Saturday, February 18, 2017

द्रव्य कर्म और भावकर्म : वैज्ञानिक चिंतन- डॉ अनेकांत कुमार जैन

द्रव्य कर्म और भावकर्म : वैज्ञानिक चिंतन
डॉ अनेकांत कुमार जैन

जीवन की परिभाषाधर्म और कर्मपर आधारित है |इसमें धर्म मनुष्य की मुक्ति का प्रतीक है और कर्म बंधन का । मनुष्य प्रवृत्ति करता है, कर्म में प्रवृत्त होता है, सुख-दुख का अनुभव करता है, और फिर कर्म से मुक्त होने के लिए धर्म का आचरण करता है, मुक्ति का मार्ग अपनाता है।सांसारिक जीवों का पुद्गलों के कर्म परमाणुओं से अनादिकाल से संबंध रहा है। पुद्गल के परमाणु शुभ-अशुभ रूप में उदयमें आकर जीव को सुख-दुख का अनुभव कराने में सहायक होते हैं। जिन राग द्वेषादि भावों से पुद्गल के परमाणु कर्म रूप बन आत्मा से संबद्ध होते हैं उन्हें भावकर्म और बंधने वाले परमाणुओं को द्रव्य कर्म कहा जाता है।
कर्म शब्दके अनेक अर्थ
            अंग्रेजी में प्रारब्ध अथवा भाग्य के लिए लक (luck) और फैट शब्द प्रचलित है। शुभ अथवा सुखकारी भाग्य को गुडलक (Goodluck) अथवा गुडफैट Goodfate कहा जाता है, तथा ऐसे व्यक्ति को fatefulया लकी (luckey) और अशुभ अथवा दुखी व्यक्ति को अनलकी (Unluckey) कहा जाता है। शुभ कर्म को पुण्य और अशुभ कर्म को पाप कहा जाता है। पश्चिमी जगत् में कर्म शब्द को एक्टिविटी, वर्क, डीड, (activity,work,deed) आदि शब्दों से व्यक्त किया जाता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में प्राणी की सभी क्रियाओं को कर्म कहा जाता है। विभिन्न दर्शनों और धर्मग्रंथों में कर्म का उल्लेख है। व्याकरणाचार्यों ने कहा है- जिस पर कर्ता की क्रिया का फल पड़ता है, अथवा जो कर्ता को प्राप्त होता है वह कर्म है।’’ ‘ऋग्वेदमे बताया गया है कि ‘‘मृत मनुष्य की आँख सूर्य के पास और आत्मा वायु के पास जाती है तथा यह आत्मा अपने कर्म के अनुसार पृथ्वी में, स्वर्ग में, जल में और वनस्पति में जाती है।’’उपनिषद् में कहा गया है कि ‘‘जो आत्मा जैसा कर्म करता है, जैसा आचरण करता है, वैसा ही बनता है। सत्कर्म करता है तो अच्छा बनता है, पाप कर्म करने से पापी बनता है। मनुष्य इच्छा के अनुसार प्राप्त संकल्प करता है, संकल्प के अनुसार कर्म होता है तथा जैसा कर्म करता है वैसा फल प्राप्त करता है।’’ धम्मपद में लिखा है- ‘‘ऊंचे आकाश में, गहरे समुद्र में या पर्वतो की गुफाओं में, इस संसार मे ऐसा कोई भी स्थान नहीं है, जहाँ छिपकर जीव अपने किये हुए पाप कर्मों से छुटकारा पा सके।’’ भगवान बुद्ध ने कहा है-‘‘जो जैसा बीज बोता है, वह वैसा ही फल पाता है।’’ रामायण मे लिखा है-‘‘शरीरधारी जीव स्वयं शुभ या अशुभ कर्म करता है और स्वयं ही उनके फलस्वरूप सुखो ओर दुखोंको भोगता है।’’ महाभारत मे लिखा है- ‘‘यह जगत् कर्मभूमि है, इसमें मनुष्य शुभ कर्मों का शुभ और अशुभ कर्मों का अशुभ फल पाता है।’’ [1]
जैन दर्शन में कर्म के स्वरूप, प्रक्रिया, प्रभाव आदि का विस्तृत और वैज्ञानिक उल्लेख है।वहां भी कर्म शब्‍द के अनेक अर्थ हैं--घटं करोतिमें कर्मकारक कर्मशब्‍द का अर्थ है।[2]कुशल अकुशल कर्ममें पुण्‍य पाप अर्थ है।[3]वैशेषिकों के यहाँ उत्‍क्षेपण अवक्षेपण आदि में कर्म का क्रिया अर्थ वि‍वक्षित है।[4] यहाँ आश्रव के प्रकरण में भी क्रिया अर्थ ही विवक्षित है अन्‍य नहीं ,क्‍योंकि वही जड़ कर्मों के प्रवेश का द्वार है।
कर्म का स्वरुप -
राजवार्तिक में आचार्य अकलंक कहते हैं ‘वीर्यान्‍तराय और ज्ञानावरण के क्षयोपशम की अपेक्षा रखनेवाले आत्‍मा के द्वारा निश्‍चय नय से आत्‍मपरिणाम और पुद्गल के द्वारा पुद्-गलपरिणामतथा व्‍यवहारनय से आत्‍मा के द्वारा पुद्गलपरिणाम और पुद्गल के द्वारा आत्‍मपरिणाम, भी जो किये जायें वह कर्म हैं।कारणभूत परिणामों की प्रशंसा की विवक्षा में कर्तृधर्म आरोप करने पर वही परिणाम स्‍वयं द्रव्‍य और भावरूप कुशल-अ‍कुशल कर्मों को करता है अत: वही कर्म है।‘[5] आप्तपरीक्षा में आचार्य विद्यानंद कहते हैं कि ‘जो जीव को परतन्‍त्र करते हैं अथवा जीव जिनके द्वारा परतन्‍त्र किया जाता है उन्‍हें कर्म कहते हैंअथवा जीव के द्वारा मिथ्‍यादर्शनादि परिणामों से जो किये जाते हैंउपार्जित होते हैं वे कर्म हैं।‘ [6]
कर्म के भेद –
सामान्य से कर्म एक ही है, उसमें कोई भेद नहीं है तथा द्रव्य कर्म और भाव कर्म की अपेक्षा दो प्रकार हो जाते हैं ।[7] उसमें ज्ञानावरण आदि रूप जो पुद्गल द्रव्य का पिंड है वह द्रव्य कर्म है और उस द्रव्य पिंड में जो फल देने की शक्ति है वह भाव कर्म है अथवा कार्य में कारण का व्यवहार होने से उस शक्ति से उत्पन्न हुये जो अज्ञान आदि अथवा क्रोधादि रूप परिणाम हैं वे भी भावकर्म कहलाते हैं । इस कर्म के आठ भेद हैं अथवा इन्हीं आठों के एक सौ अड़तालीस या असंख्यात लोक प्रमाण भेद भी होते हैं ।
१.द्रव्य कर्म-
सब शरीरों की उत्‍पत्ति के मूलकारण कार्मण शरीर को कर्म (द्रव्‍यकर्म) कहते हैं।[8]जीव के जो द्रव्‍यकर्म हैं वे पौद्गलिक हैं और उनके अनेक भेद हैं |[9]
२.भाव कर्म–
भावकर्म दो प्रकारका होता हैजीवगत व पुद्गलगत। भाव क्रोधादिकी व्‍यक्तिरूप जीवगत भावकर्म है और पुद्गलपिंड की शक्तिरूप पुद्गल द्रव्‍यगत भावकर्म है। यहाँ दृ‍ष्‍टान्‍त देकर समझाते हैंजैसे कि मीठे या खट्टे द्रव्‍य को खानेके समय जीव को जो मीठे खट्टेकी व्‍यक्ति का विकल्‍प उत्‍पन्‍न होता है वह जीवगत भाव है; और उस व्‍यक्ति के कारणभूत मीठे-खट्टे द्रव्‍य की जो शक्ति है, वह पुद्गलद्रव्‍यगत भाव है। इस प्रकार जीवगत व पुद्गलगत के भेद से दो प्रकार भावकर्म का स्‍वरूप भावकर्म का कथन करते समय सर्वत्र जानना चाहिए।[10]

