ्रम होगा ,संशय होगा कि यह देह मेरी है ,या यह देह ही मैं हूँ ,संसार में तो ये सब होता ही रहेगा |द्वितीय पंक्ति है – देह है तो देहाती – अर्थात् देह जब तक रहेगी तब तक संसारी ही रहेगा |देहाती शब्द मूर्ख और गंवार के लिए भी जगत में विख्यात है | यहाँ आधार और आधेय भाव भी परिलक्षित है | देहात  में रहने वाला देहाती कहलाता है जैसे शहर में रहने वाला शहरी | साहित्य में ग्रामीण व्यक्ति प्रायः अज्ञानी की तरह अभिव्यंजित किया जाता रहा है ,यही अर्थ देहाती का भी है |लेकिन देहाती का आधार देह बताने की जबरजस्त अभिव्यंजना यहाँ कवि ने की है | इस कविता के सिर्फ साहित्यिक अर्थ नहीं निकाले जा सकते | अध्यात्म भी समझना जरूरी है | यहाँ भाव स्पष्ट दिख रहा है कि देहाती अर्थात अज्ञानी वह नहीं जो देहात में रहता है बल्कि वह है जो देह में आसक्त रहता है |देह में आसक्त आत्मा को देहाती अर्थात अज्ञानी कहा है |तीसरी पंक्ति है - विदेह हो जा – अर्थातआत्मकल्याण के लिए या इस संसार रुपी दुःख से ऊपर उठने के लिए जरूरी है शरीर से आसक्ति का त्याग ..विदेह होना | विदेह होने का दूसरा अर्थ है बिना देह के होना अर्थात सिद्ध होना | हाइकू की इन तीन पंक्तियों में संसार का कारण और उससे मुक्ति का उपाय सीधा समझा दिया |
अध्यात्म में दार्शनिक बोध बहुत आवश्यक होता है |उसके बिना उसका धरातल ही निर्मित नहीं होता | कर्मों के रूप में जन्म जन्मान्तरों के संस्कार इस आत्मा के साथ जुड़े हुए होते हैं | आत्मा के साथ बहुत कुछ आया पर वो कम आया जो काम का था |आत्मा ने पर को खूब जाना ...वे ज्ञेय तो चिपकते गए ...किन्तु सम्यक्ज्ञान नहीं चिपका , अन्यथा इस भव में पूर्व का स्मरण हो जाता |दुनिया को जाना पर जो दुनिया को जानता है ऐसा ज्ञायक स्वाभावी आत्मा को नहीं जाना ,ऐसा होता तो कल्याण हो जाता -
ज्ञेय चिपके
ज्ञान चिपकता तो
स्मृति हो आती
।२६|
महाकवि प्रदर्शन के बहुत खिलाफ नज़र आते हैं,उन्हें वो कोई भी कार्य नहीं भाता जिसमें निज आत्मा का प्रकाश न हो ....
निजी प्रकाश
किसी प्रकाशन में
क्या कभी दिखा ?
|४९|
इसी प्रकार की तड़फ अन्यत्र भी भरी पड़ी है ,एक और छंद है 
प्रदर्शन तो
उथला है दर्शन
गहराता है
|३३|
वे प्रश्न ,तर्क आदि से परे उस परम तत्त्व की तलाश में हैं जहाँ किसी उत्तर की आवश्यकता नहीं होती –
प्रश्नों से परे
 अनुत्तर है उन्हें
 मेरा नमन
|39|
उन्हें अपना ध्येय अन्दर ही दिखाई देता ...बाहर उसकी सम्भावना कम दिखाई देती है .....
मोक्षमार्ग तो
 भीतर अधिक है
बाहर कम
|६१‍ |
अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता का उनका हाइकू अंदाज भी निराला है ..
गुरू ने मुझे
प्रगट कर दिया
दिया दे दिया
|४७|
स्वानुभव को लेकर उनका चिंतन बड़ा गहरा और गंभीर है –
स्वानुभव की
समीक्षा पर करे
तो आँखें सुने
।७६|
स्वानुभव की
 प्रतीक्षा स्व करे तो
 कान देखता
।७७|
इस प्रकार हम देखते हैं कि महाकवि आचार्य विद्यासागर जी की हाइकू रचनाएँ गहरे अध्यात्म से भरी हैं |उन्होंने अनेक हाइकू जीवन मूल्यों और उनसे जुड़ीं विसंगतियों पर भी लिखे हैं किन्तु उन सभी में उनके मूल अध्यात्म की सुगंध ही महकती है , वे संसार की बात भी करते हैं किन्तु अध्यात्म के परिप्रेक्ष्य में | उनके प्रत्येक छंद के अनेक अर्थ निकाले जा सकते हैं | हमने यहाँ नमूनों के तौर पर कुछ छंद ही चयनित किये हैं ,सभी छंदों की मीमांसा की जाए तो पूरा एक शोध ग्रन्थ लिखा जा सकता है | अंत में परम योगी पूज्य १०८ आचार्य विद्यासागर महाराज जी के संयम स्वर्ण महोत्सव (आषाढ़ शुक्ला पंचमी ) पर मैं भी अपने जीवन का प्रथम ‘हाइकू’ समर्पित करके विराम लेता हूँ -
                                                       विद्यासागर
             अनुभव  गागर
                  नमन तुम्हें
                                                         -कुमार अनेकांत

