Wednesday, February 14, 2018

जैन विश्व विद्यालय क्यों और कैसे ? एक परिकल्पना

जैन विश्व विद्यालय क्यों और कैसे ? एक परिकल्पना
(सन २००५ में स्याद्वाद महाविद्यालय की स्वर्ण जयंती स्मारिका में प्रकाशित आलेख )

संलग्न लेख में 'जैन विश्वविद्यालय क्यों और कैसे ? एक परिकल्पना के माध्यम से उस तरफ ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया है जिसकी वास्तव में आवश्यकता है ।पढ़ने के लिए इस लिंक पर भी क्लिक करें ।

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Sunday, February 11, 2018

मीडिया मिथ्यात्व से बचें - डॉ अनेकान्त कुमार जैन

मीडिया मिथ्यात्व से बचें
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- डॉ अनेकान्त कुमार जैन,नई दिल्ली

एक प्रश्न आया कि मोबाइल पर परमेष्ठी आदि के चित्र को डिलीट करने से पाप होता है अथवा नहीं ?

1. सर्व प्रथम अच्छा तो यह ही है कि पंच परमेष्ठी के चित्र आदि सोशल मीडिया पर न भेजे जाएं ।

2.सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्ररत्नत्रयप्रभावेन आत्मनः प्रकाशनं प्रभावनम्‌ । - सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप रत्नत्रय के प्रभाव से आत्मा को प्रकाशमान करना प्रभावना है । बाकी सोशल मीडिया आदि अन्य प्रभावना के कार्य उपचार से ही हैं । वास्तविक प्रभावना नहीं है ।

3. मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि सोशल मीडिया पर परमेष्ठी के चित्र आदि भेजने से न पुण्य होता है न मोबाइल से इन्हें डिलीट करने से पाप ।

4.अन्यथा भेजने वाला पुण्य के लोभ में भेजता रहेगा और हम पाप के डर से कब तक मेमोरी कार्ड बदलते रहेंगे ।

5. चित्र आदि की उपचार विनय ही होती है ,हो पाती है ।वह वास्तविक विनय नहीं है ।

6.फिर कल को पारस और जिनवाणी आदि चैनल वाले भी कहने लगेंगे कि यदि आपने हमारा चैनल बदल कर न्यूज़ या सीरियल का चैनल लगाया तो पाप बंध हो जाएगा । क्यों कि यह जिन धर्म का अपमान है ।

7. विश्वास माने जैन धर्म सरल जरूर है पर इतना सस्ता नहीं है जो जब चाहे उसका सम्मान कर दे और जब चाहे उसका अपमान कर दे ।

8.जैन धर्म यदि ऐसी ही सस्ती लोकप्रियता का लोभी होता तो आज घर घर में मंदिर,मड़िया होते और जो चाहे जैसे भी तीर्थंकरों की प्रतिमाओं का बिना किसी नियमों के गलियों,चौराहों पर अभिषेक भी करता होता ।

9.लोकप्रियता के लिए लौकिक स्तर पर भगवान को भी उतारना पड़ता है जो हम भवदधि से पार हो चुके अपने भगवंतों के लिए नहीं कर सकते ।

10. सस्ती धर्म प्रभावना का लोभ  धर्म को सस्ता बना देता है । जो कम से कम जैन धर्म को स्वीकार नहीं है । वह सरल हो सकता है निम्न या सस्ता नहीं ।

आधुनिक संदर्भ में ‘सामायिक’ की उपादेयता

आधुनिक संदर्भ में ‘सामायिक’ की उपादेयता

'सामायिक’ जैनधर्म की एक मौलिक अवधारणा है जिसमें संपूर्ण जैन दर्शन का सार समाहित है। यदि यह पूछा जाए कि एक शब्द में भगवान् महावीर का धर्म क्या है तो इसका उत्तर होगा—‘सामायिक’। प्राचीन काल से ही ही ‘सामायिक’ करने की परम्परा संपूर्ण जैन समाज में चली आ रही है। दिगम्बर हो या श्वेताम्बर; गृहस्थ हो या मुनि सामायिक का महत्त्व प्रत्येक स्थल पर है।
मुनियों के छह आवश्यकों में ‘सामायिक’ प्रथम आवश्यक है। आचार्य कुन्दकुन्द ने ‘‘समणो समसुह दुक्खो’ (प्रवचनसार गाथा १/४ कहकर समण का लक्षण ही सुख और दु:ख में समभाव रहने वाला किया है। भगवती आराधना की विजयोदया टीका में समण का लक्षण करते हुए, अपराजितसूरि ने कहा—

‘समणो समानमणो समणस्स भावो सामण्णं क्वचिदप्यनगुगतरागद्वेषता

समता सामणशब्देनोच्यते। अथवा सामण्णं समात।’ अर्थात् ‘जिनका मन सम है वह समण तथा समण का भाव ‘सामण्णं’ (श्रामण्य) है। किसी भी वस्तु में राग—द्वेष का अभाव रूप समता ‘सामण्णं’ शब्द से कही जाती है। अथवा सामण्णं को समात कहते हैं।
मात्र मुनि ही नहीं वरन् गृहस्थ भी मुनियों की तरह सामायिक धारण करता है और समस्त सावद्य योग से रहित, समता में स्थित सामायिक करने वाला गृहस्थ भी उतने क्षण मुनि सदृश हो जाता है। इसकी चर्चा भी जैनाचार्यों ने स्थान—स्थान पर की है। आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं कि सामायिक आश्रित गृहस्थ चारित्र मोहोदय के सद्भाव में भी महाव्रती मुनि के समान होता है—
सामायिकश्रितानां समस्तसावद्ययोगपरिहारात्।
भवति महाव्रतमेषामुदयेऽपि चारित्रमोहस्य।।

