Sunday, September 9, 2018

हिंदी साहित्य आई सी यू में है

हिंदी साहित्य आई सी यू में है

अपनी ही डायरी के पुराने पन्ने पलट के अपनी ही 20 -25 वर्ष पुरानी कविताएं पढ़ते हैं तो आश्चर्य होता है और सोचता हूँ इतनी गहरी संवेदना और अभिव्यक्ति कला क्या पुनर्जीवित हो सकती है ? आज संदर्भ भी बदल गये और प्रसंग भी । अब वो खुद की दुनिया में ,खुद ही राजा बनकर रहने का जुनून भी कहाँ से लाया जाए । यथार्थ के दलदल में ऐसे फँसे कि फ़साने बुनना कब छूट गया पता ही नहीं चला ।  पहले कविता का केंद्र चाहे जो रहा हो लेकिन उसमें अभिव्यक्त रोष,कुंठा,प्रेम,आग,बगावत ये सब डायरी की दीवार में कैद अपनी खिचड़ी बनाते रहे और भले ही ये प्रकाशन में न आ पाए हों, युग को कोई राह न् दिखा पाए हों लेकिन इस अभिव्यक्ति ने हमें निराशा और कुंठाओं से मुक्त रहने और तनाव रहित जीवन जीने में, जीवन निर्माण में बहुत बड़ा योगदान दिया । यह लाभ उन मित्रों को भी मिला जो उन छंद रचनाओं के साक्षी रहे ।
हमेशा हिंदी में लिखा ,इसलिए हिंदी के खुद के साहित्य  का मूल्यांकन खुद ही करने बैठा हूँ ।

इस तरह का साहित्य जो कभी प्रकाशित नहीं हुआ । जो कभी काव्य संग्रह की शक्ल नहीं पा सका । कुछ इक्का दुक्का वो ही रचनाएं पत्र पत्रिकाओं में छपीं जिन्हें सार्वजनिक करने में कोई बुराई नज़र नहीं आयी । कभी मंच पर भी वे ही काव्य सुना पाए जिनसे लोगों का मनोरंजन हो सके । लेकिन इन रचनाओं को मैं साहित्य कभी नहीं मान पाया । जो रचना दिल से लिखी वह न तो कहीं छप सकी और न ही कहीं सुनाई जा सकी । धर्म दर्शन से सम्बंधित रचनाएं भी कृत्रिमता और कोरे बनावटी आदर्श से ओतप्रोत रहीं और सराही भी गयीं । एक ओहदे पर आने के बाद भी कविता क्षतिग्रस्त हुई । हमेशा यही संकोच बना रहा कि मेरी इस उन्मुक्त अभिव्यक्ति से पद और प्रतिष्ठा पर प्रश्न उठेंगे । कारां घटने की बजाय बढ़ते चले गए । धीरे धीरे एक कवि मरता चला गया । अब वर्तमान में फ़ेकबुक और भ्रष्टअप्प की वर्चुअल मायावी दुनिया में वाल पर कभी कभी दो चार लाइन लिखकर यह बताया जाता है कि सांसे बस चल रहीं हैं लेकिन हिंदी साहित्य और कवि दोनों आई सी यू में है ।

- अनेकान्त

Monday, August 20, 2018

लव जिहाद के दूसरे पहलू भी देखें


लव जिहाद के मुकाबले के लिए समाज में खुला माहौल भी बनाएं

- प्रो.डॉ अनेकान्त कुमार जैन,नई दिल्ली
drakjain2016@gmail.com

वर्तमान में लव जिहाद से पीड़ित समाज बहुत सदमे में है । वास्तव में यह वर्तमान के साथ साथ भविष्य के लिए भी बहुत चिंता का विषय है । गृहस्थों के साथ साथ ब्रह्मचारी और साधु वर्ग भी बहुत चिंतित हैं और तरह तरह के सुझाव प्रस्तुत कर रहे हैं ।

जितने सुझाव अभी तक दिखाई दे रहे हैं उन सभी का सार यही है कि परिवार में संस्कार दो । बेटियों को संस्कार दो । संस्कार और सिर्फ संस्कार का हल्ला गुल्ला मचा कर हम पुनः निश्चिंत हो जाएंगे । लेकिन सिर्फ  संस्कारों की दुहाई देने से क्या समाधान हो जायेगा ?

