Thursday, November 15, 2018

अन्तिम समय तक जीने की कला सिखाता है जैन धर्म –प्रो. अनेकांत

अन्तिम समय तक जीने की कला सिखाता है जैन धर्म  –प्रो. अनेकांत
इस वर्ष दीपोत्सव के ठीक पूर्व सीनियर सिटीजन कॉउन्सिल दिल्ली द्वारा कम्युनिटी सेंटरग्रीनपार्क एक्सटेंशननई दिल्ली में आध्यात्मिक सत्संग का आयोजन किया गया । जिसमें *जैन धर्म के अनुसार जीवन जीने की कला*विषय पर प्रो अनेकांत कुमार जैन, आचार्य एवं अध्यक्ष –जैन दर्शन विभाग,श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ ,नई दिल्ली  ने सार गर्भित व्याख्यान करते हुए कहा कि प्रथम तीर्थंकर रिषभ देव से लेकर अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर तक चौबीस तीर्थंकर हुए जिन्होंने संसार के सभी मनुष्यों को जीवन जीने की कला सिखलाई उन्होंने सिखाया कि संसार में किस तरह रहना चाहिए ताकि मानव मात्र का कल्याण हो सके |जीवों के कल्याण के लिए सबसे पहले भगवान् महावीर ने रिसर्च की कि मनुष्यों की कौन सी ऐसी कमियां हैं जो उसके विकास को रोक रहीं हैं तथा उसका जीवन बर्बाद कर रहीं हैं अपनी इस रिसर्च में उन्होंने सात आदतें ऐसी पायीं जिनके कारण वह उसका जीवन बर्बाद हो रहा है और आगे नहीं बढ़ पा रहा है इसलिए अच्छा ,स्वस्थ्य और सुन्दर जीवन जीने के लिए उन्होंने इन सात व्यसनों को सबसे पहले छोड़ने को कहा | यदि ये व्यसन बने रहेंगे तो आध्यात्मिक तो छोडिये किसी भी तरह का लौकिक कल्याण भी आप नहीं कर सकते |
भगवान् महावीर ने फिर एक रिसर्च की उन्होंने विचार किया कि सात प्रकार के व्यसनों से दूर होने के बाद अब मनुष्य आत्मकल्याण के लायक हो गया है अतः इसके दुखों को दूर करने का कुछ ऐसा रास्ता खोजना चाहिए ताकि मनुष्य दुःख दूर करने के नकली उपायों से बचे और वास्तव में इसके दुःख दूर हो सके उन्होंने बारह वर्ष तक कठोर साधना की ,यह उनका आत्मानुसंधान का काल था उन्होंने इस दौरान कोई भी उपदेश नहीं दिया ,वे मौन रहे जब उनका आत्मानुसंधान पूरा हो गया और उन्हें दिव्य अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति हो गयी तब उन्होंने जो रास्ता पाया वह सभी मनुष्यों को बतलाया |  उन्होंने कहा सुखी होने और सच्चे जीवन जीने की कला है  - सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र उन्होंने इस कला को  मोक्ष का मार्ग कहा |उन्होंने कहा कि दुःख भी एक रोग है और उसके लिए भी दवाई की जरूरत है हमारे संसार सम्बन्धी सभी रोगों के नाश के लिए उन्होंने यह त्रिरत्न रुपी त्रिफला चूर्ण खोज निकाला |
उन्होंने कहा कि सबसे पहले हमें सच्चा विश्वास या सच्ची श्रद्धा करना सीखना चाहिए लेकिन सिर्फ श्रद्धा से काम नहीं चलेगा उसके साथ साथ सच्चा ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए और सिर्फ श्रद्धा या ज्ञान से भी बात नहीं बनेगी ...इन दोनों के साथ साथ हमें सच्चा आचरण ( चारित्र ) भी धारण करना चाहिए कोई कहता है कि हम अकेले श्रद्धा करेंगें,पूजा भक्ति करेंगे ,भगवान् का केवल नाम रटेंगे तो हमारे दुःख दूर हो जायेंगे,हमारा कल्याण हो जायेगा कोई सोचता है कि कुछ करने की जरुरत नहीं है सिर्फ ज्ञान प्राप्त करो तो कल्याण हो जायेगा कोई बताता है कि अरे बस कठोर व्रत करो तपस्या करो तो संसार के दुखों से पार प् जाओगे लेकिन महावीर बहुत वैज्ञानिक हैं उन्होंने समझाया कि अगर सच्चे डॉक्टर पर सच्चा विश्वास न हो तो दवाई काम नहीं करती,इसलिए पहले डॉक्टर पर सच्चा विश्वास करो ......