(पुरुषार्थसिद्धयुपाय—श्लो. १५०)
र्काितकेयानुप्रेक्षा में भी ‘‘जो कुव्वादि साइयं सो मुणिसरिसो हवे ताव।।’’ (गाथा—३५७) कहकर यही भाव प्रकट किया गया है। आचार्य बट्टकेर मूलाचार (१/२३) में लिखते हैं कि जीवन—मरण, लाभ—हानि, संयोग—वियोग, मित्र—शत्रु, सुख—दु:ख आदि में रागद्वेष न करके समभाव रखना समता है और इस प्रकार के भाव को सासामायिककहते हैं।
सामायिक की व्युत्पत्तिमूलक व्याख्या करते हुए केशववर्णी ने लिखा है ‘सम’ अर्थात् एकत्व रूप से आत्मा में ‘आय’ अर्थात् आगमन को समाय कहते हैं। इस दृष्टि से परद्रव्यों से निवृत्त होकर आत्मा में प्रवृत्ति का नाम समाय है। अथवा ‘स’ अर्थात् समरागद्वेष से अबाधित मध्यस्थ आत्मा में ‘आय’ उपयोग की निवृत्ति समाय है। यह प्रयोजन जिसका है वह सामायिक है।
(गोम्मटसार जीवकाण्ड, जीव त. प्र. टीका गाथा ३६८)
उत्तराध्ययन के एक प्रश्नोत्तर में कहा है—जीव को सामायिक से क्या प्राप्त होता है ? इसके उत्तर में कहा है—सामायिक से जीव सावद्य योगों (असत् प्रवृत्तियों) से विरति को प्राप्त होता है।
(उत्तराध्ययन २९/८)
आचार्य कुन्दकुन्द ने कहा कि चारित्र वास्तव में धर्म है। जो धर्म है वह ‘साम्य’ है और मोह क्षोभ से रहित आत्मा का परिणाम भाव ही ‘साम्य’ है। आत्मा की इसी अवस्था को सामायिक कहते हैं।
चारित्तं खुल धम्मो धम्मो जो सो समोत्ति णिद्दट्ठो।
मोहक्खोहविहीणो परिणामो अप्पणो हु समो।।

(प्रवचनसार, १/७)
संपूर्ण व्याख्याओं का सार यही है कि सभी सावद्ययोग से रहित होकर, राग—द्वेषादि विकारों से परे आत्मा का साम्यभाव में स्थिर होना ही सामायिक कहलाता है। जयधवला में द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, इन चार प्रकारों से सामायिक के भेद किया है। (जयधवला १/१/१, प्र. ८१)। भगवती आराधना में नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव के भेद से तथा एक स्थल पर मन, वचन और काय—इन तीन भेदों से सामायिक के भेद माने हैं। (भ. आ. वि. टीका गाथा—११६) इस प्रकार प्रकारान्तर से और भी प्रभेद मिल जाते हैं। किन्तु यदि गहराई से विचार करें तो हम पायेंगे इन भेदों के मूल में भी बाह्य निमित्तों की अपेक्षा ही मुख्य है। अन्तरंग निमित्त तो यहाँ एक आत्मपरिणति ही है। कब कब सामायिक करना चाहिए इसका उल्लेख भी शास्त्रों में कई प्रकार से प्राप्त होते हैं।

आवश्यकसूत्र में उल्लिखित सामायिक पाठ

उच्चारण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इस विषय पर शोधकार्य करके पर्याप्त दृष्टियों को सामने लाया जा सकता है। यहाँ मैं सामायिक के मात्र कुछ संदर्भ ही उल्लिखित कर रहा हूँ क्योंकि सामायिक विषय पर प्राचीन दिगम्बर—श्वेताम्बर आगमों का अध्ययन तथा उन पर शोधकार्य कर एक पूरे शोध प्रबन्ध की भी रचना हो सकती है और संभवत: हुई भी है। शास्त्रों में सामायिक के अतिचारों का भी उल्लेख है, मैं उस विस्तृत व्याख्या में भी नहीं जा रहा हूँ।
इस संदर्भ में मेरा मात्र यही कहना है कि सामायिक के पाठ आज हिन्दी तथा संस्कृत में भी उच्चरित होने लगे हैं। मेरा मानना है कि सामायिक पाठ मूल प्राकृत भाषा में ही होने चाहिए। भाषा का अपना एक महत्त्व होता है। प्राकृत जैनों के मूल आगमों की भाषा है। हम भले ही हिन्दी, संस्कृत या अंग्रेजी में उनके अर्थ श्रावकों को समझायें ताकि आत्महत्या तक कर लेते हैं यह किसी से छुपा नहीं है।
जैनधर्म की ‘सामायिक’ व्यक्ति को खुद से जुड़ने का मौका देती है। खुद से खुद की मुलाकात का मौका देती है ‘सामायिक’। ‘सामायिक’ का अभ्यास करने वाले का आत्मबल इतना मजबूत हो जाता है कि वह किसी भी परिस्थिति में अपना संतुलन नहीं खोता। इस प्रकार का आत्म विजयी व्यक्ति पूरे विश्व पर सफलता की विजय पताका फहरा सकता है।
आज नयी पीढ़ी धार्मिक क्रियाओं के नाम से घबराती है। सम्प्रदायाओं की व्याख्याओं से उसका कोई लेना देना नहीं है। महानगरों में, विदेशों में प्रतिदिन देवदर्शन करना एक बहुत बड़ी समस्या है। आज की इस भागदौड़ वाली जिन्दगी में कोई एक स्थान पर बैठकर दो घड़ी यदि अपनी आत्मा और परमात्मा का स्मरण कर ले तो समझिए बहुत बड़ी सफलता मिल गयी है।
यदि हम सामायिक के उद्देश्य, स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए नयी सामायिक को विकसित करें तो आधुनिक युग का श्रावक धर्म से जुड़ा रहेगा, अपनी आत्मा से जुड़ा रहेगा, अपने जीवन मूल्यों को सुरक्षित रख सकेगा। तनाव और अशांति के इस माहौल में भी वह हर परिस्थिति पर विजय प्राप्त करके आत्मकल्याण का मार्ग भी प्रशस्त कर सकेगा।