कर्म और विज्ञान –
हमारे जगत् के तीन आयाम है-लंबाई, चौडाई और ऊँचाई। वैज्ञानिक जगत में चौथा आयाम है-अदृश्य। हमारे शरीर में जो ग्रंथियों का स्राव है उनका संबंध स्थूल शरीर से होता है। इनसे शरीर और मन प्रभावित होता है। पांचवां आयाम है अमूर्त। इस अमूर्त के साथ कर्म का संबंध है। कर्म के पुद्गल सूक्ष्म हैं। कर्म का संबंध अतीत से है। जैनदर्शन ने ही यह सिद्धांत स्थापित किया कि कर्म पौद्गलिक भी हैं । आत्मा के राग और द्वेष आदि भाव ही आत्मा के साथ कर्म का संबंध कराते हैं । जैन आचार्यों ने क्रोध और मान को द्वेषात्मक अनुभूति और माया तथा लोभ को रागात्मक अनुभूति माना है।[11]
वर्तमान में विज्ञान जड़ भौतिक शरीर की सूक्ष्मतम गुत्थियों को सुलझाने के अन्तिम चरण में है, अत: यही सबसे बड़ अवसर है कि अब वह इसके आगे शरीर को प्रभावित करने वाले कारकों पर अपने अनुसंधान को केन्द्रित करे और इस कार्य में जैन कर्म सिद्धान्त उसे प्रेरणा, मार्गदर्शन तथा समुचित दिशा दे सकता है।धर्म और विज्ञान के सम्मिलन का यही सर्वोत्तम समय है जब विज्ञान अपनी सीमाओं को समझ कर आध्यात्मिक अनुसंधान की ओर उन्मुख हो जिससे आधुनिकता से उत्पन्न विभिन्न समस्याओं का निराकरण कर अप्राकृतिक उत्तेजना तथा सुखाभास के स्थान पर सहज सुख तथा अनंत आनन्द की संभावना साकार हो सके।इसी भाव से जीवन विज्ञान के आवश्यक अंगों शरीर विज्ञान, मनोविज्ञान, जीवविज्ञान, पर्यावरण विज्ञान आदि के सन्दर्भ में कार्माण वर्गणाओं के महत्व की विवेचना करके जैन कर्म सिद्धान्त को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास अवश्य होना चाहिए |जैन कर्म विज्ञान ना केवल आध्यात्मिक उन्नति हेतु सर्वोत्तम सत्य है अपितु भौतिक, शारीरिक एवं मानसिक स्तरों पर भी इसकी तार्किकता एवं उपयोगिता असंदिग्ध है। इसका गहन अध्ययन, मनन तथा वैज्ञानिक अनुसंधान समग्र मानवता, जीव जगत तथा प्राकृतिक पर्यावरण के लिये मंगलमय है जिस पर समस्त विद्वानों एवं वैज्ञानिकों का ध्यान देने की बहुत आवश्यकता है।[12]
द्रव्य कर्म और परमाणु विज्ञान -
जिस प्रकार से प्राचीन चार्वाक आदि नास्तिक दर्शन जड़ वस्तुओं के उपभोग को सर्वोच्च समझकर शरीर को भौतिक वस्तु मानते थे उसी प्रकार आधुनिक भौतिकवादी यंत्रों की उपलब्धि के लिये न केवल दूसरे जीवों तथा मनुष्यों को अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु कलपुर्जे मान रहा है वरन इस अंधी दौड़ में वह स्वयं भी एक यंत्र मात्र बनकर रह गया है। ऐसे में जब विज्ञान हमें बताता है कि हमारे शरीर को नियंत्रित करने वाले तत्वों का पता लगा लिया गया है तो लोगों को यह बहुत बड़ी उपलब्धि नजर आती है। आज जेनेटिक मेपिंग के द्वारा मनुष्य के विभिन्न गुणों को निर्धारित करने वाले विभिन्न जीनों के क्रमों को खोज लिया गया है तथा नित नूतन शोध हमें हमारे विभिन्न गुणों को निर्धारित करने वाले जीनों के बारे में जानकारी दे रहे हैं। फिर भी अभी तक मनुष्यों के पूरे गुणों की गुत्थी सुलझ नहीं पाई है जबकि जैन कर्म सिद्धांत सभी जीवों के गुणों को निर्धारित करने वाले कर्म परमाणुओं के संबंध में विस्तार से विवेचना करता है जिसके अनुसार जीव के न केवल शरीर के गुण वरन उसके सुख, दुख, दर्शन, आयु, नाम,गोत्र आदि का निर्धारण भी कर्म करते हैं।[13]