लेकिन सिर्फ भरोसा कर लो तो भी रोग दूर नहीं होगा ....इसलिए वह जो उपचार और दवाई बताये उसका सही ज्ञान प्राप्त करो ....दवाई का सही ज्ञान नहीं होगा कि कौन सी कब खानी है तो भी रोग दूर नहीं हो पायेगा इसके बाद वो कहते हैं कि आपने सिर्फ विश्वास और ज्ञान तो कर लिया लेकिन वो दवाई समय पर खाई नहीं तो भी रोग दूर नहीं होगा अतः विश्वास भी जरूरी है,ज्ञान भी जरूरी है तथा उसके अनुसार आचरण भी जरूरी है – तभी दुखों से मुक्ति संभव है |
भगवान् महावीर ने देखा कि लोग विश्वास और श्रद्धा तो करते हैं लेकिन कभी कभी अज्ञानता में गलत श्रद्धान कर लेते हैं अतः धर्म का वास्तविक स्वरुप समझ कर फिर श्रद्धान करना चाहिए कोई समझा देता है कि पहाड़ से नीचे कूद जाओ या नदी में डूब जाओ तो मोक्ष हो जायेगा कोई कहता है कि पशुओं की बलि चढाओ तो पुण्य होता है ,कोई नशा करने से परमात्मा का दर्शन करवाने की बात कहता है तो हम जल्दी भरोसा कर लेते हैं और यह मानने लगते हैं कि यही धर्म है ..और अपनी श्रद्धा और विश्वास को गलत दिशा दे देते हैं इसलिए सबसे पहले जरूरी है मनुष्य सच्चे धर्म की पहचान करके विश्वास करे अन्यथा हमेशा की तरह लुटता ही रहेगा |
सम्यग्दर्शन की गहरी व्याख्या करते समय वे भेद विज्ञान की कला समझाते हैं और कहते है कि इस कला से मनुष्य संसार के दुखों में भी कीचड़ में कमल की तरह उससे भिन्न रह सकता है अनासक्त भाव और साम्य दृष्टि ...यह भेद विज्ञान पूर्वक जीवन जीने की अनुपम कला है महावीर कहते हैं - सृष्टि नहीं दृष्टि बदलो |
सम्यग्ज्ञान के माध्यम से किसी भी घटनापरिस्थिति  या परिणाम की सही जानकारी होती है जो वस्तु जैसी है उसका जो स्वरूप हैउसको वैसा ही जानना यह सम्यज्ञान है प्रायः सही ज्ञान के अभाव में मनुष्य व्यर्थ ही तनावग्रस्त रहता है सही ज्ञान ही समस्या का समाधान कर सकता है महावीर ने अनेकांत का सिद्धांत की खोज  वस्तु घटनापरिस्थिति  या परिणाम की सर्वांग जानकारी के लिए की सत्य को कभी भी एक दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता क्यों कि वह बहु आयामी है इसलिए हमें भी अपना दृष्टिकोण बहु आयामी रखना चाहिए यह चिंतन की कला है हमारे सोचने का तरीका ठीक होगा और सकारात्मक होगा तो हमारे आधे दुःख वहीँ कम हो जायेंगे हर घर में ,परिवार में,समाज में झगडे का एक ही कारण है कि हम सिर्फ अपने नजरिये से देखते हैं ..जिस दिन हम दूसरे के नजरिये से भी देखने लगेंगे उस दिन जीवन का रंग ही बदल जायेगा जीवन बहु रंगी हो जायेगा 
सम्यग्चारित्र मनुष्य को सदाचरण सिखाता है हमारे तनाव - अवसाद का मुख्य कारण हमारा गलत आचरण भी है क्रोधमानमायालोभ - ये चार ऐसे भाव है जो शांत चित्त आत्म को कष्ट  देते हैं अर्थात दुःखी करते हैं इसलिए इनका नाम जैनदर्शन में 'कषायरखा गया है आत्मा के चारित्रिक गुणों का घात इन्हीं चार कषायों के कारण होता हैंऔर इन्हीं कषायों की प्रबलता मनुष्य को तनावग्रस्त भी करती है |  शुद्ध चारित्र की प्राप्ति के लिए इन चार कषायों की समाप्ति बहुत आवश्यक है ये कषायें जैसे जैसे मन्द होती हैं वैसे वैसे तनाव घटता जाता है अन्य कई प्रकार ही मानसिक बीमारियों का कारण भी इन कषायों की प्रबलता है अतः सम्यग्चारित्र के अभ्यास से इन पर विजय प्राप्त करके मनुष्य अवसाद आदि का शिकार नहीं होता अपने भीतर से  क्रोधमानमायालोभ को कम करना यह हमारा आंतरिक चरित्र है और बाहर से भोगों के प्रति उदासीन भाव और अपनी आत्मा के प्रति उत्साह यह बाह्य चरित्र है महावीर कहते हैं कि व्रत,उपवास ,तपस्या भी यथा शक्ति करने से शरीर के प्रति ममत्व घटता है ,मनुष्य शारीरिक रोगों से भी मुक्त होता है और कर्मों से भी |