क्या हमने कभी इसके दूसरे पहलुओं पर विचार किया ? जब सभी समाधान बता रहे हैं तो मैं भी कुछ युगानुरूप समाधान आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ जिन सुझावों को साधक वर्ग अपनी मर्यादाओं के कारण प्रस्तुत नहीं कर सकता । मुझे विश्वास है कि यदि इस पर अमल किया गया तो हम अच्छे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं ।

1. प्रेम कब होता है ? जब हम आपस में मिलते हैं , एक दूसरे के विचारों से ,स्वभाव से प्रभावित होते हैं तब दो युवा दिल एक दूसरे में अपने जीवन का भविष्य देखने लगते हैं ।

2. आपको क्या लगता है ? हम एक धर्म और समाज के लोग कब एकत्रित होते हैं ? 99% धार्मिक समारोहों में ,जहां धर्म की प्रधानता होने से इस मेल मिलाप को पाप कहा जाता है ।

3. हम साधर्मी युवतियों और युवाओं के ऐसे कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं करते जहां वे एक दूसरे को जान सकें ,स्वभाव,ज्ञान,सुंदरता,समान कैरियर आदि से लगातार परिचित हो सकें ।

4.फलस्वरूप युवा अपने शिक्षा स्थल,कार्य स्थल,कॉलोनी,अप्पर्टमेंट्स आदि स्थलों में अपने अनुरूप जीवन साथी खोजने लग जाता है फिर भले ही वह भिन्न धर्म या जाति का हो ।

5. जेहादी हमारी इस दोहरी मानसिकता का फायदा उठाते हैं । जो अवसर देना हमें गंवारा नहीं ,वे अवसर वे दे देते हैं । और संस्कार हीनता आग में घी का काम करती है ।

6. मैंने तो साधर्मी में विवाह करने पर भी युद्ध होते देखें हैं अगर वह प्रेम पर आधारित हुआ तो ।

7.यह कैसा समाज है जो एक तरफ लव जिहाद से पीड़ित होकर रोता है और अगर कोई अपने ही धर्म में किसी इतर जाति से विवाह कर ले तो भी भृकुटी तान लेता है ।

8. समाज में दिगम्बर से,श्वेतांबर से,उसमें भी सोनगड़ियों से,बीस या तेरापंथियों से,
ओसवाल ,खंडेलवाल , लमेचु,पोरवाल,परवार, गोलालरे,गोलापूरब,खड़ौआ, आदि जातियों से भी एक जैन धर्म के अनुयायी होते हुए भी आपस में विवाह सम्बंध करने पर  सामाजिक विरोध से भयभीत रहते हैं । हमने तो फ़रमान तक सुने हैं ।

9. क्या हमें नहीं लगता कि  जनसंख्या में आधा प्रतिशत से भी कम जैन धर्म समाज अपने ही भीतर आपस में इतनी कठोर रहेगी तो हमारे बच्चे कब तलक हमारे बस में रहेंगे ?

10. लव जेहाद का जबाब साधर्मी प्रेम पुष्प को खिलाकर दीजिये तो बात बन सकती है । इसके लिए उचित और मर्यादित उन्मुक्त वातावरण का निर्माण हमें स्वयं को करना होगा   ।

आइये एक स्वस्थ्य,स्वतंत्र ,संपन्न और उदात्त विचारों से समृद्ध समाज का निर्माण स्वयं करें और लव जेहाद जैसी शैतानी शक्तियों से अपनों का जीवन बचाएं ।

Thursday, August 16, 2018

अटल जी से सीखें विरोधी के साथ व्यवहार कैसे करें ?

अटल जी से सीखें विरोधी के साथ व्यवहार कैसे करें ?

हमारे समभाव की परीक्षा इस बात से होती है कि हम अपने विरोधियों के साथ क्या व्यवहार अपनाते हैं ?क्या  हम अपने विचारों से विपरीत विचार वाले के साथ उठ बैठ लेते हैं ? उसे बने रहने देना चाहते हैं या कि समाप्त करना चाहते हैं ? यदि हम उसे जड़ से ख़त्म करना चाहते हैं ,उसे मार डालना चाहते हैं तो हमारे समभाव की नीति बहुत संदेहास्पद है | हम समभाव को समझे ही नहीं |अपने विरोध को भी सहज स्वीकारे  और सहन किये बिना हम समभाव की साधना नहीं कर सकते |
विरोधी के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए यह हमें अटल जी के जीवन से सीखना चाहिए । वे विरोध भी इस नज़ाकत के साथ करते थे कि विरोधी को भी उनसे प्यार हो जाता था।गांधी जी ने राजनीति में अहिंसा के प्रयोग की मिसाल कायम की थी ।अटल जी ने राजनीति में जैन दर्शन के अनेकान्त और स्याद्वाद सिद्धांत के कुशल प्रयोग की मिसाल बनायी । विपक्ष भी सरकार चलाता है - ये हमें अटल जी ने समझाया ।

