Wednesday, May 15, 2019

प्रो०डॉ अनेकांत कुमार जैन संक्षिप्त परिचय


संक्षिप्त परिचय
प्रो०डॉ अनेकांत कुमार जैन
शिक्षा-एम.ए.(जैन विद्या एवं तुलनात्मक धर्मदर्शन)   ,जैनदर्शनाचार्य, पी-एच.डी, NET/JRF
पिता- प्रो.डॉ.फूलचन्द जैन प्रेमी,वाराणसी,  माता - श्रीमती डॉ मुन्नीपुष्पा जैन,वाराणसी
प्रकाशन
१.बारह ग्रंथों का लेखन और संपादन
२.लगभग ७० शोधपत्र, राष्ट्रिय / अन्ताराष्ट्रिय शोध-पत्रिकाओं में हिन्दी, संस्कृत तथा अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित।
३.विभिन्न राष्ट्रिय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में धर्म-संस्कृति तथा समसामयिक विषयों पर शताधिक लेख ,कवितायेँ और कहानियां प्रकाशित।
४.प्राकृत भाषा की प्रथम पत्रिका ‘पागद-भासा’के मुख्य संपादक तथा अनेक पत्र पत्रिकाओं के संपादक मंडल के सदस्य  
पुरस्कार / उपाधियाँ / सम्मान -
१. महर्षि वादरायण व्यास युवा राष्ट्रपति पुरस्कार २.महावीर पुरस्कार ३. शास्त्रिपरिषद पुरस्कार ४.विद्वत्परिषद पुरस्कार ५.कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ पुरस्कार ६. अर्हत्वचन पुरस्कार  ७.जैन सिद्धांत भास्कर ८.युवा वाचस्पति ९. अहिंसा इन्टरनेशनल अवार्ड १०.दिल्ली सरकार द्वारा श्रेष्ठ शिक्षक सम्मान  आदि
अन्य योगदान -
          १.देश/विदेश में लगभग पचास राष्ट्रिय/अन्तर्राष्ट्रिय सेमिनारों में शोधपत्र प्रस्तुत।
         २.सभा संचालन/प्रखर वक्ता/दूरदर्शन आकाशवाणी केन्द्र वार्ता/स्क्रिप्ट लेखन / काव्य-कहानी लेखन
         ३.ब्लॉग लेखन ,ऑनलाइन शिक्षण ,आध्यात्मिक प्रवचनकार
         ३.जैन ध्यान योग , तनाव प्रबंधन,मोटिवेशनल आदि कार्यशालाओं के विशेषज्ञ
          ४.जापान तथा ताइवान में विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित सर्वधर्म अन्तर्राष्ट्रिय
             सम्मेलन में भारत से जैनधर्म का प्रतिनिधित्व ।
         ५.राष्ट्रिय मूल्याङ्कन एवं प्रत्यायन परिषद(NAAC) के टीम सदस्य
सम्प्रति : अध्यक्ष – जैनदर्शनविभाग  ,दर्शन संकाय , श्रीलालबहादुर शास्त्री राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ ; (मानव संसाधन विकास मंत्रालयाधीन मानित विश्वविद्यालय) कुतुबसांस्थानिक क्षेत्र, नई दिल्ली-110016
सम्पर्क सूत्र : जिन फाउण्डेशन, A93/7A, नन्दा हास्पिटल के पीछे, छत्तरपुर एक्सटेंशन ,नई दिल्ली-110074, Phone 9711397716 ,9868098396
                                    https://www.facebook.com/PrakritLanguage/
                                 https://www.facebook.com/AhimsaDarshanahinsaDarsana/
                     https://www.facebook.com/DepartmentOfJainPhilosophy/

Sunday, May 5, 2019

मैं मतदान करता हूं , मतिदान नहीं - डॉ. अनेकांत जैन

मैं मतदान करता हूं , मतिदान नहीं
         - डॉ. अनेकांत जैन

मैं हमेशा उस प्रत्याशी को वोट देता हूं जो साफ छवि का हो , राष्ट्र भक्त हो ,अपेक्षाकृत ज्यादा ईमानदार हो, जिसका इरादा नेक हों। भले ही वह किसी भी जाति ,धर्म,पंथ,संप्रदाय,भाषा या क्षेत्र का हो ।