संपर्क - डॉअनेकांत कुमार जैन,सह आचार्य एवं अध्यक्ष जैन दर्शन ,दर्शन संकाय ,श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,(मानव संसाधन विकास मंत्रालयाधीन मानितविश्वविद्यालय),क़ुतुबसंस्थानिकक्षेत्रनईदिल्ली-११००१६,फ़ोन ९७११३९७७१६,anekanr76@gmail.com 



1. https://hi |wikipedia |org/wiki/ हाइकू retrieved on 27/06/2017 
2. S .. Tiwari article ,  https://www |poemhunter |com/poem/aao-seekhen-haiku/

28 जून आचार्य विद्यासागर महाराज जी के 50 वें संयमवर्ष पर विशेष- *महायोगी का जीवन ही उनका दर्शन है*

28 जून आचार्य विद्यासागर महाराज जी के 50 वें संयमवर्ष पर विशेष 

*महायोगी का जीवन ही उनका दर्शन है*

*डॉ अनेकांत कुमार जैन* नई दिल्ली 

 जीवन में हम बहुत कुछ सीखते हैं ,कई तरह से सीखते हैं ,किताबें पढ़ कर सीखते हैं तो कभी किसी से सुनकर सीखते हैं ,कुछ अपने अनुभव से सीखते हैं तो कुछ दूसरों के अनुभव से सीखते हैं | फिर हम सिखाने भी लग जाते हैं ,लगभग वही जो हमने सीखा है | इन सीखने सिखाने के सिलसिलों में हमारी उम्र कितनी गुजर जाती है पता ही नहीं चलता | उम्र के एक पड़ाव पर कभी फुरसत के क्षणों में यह लेखा जोखा करने बैठते हैं कि मैंने जो कुछ भी जीवन भर सीखा-सिखाया उसमें कितना प्रेयस था और कितना श्रेयस ? हमारे  आत्मकल्याण में ,आत्मशांति की प्राप्ति में वह सीख कितनी कार्यकारी है ? तो अक्सर हिसाब संतुलित नहीं बैठता | प्रेयस का पड़ला भारी नजर आता है , श्रेयस का बजन बहुत हल्का नजर आता है | दुःख होता है कि महाभाग्य से इतना दुर्लभ मनुष्य भव पा करके भी आत्मज्ञान के अभाव में हमारा सारा का सारा बौद्धिक विकास कितना रीता रीता सा लग रहा है ?

जानने का स्वभाव होते हुए भी हम उसे नहीं जान पाए जो जाननहार है ,ज्ञायक है | इसलिए मेरी अभी तक की सारी शिक्षा संसार बढाने वाली होने से  भार स्वरुप ही है | उस बौद्धिक विकास से हमारी आर्थिक स्थिति तो सुधरी लेकिन मानसिक स्थिति खराब हो गयी और हम उस सुधरी हुई आर्थिक स्थिति का भी आनंद नहीं ले पाए | हमारे दुःख कम होने की जगह बढ़ गए |

कविवर दौलतराम जी छहढाला के शुरू में ही लिखते हैं -

*जे त्रिभुवन में जीव अनंत , सुख चाहें दुःख ते भयवन्त |*

*तातें दुखहारी सुखकार, कहें सीख गुरु करुणा धार ||*

सीख अर्थात् शिक्षा |  स्वयम् साक्षात् मोक्षमार्ग पर चलने वाले आचार्य हमारे ऊपर करुणा करके हमें कौन सी शिक्षा देना चाहते हैं ? हमें ऐसा क्या सिखाना चाहते हैं जो सब कुछ सीखने के बाद भी हम सीख नहीं पाए ? और वो कैसे सिखायेंगे ? 