डॉ. अनेकान्त कुमार जैन
अध्यक्ष -जैनदर्शन , श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ
(मानित विश्वविद्यालय) नई दिल्ल— १६
, ९७११३९७७१६
अनेकान्त शोध पत्रिका  अक्टू. दिसम्बर. २०१० पृ० ४२ से ४६ तक प्रकाशित 

अहिंसा, जैनधर्म और इस्लाम -- डॉ. अनेकान्त कुमार जैन

अहिंसा, जैनधर्म और इस्लाम

-डॉ. अनेकान्त कुमार जैन
इस्लाम अरबी भाषा का शब्द है। मुहम्मद अली की पुस्तक 'Religion of Islam' में इस शब्द की व्याख्या बताई गई है। इस्लाम शब्द का अर्थ है- ‘शान्ति में प्रवेश करना’। अतः मुस्लिम व्यक्ति वह है, जो ‘परमात्मा पर विश्वास और मनुष्यमात्र के साथ पूर्ण शांति का संबन्ध’ रखता हो। इस्लाम शब्द का लाक्षणिक अर्थ होगा- वह धर्म, जिसके द्वारा मनुष्य भगवान की शरण लेता है और मनुष्यों के प्रति अहिंसा एवं प्रेम का व्यवहार करता है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में इस्लामधर्म की विशेषताओं पर व्यापक प्रकाश डाला है।

इस्लाम के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब

माने जाते हैं, जिनका जन्म अरब देश के मक्का शहर में सन् ५७० ई. में हुआ था और मृत्यु सन् ६३२ ई. में हुई। इस्लामधर्म के मूल कुरान, सुन्नत और हदीस नामक ग्रन्थ हैं। कुरान वह ग्रन्थ है, जिसमें मुहम्मद साहब के पास खुदा के द्वारा भेजे गये संदेश संकलित हैं। सुन्नत वह है, जिसमें मुहम्मद साहब के कार्यों का उल्लेख है और हदीस वह किताब है, जिसमें उनके उपदेश संकलित है।
कुरान में प्रेम और अहिंसा से सम्बन्धित अनेक सन्देश हैं। इकबाल की पुस्तक 'Secret of the self'२ की भूमिका मे लिखा है- नबी ने कहा है, ‘तखल्लिक्-बि-इखलाकिल्लाह’ अर्थात् अपने भीतर परमेश्वर के गुणों का विकास कर। खुदा बन्दों को प्यार करता है और वे उसे प्यार करते हैं इसलिए उसका नाम वदूद (प्रेमी) भी है।’’ - यह कुरान का ही वचन है।
हदीस का वचन है कि ‘‘ईमान की ७० शाखाएँ हैं। सबसे ऊँची यह कि अल्लाह को छोड़कर किसी की इबादत मत करो और सबसे नीची यह कि जिन बातों से किसी का नुकसान होता हो, उन्हें छोड़ दो।’’
कुरान का फातिहा नामक अध्याय बहुत महत्त्वपूर्ण है। एक तरह से यह कर्मफल के विवेचन का अध्याय है, इसमें प्रत्येक मुसलमान का ध्यान हर रोज पांच बार दिलाया जाता है। उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कर्मफल पर विश्वास दृढ़ होने पर आदमी दुष्कर्मों को छोड़ देता है। कुरान कहता है- ‘‘अच्छे और बुरे कर्मों के परिणाम अवश्य मिलेंगे। जिसने भी,कण मात्र भी सुकर्म किया है, वह उसे अपनी आंखों से देखेगा; जिसने ककण मात्र भी दुष्कर्म किया है वह भी उसे अपनी आँखों से देखेगा। जिसने भी कण मात्र भी सुकर्म किया है, वह भी उसे अपनी आँखों से देखेगा;
इस्लाम दर्शन में ग्यारहवीं शती में एक प्रख्यात चिंतक हुए ‘अबुल अरा’ (सन् १०५७) अबुल अरा आवागमन के सिद्धान्त के विश्वासी थे। शाकाहारी तो थे ही, दूध, मधु और चमड़े का व्यवहार भी नहीं करते थे। पशु-पक्षियों के लिए उनके मन में दया थी। वे ब्रह्मचर्य और यतिवृत्ति का भी पालन करते थे।
इस्लाम की मान्यता है कि जगत मे जितने भी प्राणी हैं, वे सभी खुदा के ही बन्दे और पुत्र हैं। कुरान शरीफ के प्रारंभ में अल्लाताला का विशेषण ‘विस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीमि’ है, जिसका अर्थ है, खुदा दयामय है अर्थात् खुदा के मन के कोने-कोने में दया का निवास है।
मुहम्मद साहब के उत्तराधिकारी हजरत अली ने मानवों को संबोधित करते हुए कहा - हे मानव! तू पशु -पक्षियों की कब्र अपने पेट में मत बना।’’ अर्थात् तू माँस का भक्षण मत कर। इसी प्रकार ‘ दीन-ए-एलाही’ विचारधारा के प्रवर्तक सम्राट अकबर ने कहा- मैं अपने पेट को दूसरे जीवों का कब्रिस्तान नहीं बनाना चाहता।’’ यदि किसी की जान बचाई तो मानों उसने सारे इन्सानों की जिन्दगी बख्शी है। कुरान शरीफ का वाक्य है - व मन् अह्या हा फकअन्नम् अह्यन्नास जमी अनः’।