आज विरोध करना सभी को आता है लेकिन उस विरोध में शालीनता,विनम्रता ,भाषा का संतुलन और कुछ नहीं कह कर भी विरोध जता देने की कला के महारथी थे अटल जी । आज राजनीति में भाषा और व्यवहार का जो गिरा हुआ रूप देखने में आ रहा है वह चिंतनीय है ,इसके कारण आज लोकतंत्र कलंकित हो रहा है । अटल जी को श्रद्धांजलि देने वाले सभी राजनीतिज्ञ उनके इस गुण को सीख लें तो अटल जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

अटल जी के जीवन की शिक्षाएं हमारे जीवन में अटल रहें - यही कामना है ।
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि ।

-प्रो अनेकान्त कुमार जैन ,अध्यक्ष-जैनदर्शन विभाग,श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,नई दिल्ली-16

Wednesday, June 13, 2018

सावधान ! सूचना क्रांति बनेगी अवसाद का सबसे बड़ा कारण

एक संत तो निकल लिए बाकी का क्या ? 
(सावधान ! सूचना क्रांति बनेगी अवसाद का सबसे बड़ा कारण) 

                                                          - आचार्य अनेकांत ,नई दिल्ली
अवसाद की अनेक वजहों में एक बड़ी वजह स्वाभाविक अभिव्यक्ति में आने वाली लगातार कमी भी है | आपको जब गुस्सा आ रहा हो और आप सिर्फ इसीलिए अभिव्यक्त न कर पायें कि कोई फ़ोन रिकॉर्ड कर लेगा ,विडियो बना लेगा,सी सी टी वी में कैद हो जायेगा और यह सब कुछ बिना वजह उनके सामने उस समय पेश किया जायेगा जिनसे जिस वक्त गुस्सा छोड़कर आपने किसी तरह सम्बन्ध अच्छे बना लिए हैं और सब कुछ शांति से चल रहा है |
तब इन्हीं कुछ कारणों से लोग मित्रों ,रिश्तेदारों तक से अपना ह्रदय खोलने में घबड़ा रहे हैं | इस प्रकार की प्रवृत्ति परिवार,समाज,कार्यालय ,शिक्षा संस्थान आदि में एक कृत्रिम वातावरण का निर्माण कर रही है जहाँ किसी के साथ खुल कर हंसना बोलना रोना चिल्लाना आदि सारे मनो भाव स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त न होने के कारण लोगों को कुंठाग्रस्त कर रहे हैं |
संवादहीनता की वृद्धि -
हमें अगर किसी से कोई समस्या है और अगर हम किसी कारण से उससे न कह सकें तो दूसरों से कह कर तो मन हल्का कर ही सकते हैं ,किन्तु अविश्वसनीय और स्वार्थी माहौल ने मन ही मन घुटना एक मजबूरी बना दिया है | हम जिस पर विश्वास करके अपना मन हल्का करते हैं वह उसे रिकार्ड करके प्रतिपक्षी का मन हमारे प्रति भारी कर आता है | क्षणिक भावों को स्थायी भाव बता कर प्रस्तुत करने वाले नारदीय गुण वाले बंदरों के हाथ में सोशल मीडिया का उस्तरा जब से हाथ में आया है तब से वे पहले से ज्यादा व्यस्त हो गए हैं |इधर की उधर भिड़ाकर लोगों को लड़ाने में . संघर्ष करवाने में और राग द्वेष भड़काने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है |
एक संत तो निकल लिए बाकी का क्या ?  
सोशल मीडिया सूचना तकनीकी क्रांति भले ही बहुत कुछ प्रदान कर रही है पर हमारे स्वाभाविक जीवन को तहस नहस भी कर रही है | अवसाद से आज मोक्ष के लिए तपस्या रत साधू समाज भी ग्रसित हो रहा है | आत्म शून्य अध्यात्मवाद के चक्कर में वे स्वयं आत्मप्रवंचना के शिकार हो रहे हैं | जबरजस्ती दबाई गयी वासना और पवित्रता-पूज्यता का क्षद्म चोला ओढ़ कर वे स्वयं को भगवान समझने की भूल कर रहे हैं और यद्वा तद्वा विकृत सेक्स की घटनाओं में लगातार फंस रहे हैं |
कृत्रिम अभिव्यक्ति की आजादी वाला मोबाइल,इन्टरनेट,लैपटॉप भी उनके हाथों में है | जिससे वे भी लगातार लोकेषणा, आत्ममुद्घता और आत्म प्रवंचना के शिकार हो रहे हैं | वे ध्यान कम करते हैं ,किन्तु उस मुद्रा की फोटो खिंचवा कर इन्टरनेट पर ज्यादा डालते हैं | हमसे ज्यादा वे अवसाद से ग्रसित हैं ,लगातार मंच पर मुस्कुराते हुए बैठना और खुद को शांत रस की मूर्ति बना कर प्रस्तुत करते रहना किसी गहरे तनाव से कम नहीं |अकूत संपत्ति एकत्रित करते समय शास्त्र की ये पंक्तियाँ विस्मृत कर देते हैं कि अर्थ ही अनर्थ का मूल होता है - अत्थो अणत्थ मूलं |
सारा अध्यात्म सारे प्रवचन सारा ज्ञान सारा वैभव बेमानी लगने लग जाता है जब कोई संत कहलाने वाला बाहर से संपन्न मनुष्य आत्महत्या कर लेता है | काश अन्दर से संपन्न लोगों को समाज में संत कहा जाता और पूजा जाता तो संत आत्महत्याओं से बच जाता और समाज लुटने से |