वस्तुत: जिस जीन एवं जेनेटिक कोड को वैज्ञानिक सर्वेसर्वा मान रहे हैं वह कार्माण वर्गणाओं के समकक्ष अथवा उसके अधीनस्थ कार्य करने वाले अणुमात्र हैं। जिस पर गहन शोध बोध की आवश्यकता है। क्योंकि जहाँ विज्ञान मात्र शारीरिक गुणों पर ही आकर रूक गया है वहीं कर्म सिद्धांत इसके बहुत आगे है। वंशाणु विज्ञान मात्र ये बताता है कि हमारे गुणों को निर्धारित करने वाले अणुओं को उस ने जान लिया है जबकि कर्म सिद्धांत न केवल शरीरेतर बहुतेरे गुणों की विवेचना करता है वरन् यह भी बताता है कि यह गुण किस प्रकार से हमारे साथ संलग्न होते हैं, (आस्रव) किस प्रकार से इन विभिन्न गुणों/कर्मों को रोका जा सकता है (संवर) तथा कैसे इन कर्मों को हटाकर अनंत आनंद पाया जा सकता है (निर्जरा)। इस प्रकार भौतिक स्तर पर भी भौतिक सुख सुविधाओं को निर्धारित करने वाले यांत्रिक वंशानुवाद (जीव थ्योरी) से जैन कर्म सिद्धान्त अधिक तार्किक तथा उपयोगी हैं।[14]
शरीर विज्ञान और कर्म -
आधुनिक शरीर विज्ञान यह स्पष्ट रूप से मानता है कि हमारे शरीर, हमारे विभिन्न तंत्रों तथा विभिन्न अंगों की क्षमतायें अद्भुत तथा असीम हैं, जिसकी तुलना मानव निर्मित किसी भी, कितनी भी महंगी मशीन से नहीं की जा सकती है। हमारा रोग प्रतिरक्षा तंत्र इतना मजबूत है कि हम तमाम रोगों से बखूबी बचे रह सकते हैं। आधुनिक शोध भी यह लगातार बता रहे हैं कि संतुलित खानपान से विशेषकर साग सब्जियों, फलों के द्वारा रोगों को दूर भी किया जा सकता है तथा रोगों को दूर भी रखा जा सकता है। जैन कर्म सिद्धांत कर्मों को बाधक, घातक, आवरण के रूप में मानता है जो कि जीव के विभिन्न गुणों के ऊपर पर्दा डाले रखता है तथा इन कर्मावरणों को काटने के लिये अहिंसा  मूलक आचार विचार तथा आहार पर बल देता है। यही कारण है कि आज अधिकांश जैन धर्मावलम्बी शाकाहारी, स्वस्थ तथा सम्पन्न हैं। आधुनिक विज्ञान के पूर्ण जानकार, अत्यन्त अनुभवी प्राकृतिक चिकित्सकों की तो यह मूल धारणा ही रहती है कि हमारे शरीर में रोग निवारण की असीम शक्ति है तथा इसके विकारों/दोषों को हटाकर इसकी शक्ति को पुन: प्राप्त किया जा सकता है अत: वे अपने उपचार में प्राकृतिक परिवेश, प्राकृतिक साधनों जैसे फल, सब्जी तथा उपवास आदि के द्वारा सफलतापूर्वक लोगों को पूर्णत: सक्षम एवं स्वस्थ बना देते हैं।[15]
होम्योपैथी, नेचुरोपैथी, आयुर्वेद आदि सभी चिकित्सा पद्धतियाँ विकारों को हटाने पर जोर देते हैं। ऐलोपैथी भी शल्य क्रिया के द्वारा विकारों को हटाकर रोग मुक्त करती हैं। उपरोक्त सन्दर्भ में जैन कर्म सिद्धांत की आत्मा की असीम शक्ति के ऊपर कर्मावरण की अवधारणा को देखा एवं लागू किया जा सकता है। कर्म बंध रोकने एवं हटाने के उपायों में मद्य मांसादि का त्याग, सात्विक शाकाहार का उपयोग तथा एकासन उपवास आदि के महत्व को भी भलीभाँति रेखांकित किया जा सकता है। अधिकांश औषधियाँ वनस्पतिजन्य होती है तथा अधिकांश वनस्पतियाँ रोग निवारक होती है। इनके विभिन्न तत्व भिन्न-भिन्न रोगों को हटाते हैं तथा उपवास से स्वास्थ्य सुधरता है, इन सबके बारे में विभिन्न वैज्ञानिक निष्कर्ष हमारे सामने हैं। जैन श्रमणचर्या तो प्राकृतिक चिकित्सकों तथा शरीर वैज्ञानिकों के लिये प्रेरणा तथा शोध का विषय है ही।[16]