वे हमें सब कुछ सिखाते हैं ,कुछ कह कर सिखाते हैं ,बहुत कुछ बिना कहे ,कुछ करके सिखाते हैं ,बहुत कुछ बिना करे , उनका पूरा जीवन एक पाठशाला होता है ,योग्य शिष्य उनके जीवन की प्रत्येक  क्रिया एवं चर्या से , हर वाक्य से ,उनके हर पल से महाविद्या तक सीख लेता है |

हम सभी के ऐसे ही परम गुरु, भारत की पवित्र धरा पर पिछले पचास वर्षों से वीतरागी नग्न दिगम्बर उन्मुक्त विचरण करने वाले ,परम तपस्वी , स्वानुभवी आचार्य विद्यासागर जी महाराज हैं जिन्होंने स्वयं के कल्याण के साथ साथ हम जैसे जीवों के कल्याण के लिए शाश्वत मोक्षमार्ग की शिक्षा देकर हम सभी का परम उपकार किया है | संयम और ज्ञान की चलती फिरती महापाठशाळा के आप  ऐसे अनोखे  आचार्य हैं जो न सिर्फ कवि,साहित्यकार और विभिन्न भाषायों के वेत्ता हैं बल्कि न्याय,दर्शन ,अध्यात्म और सिद्धांत के महापंडित भी हैं ,ज्ञान के क्षेत्र में जितने ऊँचे हैं ,उससे कहीं अधिक ऊँचे वैराग्य ,तप,संयम की आराधना में हैं | ऐसा मणि-कांचन संयोग सभी में सहज प्राप्त नहीं होता |

विद्यासागर सिर्फ उनका नाम नहीं है यह उनका जीवन है ,वे चलते फिरते पूरे एक विशाल विश्वविद्यालय हैं , वे संयम , तप, वैराग्य , ज्ञान विज्ञान की एक ऐसी नदी हैं जो हज़ारों लोगों की प्यास बुझा रहे हैं , कितने ही भव्य जीव इस नदी में तैरना और तिरना दोनों सीख रहे हैं |

कितने ही उन्हें पढ़कर जानते हैं ,कितने ही उन्हें सुनकर जानते हैं ,कितने ही उन्हें देख कर जानते हैं और न जाने ऐसे कितने लोग हैं जो उन्हें जीने की कोशिश करके उन्हें जानने का प्रयास कर रहे हैं |

 इन सबके बाद भी आज बहुत से लोग ऐसे हैं जो कुछ नया जानना चाहते हैं , जीवन दर्शन को समझना चाहते हैं और जीवन के कल्याण की सच्ची विद्या सीखना चाहते हैं उन्हें इस सदी के महायोगी दिगम्बर जैन आचार्य  विद्यासागर महाराज के एक बार दर्शन अवश्य करना चाहिए ।

Tuesday, April 4, 2017

स्वच्छता और शुद्धता अभियान - दैनिक जागरण ४/४/२०१७


महावीर जयंती पर विशेष - 'भगवान् महावीर का स्वच्छता और शुद्धता अभियान'- डॉ अनेकांत कुमार जैन