Friday, March 16, 2018

इस घटना के माध्यम से मैं कुछ कहना चाहता हूँ

इस घटना के माध्यम से मैं कुछ कहना चाहता हूँ ......................

हमने दूसरे समुदाय से क्या सीखा ?और उन्हें क्या सिखाया ?

                                        -  डॉ अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली

 मैं आपको एक नयी ताज़ा सत्य घटना सुनाना चाहता हूँ और उसके माध्यम से बिना किसी निराशा के कुछ कहना भी चाहता हूँ | शायद आप समझ जाएँ |

 अभी मेरा दिल्ली में लोधी कॉलोनी में आयोजित एक सर्व धर्म संगोष्ठी में जाना हुआ | जैन धर्म की तरफ से मुझे प्रतिनिधित्व करना था | वह एक राउंड टेबल परिचर्चा थी जिसमें भाषण देने देश के विभिन्न धर्मों के लगभग २४-२५ प्रतिनिधि पधारे थे | अध्यक्ष महोदय ने सभा प्रारंभ की और सभी को वक्तव्य देने से पहले एक शर्त लगा दी कि आपको अपने धर्म के बारे में कुछ नहीं कहना है | आपको अपने से इतर किसी एक धर्म के समुदाय से आपने कौन सी अच्छी बात सीखी सिर्फ यह बताना है | जाहिर सी बात है मेरी तरह सभी अपने धर्म की विशेषताएं बतलाने के आदी थे और अचानक ये नयी समस्या ? खैर सभी ने खुद को किसी तरह तैयार किया इस अनोखे टास्क के लिए | जो हिन्दू धर्म का विद्वान् था उसने इस्लाम की प्रशंसा करके उनकी एक खूबी बताई जिससे वे प्रभावित थे ,एक मुस्लिम विद्वान् ने वेदांत दर्शन की एक खूबी बतलाई जिससे वे प्रभावित हुए | मैंने सिक्ख समुदाय की एक विशेषता बतलाई जिससे मैं प्रभावित हुआ था | इस तरह सभी ने सभी धर्मों की खूबियों का बखान किया ,किसी धर्म को नहीं छोड़ा |ऐसे धर्म तक चर्चा में आये जो भारत में हैं ही नहीं ,या नाम मात्र के हैं |