कभी कभी ऐसे प्रत्याशी हार भी जाते हैं , लेकिन मैं तब भी उन्हें ही वोट देता हूं । मुझे यह संतोष रहता है कि मैंने गलत का साथ नहीं दिया । और उस प्रत्याशी को भी इस बात की प्रसन्नता रहती है कि कुछ लोग तो हैं जो अच्छाई पसंद करते हैं ।

जमाना भले ही उसके खिलाफ हो ।
वोट उसे ही जिसकी नीयत साफ हो ।।

सुधरे मतदाता , नेता मतदाता से ,राष्ट्र स्वयं सुधरेगा ।

Saturday, May 4, 2019

नेता ईमानदार तभी मिलेगा जब मतदाता ईमानदार हो

हम सभी चाहते हैं कि

एक ऐसा व्यक्ति भारत का प्रधान मंत्री होना चाहिए जो जन आंदोलनों से उभरा हो ,जिसने जनता का दर्द महसूस किया हो । जिसमें विदेशी कूटनीति की गहरी समझ हो । जो सिर्फ अच्छा प्रशासक ही न हो बल्कि एक सच्चा समाज सेवक भी हो । समाज में,राष्ट्र में किसी नए परिवर्तन का पुरोधा हो । जो राष्ट्र को मजबूती प्रदान करने की क्षमता रखता हो । जो धार्मिक हो , आध्यात्मिक हो किन्तु सांप्रदायिक न हो । जो जाति,भाषा,धर्म के नाम पर  देश को बंटने से रोके । जो सभी को समान दृष्टि से देखता हो । स्वयं चारित्र निष्ठ हो ।आत्मानुशासित हो , निरहंकार हो , सादगी और विनम्रता की मिसाल हो । दिल का अमीर हो ,न्यायप्रिय हो । ईमानदार हो और नीयत साफ हो ।

यह सब तभी संभव है जब मतदाता ईमानदार , समझदार , विवेकशील और देश भक्त हो ।

मतदाता अर्थात् राष्ट्र निर्माता ।

जमाना भले ही उसके खिलाफ हो ,
वोट उसे जिसकी नीयत साफ हो ।

 

Saturday, April 20, 2019

स्वच्छता अभियान और भगवान् महावीर

भगवान् महावीर का स्वच्छता और शुद्धता अभियान


प्रो अनेकांत कुमार जैन*


वर्तमान में स्वच्छ भारत अभियान आन्दोलन से स्वच्छता ने हमारी भारतीय संस्कृति  के गौरव को पुनः स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है  | भारतीय समाज में इसी तरह का स्वच्छता अभियान भगवान् महावीर ने ईसा की छठी शताब्दी पूर्व  चलाया  था  | उस अभियान को हम शुद्धता का अभियान कह सकते हैं  | भगवान् महावीर ने दो तरह की शुद्धता की बात कही -1. अन्तरंग शुद्धता 2. बहिरंग शुद्धता  | क्रोध, मान, माया,लोभ ये चार कषाये हैं  | ये आत्मा का मल-कचड़ा  है  | भगवान्महावीर ने मनुष्य में सबसे पहली आवश्यकता इस आंतरिक कचड़े को दूर करने की बतायी | उनका स्पष्ट मानना था की यदि क्रोध, मान, माया, लोभ और इसी तरह की अन्य हिंसा का भाव आत्मा में हैं तो वह अशुद्ध है और ऐसी अवस्था में बाहर से चाहे कितना भी नहाया-धोया जाय, साफ़ कपडे पहने जायें वे सब व्यर्थ हैं, क्यों कि किसी पशु की बलि देने से पहले उसे भी नहलाया-धुलाया जाता है, पुजारी भी नहाता है और उस पशु की पूजा करता है  |