भावकर्म और मनोविज्ञान –
            कर्मवाद मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। अत: कर्मशास्त्र को कर्म मनोविज्ञान ही कहना चाहिए। आज के मनोवैज्ञानिक मन की हर समस्या पर अध्ययन और विचार कर रहे हैं, जिन समस्याओं पर कर्मशास्त्रियों ने अध्ययन और विचार किया, उन्हीं समस्याओं पर मनोवैज्ञानिक अध्ययन और विचार कर रहे हैं। यदि मनोविज्ञान के सन्दर्भ में कर्मशास्त्र को पढ़ा जाए तो उसकी अनेक गुत्थियां सुलझ सकती हैं, अस्पष्टताएं स्पष्ट हो सकती हैं। यदि कर्मशास्त्र के संदर्भ में मनोविज्ञान को पढ़ा जाए तो उसकी अपूर्णता को समझा जा सकता है और अब तक अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर खोजे जा सकते हैं। मनोवैज्ञानिक का मत है कि मूल प्रवृत्तियों में परिवर्तन से व्यक्तित्व का विकास किया जा सकता है। चार पद्धितयों द्वारा यह परिवर्तन संभव है
१. अवदमन— (REPRESSION)२. विलयन (INHIBITION)३. मार्गान्तरीकरण (REDIRECTION)
४. शोधन (SUBLIMATION) विलयन पद्धति के अन्तर्गत दो साधन हैं१. निरोध और २. विरोध
दो पारस्परिक विरोधी प्रवृत्तियों को साथ ही उत्तेजित कर देने से मूलप्रवृत्तियों में परिवर्तन लाया जा सकता है। कामप्रवृत्ति के उत्तेजित होने के समय यदि भय अथवा क्रोध उत्पन्न कर दिया जाए तो कामभावना ठंडी पड़ जाएगी। संग्रहप्रवृत्ति त्याग भावना से शान्त की जा सकती है। अत: पातंजल योग दर्शन की प्रतिपक्ष की भावना, जैनागम के क्रोधादि भावों को उपशम(क्षमा) आदि से शांत करना तथा मनोवैज्ञानिक का विलयन (विरोधन) के सिद्धान्त में आश्चर्य कारी साम्यसमानता है। अत: यह समन्वयात्मक ज्ञान आत्मविकास के लिए परम हितकर है। जिसका अध्ययन अपेक्षित है।[17]
उपसंहार
इस प्रकार अनेक प्रकार से जैन दर्शन के कर्म विज्ञान की संयुति आधुनिक विज्ञान के साथ बैठाकर अनेक नये तथ्यों की खोज की जा सकती है | विगत वर्षों में इस विषय पर काफी चर्चाएँ हुई हैं तथा अनेक विज्ञान प्रेमी विद्वानों ने पुस्तकें तथा शोध लेख भी लिखे हैं जो कि अच्छे संकेत हैं किन्तु अभी तक भी गहरे में जा कर बहुत प्रमाणिक अनुसंधान नहीं हो पाए हैं ,उसका मूल कारण यह है कि कर्म सिद्धांत के मर्मज्ञ विद्वान् अब बहुत कम हैं ,जो हैं उन्हें आधुनिक विज्ञान का पर्याप्त ज्ञान नहीं है | इसी प्रकार अनेक लोग ऐसे हैं जिन्हें आधुनिक विज्ञान का अच्छा अभ्यास है , किन्तु कर्म सिद्धांत का अच्छा अभ्यास नहीं है बस रूचिवशात वे जैन धर्म के कर्म सिद्धांत को थोडा बहुत जानते हैंऔर मेरे जैसे अनेक हैं जो न तो विज्ञान के अच्छे ज्ञाता हैं और न ही कर्म विज्ञान में गहरी पकड़ है | यही कारण है कि इस आलेख के माध्यम से मैंने इस विषय पर कुछ चर्चा मात्र की है जो आचार्यों के वचन और आधुनिक अनुसन्धाताओं के लेखों पर आधारित है |