यह छुपाने वाली बात नहीं है कि मैं मन ही मन मैं सभी धर्म के प्रतिनिधियों की बातें ध्यान पूर्वक इसलिए सुनता रहा और तरसता रहा कि कोई तो ऐसा होगा जो ये कहेगा कि मैं जैन धर्म और समुदाय से प्रभावित हुआ ,मैंने उनसे यह एक अच्छी बात सीखी | टेबल पर पूरा राउंड होने को था लगभग सभी धर्म समुदाय कवर हो लिए थे | लेकिन अंतिम वक्ता को सुनने के बाद मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि उस सभा में बैठे अपने अपने धर्मों के शीर्ष विद्वानों में से किसी ने सहजता से भी जैन धर्म का जिक्र तक नहीं किया |

मैं स्तब्ध था, जैन समाज के धर्म प्रभावना के सभी धन और समय के खर्चीले कार्यक्रमों के बारे में सोच रहा था | हमने कितनी महावीर जयंतियां मना लीं,कितने जन्म दिवस और दीक्षा दिवस मना लिए,कितने पञ्चकल्याणक हो लिए ,सेवा के लिए कितने स्कूल,कॉलेज,अस्पताल बना डाले,लाखों संस्थाएं बना डालीं  और इसके बदले आज ये देखने को मिल रहा है कि अन्य धर्मों के किसी एक प्रतिनिधि ने भी कुछ नया सीखने को लेकर जैन धर्म ,समुदाय को प्राथमिकता पर नहीं रक्खा | मुझे लगा कुछ परिचित प्रतिनिधियों से चुपचाप कह दूँ कि आप जैन का बताना ताकि इज्जत बच जाए ,लेकिन मैं शांत रहा | मैंने सोचा नहीं ,ये आज हमारी परीक्षा का सही मौका है | सभी स्वतंत्रता से बोल रहे हैं |उन्हें अपने मन से निर्णय करके बोलने दो ,तो ही ठीक रहेगा |

हम तो अपने गिरेबान में झांकेंगे कि आखिर ऐसी कौन सी भूल हम से हो रही है कि हमारी प्रभावना सिर्फ हम तक ही सीमित है ?क्या हम ऐसा कुछ नहीं कर पाए कि दूसरे हमारे धर्म से दिल से प्रभावित हो ? ये सब अंतर्द्वन्द्व मेरे भीतर चल ही रहा था कि सभा समाप्ति की ओर आ गयी और अध्यक्ष जी को अध्यक्षीय देना था | मैंने मानस बनाया कि यदि इन्होंने भी कुछ नहीं बोला तो फिर मैं निवेदन करूँगा | अध्यक्ष जी मेरी मनः स्थिति शायद भांप गए और विनम्र शब्दों में सभी का धन्यवाद दिया और निवेदन किया कि एक जैन धर्म हममें से किसी ने नहीं ले पाया अतः मैं विराम लेने से पूर्व आप से गुजारिश करता हूँ कि डॉ जैन को छोड़ कर अन्य कोई प्रतिनिधि  इस धर्म के बारे में भी बताये कि आपने जैनों से क्या सीखा ? चूंकि हम सभी धर्मों को साथ लेकर चल रहे हैं अतः इस धर्म पर भी चर्चा थोड़ी देर कर दें | उनके निवेदन के उपरान्त सभी ने सांत्वना के रूप में अहिंसा ,अनेकांत आदि सिद्धांतों की प्रशंसा कर डाली | मैंने भी कुछ राहत महसूस की और सभा समाप्त हो गयी |   

सभा तो समाप्त हो गयी लेकिन मैं अन्दर से हिल गया और अभी तक चिंतन मनन कर रहा रहूँ | आत्मनिरीक्षण कर रहा हूँ | किसी की निंदा या स्तुति के मूड में भी नहीं हूँ | पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि हम किसी निरर्थक आत्मप्रवंचना के शिकार होते जा रहे हैं |अपने ही साथ भारी भरकम छल सा कर रहे हैं | दूसरों को अपने रंग में रंगने की कला विकसित करने की जगह सिर्फ मूर्तियाँ रंग रहे हैं , भगवानों को नहलाये जा रहे हैं लेकिन किसी को भी भिगो नहीं पा रहे हैं | पुण्य पाप की स्वार्थी और बाजारू व्याख्याएं कर रहे हैं | कषायों के कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं और खुश हो रहे हैं कि हम सबसे शुद्ध और अच्छे हैं |हम आध्यात्मिक दिखाई तो देना चाहते हैं ,होना नहीं चाहते और प्रयास भी नहीं करते |

हो सकता है यह घटना तात्कालिक एक संजोग मात्र हो | हर समय हर किसी के साथ जरूरी नहीं कि ऐसा अनुभव हो | मेरे साथ भी ऐसा पहली बार ही हुआ है | लेकिन सोचना तो पड़ेगा | आपके पास समय हो तो आप भी विचार कीजिये  .................