चैत्र शुक्ल त्रयोदशी  ९ अप्रैल २०१७ को महावीर जयंती पर विशेष 

भगवान् महावीर का स्वच्छता और शुद्धता अभियान
डॉ अनेकांत कुमार जैन*
वर्तमान में स्वच्छ भारत अभियान आन्दोलन से स्वच्छता ने हमारी भारतीय संस्कृति  के गौरव को पुनः स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है  | भारतीय समाज में इसी तरह का स्वच्छता अभियान भगवान् महावीर ने ईसा की छठी शताब्दी पूर्व  चलाया  था  | उस अभियान को हम शुद्धता का अभियान कह सकते हैं  | भगवान् महावीर ने दो तरह की शुद्धता की बात कही -1. अन्तरंग शुद्धता 2. बहिरंग शुद्धता  | क्रोध, मान, माया,लोभ ये चार कषाये हैं  | ये आत्मा का मल-कचड़ा  है  | भगवान् महावीर ने मनुष्य में सबसे पहली आवश्यकता इस आंतरिक कचड़े को दूर करने की बतायी | उनका स्पष्ट मानना था की यदि क्रोध, मान, माया, लोभ और इसी तरह की अन्य हिंसा का भाव आत्मा में हैं तो वह अशुद्ध है और ऐसी अवस्था में बाहर से चाहे कितना भी नहाया-धोया जाय, साफ़ कपडे पहने जायें वे सब व्यर्थ हैं, क्यों कि किसी पशु की बलि देने से पहले उसे भी नहलाया-धुलाया जाता है, पुजारी भी नहाता है और उस पशु की पूजा करता है  |
            भगवान् माहावीर का मानना था की उस निर्दोष प्राणी के जीवन को समाप्त करने का और प्रसाद में उसके रक्त और मांस सेवन का अभिप्राय तुम्हारे मन में है तो ऐसे पापी का नहाना-धोना,स्वच्छता आदि सब पाखण्ड हैं, अधर्म है | समाज में हिंसा हर जगह होती है  | उसके अहिंसक समाधान भी धैर्य पूर्वक खोजे जा सकते हैं किन्तु जब धर्म के नाम पर ही हिंसा होने लगे तो इससे बड़ी सामाजिक गन्दगी कुछ नहीं हो सकती  |उन्होंने समाज से इस प्रकार की गन्दगी को हटाने का संसार का सबसे बड़ा ‘स्वच्छता-अभियान’ प्रारंभ किया |
            भारत में पवित्र वैदिक संस्कृति को यज्ञादि में पशु बलि प्रथा ने विकृत कर रखा था  | भगवान् महावीर से पूर्व तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने राजकुमार अवस्था में एक तापस ऋषि को यज्ञ के लिए लकड़ी जलने से यह कहकर मना किया कि इसके भीतर एक सर्पयुगल रहता है | मना करने के बाद भी ऋषि ने क्रोध में वह लकड़ी जलाई और काफी अनुरोध पर जब लकड़ी चीरकर देखी गयी तो उसमें झुलसे हुए सर्प युगल निकले और उनका प्राणांत हो गया  | उसके बाद भगवान् महावीर ने भारतीय समाज में फैली तमाम बुराईयों को दूर करने का प्रयास किया  | भगवान् महावीर के अभियान का यदि हम अभिप्राय समझें तो यह अभिव्यक्त होता है कि ‘शुद्धता’ एक व्यापक दृष्टिकोण है जिसका एक अंग है ‘स्वच्छता’ |
            अगर आपके भीतर जीवों के प्रति मैत्री, करुणा, दया या अहिंसा का भाव नहीं है और आप बाहरी साफ़-सफाई सिर्फ इसलिए करते हैं कि स्वयं आपको रोग न हो जाये तो यह ‘स्वच्छता’ है किन्तु इस क्रिया में आप साफ़-सफाई इसलिए भी करते हैं कि दूसरे जीवों को भी कष्ट न हो, सभी स्वस्थ रहें, जीवित रहें तो अहिंसा का अभिप्राय मुख्य होने से वह ‘शुद्धता’ की कोटि में आता है |
जैन साधु हमेशा मयूर पंख की एक पिच्छी साथ में रखते हैं | किसलिए? जब वे चलते हैं, बैठते हैं, या कोई ग्रन्थ आदि कहीं पर रखते हैं तो पहले मयूर पिच्छी से उस स्थान को एक बार बुहार लेते हैं | जगह की सफाई करके ही वहां बैठते हैं | सामान्य जन को एक बार लगेगा कि यह मयूर पिच्छी, साफ़-सफाई का उपकरण (झाडू) है; लेकिन जैन आगमों में इसे ‘संयम का उपकरण’ कहा है | कार्य सफाई का है लेकिन उद्देश्य यह है कि यदि बिना साफ किए वहाँ बैठ जायेंगे तो वहाँ दृश्य-अदृश्य, स्थूल, सूक्ष्म जीवों को वेदना हो सकती है, उनका प्राणांत हो सकता है अतः मयूर