            भगवान् महावीर का मानना था की उस निर्दोष प्राणी के जीवन को समाप्त करने का और प्रसाद में उसके रक्त और मांस सेवन का अभिप्राय तुम्हारे मन में है तो ऐसे पापी का नहाना-धोना,स्वच्छता आदि सब पाखण्ड हैं, अधर्म है | समाज में हिंसा हर जगह होती है  | उसके अहिंसक समाधान भी धैर्य पूर्वक खोजे जा सकते हैं किन्तु जब धर्म के नाम पर ही हिंसा होने लगे तो इससे बड़ी सामाजिक गन्दगी कुछ नहीं हो सकती  | उन्होंने समाज से इस प्रकार की गन्दगी को हटाने का संसार का सबसे बड़ा ‘स्वच्छता-अभियान’ प्रारंभ किया |

            भारत में पवित्र वैदिक संस्कृति को यज्ञादि में पशु बलि प्रथा ने विकृत कर रखा था  | भगवान् महावीर से पूर्व तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने राजकुमार अवस्था में एक तापस ऋषि को यज्ञ के लिए लकड़ी जलने से यह कहकर मना किया कि इसके भीतर एक सर्पयुगल रहता है | मना करने के बाद भी ऋषि ने क्रोध में वह लकड़ी जलाई और काफी अनुरोध पर जब लकड़ी चीरकर देखी गयी तो उसमें झुलसे हुए सर्प युगल निकले और उनका प्राणांत हो गया  | उसके बाद भगवान् महावीर ने भारतीय समाज में फैली तमाम बुराईयों को दूर करने का प्रयास किया  | भगवान् महावीर के अभियान का यदि हम अभिप्राय समझें तो यह अभिव्यक्त होता है कि ‘शुद्धता’ एक व्यापक दृष्टिकोण है जिसका एक अंग है ‘स्वच्छता’ |

            अगर आपके भीतर जीवों के प्रति मैत्री, करुणा, दया या अहिंसा का भाव नहीं है और आप बाहरी साफ़-सफाई सिर्फ इसलिए करते हैं कि स्वयं आपको रोग न हो जाये तो यह ‘स्वच्छता’ है किन्तु इस क्रिया में आप साफ़-सफाई इसलिए भी करते हैं कि दूसरे जीवों को भी कष्ट न हो, सभी स्वस्थ रहें, जीवित रहें तो अहिंसा का अभिप्राय मुख्य होने से वह ‘शुद्धता’ की कोटि में आता है |

जैन साधु हमेशा मयूर पंख की एक पिच्छी साथ में रखते हैं |किसलिए? जब वे चलते हैं, बैठते हैं, या कोई ग्रन्थ आदि कहीं पर रखते हैं तो पहले मयूर पिच्छी से उस स्थान को एक बार बुहार लेते हैं | जगह की सफाई करके ही वहां बैठते हैं |सामान्य जन को एक बार लगेगा कि यह मयूर पिच्छी, साफ़-सफाई का उपकरण (झाडू) है; लेकिन जैन आगमों में इसे ‘संयम का उपकरण’ कहा है | कार्य सफाई का है लेकिन उद्देश्य यह है कि यदि बिना साफ किए वहाँ बैठ जायेंगे तो वहाँ दृश्य-अदृश्य, स्थूल, सूक्ष्म जीवों को वेदना हो सकती है, उनका प्राणांत हो सकता है अतः मयूर पंख की पिच्छी से विनम्रता पूर्वक उन्हें वहाँ से अलग कर दें तो हिंसा नहीं होगी |अब इस कार्य के लिए झाडू भी रखी जा सकती थी; किन्तु मयूर पंख की अत्यंत कोमलता के कारण ही पिच्छी को चुना गया | मयूर पिच्छी से जब सूक्ष्म जीवों को भी वहाँ से हटाया जाता है तो उसकी कोमलता से उन्हें बहुत अल्प कष्ट ही होता है |भगवान् की अत्यंत करुणा से युक्त ऐसा अभियान ‘शुद्धता’ का था जिसमें स्वच्छता तो स्वभाव से गर्भित रहती ही है |वे सच्चे साधु के लिए मठ-आश्रम बनाने के भी खिलाफ थे |उनका मानना था कि जब-जब साधुओं ने मठ व आश्रम बनाये हैं, तब तब वे संसार में फंसे हैं | मठों-आश्रमों को अनाचार का केंद्र बनते देर नहीं लगती |