कुरआन में अहिंसा सम्बन्धी आयतें -

मुझे कुरान देखने एवं पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। मक्तबा अल-हसनात, रामपुर (उ.प्र.) से सन् १९६८ में हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित कुरआन मजीद, जिनके मूल संदर्भों का प्रयोग मैंने किया है, को ही मैंने पढ़ा है। इसी ग्रन्थ से मैंने कुछ आयतें चयनित की हैं जो अहिंसा की भावना को व्यक्त करती हैं। प्रस्तुत हैं वे चयनित आयतें -
१. अल्लाह ने काबा को शान्ति का स्थान बनाया है। (२८:५७)
२. नाहक खून न बहाओ और लोगों को घर से बेघर मत करो। (२:८४)
३. दूसरे के उपास्यों को बुरा न कहो। (६:१०८)
४. निर्धनता के भय से औलाद का कत्ल न करो। (१७:३१)
५.नाहक किसी को कत्ल न करो। मानव के प्राण लेना हराम है। (१७:३३)
६. यतीम पर क्रोध न करो। (९३:९)
७. गुस्सा पी जाया करो और लोगो को क्षमा कर दिया करो। (२:१३४),(२४:२२)
८. बुराई का तोड़ भलाई से करो। (१३:२२), (२८:५४,५५), (४१:३५)
९. कृतज्ञता दिखलाते रहो। (१४:७)
१०. सब्र करना और अपराध को क्षमा करना बड़े साहस के काम हैं। (४२:४३)
११. दो लड़ पड़ें तो उनमें सुलह-सफाई करा दो। (४९:९,१०)
१२. दुश्मन समझौता करना चाहे तो तुम समझौते के लिए हो जाओ। (८:६१)
१३. जो तुमसे न लड़ें और हानि न पहुँचाये उससे, उसके साथ भलाई से व्यवहार करो। (६०:८)

अहिंसा के प्रायोगिक रूप -

मुस्लिम समाज में मांसाहार आम बात है। किन्तु ऐसे अनेक उदाहरण भी देखने में आये हैं जहाँ इस्लाम के द्वारा ही इसका निषेध किया गया है। इसका सर्वोत्कृष्ट आदर्शयुक्त उदाहरण हज की यात्रा है। मैंने अपने कई मुस्लिम मित्रों से इसका वर्णन साक्षात् सुना है तथा कई स्थानों पर पढ़ा है कि जब कोई व्यक्ति हज करने जाता है तो इहराम (सिर पर बाँधने का सपेâद कपड़ा) बाँध कर जाता है। इहराम की स्थिति में वह न तो पशु-पक्षी को मार सकता है न किसी जीवधारी पर ढेला फेक सकता है और न घास नोंच सकता है। यहाँ तक कि वह किसी हरे-भरे वृक्ष की टहनी पत्ती तक भी नहीं तोड़ सकता। इस प्रकार हज करते समय अहिंसा के पूर्ण पालन का स्पष्टविधान है। ‘इहराम की हालत में शिकार करना मना है’।
इतना ही नहीं, इस्लाम के पवित्र तीर्थ मक्का स्थित कस्बे के चारों ओर कई मीलों के घेरे में किसी भी पशुपक्षी की हत्या करने का निषेध है। हज-काल में हज करने वालों को मद्य-मांस का भी सर्वथा त्याग जरूरी है। इस्लाम में आध्यात्मिक साधना में मांसाहार पूरी तरह वर्जित है, जिसे तकें हैवानात (जानवर से प्राप्त वस्तु का त्याग) कहते हैं।
डॉ. कामता प्रसाद लिखते हैं ‘म जरदस्त ने ईरान में पशुबलि का विरोध कर अहिंसा की प्राणप्रतिष्ठा की थीं ईरान के शाहदरा के पाषाणों पर अहिंसा का आदेश अंकित कराया था। त तेजमशेद नामक स्थान पर एक लेख आज भी मौजूद हैं। आज भारत में भी ऐसे अनेक उदहारण हैं। कर्नाटक राज्य में गुलबर्गा में अल्लन्द जाने के मार्ग में चौदहवीं शताब्दी में मशहूर दरवेश वाजा वन्दानवाज गौसूदराज के समकालीन दरवेश हजरत शारुव्रुâद्दीन की मजार के आगे लिखा है- ‘‘यदि तुमने मांस खाया है तो मेहरबानी कर अन्दर मत आओ’’
इसके अलावा कई मुस्लिमसम्राटों ने जैनों के दशलक्षण-पर्युषण पर्व पर कत्लखानों तथा मांस की दुकानों को बन्द रखने के आदेश भी दिये हैं। जिसके प्रमाण मौजूद हैं।
सारांश के रूप मे कह सकते हैं कि इस्लाम में सदगुण (Virtue) और दुर्गुण (Vice) का स्पष्ट विवेचन हुआ है। इस धर्म ने ईश्वर में विश्वास करने, धर्मपथप्रदशकों के विचारों पर आस्था रखने, निर्धनों और दुर्बलों के प्रति दयाभाव रखने की सीख दी है। इससे स्पष्ट है कि इस्लाम परम्परा में उन तत्त्वों की अवहेलना की गई है, जिनसे हिंसाभाव की उत्पत्ति या वृद्धि होती है और उन तत्त्वों को अपनाया गया है, जिनसे अहिंसाभाव की पुष्टि होती है एवं अहिंसा का विकास होता है। यदि हम वास्तव में विश्व शांति और भाई-चार स्थापित करना चाहते हैं तो हमारा यह कत्र्तव्य होना चाहिए कि मजहबों के उन बिन्दुओं को उजागर करें जिनमें अहिंसा, प्रेम, बन्धुत्व आदि की चर्चा है तथा प्रायोगिक उदाहरण हैं, न कि सिर्पâ उन्हें जिनके कारण हमारे कटु अनुभव जुड़े हैं।