भगवान् महावीर ने सम्पूर्ण जीवन को अहिंसा पूर्वक जीने को कहा हम ऐसा जीवन जियें जिससे किसी दुसरे प्राणी को कष्ट न हो और और किसी के प्राणों का हरण न हो जैसे हमें दुःख पसंद नहीं वैसे ही दूसरों को भी पसंद नहीं है अतः शांति पूर्ण सहस्तित्व के लिए अहिंसा का आचरण जरूरी है |आसक्ति बहुत बड़ा दुःख है मकान ,जमीन,रुपया पैसा सोना चांदी आदि के प्रति अत्यधिक मोह आपको चिंता ग्रस्त बनाता है अतः भगवान कहते हैं कि अपने पास उतना ही रखो जितनी जरूरत है ,व्यर्थ का सामान मत जोड़ो |
भगवान् महावीर ने मनुष्यों को  जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन जीने की कला सिखलाई उन्होंने कहा कि जो जन्म लेता है वह मरता भी है यह जीवन की एक बहुत बड़ी सच्चाई है इसे हमें स्वीकार कर लेना चाहिए मरना तो एक क्षण का है किन्तु उसके पूर्व अंत समय तक जीवन है अतः हमें अपना अंत समय धर्म ध्यान व्रत उपवास पूर्वक व्यतीत करना चाहिए ,जो छूट जाने वाला है उसे तुम पहले ही छोड़ दो तो सुख पूर्वक अंत तक जी लोगे इसलिए जब ऐसा लगने लग जाये कि अब आयु कम रह गयी है तब घबड़ाना नहीं चाहिए ,बल्कि अपने सुन्दर जीवन रुपी निबंध का अच्छा उपसंहार या समापन करना चाहिए |अंत समय तक भगवान् का भजन करना चाहिएअपनी भूलों के लिए सबसे क्षमा याचना करना चाहिए और संयम पूर्वक रहना चाहिए |इस प्रकार अपने प्रेरक व्याख्यान नें प्रो अनेकांत जैन ने विस्तार पूर्वक बतलाया कि भगवान् महावीर ने मनुष्यों को जीवन  सत्यं ,शिवम् और सुन्दरम् बनाने की प्रेरणा दी उसके उपाय भी बतलाये |
आरम्भ में प्रो.वीरसागर जी ने विद्वान वक्ता का परिचय दिया तथा जैन धर्म के इतिहास और सार्वभौमिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन धर्म भारत का एक अत्यंत प्राचीन धर्म है जिसे श्रमण परंपरा के नाम से जाना जाता है इस युग में जैन धर्म की स्थापना करने वाले प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव हुए जिनका स्मरण वेदों में तथा अनेक पुराणों में अत्यंत आदर के साथ किया गया है भागवत में तो उन्हें बहुत बड़ा तपस्वी परमहंस तक कहा गया है पूरी भारतीय संस्कृति ने उन्हें बहुत सम्मान दिया तथा यही कारण है कि उनके एक कर्म योगी पुत्र भरत’ के नाम पर ही अपने देश का नाम भारत हुआ है |
            काउंसिल के अध्यक्ष श्री जे आर गुप्ता जी ने प्रो जैन का स्वागत करते हुए कहा कि हम वरिष्ठ नागरिकों के लिए प्रत्येक धर्म की शिक्षाओं के प्रवचन रखते हैं ,हमारा यह क्रम सम्पूर्ण वर्ष चलता है तथा अनेक लोग इस माध्यम से अपना जीवन सुधार रहे हैं । हमें प्रसन्नता है कि आज हमने जैन धर्म की महान शिक्षाओं को सीखा | प्रो.अनेकांत जी ने अत्यंत सरल एवं सुबोध शैली में जैन धर्म के अनुसार जीवन जीने की कला पर हम सभी को मार्मिक उद्बोधन दिया | हम आगे भी इसी तरह जैन धर्म पर आधारित प्रवचन व्याख्यान अवश्य रखेंगे |