भगवान् महावीर के प्रथम शिष्य गौतम गणधर ने हर बात पर अहिंसा-अहिंसा सुनकर एक बार उनसे पूछा हे भगवन्-

‘कहं चरे कहं चिट्ठे कहमासे कहं सए  |
कहं भुंजतो मासंतो पावं कम्मं न बंधई  | |’


          अर्थात् कैसे चलें? कैसे खड़े हों? कैसे बैठे? कैसे सोएं? कैसे खाएं? कैसे बोलें? जिससे पापकर्म का बंधन न हो | तब इस प्रश्न का समाधान करते हुए एक बार भगवान् महावीर ने कहा-

‘जयं चरे जयं चिट्ठे जयमासे जयं सए  |
जयं भुंजन्तो भाजन्तो पावकम्मं न बंधई  | |’


          अर्थात् सावधानीपूर्वक चलो, सावधानीपूर्वक खड़े हो, सावधानीपूर्वक बैठो, सावधानीपूर्वक सोओ, सावधानीपूर्वक खाओ और सावधानी से वाणी बोलो तो पाप कर्म बंधन नहीं होता |कहने का तात्पर्य क्रिया का निषेध नहीं है बल्कि हर किया के साथ यत्नाचार सम्मिलित हो- यह अपेक्षा है | आप अपनी हर क्रिया में इतनी सावधानी रखें कि दूसरे जीवों की विराधना न हो, कष्ट न हो तो उस क्रिया में पाप बंध नहीं होगा |

            आज भी जैन मुनि यत्र-तत्र कहीं भी आहार नहीं लेते | गृहस्थ लोग अपने चौके (रसोई) को पहले पूर्णतः शुद्ध करते हैं, उस दिन वे शास्त्रीय पद्धति से शुद्ध आहार का निर्माण करते हैं तथा स्वयं ग्रहण करने से पहले पूर्व किन्हीं मुनिराज को आहार हेतु निमंत्रित करते हैं, मुनिराज भी पहले उससे संकल्प करवाते हैं कि ‘मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि आहार जल शुद्ध है,’ तभी वे उसके यहाँ मात्र एक समय पाणी-पात्र में खड़े होकर थोड़ा सा आहार ग्रहण करते हैं |इसी बीच यदि कहीं भी कोई साफ़-सफाई में अशुद्धता उन्हें दिखाई दे जाये तो उसे वे अंतराय (विघ्न) जानकार आहार त्याग कर देते हैं |

            जैनधर्म में अहिंसा पर अत्यधिक बल दिया गया है; किन्तु गृहस्थ जीवन में कुछ हिंसाएं न चाहते हुए भी हो जाती हैं अतः कहा गया है कि गृहस्थ व्यक्ति ‘आरंभी हिंसा’ का पूर्ण त्यागी नहीं होता | यह आरंभी हिंसा वही है जो घर-मोहल्ले की साफ़-सफाई, झाडू, बुहारी इत्यादि कार्यों में हो जाती हैं, एक गृहस्थ व्यक्ति को साफ़-सफाई रखना ही चाहिए यह उसका परम कर्तव्य है, धर्म है, बस इतना जरूर कहा गया है कि वह इस साफ-सफाई में भी हिंसा की अल्पता रखे और प्रयास करे कि जीवों को कम से कम कष्ट हो | पहले वह अहिंसक उपायों से ही स्वच्छता रखने का अधिक प्रयास करे  |अहिंसा का विवेक साथ में रहेगा तो ‘स्वच्छता’ ‘शुद्धता’ द्वारा अलंकृत हो जायेगी | 

महावीर गंदगी साफ़ करने ज्यादा बल नहीं देते बल्कि वे वह बात करते हैं जिससे गंदगी पैदा ही न हो | गंदगी साफ़ करना तो मजबूरी है ,जैन परंपरा में उसे मजबूरी माना गया है | कई स्थलों पर तो साफ़ सफाई करने के बाद प्रायश्चित्त का विधान है क्यों कि गंदगी साफ़ करेंगे तो हिंसा होगी |आलोचना-पाठ में कहा है –