सूफी दर्शन और अहिंसा -

इस्लामधर्म के अन्तर्गत ही सूफी संप्रदाय भी विकसित हुआ है। सुफियों का मानना है कि मुहम्मदसाहब को दो प्रकार के ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हुए थे- एक ज्ञान को उन्होंने कुरान के द्वारा व्यक्त किया और दूसरा ज्ञान, उन्होंने अपने ह्रदय में धारण किया। कुरान का ज्ञान, विश्व के सभी व्यक्तियों के लिए प्रसारित किया गया, जिससे वे सद्ज्ञान के द्वारा अपने जीवन को पावन बनायें। दूसरा ज्ञान, उन्होंने अपने कुछ प्रमुख शिष्यों को ही प्रदान किया। वह ज्ञान अत्यन्त रहस्यमय था, वही सूफीदर्शन कहलाया। कुरान का किताबी ज्ञान तो ‘इल्म-ए-शाफीन’ और हार्दिक ज्ञान ‘इल्म-ए-सिन’ कहलाता है।

सूफीदर्शन का रहस्य है-

परमात्मा- सम्बन्धी सत्य का परिज्ञान करना। परमात्म-तत्त्व की उपलब्धि के लिए सांसारिक वस्तुओं का परित्याग करना। जब परमात्म-तत्त्व की अन्वेषणा ही सूफियों का लक्ष्य रहा है तो हिंसा-अहिंसा का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। हिंसा-अहिंसा का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। हिंसा-अहिंसा का प्रश्न वहीं उत्पन्न होता है, जहाँ किसी के प्रति रागभाव का प्राधात्य हो और किसी के प्रति द्वेष की दावाग्नि सुलग रही हो; वहीं हिंसा का प्राधान्य रहता है।

सूफी सम्प्रदाय

सूफी सम्प्रदाय में प्रेम के आधिक्य पर बल दिया गया है। वे परमात्मा को प्रियतम मानकर सांसारिक प्रेम के माध्यम से प्रियतम के सन्निकट पहुंचना चाहते हैं। उनके अनुसार मानवीय प्रेम ही आध्यात्मिक प्रेम का साधन है। प्रेम परमात्मा का सार है। प्रेम ही ईश्वर की अर्चना करने का सर्वश्रेष्ठ और सर्वोंत्कृष्ट रूप है।
इस प्रकार सूफी संप्रदाय में, प्रेम के रूप में अहिंसा की उदात्त भावना पनपी है। प्रेम के विराट रूप का जो चित्रण सूफी संप्रदाय में हुआ, वह अद्भुत है।
यदि हम सूक्ष्मदृष्टि से देखें तो पाएँगे कि इस्लामिक विश्वास, वचन और कर्मकाण्ड (Practice), इसके बाहरी रूप हैं, जबकि इसका आंतरिक रूप सूफीमत है; अतः जनसाधारण का नीतिगत विचार भी सामाजिक और व्यवाहारिक नियमों के अंतर्गत पाया जाता है, पर इसका आंतरिक रूप सूफी विचारों में ही देखा जाता है।
जहाँ तक सूफी मत का प्रश्न है, उसमें आत्म-विकास (Development of the Soul) का पाठ सिखाया गया है। इसमें बहुत ऊँचे आंतरिक आचार की बातें बताई गयी हैं। इस्लाम के अनुसार सच्चा जेहाद तो अपनी शारीरिक तृष्णाओं अथवा वासनाओं के विरुद्ध करना चाहिए। अध्यात्म की दृष्टि से सूफी अहिंसा के अधिक करीब दिखायी देते हैं।