डॉ अनेकांत कुमार जैन
अध्यक्ष –जैनदर्शन,दर्शन संकाय
श्री लालबहादुराशास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ
नई दिल्ली-११००१६
०९७११३९७७१६




[1]अष्टकर्मों का मानव व्यवहार पर प्रभाव- मनोवैज्ञानिक व्याख्या - सरोज कोठारी, अर्हत्वचन(त्रैमासिक) अक्टूबरदिसम्बर२००५
[2]कर्मशब्‍दोऽनेकार्थ:--क्‍वचित्‍कर्तुरीप्सिततमे वर्ततेयथा घटं करोतीति।–राजवार्तिक /६/१/३/५०४/११
[3]क्वचित्‍पुण्‍यापुण्‍यवचन:--यथा ‘‘कुशला‍कुशलं कर्म’’ - आप्‍तमीमांसा / ८
[4]क्वचिच्‍च क्रियावचन:--यथा उत्‍क्षेपणमवक्षेपणमाकुन्‍चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि - वैशेसिक सूत्र ./१/१/७
[5]वीर्यान्‍तरायज्ञानावरणक्षयक्षयोपशमापे‍क्षेण आत्‍मनात्‍मपरिणाम: पुद्गलेन च स्‍वपरिणाम: व्‍यत्‍ययेन च निश्‍चयव्‍यवहारनयापेक्षया क्रियत इति कर्म। करणप्रशंसा विवक्षायां कर्तृधर्माध्‍यारोपे सति स परिणाम: कुशलमकुशलं वा द्रव्‍यभावरूपं करोतीति कर्म।- रा.वा./६/१/७/५०४/२६
[6]जीवं परतन्‍त्रीकुर्वन्ति, स परतन्‍त्री क्रियते वा यस्‍तानि कर्माणि, जीवेन वा मिथ्‍यादर्शनादिपरिणामै: क्रियन्‍ते इति कर्माणि।- आप्‍तप./टी./११३/२९६तथा भ.आ./वि./२०/७१/८ लक्षण नं. २।
[7]    कर्माणि द्विविधान्‍यत्र द्रव्‍यभावविकल्‍पत:।- आप्‍तपरीक्षा /मू./११३
तथा कम्‍मत्तणेण एक्‍कं दव्‍वं भावोत्ति होदि दुविहं तु |- गोम्मटसार कर्मकांड /मू./६/६
[8]सर्वशरीरप्ररोहणबीजभूतं कार्मण शरीरं कर्मेत्‍युच्‍यते। - सर्वार्थसिद्धि /२/२५/१८२/८
[9]द्रव्‍यकर्माणि जीवस्‍य पुद्गलात्‍मान्‍यनेकधा | - आप्‍त.प./मू./११३
[10]भावकर्म द्विविधा भ‍वति। जीवगतं पुद्गलकर्मगतं च। तथाहि-भावक्रोधादिव्‍यक्तिरूपं जीवभावगतं भण्‍यते। पुद्गलपिण्‍डशक्तिरूपं पुद्गलद्रव्‍यगतं। ....................अत्र दृष्‍टान्‍तो यथामधुरकटुकादिद्रव्‍यस्‍य भक्षणकाले जीवस्‍य मधुरकटुकस्‍वादव्‍यक्तिविकल्‍परूपं जीवभावगतं, तद्वयक्तिकारणभूतं मधुरकटुकद्रव्‍यगतं शक्तिरूपं पुद्गलद्रव्‍यगतं। एवं भावकर्मस्‍वरूपं जीवगतं पुद्-गलगतं च द्विधेति भावकर्म व्‍याख्‍यानकाले सर्वत्र ज्ञातव्‍यम् । -समयसार./ता.वृ./१९०-१९२
[11]अष्टकर्मों का मानव व्यवहार पर प्रभाव- मनोवैज्ञानिक व्याख्या- सरोज कोठारी, अर्हत्वचन(त्रैमासिक) अक्टूबरदिसम्बर२००५
[12]आधुनिक विज्ञान के सापेक्ष: मार्गदर्शक,आनंददायी, वीतरागी कर्म विज्ञान-अजित जैन जलज’ –अर्हत्वचन(त्रैमासिक ) जनवरीमार्च २००५ पेज नं ५८-६७'
[13]वही
[14]वही
[15]वही
[16]आधुनिक विज्ञान के सापेक्ष: मार्गदर्शक,आनंददायी, वीतरागी कर्म विज्ञान-अजित जैन जलज’ –अर्हत्वचन(त्रैमासिक ) जनवरीमार्च २००५ पेज नं ५८-६७'
[17]कर्मवाद का मनोवैज्ञानिक पहलू - रतनलाल जैन,अर्हत् वचन, ४ अक्टू-९१. पृ ५१ से ६०