Saturday, November 3, 2018

Prof Dr Anekant Kumar Jain : JAIN SCHOLAR : An Introduction and Contacts

PROF.DR. ANEKANT KUMAR JAIN
(Awarded by President of India)

Designation
Professor and Head-Deptt.Of Jainphilosophy,Faculty of Philosophy
Sri LalbahadurShastriRashtriya Sanskrit Vidyapeeth
Deemed University Under Ministry Of HRD
Qutab Institutional Area, New Delhi-110016

Qualification:
  • M.A., Phd (Jainology& Comparative Religion & Philosophy)
  • Acharya
  • JRF From UGC 
Teaching Experience: 17 years UG/PG classes and Research Guidance for three students
            Publications  :
  • 12 Books, 60 Research Articles In National And International Journals.
  • More Then 150 Articles Published InMany National News Papers Like (DainikJagran, Hindustan,
Nbt, Ras.Sahara, Amarujala; Raj.Patrika, DainikTribune, Etc.)
  • Many Poetry, Stories Published In Various Magazines,News Papers.
  • Script Writing For Documentary Films.
  • Editor – PAGAD BHASA  (The first News Paper in Prakrit Language )
Residence &Contacts :

‘JIN FOUNDATION’, A 93 / 7A,Near Jain Mandir, Behind Nanda Hospital, Chattarpur Extention,NewDelhi-110030;MOB:9711397716

Activities (Social & Academic):
·        Presented Research Papers In 50 National & International Seminarson Jainism.
·        Faculty member Of International School for Jain Studies ,New delhi
·        Delivered Many Lectures About Spiritual Life Style In Various Institutions.
·        Delivered Lectures On DD1, Other T.V.Channels And A.I.Radio, N.Delhi
·        Workshops For Meditation & Stress Management
·        Delivered  PravachanAnd Lectures On ParyushanParva In Different Cities From 20 Years.
·    Presented Special Lectures In International Interfaith Conferences For Peace In Taiwan ,Japan and Kenya

DR. ANEKANT KUMAR JAIN  is a rare combination of tradition and modernity .His life is dedicated to give more & more in field of Jainology&Prakrit Literature . He has been Gold Medalist in M.A. in Jainology and Comparative Religion and Philosophy and in Buddha DarshanAacharya.His nine books has been published in which any body can find the standard of research, manuscript editing ,explanation of subject and the different original thoughts . His famous book written on the Jain philosophy named ‘JAIN DHARM EK JHALAK’(जैनधर्म :एक झलक )has been sold out more then 25,000 copies with six editions. His book ‘AhinsaDarshan :ekAnuchintan’(अहिंसादर्शन : एक अनुचिंतन )is recently observed by the President of India. More then 60 research articles and more then 100 general articles has been published in reputed Research journals /National news papers like DainikJagran ,NBT,Hindustaan Amar Ujalaetc and magazines. He has presented his research papers in more then 60 International and national seminars in
India and abroad. He is honoured By ‘KundkundGyanpeeth Award’(कुन्दकुन्दज्ञानपीठपुरस्कार),‘Arhatvachan Award’(अर्हत्वचनपुरस्कार-१९९९),conducted by KndkundGyanpeeth,Indore,‘JainVidyaBhaskar-2008’(जैनविद्याभास्कर-२००८)by Jain socity,Firojabad and ‘YuvaVachaspati’(युवावाचस्पति-२०१२)by Jain socity Kolkata, for his research and scholarship.His research book “DarshnikSamanvayki Jain Drishti : NAYVAD (दार्शनिकसमन्वयकीजैनदृष्टि :नयवाद)is selected best research for the Mahaveer Award -2013(महावीरपुरस्कार-२०१३)conducted by the Jain VidyaSansthan,Jaipur.The two ancient Jain Scholar Societies ShastriParishad and VidwatParishadhas been awarded him on 2013 and 2014 for his outstanding contribution to Jainism and Prakrit language .  In research field, his analytical power is awesome. The most important feature of Anekant is that in spite of having such a good command over Jainaagamas and Philosophy , he has not kept himself confined to this field only, he is equally good in Hindi, Sanskrit ,Prakritand English Languages and not only languages but also in the field of Poetry.
He discovered and edited rare ancient Sanskrit and Prakrit manuscripts named षडदर्शनेषुप्रमाणप्रमेयसमुच्चयःand ‘संवेगचूणामणिwhich was written by ancient Jain monks. He edited the Hindi commentary by Br. Sheetalprasaadji on the Prakrit text named प्रवचनसार.He started the first news paper in Prakrit language named ‘पागद-भासा’which is the unique contribution to promote this ancient language among common peoples.

Recently he had done hard work to conclude the famous Jain Nyay book named ‘Prameya Kamal Martand’- a very detailed Sanskrit commentary Witten by Aacharya Prabhachandra in Eleventh century. This is a unique work in the field of Jain logic. BhartiyaGyaanpeeth ,New Delhi has published thisbook named ‘प्रमेयकमलमार्तंडसारः’.



He is well-versed in Information Technology and is keen to utilize it in Prakrit/Sanskrit teaching and research. These out-of-the-box features of Anekant differentiate him from those who are confined to conventional knowledge of Prakrit and Jainism. Also, these features make him demand of the time to make Jainism popular and useful for common people. Recently the president of India MrPranabMukharjee has been awarded him by young President award named ‘MAHARSHI VADRAYAN VYAS SAMMAN’-2013 at president house on 17 January 2014 for his contributions in the field of PrakritVangmaya.