‘‘झाड़ू ले जगा बुहारी | चींटी आदिक जीव विदारी ||’’

जैन परंपरा में रोज घर की सफाई करने को भी कहा गया और इसे बहुत अच्छा भी नहीं माना गया | क्यों कि पाप धोना कोई उत्कृष्ट बात नहीं है वह मजबूरी है | महावीर कहते हैं कि यदि पाप धोने को उत्कृष्ट कार्य मानेंगे तो पाप करने की प्रेरणा मिलेगी | ये वैसा ही है जैसा कि आज कल टेलीविजन पर साबुन के विज्ञापन में कहते हैं कि ‘ दाग अच्छे हैं’ क्यों कि हमारे साबुन से तुरंत धुल जाते हैं | महावीर कोई साबुन बेचने के पक्ष में नहीं हैं इसलिए वे दाग को अच्छा नहीं कह सकते | उनका मानना है कि सबसे उत्कृष्ट धर्म यह है कि इस तरह रहो कि दाग लगें ही न , ताकि उन्हें धोने की जरूरत न पड़े | पाप धोना हमारी मजबूरी होना चाहिए शौक नहीं | ठीक यही बात महावीर स्वच्छता को लेकर समझाना चाह रहे हैं कि एक तरफ तुम खुद ही अपने प्रमाद से गंदगी पैदा करोगे और फिर स्वच्छता अभियान चलाओगे तो यह तो ठीक बात नहीं है | स्वच्छता उसे कहते हैं जहाँ गंदगी पैदा ही न हो | इसलिए सफाई रखना जरूरी है लेकिन सफाई करना मजबूरी है | सर्वप्रथम हमारी जीवन शैली ऐसी होनी चाहिए जिससे कचड़ा पैदा ही न हो , और बहुत बचाने पर भी जो कचड़ा हो ही जाय उसका कुशलता पूर्वक निपटारा किया जाय ताकि ऐसा न हो कि वह किसी नयी समस्या की वजह बन जाय |हम कह सकते हैं कि भगवान् महावीर ने सफाई करो की जगह सफाई रखो पर ज्यादा जोर दिया जो काफी प्रासंगिक है | अतः हम शुद्धता से रहें ताकि स्वच्छता की जरूरत ही न पड़े |

*अध्यक्ष –जैनदर्शन विभाग ,दर्शन संकाय

श्री लालबहादुरशास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ (मानित विश्वविद्यालय )

नई दिल्ली-११००१६

०९७११३९७७१६

drakjain2016@gmail.com

 

Monday, April 15, 2019

भगवान् महावीर की भाषा को समझें

महावीर जयंती पर विशेष -


भगवान् महावीर की भाषा को समझें


प्रो.डॉ अनेकांत कुमार जैन,नई दिल्ली


हम भगवान् महावीर को जानना समझना चाहते हैं किन्तु जब तक हम उनकी भाषा और शैली को नहीं समझेंगे तब तक क्या हम उनके उपदेशों को सही अर्थों में समझ पाएंगे ? भगवान् महावीर ने जो सबसे बड़ी क्रांति की थी वह थी उनकी संवाद शैली | जिस अतीन्द्रिय ज्ञान के माध्यम से उन्होंने आत्मा के सत्य के बहुआयामी स्वरुप को जान लिया था उसे व्याख्यायित करते समय उनके सामने दो समस्याए थीं एक तो सभी लोग संस्कृत नहीं जानते थे और दूसरा इन्द्रिय ,वाणी और शब्दों की सीमित शक्ति वस्तु के परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले बहु आयामी स्वरुप को यथावत् अभिव्यक्त करने में समर्थ नहीं थी |