"श्री अजीत पाटनी : सिर्फ नाम ही काफी था !"

"श्री अजीत पाटनी : सिर्फ नाम ही काफी था !"


मैं आज भी विश्वास नहीं कर पा रहा हूँ कि श्री अजीत पाटनी अब इस दुनिया में नहीं हैं। दिगम्बर जैन समाज ने उनके चले जाने से एक जुझारू समर्पित समाजसेवी,पत्रकार खो दिया है। कोलकाता का नाम आये और  श्री अजीत पाटनी जी का स्मरण न हो ऐसा संभव ही नहीं था । मुझे दशलक्षणपर्व पर लगातार कई वर्षों तक कोलकाता के बड़े मंदिर में प्रवचन करने का अवसर प्राप्त हुआ था,उसी दौरान लगातार उनके साथ रहकर उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को करीब से जानने का अवसर भी मिला । मुझे आश्चर्य होता था कि वे बड़ी से बड़ी सामाजिक समस्या को चुटकियों में कैसे सुलझा देते थे ?
उन्हीं दिनों के बाद से उनसे मेरी अक्सर बातचीत होती ही रहती थी । जब मैंने प्राकृत भाषा में समाचार पत्र "पागद-भासा"प्रकाशित किया तो उन्होंने बहुत प्रोत्साहित किया ।मुझे पत्रकारिता का ज्यादा अनुभव न होने से इस कार्य में उन्होंने काफी सहयोग भी किया ।  जैनदर्शन से जुड़ी कोई भी जानकारी उन्हें चाहिए तो वे मुझसे अवश्य संपर्क करते थे । मैंने अनुभव किया कि वे व्यक्तिगत रूप से साम्प्रदायिक दृष्टिकोण के नहीं थे । मेरे साथ वे कई बार बीसपंथ,तेरापंथ,मुमुक्षु,श्वेताम्बर तथा हिन्दू 
समाज के कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक गये और काफी उदार चर्चायें कीं। 
सामाजिक जीवन से भिन्न उनका एक आत्मिक संसार भी था जिसका आभास मुझे उस समय हुआ जब वे अक्सर मुझसे यह कहते थे कि पंडित जी ! मैं इन सामाजिक दायित्वों से ऊपर उठना चाहता हूँ , समाज की लगभग हर मीटिंग में मेरी उपस्थिति अनिवार्य सी मान ली गयी है , आखिर कब तक मैं इस व्यवहार धर्म में उलझा रहूँगा, इस मनुष्य भव में मुझे अपना कल्याण भी तो करना है ।' उनकी यही छटपटाहट उन्हें दिगम्बर मुनिराजों की सेवा में संलग्न रखती थी । पूज्य आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज के पास उनके चाचा जी की जब दीक्षा हो रही थी तब वे इतने उत्साहित थे मानो स्वयं की दीक्षा हो रही हो । 
 किसी कारण से वे स्वयं दीक्षित नहीं हो पा रहे थे , तो जो जीव संयम के उत्कृष्ट मार्ग पर चल रहे हैं उनकी सेवा करके ,उनकी अनुमोदना करके वे अपने जीवन को सार्थक करने में लगे थे । 
श्रवणबेलगोला को मैं जैनों की काशी मानता हूँ,सल्लेखना समाधि के लिए इस तीर्थ का नाम इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है । यह भी एक विचित्र संयोग है कि वे अपने अंतिम दिनों में इस तीर्थ पर ही रहे , श्री मठ के पास , भगवान बाहुबली के चरणों में कानजी स्वामी निलय में उन्होंने अंतिम साँसें लीं । आई सी यू आदि में वेन्टीलेटर आदि के साथ देहविसर्जन की अपेक्षा , इस तरह तीर्थ आदि में   कोई अंतिम श्वास ले तो इसे भी मैं उस जीव के पुण्य का ही फल मानता हूँ,और क्षेत्र मंगल की विवक्षा से उनकी इस तरह की अंतिम यात्रा को मांगलिक मरण कह सकता हूँ ।
उन्हें हर जन्म में आप्तागमतपोभृताम् का सान्निध्य प्राप्त हो ताकि वे तत्वज्ञानपूर्वक संयम धारण करके स्वानुभूति को प्राप्त कर अपना मूल लक्ष्य प्राप्त कर सकें । इन्हीं भावनाओं के साथ उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ।
-डॉ अनेकान्त कुमार जैन,जिन फाउंडेशन, नई दिल्ली 