पंख की पिच्छी से विनम्रता पूर्वक उन्हें वहाँ से अलग कर दें तो हिंसा नहीं होगी |अब इस कार्य के लिए झाडू भी रखी जा सकती थी; किन्तु मयूर पंख की अत्यंत कोमलता के कारण ही पिच्छी को चुना गया | मयूर पिच्छी से जब सूक्ष्म जीवों को भी वहाँ से हटाया जाता है तो उसकी कोमलता से उन्हें बहुत अल्प कष्ट ही होता है |भगवान् की अत्यंत करुणा से युक्त ऐसा अभियान ‘शुद्धता’ का था जिसमें स्वच्छता तो स्वभाव से गर्भित रहती ही है |वे सच्चे साधु के लिए मठ-आश्रम बनाने के भी खिलाफ थे | उनका मानना था कि जब-जब साधुओं ने मठ व आश्रम बनाये हैं, तब तब वे संसार में फंसे हैं | मठों-आश्रमों को अनाचार का केंद्र बनते देर नहीं लगती |
भगवान् महावीर के प्रथम शिष्य गौतम गणधर ने हर बात पर अहिंसा-अहिंसा सुनकर एक बार उनसे पूछा हे भगवन्-
‘कहं चरे कहं चिट्ठे कहमासे कहं सए  |
कहं भुंजतो मासंतो पावं कम्मं न बंधई 
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          अर्थात् कैसे चलें? कैसे खड़े हों? कैसे बैठे? कैसे सोएं? कैसे खाएं? कैसे बोलें? जिससे पापकर्म का बंधन न हो | तब इस प्रश्न का समाधान करते हुए एक बार भगवान् महावीर ने कहा-
‘जयं चरे जयं चिट्ठे जयमासे जयं सए  |
जयं भुंजन्तो भाजन्तो पावकम्मं न बंधई 
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          अर्थात् सावधानीपूर्वक चलो, सावधानीपूर्वक खड़े हो, सावधानीपूर्वक बैठो, सावधानीपूर्वक सोओ, सावधानीपूर्वक खाओ और सावधानी से वाणी बोलो तो पाप कर्म बंधन नहीं होता |कहने का तात्पर्य क्रिया का निषेध नहीं है बल्कि हर किया के साथ यात्नाचार सम्मिलित हो- यह अपेक्षा है | आप अपनी हर क्रिया में इतनी सावधानी रखें कि दूसरे जीवों की विराधना न हो, कष्ट न हो तो उस क्रिया में पाप बंध नहीं होगा |
            आज भी जैन मुनि यत्र-तत्र कहीं भी आहार नहीं लेते | गृहस्थ लोग अपने चौके (रसोई) को पहले पूर्णतः शुद्ध करते हैं, उस दिन वे शास्त्रीय पद्धति से शुद्ध आहार का निर्माण करते हैं तथा स्वयं ग्रहण करने से पहले पूर्व किन्हीं मुनिराज को आहार हेतु निमंत्रित करते हैं, मुनिराज भी पहले उससे संकल्प करवाते हैं कि ‘मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि आहार जल शुद्ध है,’ तभी वे उसके यहाँ मात्र एक समय पाणी-पात्र में खड़े होकर थोड़ा सा आहार ग्रहण करते हैं |इसी बीच यदि कहीं भी कोई साफ़-सफाई में अशुद्धाता उन्हें दिखाई दे जाये तो उसे वे अंतराय (विघ्न) जानकार आहार त्याग कर देते हैं |
            जैनधर्म में अहिंसा पर अत्यधिक बल दिया गया है; किन्तु गृहस्थ जीवन में कुछ हिंसाएं न चाहते हुए भी हो जाती हैं अतः कहा गया है कि गृहस्थ व्यक्ति ‘आरंभी हिंसा’ का पूर्ण त्यागी नहीं होता | यह आरंभी हिंसा वही है जो घर-मोहल्ले की साफ़-सफाई, झाडू, बुहारी इत्यादि कार्यों में हो जाती हैं, एक गृहस्थ व्यक्ति को साफ़-सफाई रखना ही चाहिए यह उसका परम कर्तव्य है, धर्म है, बस इतना जरूर कहा गया है कि वह इस साफ-सफाई में भी हिंसा की अल्पता रखे और प्रयास करे कि जीवों को कम से कम कष्ट हो | पहले वह अहिंसक उपायों से ही स्वच्छता रखने का अधिक प्रयास करे  | अहिंसा का विवेक साथ में रहेगा तो ‘स्वच्छता’ ‘शुद्धता’ द्वारा अलंकृत हो जायेगी | 
                                                                                                                 
*अध्यक्ष जैनदर्शन,दर्शन संकाय
श्री लालबहादुरशास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ
नई दिल्ली-११००१६
०९७११३९७७१६
 (यह आलेख ४ /४/२०१७ को दैनिक जागरण में प्रकाशित है )