इसके समाधान के लिए उन्होंने सबसे पहले उस समय पूरे भारत की जनभाषा प्राकृत में प्रवचन देना प्रारंभ किया – ‘भगवं च अद्धमागिए भासाए धम्मं आइक्ख’ |उस समय प्राकृतभाषा अनेक रूपों में प्रचलित भाषा थी बाद में सम्राट अशोक ने भी अपने अनेक शिलालेख प्राकृत भाषा में ही लिखवाए |कालिदास,शूद्रक आदि ने अपने नाटकों में प्राकृत भाषा का प्रयोग किया | भाषा वैज्ञानिक इसीलिए भारत की अधिकांश भाषाओँ की जननी प्राकृत भाषा को मानते हैं ,अपभ्रंश और उसके बाद हिंदी का विकास भी इसी क्रम में हुआ है | इसलिए यदि भगवान् महावीर का दर्शन हमें वास्तविक रूप में समझना है तो हमें मूल प्राकृत आगमों को पढना पढ़ेगा और उसके लिए प्राकृत भाषा को सीखना ही पढ़ेगा |

एक ही सत्य के अनेक विरोधी स्वरुप को वाणी के माध्यम से समझने समझाने के लिए उन्होंने ‘स्यादवाद’ की शैली का आविष्कार किया | यह अद्भुत शैली थी | यहाँ स्यात् पद जो कि मूल प्राकृत में ‘सिय’ शब्द है उसका अर्थ है- ‘कथंचित’ अर्थात् किसी अपेक्षा से , वाद शब्द का अर्थ कथन होता है अतः स्याद्वाद का अर्थ है किसी अपेक्षा से कथन | यह शैली इसलिए अपनाई क्यों कि हम जब भी कोई कथन करते हैं तो सापेक्ष कथन करते हैं ,सर्वथा कथन नहीं करते हैं | महावीर कहते हैं कि एक समय में अनंत धर्मात्मक वस्तु के किसी एक धर्म को ही हम वाणी के द्वारा कह सकते हैं तब श्रोता कैसे समझेगा कि वस्तु में अन्य धर्मों की भी सत्ता है ? और हमें यह भी निश्चित करना है कि कोई कथन करते समय हम अन्य धर्मों को गौण कर रहे हैं या उनका निषेध ही कर दे रहे हैं ? महावीर कहते हैं कि यदि किसी कथन के पहले हम स्यात् पद लगा दें तो श्रोता समझ जायेगा कि अभी वस्तु का एक धर्म समझाया जा रहा है लेकिन अन्यधर्म भी हैं उनका निषेध नहीं हैं | महावीर कहते हैं कि आप यदि अपनी भाषा में ‘ही’ की जगह ‘भी’ का प्रयोग करें तो संघर्ष रहेगा है नहीं | जैसे आप कहें कि मेरा संप्रदाय ‘भी’ अच्छा है तो कभी किसी को कोई परेशानी नहीं है किन्तु जब आप यह कहते हैं कि मेरा सम्प्रदाय ‘ही’ अच्छा है तो इतर संप्रदाय को बुरा लगता है और संघर्ष होना शुरू हो जाता है | सिर्फ भाषा के अंतर से अभिप्राय का अंतर आ जाता है |

हमारी भाषा में भी अहिंसक शैली होनी चाहिए,महावीर कहते हैं कि यदि ‘सब्जी काट दो’ की जगह अगर आप ‘सब्जी बना दो’ कहें तो ज्यादा उपयुक्त होगा | भगवान् महावीर ने साधना के क्षेत्र में भाषा को लेकर बहुत प्रयोग किये | उनकी योगविद्या की प्रमुख साधना थी-‘वचन योग गुप्ति’ | प्रथम तो साधक को मौन रहना चाहिए और अगर बोलना ही पड़े तो ‘भाषा समिति‘ पालना चाहिए अर्थात कम बोलना चाहिए और मात्र हित,मित,प्रिय वचनों का प्रयोग करना चाहिए |बोलते समय स्यादवाद की शैली का प्रयोग करना चाहिए ताकि सत्य धर्म की विराधना न हो | भगवान् महावीर को समझे बिना भारतीय संस्कृति को हम पूर्ण रूप से नहीं समझ सकते अतः उन्हें समझने के लिए हमें प्राकृत भाषा और स्यादवाद सिद्धांत सीखना ही होगा | सहिष्णुता बिना स्यादवाद के नहीं आ पाएगी | वास्तव में स्याद्वाद सहिष्णुता ,सह-अस्तित्व और साधना का एक सशक्त माध्यम है | स्याद्वाद के बिना भगवान् महावीर की देशना को सही अर्थों में समझना असंभव है |
drakjain2016@gmail.com

Friday, March 29, 2019

PHD on Phone

*फोन पर पीएचडी*

- प्रो अनेकांत कुमार जैन
drakjain2016@gmail.com

➡सर
मैं पीएचडी करना चाहती हूं ।

✅बहुत अच्छी बात है ।

➡इसके लिए मुझे क्या करना होगा ?