Family Background 

He has a traditional scholarship from Varanasi. His father and mother both are the world famous scholar of jainism named Prof Phoolchand Jain 'Premi'(ex-HOD,Deptt.of Jain Philosophy,Samurnanad Sanskrit University,Varanasi) and Dr Munni Jain is working at same deptt.




Thursday, October 4, 2018

हे व्हाट्सएप्प देव

फील गुड की फीलिंग

-कुमार अनेकान्त

व्हाट्सएप्प पर आठ दस मैसेज इधर से उधर कर दो तो आज समाज सेवा और जीव दया,करुणा का कोटा पूरा होगया जैसी फीलिंग होती है और दिन अच्छे से गुजरता है ।

मोदी जी के गुणगान में कुछ कांग्रेसियों को लपेट दो तो लगता है आज की राष्ट्रभक्ति का कोटा पूरा हुआ ।

कुछ माता पिता की सेवा से संबंधित शायरी या कोटेशन , कुछ धार्मिक फ़ोटो और प्रवचन fwd कर दो तो लगता है जैसे मंदिर हो आये हों

कुछ ज्ञान बघार दो और कुछ ज्ञान पढ़ लो तो लगता है आज की पढ़ाई का कोटा भी पूरा हुआ ।

कुछ प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नुस्खे बिना जांच पड़ताल के आगे भेज दो तो परोपकार जैसे पुण्य का अनुभव होने लगता है ।

कुछ बुराइयों की जमकर बुराई लिख दो तो क्रांतिकारी होने की हसरत भी पूरी हो जाती है ।

हे व्हाट्सएप्प देव तुमने बिना कुछ किए सब कुछ करने जैसी अनुभूतियों से हमारे जीवन को भर दिया है
तुम्हें शत शत नमन 🙏

Saturday, September 29, 2018

मिच्छामि दुक्कडं और ‘पर्युषण पर्व’ कहना गलत नहीं है’

सादर प्रकाशनार्थ

मिच्छामि दुक्कडं’ और पर्युषण पर्व कहना गलत नहीं है’
प्रो.अनेकांत कुमार जैन
अध्यक्ष-जैनदर्शन विभाग
श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ
नई दिल्ली -१६, drakjain2016@gmail.com  
वर्तमान में दिगंबर जैन समाज में व्यवहार में मूल प्राकृत आगमों के शब्दों के प्रायोगिक अभ्यास के अभाव कई प्रकार की भ्रांतियां उत्पन्न हो रही हैं जिस पर गम्भीर चिन्तन मनन आवश्यक है | मैं इस विषयक में कुछ स्पष्टीकरण देना चाहता हूँ -
१.एक भ्रान्ति यह फैल रही है कि मिच्छामि दुक्कडं’ शब्द श्वेताम्बर परंपरा से आया है |कारण यह है कि श्वेताम्बर श्रावकों में मूल प्राकृत के प्रतिक्रमण पाठ पढने का अभ्यास ज्यादा है | दिगंबर परंपरा में यह कार्य मात्र मुनियों तक सीमित है | दिगंबर श्रावक भगवान् की पूजा ज्यादा करते हैं ,कुछ श्रावक प्रतिक्रमण करते हैं तो हिंदी अनुवाद ही पढ़ते हैं ,मूल प्राकृत पाठ कम श्रावक पढ़ते हैं अतः मिच्छामि दुक्कडं’ का प्रयोग श्वेताम्बर समाज में ज्यादा प्रचलन में आ गया जबकि दिगंबर परंपरा के सभी प्रतिक्रमण पाठों में स्थान स्थान पर मिच्छामि दुक्कडं’ का प्रयोग भरा पड़ा है ,अतः यह कहना कि यह श्वेताम्बरों से आया है बिल्कुल गलत है | वास्तविकता यह है कि प्रतिक्रमण पाठ गौतम गणधर के काल से यथावत चल रहा है जब श्वेताम्बर दिगंबर का भेद भी नहीं हुआ था | यह पाठ प्रतिदिन करणीय था इसलिए वास्तव में दिगंबर-श्वेताम्बर परंपरा के मुनियों ने अपने कंठों में इसे श्रुतपरम्परा की भांति आज तक सुरक्षित रखा हुआ है ,इसलिए वह कुछ पाठ भेद के बाद भी दोनों जगह लगभग एक सा है |