कुछ समझ आता नहीं कैसी हो रही हैं साजिशें |

भीगता कुछ भी नहीं और हो रहीं हैं बारिशें ||

यदि आप भी इस विषय में कुछ कहना चाहते हैं तो मुझेdrakjain2016@gmail.comपर ईमेल कर सकते हैं | 

Saturday, March 10, 2018

भारतीय संस्कृति के आराध्य तीर्थंकर ऋषभदेव - डा. अनेकान्त कुमार जैन


ऋषभदेव जयंती पर विशेष
भारतीय संस्कृति के आराध्य तीर्थंकर ऋषभदेव
डा. अनेकान्त कुमार  जैन

मनुष्य के अस्तित्व के लिए रोटी, कपड़ा, मकान जैसे पदार्थ आवश्यक हैं, किंतु उसकी आंतरिक सम्पन्नता केवल इतने से ही नहीं होती। उसमें अहिंसा, सत्य, संयम, समता, साधना और तप के आध्यात्मिक मूल्य भी जुड़ने चाहिए। भगवान् ऋषभदेव ने भारतीय संस्कृति को जो कुछ दिया है, उसमें असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छह कर्मो के द्वारा उन्होंने जहां समाज को विकास का मार्ग सुझाया वहीं अहिंसा, संयम तथा तप के उपदेश द्वारा समाज की आंतरिक चेतना को भी जगाया।
जन-जन की आस्था के केंद्र तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म चैत्र शुक्ला नवमी को अयोध्या में हुआ था तथा माघ कृष्णा चतुर्दशी को इनका निर्वाण कैलाश पर्वत से हुआ था।इन्हें आदिनाथ के नाम से भी जाना जाता है .इनके पिता का नाम नाभिराय तथा इनकी माता का नाम मरुदेवी था. कुलकर नाभिराज से ही इक्क्षवाकू कुल की शुरुआत मानी जाती है। इन्हीं के नाम पर भारत का एक प्राचीन नाम अजनाभवर्ष भी प्रसिद्ध है . ऋषभदेव प्रागैतिहासिक काल के एक शलाका पुरुष हैं जिन्हें इतिहास काल की सीमाओं में नहीं बांध पाता है किंतु वे आज भी भारत की सम्पूर्ण भारतीयता तथा जन जातीय स्मृतियों में पूर्णत:सुरक्षित हैं। भागवत में कहा है –
 अष्टमेमेरुदेव्यांतुनाभेर्जातउरूक्रमः.
            दर्शयन वर्म धीराणां सर्वाश्रमनमस्कृतम् 
चौबीस तीर्थकरों में ये ही ऐसे तीर्थकर हैं, जिनकी पुण्य-स्मृति जैनेतर भारतीय वाड्.मय और परंपराओं में भी एक शलाका पुरुष के रूप में विस्तार से सुरक्षित है।इनकी दो पुत्रियां ब्राह्मी तथा सुन्दरी नाम से थीं तथा भरत, बाहुबली आदि सौ पुत्र भी थे .इन्होंने अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि विद्या तथा सुन्दरी को अंक विद्या का ज्ञान सर्वप्रथम देकर स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात किया .
यही कारण है कि प्राचीनकाल में सम्राट अशोक ने जिस लिपि में अपने शिलालेख लिखवाये उसका नाम ब्राह्मीलिपि है.यही लिपि विकसित होकर आज देवनागरी के रूप में हमारे सामने है.इनके पुत्र बाहुबली की एक हज़ार वर्ष पुरानी एक शिला पर उत्कीर्ण ५७ फुट विशाल विश्व प्रसिद्ध प्रतिमा कर्णाटक के श्रवणबेलगोला स्थान पर स्थित है .
भगवान् ऋषभदेव का सबसे बड़ा योगदान यही है कि एक राजा के रूप में उन्होंने मनुष्यों को कर्म करना सिखाया ,कई कलायें सिखायीं तथा एक तपस्वी के रूप में उन्हें मुक्ति का मार्ग भी बताया .वे कहते थे ‘कृषि करो और ऋषि बनो’