✅आप पीएचडी क्यों करना चाहती हैं ?

➡ सर, मुझे बहुत शौक है कि मेरे नाम के आगे भी डॉक्टर लगे ।

✅शौक के लिए करना है ?

➡जी

✅चलिए , ठीक है । किसी दिन विभाग में समय लेकर आइए , विस्तार से चर्चा करेंगे ।

➡मगर , सर ,  विश्वविद्यालय बहुत दूर है , फोन पर चर्चा नहीं हो सकती । आपके पास जब समय हो मैं बात कर लूंगी ।

✅ठीक है , कल शाम को ४ बजे बात कीजिएगा ।

तीन दिन बाद

➡हैलो सर , मैं बोल रही हूं , आपसे पीएचडी के बारे में बात की थी ।वो कौन सा विषय लेना चाहिए ?

✅आप आज फोन कर रही हैं ?

➡sorry sir वो क्या था न कि घर पर कुछ रिश्ते दार आ गए थे तो मैं भूल गई , अभी अचानक याद आया ।

✅चलिए , ठीक है , बतलाए , क्या कहना है ?

➡वो मैं ये पूछ रही थी कि पीएचडी के लिए रोज विश्वविद्यालय आना पड़ेगा ?

✅जी,

➡ क्या , ये पत्राचार से भी हो सकता है ?

✅नहीं , यह नियमित कोर्स है ।

➡तब मैं कैसे करूंगी ?
मैं तो रोज आ नहीं सकती ।

✅तो मत कीजिए , आपसे किसने कहा पीएचडी करने के लिए ?

➡Sir, शौक है ।

✅मुझे लगता है आपको सिर्फ फोन करने का शौक है ।
शांति से खुद रहिए और मुझे भी रहने दीजिए ।

➡ सर, लेकिन आपने खुद भी तो पीएचडी की थी , वो कैसे की ?

✅क्यों कि मुझे शौक नहीं था, जुनून था कुछ नया कर गुजरने का ।

🙏
*पीएचडी शोध के लिए है,शौक के लिए नहीं।*
🙏

*ये शोध नहीं आसां,बस इतना समझ लीजे।एक आग का दरिया है,और डूब कर जाना है*

Monday, March 18, 2019

चौकीदार आप हो .....हम तो जमींदार हैं.......

चौकीदार आप हो ......
         हम तो जमींदार हैं.......

- कुमार अनेकांत

लगभग बीस वर्ष पहले की बात है । बनारस के अस्सी घाट पर गंगा किनारे एक कवि सम्मेलन हो रहा था । हम छात्र थे ,  कहीं जगह नहीं मिली तो हम कवियों के सामने जमीन पर ही बैठ गए कवियों को सुनने । एक कवि ने हम लोगों की दशा देखकर व्यंग्य करते हुए जो कहा उसने हमारा मन जमीन पर बैठकर भी गौरवान्वित हो गया ।

सामने गद्देदार सोफों पर नेता,मंत्री, मुख्य अतिथि, श्रेष्ठी बैठे हुए थे , कुछ कवि उनके साथ एक ऊंची चौकी पर बैठे हुए थे ।

उन्होंने सभी को व्यंगात्मक संबोधन करते हुए कहा मेरे सामने गद्दी पर बैठे हुए आदरणीय गद्दारों , मेरे बगल में चौकी पर बैठे हुए आदरणीय चौकीदारों और  हमारी तरफ इशारा करते हुए कहा , और सामने जमीन पर बैठे हुए आदरणीय जमींदारों को मेरा शत शत प्रणाम !

कसम से हमें उस समय ऐसा लगा था जैसे हम ही मुख्य अतिथि हों ।