२. दूसरी भ्रान्ति यह फ़ैल रही है कि दसलक्षण पर्व को पर्युषण पर्व कहना गलत है क्यों कि यह श्वेताम्बर परंपरा में मनाया जाता है | यह धारणा भी ठीक नहीं है | यद्यपि श्वेताम्बर परंपरा में यह शब्द ज्यादा प्रचलित है तथा श्वेताम्बर आगमों में इसका उल्लेख भी बहुतायत से मिलता है किन्तु दिगंबर साहित्य में भगवती आराधना और मूलाचार में साधुओं के जिनकल्पी और स्थविरकल्पी - ये दो भेद बताये हैं और स्थविरकल्प के दस भेद बताते हुए लिखा है –
आचेलक्कुद्देसियसेज्जाहररायपिंडकिरियम्मे।
जेट्ठपडिक्कमणे वि य मासं पज्जोसवणकप्पो।।
(देखें - भगवती आराधना –गाथा ४२३ ,पृष्ठ ३२०,प्रका.जैन संस्कृति संरक्षक संघ ,शोलापुर ,२००६
तथा मूलाचार ,अधिकार-१०,गाथा-१८ )
विजयोदया टीका में लिखा है कि  ‘ पज्जोसमणकल्पो  नाम दशमः | वर्षाकालस्य चतुर्षु मासेषु एकत्रैवावस्थानं भ्रमणत्यागः (भ.आरा.विजयो.टीका पृष्ठ ३३३ )
अर्थात् पज्जोसमण नाम का दसवां कल्प है जिसका अभिप्राय है वर्षा काल के चार मासों में भ्रमण त्यागकर एक ही स्थान पर निवास करना | इस हिसाब से देखें तो चातुर्मास को पर्युषण कहते हैं और इस दौरान जो भी पर्व आते हैं उन्हें पर्युषण पर्व कहते हैं |
इस प्रकरण में पंडित कैलाशचंद शास्त्री जी ने एक स्पष्टीकरण भी दिया है –
‘प्राकृत में दसवें कल्प का नाम ‘पज्जोसवणा’ है उसका संस्कृत रूप पर्युषणाकल्प है | इसी से भादों के दसलक्षण पर्व को पर्युषण पर्व भी कहते हैं | श्वेताम्बर परंपरा में भी इसका उत्कृष्ट काल आषाढ पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक चार मास है |जघन्य काल सत्तर दिन है | भाद्रपद शुक्ला पंचमी से कार्तिक की पूर्णिमा तक सत्तर दिन होते हैं | संभवतः इसी से दिगंबर परंपरा में पर्युषण पर्व भाद्रपदशुक्ला पंचमी से प्रारंभ होते हैं | इस काल में साधु विहार नहीं करते | (देखें - भगवती आराधना पृष्ठ ३३४ )
 इसी प्रकार संवत्सरी और क्षमावाणी पर्व को लेकर भी कुछ भ्रांतियां फैल रही हैं जिसके पुख्ता प्रमाण प्राप्त होने पर स्पष्टीकरण करने का प्रयास करूँगा |
एक निवेदन यह भी है कि आजकल हम लोग बहुत सी प्रचलित परम्पराओं और अनुष्ठानों तथा पर्वों को लेकर यह कहने लग गए हैं कि यह तो अन्य परंपरा से हमारे यहाँ आई है ,यह हमारी नहीं है | हमें इस विषय पर गंभीरता से विचार करना  चाहिए | तथा सोच समझ कर कथन करना चाहिए | हमारा बहुत सा साहित्य नष्ट हो गया है ,किन्तु परंपरा में कई आवश्यक विधान हमारे आचार्यों /विद्वानों ने कुछ सोच समझ कर समाज के हित में प्रारंभ किये थे | हम हर चीज को दूसरों का कह कर यदि दुत्कारते रहेंगे तो एक दिन अपना ही वजूद खो बैठेंगे | श्वेताम्बर परंपरा के प्रति भी बहुत हेयदृष्टि नहीं रखनी चाहिए ,वे चाहे कुछ भी हों ,हैं तो हमारे ही भाई और भगवान् महावीर की बहुत सारी सम्पदा दिगंबर –श्वेताम्बर दोनों भाइयों ने मिल कर संरक्षित की है | सैद्धांतिक और आचारगत अनेक मतभेद होते हुए भी जैन संस्कृति के संरक्षण में भी दोनों में से किसी के भी अवदान को नकारा नहीं जा सकता है |