Friday, January 6, 2017

सर्वधर्म समभाव मतलब क्या ?=डॉ अनेकांत कुमार जैन

गुरु  गोविन्द  सिंह  जी  की  ३५० वीं  जयंती  के  अवसर  पर 27 /12/2016  को  धर्म अध्ययन विभाग ,पंजाबी  विश्व विद्यालय  ,पटियाला  द्वारा  आयोजित  सर्व धर्म  समभाव  पर आधारित  राष्ट्रीय  सम्मेलन  के  उद्घाटन  में  प्रदत्त  मुख्य भाषण  का  सार  


सर्वधर्म समभाव मतलब क्या ?

डॉ अनेकांत कुमार जैन*

धर्म एक होता है अनेक नहीं ,इसलिए सर्वधर्म शब्द कहने में मुझे हमेशा संकोच होता है ,जब एक ही है तो सर्व शब्द लगाने की आवश्यकता ही क्या है ? और समभाव ही तो धर्म है तो फिर अलग से इसके उच्चारण का क्या औचित्य है ? हाँ , यहाँ धर्म का अर्थ सम्प्रदाय से लगाया जा रहा है तो बात अलग है | फिर शीर्षक होना चाहिए ‘सर्व सम्प्रदाय अनुयायी समभाव’ |क्यों कि समभाव की आवश्यकता  सम्प्रदायों  को ज्यादा है  और उससे भी ज्यादा उनके अनुयायियों को उसकी आवश्यकता है | धर्म शब्द को अक्सर सीमित अर्थों में देखा जाता है इसीलिए समस्या हो जाती है |

समन्वय का मतलब –

‘‘मैं जैन धर्म का अनुयायी हूँ , उन सभी लोगों की मैं चिंता करता हूँ जो जैन हैं | मुझे आपकी भी चिंता हो सकती है ,आपसे मेरा कोई द्वेष नहीं है किन्तु आपके धर्म से समस्या है ,आप ऐसा करें जैन धर्म अपना लें ,तो मैं आपकी भी चिंता करूँगा |’’- यह चिंतन समन्वय का नहीं है | यह विलय का चिंतन है | दीवान टोडरमल जैन ने फतेहगढ़ साहिब में गुरु गोविन्द सिंह जी के दीवार में चुनवा कर मार दिए गए पुत्रों के अंतिम संस्कार के लिए नबाब से सोने के सिक्के बिछा कर उस बराबर जमीन ली ,तो यह शर्त नहीं रखी कि आपको जैन धर्म अपनाना पड़ेगा | यह समभाव है ,समन्वय है | समन्वय की आड़ में जब विलय की राजनीती होती है तभी समभाव बिगड़ता है | समभाव भारत की नस नस में है ,वह उसकी आत्मा है |बस हमें उसे पहचानने की आवश्यकता है |

विरोधी के साथ व्यवहार –

हमारे समभाव की परीक्षा इस बात से होती है कि हम अपने विरोधियों के साथ क्या व्यवहार अपनाते हैं ?क्या  हम अपने विचारों से विपरीत विचार वाले के साथ उठ बैठ लेते हैं ? उसे बने रहने देना चाहते हैं या कि समाप्त करना चाहते हैं ? यदि हम उसे जड़ से ख़त्म करना चाहते हैं ,उसे मार डालना चाहते हैं तो हमारे समभाव की नीति बहुत संदेहास्पद है | हम समभाव को समझे ही नहीं |अपने विरोध को भी सहज स्वीकारे  और सहन किये बिना हम समभाव की साधना नहीं कर सकते |