इस्लाम और जैनधर्म-

भारत सदाकाल से अहिंसा, शाकाहार, समन्वय और सदाचार का हिमायती रहा है, उसकी कोशित रही है कि सभी जीव सुख से रहें, जिओ और जीने दो- जैनधर्म का मूलमंत्र है। जैनधर्म ने अपने इस उदारवादी सिद्धान्तों से मुल्क के तथा विदेशी मुल्को के हर मजहब और तबके को प्रभावित किया है। इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘विश्ववाणी’ के यशस्वी संपादक पूर्व राज्यपाल तथा इतिहास विशेषज्ञ डॉ. विशम्बरनाथ पाण्डेय ने अपने एक निबन्ध ‘अहिंसक परम्परा’ में इस बात का जिक्र किया है। वे लिखते हैं कि-
इस समय जो ऐतिहासिक उल्लेख उपलब्ध है, उनसे यह स्पष्ट है कि ईस्वी की पहली शताब्दी में और उसके बाद के १००० वर्षों तक जैनधर्म मध्य-पूर्व के देशों में किसी न किसी रूप में यहूदी, ईसाई तथा इस्लाम को प्रभावित करता रहा है। प्रसिद्ध जर्मन इतिहास लेखक वान व्रेमर के अनुसार ‘मध्य-पूर्व’ में प्रचलित ‘समानिया’ संप्रदाय ‘श्रमण’ शब्द का अपभंरश है इतिहास लेखक जी.एफ.मूर के अनुसार ‘हजरत’ ईसा की संख्या शताब्दी से पूर्व इराक, शास और फिलिस्तीन में जैन मुनि और बौद्ध भिक्षु सैकड़ों की संख्या में चारों तरफ पैâले हुए थे। पश्चिमी एशिया, मिस्र, यूनान और इथियोपिया के पहाड़ों और जंगलों में उन दिनों अगणित भारतीय साधु रहते थे जो अपने त्याग और अपनी विद्या के लिए मशहूर थे, ये साधु वस्त्रों तक का त्याग किये हुये थे, अर्थातवे दिगम्बर थे।
सियाहत नामए नासिर का लेखक लिखता है कि इस्लाम धर्म के कलन्दरी तबके पर जैन धर्म का काफी प्रभाव पड़ा। कलन्दरों की जमात परिव्रजकों की जमात थी। कोई कलन्दर दो रात से अधिक एक घर में नहीं रहता था। कलन्दर चार नियमों का पालन करते थे- साधुता, सत्यता और दरिद्रता। वे अहिंसा पर अखण्ड विश्वास रखते थे।
डॉ. कामता प्रसाद जैन अपने एक निबन्ध ‘विदेशी’ संस्कृतियों में अहिंसा में लिखते हैं कि मध्यकाल में जैन दार्शनिकों का एक संघ बगदाद में जम गया था। जिसके सदस्यों ने वहाँ करुणा और दया, त्याग और वैराग्य की गंगा बहा दी थी। सिहायत नामए नासिर के लेखक की मान्यता थी कि इस्लाम धर्म के कलन्दर तबके पर जैनधर्म का काफी प्रभाव पड़ा था। वे लोग अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी अहिंसा का पालन करते थे, ऐसे अनेक उदाहरण भी मिलते हैं। श्री विशम्बरनाथ पाण्डेय लिखते हैं कि एक बार दो कलन्दर मुनि बगदाद में आकर ठहरे। उनके सामने एक शुतुर्मुर्ग किसी का हीरों का हार निगल गया। सिवाय कलन्दरों को किसी ने यह बात नहीं देखी। हार की खोज हुई। कोतवालों को कलन्दर मुनियों पर संदेह हुआ। मुनियों ने मूक पक्षी के साथ विश्वासघात करना उचित नहीं समझा। उन्होंने स्वयं कोतवालों की प्रताड़ना सहन कर ली लेकिन शुतुर्मुर्ग के प्राणों की रक्षा की।
डॉ. कामता प्रसाद लिखते हैं कि अलविद्या फिर्वेâ के लोग हजरत अली की औलाद से थे- वे भी मांस नहीं खाते थे और जीव दया के पालते थे। ई. ९वीं-१०वीं शती में अब्बासी खलीफाओं के दरबार में भारतीय पण्डितो और साधुओं को बड़े आदर से निमंत्रित किया जाता था। इनमें जैन बौद्ध साधु भी होते थे। इस सांस्कृतिक संपर्वâ का सुफल यह हुआ कि ईरान में अध्यात्मवाद जगा और जीव दया की धारा बही।
वे लिखते हैं कि प्राचीनकाल में अफगानिस्तान तो भारत का ही एक अंग था और वहाँ जैन एवं बौद्ध धर्मों का प्रचार होने से अहिंसा का अच्छा प्रचार था। ई. ६वी-७वीं शताब्दी में चीन यात्री हुएनसांग को वहाँ अनेक दिगम्बर जैन मुनि मिले थे।