Sunday, September 9, 2018

हिंदी साहित्य आई सी यू में है

हिंदी साहित्य आई सी यू में है

अपनी ही डायरी के पुराने पन्ने पलट के अपनी ही 20 -25 वर्ष पुरानी कविताएं पढ़ते हैं तो आश्चर्य होता है और सोचता हूँ इतनी गहरी संवेदना और अभिव्यक्ति कला क्या पुनर्जीवित हो सकती है ? आज संदर्भ भी बदल गये और प्रसंग भी । अब वो खुद की दुनिया में ,खुद ही राजा बनकर रहने का जुनून भी कहाँ से लाया जाए । यथार्थ के दलदल में ऐसे फँसे कि फ़साने बुनना कब छूट गया पता ही नहीं चला ।  पहले कविता का केंद्र चाहे जो रहा हो लेकिन उसमें अभिव्यक्त रोष,कुंठा,प्रेम,आग,बगावत ये सब डायरी की दीवार में कैद अपनी खिचड़ी बनाते रहे और भले ही ये प्रकाशन में न आ पाए हों, युग को कोई राह न् दिखा पाए हों लेकिन इस अभिव्यक्ति ने हमें निराशा और कुंठाओं से मुक्त रहने और तनाव रहित जीवन जीने में, जीवन निर्माण में बहुत बड़ा योगदान दिया । यह लाभ उन मित्रों को भी मिला जो उन छंद रचनाओं के साक्षी रहे ।
हमेशा हिंदी में लिखा ,इसलिए हिंदी के खुद के साहित्य  का मूल्यांकन खुद ही करने बैठा हूँ ।

इस तरह का साहित्य जो कभी प्रकाशित नहीं हुआ । जो कभी काव्य संग्रह की शक्ल नहीं पा सका । कुछ इक्का दुक्का वो ही रचनाएं पत्र पत्रिकाओं में छपीं जिन्हें सार्वजनिक करने में कोई बुराई नज़र नहीं आयी । कभी मंच पर भी वे ही काव्य सुना पाए जिनसे लोगों का मनोरंजन हो सके । लेकिन इन रचनाओं को मैं साहित्य कभी नहीं मान पाया । जो रचना दिल से लिखी वह न तो कहीं छप सकी और न ही कहीं सुनाई जा सकी । धर्म दर्शन से सम्बंधित रचनाएं भी कृत्रिमता और कोरे बनावटी आदर्श से ओतप्रोत रहीं और सराही भी गयीं । एक ओहदे पर आने के बाद भी कविता क्षतिग्रस्त हुई । हमेशा यही संकोच बना रहा कि मेरी इस उन्मुक्त अभिव्यक्ति से पद और प्रतिष्ठा पर प्रश्न उठेंगे । कारां घटने की बजाय बढ़ते चले गए । धीरे धीरे एक कवि मरता चला गया । अब वर्तमान में फ़ेकबुक और भ्रष्टअप्प की वर्चुअल मायावी दुनिया में वाल पर कभी कभी दो चार लाइन लिखकर यह बताया जाता है कि सांसे बस चल रहीं हैं लेकिन हिंदी साहित्य और कवि दोनों आई सी यू में है ।

- अनेकान्त

Monday, August 20, 2018

लव जिहाद के दूसरे पहलू भी देखें


लव जिहाद के मुकाबले के लिए समाज में खुला माहौल भी बनाएं

- प्रो.डॉ अनेकान्त कुमार जैन,नई दिल्ली
drakjain2016@gmail.com

वर्तमान में लव जिहाद से पीड़ित समाज बहुत सदमे में है । वास्तव में यह वर्तमान के साथ साथ भविष्य के लिए भी बहुत चिंता का विषय है । गृहस्थों के साथ साथ ब्रह्मचारी और साधु वर्ग भी बहुत चिंतित हैं और तरह तरह के सुझाव प्रस्तुत कर रहे हैं ।

जितने सुझाव अभी तक दिखाई दे रहे हैं उन सभी का सार यही है कि परिवार में संस्कार दो । बेटियों को संस्कार दो । संस्कार और सिर्फ संस्कार का हल्ला गुल्ला मचा कर हम पुनः निश्चिंत हो जाएंगे । लेकिन सिर्फ  संस्कारों की दुहाई देने से क्या समाधान हो जायेगा ?

क्या हमने कभी इसके दूसरे पहलुओं पर विचार किया ? जब सभी समाधान बता रहे हैं तो मैं भी कुछ युगानुरूप समाधान आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ जिन सुझावों को साधक वर्ग अपनी मर्यादाओं के कारण प्रस्तुत नहीं कर सकता । मुझे विश्वास है कि यदि इस पर अमल किया गया तो हम अच्छे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं ।

1. प्रेम कब होता है ? जब हम आपस में मिलते हैं , एक दूसरे के विचारों से ,स्वभाव से प्रभावित होते हैं तब दो युवा दिल एक दूसरे में अपने जीवन का भविष्य देखने लगते हैं ।

2. आपको क्या लगता है ? हम एक धर्म और समाज के लोग कब एकत्रित होते हैं ? 99% धार्मिक समारोहों में ,जहां धर्म की प्रधानता होने से इस मेल मिलाप को पाप कहा जाता है ।