इस प्रकार भारतीय संस्कृति को उनका अवदान एकांगी होकर सर्वागीण और चतुर्मुखी है। भारतीय संस्कृति के आंतरिक पक्ष को जो योगदान उन्होंने दिया, उसकी चर्चा संसार का प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद इन शब्दों में करता है-
त्रिधा बद्धोवृषभोरोरवीतिमहादेवोमत्यां आ विवेश”
इस मन्त्रांश का सीधा शब्दार्थ है-तीन स्थानों से बंधे हुये वृषभ ने बारंबार घोषणा की कि महादेव मनुष्यों में ही प्रविष्ट हैं। यह घोषणा आत्मा को ही परमात्मा बनाने की घोषणा है। आत्मा में परमात्मा के दर्शन करने के लिए मन, वचन, काय का संयम आवश्यक है। यह त्रिगुप्ति ही वृषभ का तीन स्थानों पर संयमित होना है।
आत्मा ही परमात्मा है, यह घोषणा भारतीय संस्कृति को उन सेमेटिक धर्मो से अलग करती है, जिन धर्मो में परमात्मा को परमात्मा और जीव को जीव माना गया है तथा यह कहा गया है कि जीव कभी परमात्मा नहीं हो सकता। किंतु जैन चिन्तन में जो आत्मा है, वही परमात्मा है- अप्पा सो परमप्पा । ऋषभदेव का यह स्वर इतना बलवान था कि यह केवल जैनों तक सीमित नहीं रहा, अपितु पूरे भारतीय चिंतन में व्याप्त हो गया। उपनिषदों ने भी घोषणा की- अयम् आत्मा ब्रह्म। वेदान्त ने तो इतना भी कह दिया कि सब शास्त्रों का सार यही है कि जीव ही ब्रह्म है- जीवो ब्रह्मैवनापर:यदि धर्म दर्शन के क्षेत्र में भारतीय संस्कृति को गैर-भारतीय संस्कृति से अलग करने वाला व्यावर्त्तकधर्म खोजा जाय तो वह है- आत्मा परमात्मा की एकता और इस तथ्य के अन्वेषण में भगवान् ऋषभदेव प्रभृत शलाका पुरुष का महत्वपूर्ण योगदान है।
जैन तीर्थकर ऋषभदेव को अपना प्रवर्तक तथा प्रथम तीर्थकर मानकर पूजा करते ही हैं, किंतु भागवत् भी घोषणा करता है कि नाभि का प्रिय करने के लिए विष्णु ने मरूदेवी के गर्भ से वातरशना ब्रह्मचारी ऋषियों को धर्म का उपदेश देने के लिए ऋषभदेव के रूप में जन्म लिया-
नाभे: प्रियचिकीर्षया। तदवरोधायने मेरूदेव्यां धर्मान्दर्शयितुकामो वातरशनानां
श्रमणानामृषिणां र्ध्वमन्थिनां शुक्लया तनुवावततारा (श्रीमद्भागवत 5/3/20)

भागवत् के पांचवें स्कंध के पांचवें अध्याय में उस उपदेश का विस्तार से वर्णन है जिसे ऋषभदेव ने दिया था। भारतीय जनता ऋषभदेव के महान उपकारों के प्रति इतनी ज्यादा समर्पित हुई कि कृतज्ञता वश उनके ज्येष्ठ चक्रवर्ती पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष करके गौरव माना- भरताद्भारतं वर्षम्।

नवीं शती के आचार्य जिनसेन के आदिपुराण में तीर्थकर ऋषभदेव के जीवन चरित का विस्तार से वर्णन है। भारतीय संस्कृति के इतिहास में ऋषभदेव ही एक ऐसे आराध्यदेव हैं जिसे वैदिक संस्कृति तथा श्रमण संस्कृति में समान महत्व प्राप्त है।महावीर जयंती कि तरह ऋषभदेव जयंती भी प्रतिवर्ष बहुत धूम धाम से मनाई जाती है .अभी यह परंपरा जैन सम्प्रदाय में प्रचलित है किन्तु यह उत्सव पूरे भारतवर्ष में सभी को मानना चाहिए.

(यह आलेख राष्ट्रीय समाचारपत्र  दैनिक जागरण में प्रकाशित है )