अरब का उल्लेख

अरब का उल्लेख जैन आगमों में मिलता है। भारत से अरब का व्यापार चलता था। जादिस अरब का एक बड़ा व्यापारी था- भारत से उसका व्यापार खूब होता था। भारतीय व्यापारी भी अरब जाते थे। जादिस का मित्र एक भारतीय वणिक था। वह ध्यानी योगी की मूर्ति अपने साथ अरब लाया और उसकी पूजा करता। जादिस भी प्रभावित हो पूजा करने लगा। मौर्यसम्राट सम्प्रति ने जैन श्रमणों, भिक्षुओं के विहार की व्यवस्था अरब और ईरान में की, जिन्होंने वहां अहिंसा का प्रचार किया। बहुत से अरब जैनी हो गये, किन्तु पारस नरेश का आक्रमण होने पर जैन भिक्षु और श्रावक भारत चले गये। ये लोग दक्षिण भारत में बस गये और ‘सोलक’अरबी जैन कहलाये।
वे आगे लिखते हैं कि - सन् ९९८ ई. के लगभग भारत से करीब बीस साधु सन्यासियों का दल पश्चिम एशिया के देशों में प्रचार करने गया। उनके साथ जैन त्यागी भी गए, जो चिकित्सक भी थे। इन्होंने अहिंसा का खासा प्रचार उन देशों में किया। सन् १०२४ के लगभग यह दल पुनः शान्ति का संदेश लेकर विदेश गया और दूर-दूर की जनता की अहिंसक बनाया। जब यह दल स्वदेश लौट रहा था, तो इसे अरब के तत्त्वज्ञानी कवि अबुल अला अल मआरी से भेंट हुई। जर्मन विद्वान प्रâान व्रेâगर ने अबुल-अला को सर्वश्रेष्ठ सदाचारी शास्त्री और सन्त कहा है।
अबुल-अला गुरू की खोज में घूमते-घामते जब बगदाद पहुंचे, तो बगदाद के जैन दार्शनिकों के साथ उनका समागम हुआ था और उन्होंने जैनशिक्षा ग्रहण की थी। इसका परिणाम यह हुआ कि अबुल अला पूरे अहिंसावादी योगी हो गये। वे केवल अन्नाहार करते थे। दूध नहीं लेते थे, क्योंकि बछड़े के दूध को लेना पाप समझते थे। बहुधा वे निराहार रहकर उपवास करते थे। कामता प्रसाद लिखते हैं कि वे शहद और अण्डा भी नहीं खाते थे। पगरखी लकड़ी की पहनते थे। चमड़े का प्रयोग नहीं करते थे। नंगे रहने की सराहना करते थे, सचमुच वे दया की मूर्ति थे।
इस प्रकार जैनधर्म दर्शन ने जलालुद्दीन रूमी एवं अन्य अनेक ईरानी सूफियों के विचारों को प्रभावित किया। जीव दया का यह चिंतन कुरान मजीद से भी प्रकट हुआ है। पार - १२ सत्ताइसवें नूर ‘अन-नस्ल’ में २३ आयतें हैं जो मक्का में उतरी थी। उनमें एक प्रसंग बड़ा महत्त्वपूर्ण है- ‘‘सुलेमान के लिए उसकी सेनायें एकत्र की गयीं जिनमें जिन्न भी थे और मानव भी, और पक्षी भी, और उन्हें नियंत्रित रखा जाता था, यहाँ तक कि जब ये सब च्यूँटियों की घाटी में पहुँचे, तो एक च्यूँटी ने कहा : हे च्यूँटियों! अपने घरों में घुस जाओ ऐसा न हो कि सुलैमान और उनकी सेनायें तुम्हें कुचल डालें और उन्हें खबर भी न हो।
’’कुरआन मजीद, पृ. ४२४ इसी पृ. पर नीचे लिखा है कि च्यूँटियो की बात कोई सुन नहीं पाताः परन्तु अल्लाह ने हसरत सुलेमान अ. को च्यूँटियों की आवाज सुनने की शक्ति प्रदान की थी। कुरआन मजीद का यह प्रसंग इसलिए संवेदनशील है कि संसार के छोटे से प्राणी चींटी की भी ह्रदय वेदना की आवाज को सशक्त अभिव्यक्ति देकर इस ग्रंथ में उकेरा गया है। यह अहिंसक भावना की सशक्त अभिव्यक्ति है। बाद में सूफी कवियों ने भी अपनी रचनाओं में उन्हीं आध्यात्मिक चेतना को आवाज दी जो जैन परम्परा की अमूल्य मौलिक धरोहर रही है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
‘ता न गरदद नफ्स ताबे सहरा, वैâद वा यावी दिले मजरूहरा। 
मुर्गे जाँ अ़ज हत्से यावद रिहा, गर बतेग् लकुशी ई ़जहदा’
सारांश के रूप में हम यह कह सकते हैं कि संसार की प्रत्येक धर्म, संस्कृति, सभ्यताएं और दर्शन सदा से दूसरे को प्रभावित करते रहे हैं। जैन संस्कृति के अहिंसावादी आचार-विचार से इस्लाम धर्म भी काफी प्रभावित हुआ। कुरआन की आयतों में तो अहिंसा, जीवदया, करुणा का प्रतिपादन तो था ही, साथ ही उदारवादी तथा व्यापक सोच रखने वाले इस्लामिक सूफियों और दार्शनिकों को जब अन्य परम्पराओं में इन अच्छाइयों का उत्कृष्ट स्वरूप दिखाई दिया तो उन्होंने उन सदगुणों को ग्रहण किया।

संदर्भः

१. कुरान मजीद, २:१/१५ २. कुरान मजीद, २७:९१ ३. दिशा बोध, कलकत्ता, अगस्त २००४, पृ. ७

-अध्यक्ष-जैनदर्शन ,श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ कुतुब इंस्ट्टीयूशनल एरिया, नई दिल्ली-११००१६
अनेकान्त (जैनविद्या एवं प्राकृत भाषाओं की त्रैमासिक शोध पत्रिका)वर्ष -६५ वाल्यूम-४ अक्टूबर-दिसम्बर २०१२ में प्रकाशित 

Thursday, February 1, 2018

नासूर हैं उपाधियों की व्याधियाँ

सादर प्रकाशनार्थ

*नासूर हैं उपाधियों की व्याधियाँ*

एक और रोग नासूर हो चला है,वह है उपाधियों का ।आज लोग अपने  व्यक्तित्व और काबलियत की कमी की पूर्ति इन खुद ही जड़े हुए शाब्दिक तमगों को जबरजस्ती या खरीदकर या जुगाड़ करके अपने नाम के साथ जोड़ने में मान रहे हैं।

कैसी नादानी या बेवकूफी है कि हम इस दुर्लभ मनुष्य जन्म का उपयोग अपने क्षणिक नाम और भ्रामक उपाधियों के जाल में उलझ कर अपना आत्म विनाश कर रहे हैं ।कभी कभी तो उपाधियों का इतना बड़ा मायाजाल खड़ा कर देते हैं कि मूल नाम स्वयं में अनुसंधेय हो जाता है कि आखिर वह है कौन सा ?

गृहस्थों, पंडितों या अन्य संसारी के लिए उचित न होते हुए भी यह उतना बड़ा अपराध नहीं प्रतिभासित होता जितना संसार से निवृत्त,मोक्ष मार्ग में संलग्न वीतरागी साधु के लिए होता है।

क्या साथ ले जाना है ? नाम ,शरीर सब यहीं धरा रह जाना है।फिर भी हम अपने विराट आत्म वैभव को विस्मृत कर के किस नाम रुप के जड़ संसार में डूब कर अपना और धर्म दोनों का पतन किये जा रहे हैं  ?

जिन्हें भाग्य से संसार का सर्वोच्च शिखर जैसा परमेष्ठी पद "साधु" /मुनि " /उपाध्याय/ आचार्य पद प्राप्त हुआ है,उनके लिए इससे बड़ा कोई और पद होता है क्या ? इससे बड़ा कोई और सम्मान है क्या ?

डाक्टर,वाणी भूषण,संत शिरोमणि,उच्चारणाचार्य,प्राकृताचार्य ,
राष्ट्रसंत ,विश्वसंत आदि अन्याय लौकिक  उपाधियों की क्या कीमत है ? हम जो हैं उसमें सन्तुष्ट क्यों नहीं हैं ?