3. हम साधर्मी युवतियों और युवाओं के ऐसे कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं करते जहां वे एक दूसरे को जान सकें ,स्वभाव,ज्ञान,सुंदरता,समान कैरियर आदि से लगातार परिचित हो सकें ।

4.फलस्वरूप युवा अपने शिक्षा स्थल,कार्य स्थल,कॉलोनी,अप्पर्टमेंट्स आदि स्थलों में अपने अनुरूप जीवन साथी खोजने लग जाता है फिर भले ही वह भिन्न धर्म या जाति का हो ।

5. जेहादी हमारी इस दोहरी मानसिकता का फायदा उठाते हैं । जो अवसर देना हमें गंवारा नहीं ,वे अवसर वे दे देते हैं । और संस्कार हीनता आग में घी का काम करती है ।

6. मैंने तो साधर्मी में विवाह करने पर भी युद्ध होते देखें हैं अगर वह प्रेम पर आधारित हुआ तो ।

7.यह कैसा समाज है जो एक तरफ लव जिहाद से पीड़ित होकर रोता है और अगर कोई अपने ही धर्म में किसी इतर जाति से विवाह कर ले तो भी भृकुटी तान लेता है ।

8. समाज में दिगम्बर से,श्वेतांबर से,उसमें भी सोनगड़ियों से,बीस या तेरापंथियों से,
ओसवाल ,खंडेलवाल , लमेचु,पोरवाल,परवार, गोलालरे,गोलापूरब,खड़ौआ, आदि जातियों से भी एक जैन धर्म के अनुयायी होते हुए भी आपस में विवाह सम्बंध करने पर  सामाजिक विरोध से भयभीत रहते हैं । हमने तो फ़रमान तक सुने हैं ।

9. क्या हमें नहीं लगता कि  जनसंख्या में आधा प्रतिशत से भी कम जैन धर्म समाज अपने ही भीतर आपस में इतनी कठोर रहेगी तो हमारे बच्चे कब तलक हमारे बस में रहेंगे ?

10. लव जेहाद का जबाब साधर्मी प्रेम पुष्प को खिलाकर दीजिये तो बात बन सकती है । इसके लिए उचित और मर्यादित उन्मुक्त वातावरण का निर्माण हमें स्वयं को करना होगा   ।

आइये एक स्वस्थ्य,स्वतंत्र ,संपन्न और उदात्त विचारों से समृद्ध समाज का निर्माण स्वयं करें और लव जेहाद जैसी शैतानी शक्तियों से अपनों का जीवन बचाएं ।

Thursday, August 16, 2018

अटल जी से सीखें विरोधी के साथ व्यवहार कैसे करें ?

अटल जी से सीखें विरोधी के साथ व्यवहार कैसे करें ?

हमारे समभाव की परीक्षा इस बात से होती है कि हम अपने विरोधियों के साथ क्या व्यवहार अपनाते हैं ?क्या  हम अपने विचारों से विपरीत विचार वाले के साथ उठ बैठ लेते हैं ? उसे बने रहने देना चाहते हैं या कि समाप्त करना चाहते हैं ? यदि हम उसे जड़ से ख़त्म करना चाहते हैं ,उसे मार डालना चाहते हैं तो हमारे समभाव की नीति बहुत संदेहास्पद है | हम समभाव को समझे ही नहीं |अपने विरोध को भी सहज स्वीकारे  और सहन किये बिना हम समभाव की साधना नहीं कर सकते |
विरोधी के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए यह हमें अटल जी के जीवन से सीखना चाहिए । वे विरोध भी इस नज़ाकत के साथ करते थे कि विरोधी को भी उनसे प्यार हो जाता था।गांधी जी ने राजनीति में अहिंसा के प्रयोग की मिसाल कायम की थी ।अटल जी ने राजनीति में जैन दर्शन के अनेकान्त और स्याद्वाद सिद्धांत के कुशल प्रयोग की मिसाल बनायी । विपक्ष भी सरकार चलाता है - ये हमें अटल जी ने समझाया ।

आज विरोध करना सभी को आता है लेकिन उस विरोध में शालीनता,विनम्रता ,भाषा का संतुलन और कुछ नहीं कह कर भी विरोध जता देने की कला के महारथी थे अटल जी । आज राजनीति में भाषा और व्यवहार का जो गिरा हुआ रूप देखने में आ रहा है वह चिंतनीय है ,इसके कारण आज लोकतंत्र कलंकित हो रहा है । अटल जी को श्रद्धांजलि देने वाले सभी राजनीतिज्ञ उनके इस गुण को सीख लें तो अटल जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

अटल जी के जीवन की शिक्षाएं हमारे जीवन में अटल रहें - यही कामना है ।
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि ।

-प्रो अनेकान्त कुमार जैन ,अध्यक्ष-जैनदर्शन विभाग,श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,नई दिल्ली-16