गांधी जी का विचार –

महात्मा गांधी जी ने इस विषय पर बहुत संतुलित विचार प्रस्तुत किया – ‘अपने व्रतों में जिस व्रत को हम लोग सहिष्णुता के नाम से जानते हैं, उसे यह नया नाम दिया है। सहिष्णुता अंग्रेजी शब्द टालरेशनका अनुवाद है। यह मुझे पसन्द न आया था। या दूसरा शब्द सूझता न था, काका साहब को भी उन्होंने सर्वधर्म आदरशब्द सुझाया। मुझे वह भी अच्छा न लगा। दूसरे धर्मों को सहन करने में उनमें न्यूनता मान ली जाती है। आदर में कृपा का भाव आता है। अहिंसा हमें दूसरे धर्मों के प्रति समभाव सिखाती है। आदर और सहिष्णुता अहिंसा की दृष्टि से पर्याप्त नहीं हैं। दूसरे धर्मों के प्रति समभाव रखने के मूल में अपने धर्म की अपूर्णता का स्वीकार भी आ ही जाता है। और सत्य की आराधना, अहिंसा की कसौटी यही सिखाती है। सम्पूर्ण सत्य यदि हमने देखा होता तो फिर सत्य का आग्रह कैसा? तब तो हम परमेश्वर हो गये, क्योंकि यह हमारी भावना है कि सत्य ही परमेश्वर है हम पूर्ण सत्य को नहीं पहचानते, इसी लिए उसका आग्रह करते हैं इसी से पुरुषार्थ की गुँजाइश है। इसमें अपनी अपूर्णता को मान लेना आ गया। हम अपूर्ण तो हमारे द्वारा कल्पित धर्म भी अपूर्ण, स्वतन्त्र धर्म सम्पूर्ण है। उसे हमने नहीं देखा जिस तरह ईश्वर को हमने नहीं देखा। हमारा माना हुआ धर्म अपूर्ण है और उसमें सदा परिवर्तन हुआ करता है, होता रहेगा। ऐसा होने से ही हम उत्तरोत्तर ऊपर उठ सकते हैं, सत्य की ओर ईश्वर की ओर दिन प्रतिदिन आगे बढ़ सकते हैं। और यदि मनुष्य कल्पित सभी धर्मों को अपूर्ण मान ले तो फिर किसी को ऊंच-नीच मानने की बात नहीं रह जाती। सभी सच्चे हैं, पर सभी अपूर्ण हैं, इसलिए दोष के पात्र हैं। समभाव होने पर भी हम उसमें दोष देख सकते हैं। हमें अपने में भी दोष देखने चाहिये। उस दोष के कारण उसका त्याग न करें, पर दोष दूर न करें। यों समभाव रखें तो दूसरे धर्मों में जो कुछ ग्राह्य जान पड़े उसे अपने धर्मों में स्थान देते संकोच न हो, इतना ही नहीं, वैसा करना धर्म हो जाय । (‘सर्वधर्म समभाव’अखंड ज्योति, पृष्ठ ८ जनवरी १९४१)

यह विषय अत्यंत गंभीर और समसामयिक है | तमाम आग्रहों से मुक्त होकर हमें इस विषय पर खुल कर चिंतन करना होगा कि क्या कभी सच्चे ह्रदय से हम अपने बच्चों परिवार के अन्य सदस्यों को अपने से अन्य धर्मों की विशालता या गंभीरता समझाते हैं ? क्या मंदिरों,मस्जिदों,गुरुद्वारों,चर्चों और अन्य धार्मिक स्थलों पर दी जाने वाली धार्मिक शिक्षाओं में अपने से अन्य धर्मों को अच्छा बतलाते हैं ?यदि हाँ , तो हमें हक़ है कि हम समभाव की बात करें | यदि नहीं ...तो ‘सर्वधर्म समभाव’ की बातें हम किस हक़ से करते हैं ? ये छद्म मंचीय समभाव जता कर हम समाज को और आने वाली पीढ़ी को धोखे में क्यों डालते हैं ? मैं मानता हूँ भारत में सामजिक स्तर पर यह समभाव हमेशा से रहा है और रहेगा- यदि राजनैतिक दल और धार्मिक ठेकेदार इसमें हस्तक्षेप करना बंद कर दें | अधिकांशतः इन्हीं के छद्म सर्वधर्म समभाव ने ही माहौल बिगाड़ा है | अतः हमें शिक्षाविदों को इनसे बहुत सतर्क होकर विद्यार्थियों के माध्यम से ,इस प्रकार के सम्मेलनों के माध्यम से वास्तविक समभाव को समाज तक पहुँचाने का पुनीत कार्य करना है |


*अध्यक्ष –जैन दर्शन ,दर्शन संकाय,श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ (मानित विश्वविद्यालय ),क़ुतुब संस्थानिक क्षेत्र , नयी दिल्ली - 110016 , Ph.09711397716 , anekant76@gmail.com