किस अर्थहीन संसार में खुद को जबरदस्ती फँसा रहे हैं जब कि महाभाग्य से दुर्लभ भगवान महावीर सा यथाजात स्वरूप हमें ऐसा प्राप्त हुआ है जिसके लिए स्वर्ग के देवेंद्र भी तरसते हैं। मुनि चंदा इकट्ठे करने वाले और हिसाब किताब करने वाले मुनीम नहीं हो सकते ,वे तो सर्वसंपन्न राजा से भी बड़े महाराज हैं क्योंकि वे सर्वत्याग संपन्न हैं।

विषय मात्र विचारणीय नहीं अनुकरणीय भी है।मेरे विचार से तो पञ्च परमेष्ठी में स्थान मिलना समूचे ब्रम्हाण्ड में सर्वोच्च स्थान और पद मिलना हैं । इस पद के साथ डॉ० आदि कोई और उपाधि जोड़ना परमेष्ठी पद की गरिमा नहीं अपितु उसका अपमान है ।

-डॅा०अनेकान्त कुमार जैन,नई दिल्ली

Saturday, January 20, 2018

आचार्य महाप्रज्ञ की दृष्टि में गोमटेश्वर' -डॉ अनेकान्त कुमार जैन

'आचार्य महाप्रज्ञ की दृष्टि में गोमटेश्वर'

-डॉ अनेकान्त कुमार जैन , नई दिल्ली

कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में स्थित विश्व प्रसिद्ध भगवान गोमटेश्वर बाहुबली की दिगम्बर खड्गासन प्रतिमा के जो भी दर्शन करता है वह अभिभूत हो जाता है ।

श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के यशस्वी आचार्य महाप्रज्ञ जी जब आचार्य श्री तुलसी जी के साथ श्रवणबेलगोला ,कर्नाटक के सुप्रसिद्ध गोमटेश्वर की प्रतिमा के सम्मुख 15 मई 1969  को ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी के दिन पधारे थे तब गोमटेश बाहुबली की विशाल प्रतिमा के दर्शन करके उन्होंने संस्कृत श्लोक के माध्यम से भगवान गोमटेश की मूर्ति को देख कर अपनी भक्ति अपनी दार्शनिक शैली में प्रकट की है ।

वे गोमटेश्वर की प्रतिमा के विभिन्न अंगों को अनंत शक्ति का स्रोत बताते हुए कहते हैं -

शक्तिर्व्यक्तिं याति बाहुद्वयेन,ज्ञानालोको मस्तकस्थो विभाति ।
आलोकानां माध्यमं चक्षुरेतत् , मोहाSभावो  व्यज्यते पुंस्कचिन्है: ।।

अर्थात्
मनुष्य अनंत शक्ति का स्रोत है उसकी मुख्य शक्तियां चार हैं -ज्ञान ,दर्शन ,वीर्य और पवित्रता । मनुष्य के शरीर में इन चारों शक्तियों की अभिव्यक्ति के चार स्थान हैं -

1. प्रथम ज्ञान का स्थान है- मस्तक ,

2.द्वितीय दर्शन का स्थान है- चक्षु ।

3.तृतीय वीर्य का स्थान है -बाहुद्वय ।

4.चतुर्थ पवित्रता का स्थान है - पुंस्कचिन्ह ।

विशाल मूर्ति को आंखों से पीते हुए अभिभूत कवि मन सहज कह उठता है -

 शक्तिः समस्ता त्रिगुणात्मिकेयं , प्रत्यक्षभूता परिपीयतेSत्र |
स्फूर्त्ताः स्वभावाः सकलाश्च भावाः ,मूर्ता इहैवात्र विलोक्यमानाः ।।

अर्थात्
 आज हम त्रिगुणात्मक शक्ति - ज्ञान ,दर्शन और पवित्रता का साक्षात् अनुभव करते हुए भगवान् बाहुबली की इस विशाल मूर्ति को आंखों से पी रहे हैं यहां सारे स्वभाव और भाव स्फूर्त और मूर्त हुए से लगते हैं ।

वे भगवान बाहुबली को स्वतंत्रता का प्रथम दीप मानते हुए कहते हैं-


स्वतंत्रतायाः प्रथमोSस्ति दीपोः ,नतो न वा यत्स्खलितः क्वचिन्न ।
त्यागस्य पुण्यः प्रथमः प्रदीपः,परम्पराणां प्रथमा प्रवृत्तिः ।।

 अर्थात्
महान् बाहुबली स्वतंत्रता के प्रथम दीपक थे । वह ना तो कहीं झुके और ना कहीं स्खलित हुए । वे त्याग के प्रथम प्रदीप और परंपरा प्रवर्तक में अग्रणी थे ।

विंध्यगिरी का सौंदर्य और विशाल मूर्ति को बहुत ही सुंदर शब्दों में संजोते हुए आचार्य महाप्रज्ञ कहते हैं -

समर्पणस्याद्यपदं विभाति, विसर्जनं मानपदे प्रतिष्ठम् ।
शैलेशशैलीं विदधत्स्वकार्ये , शैलेश एष प्रतिभाति मूर्त्तः ।।

अर्थात् महान् बाहुबली समर्पण के आदि प्रवर्तक और विसर्जन के मानदंड थे , यह शैलेश बाहुबली पर्वतराज की सारी संपदा को स्वगत किए हुए आंखों के सामने खड़े हैं ।

   इस प्रकार महान संस्कृतज्ञ और दार्शनिक आचार्य महाप्रज्ञ जी ने गणाधिपति आचार्य तुलसी जी के  साथ ससंघ भगवान गोमटेश्वर के दर्शन किये और अपने आशुकवित्व के माध्यम से अपनी दार्शनिक और साहित्यिक भक्ति की अभिव्यक्ति संस्कृत छंदों में प्रस्तुत की ।