Friday, January 18, 2019

हमारे अधूरे जिनालय

*हमारे अधूरे जिनालय*

प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली drakjain2016@gmail.com

अभी कुछ दिन पहले  किसी निमित्त दिल्ली में वैदवाडा स्थित जैन मंदिर के दर्शनों का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ । बहुत समय बाद इतने भव्य , मनोरम और प्राचीन जिनालय के दर्शन करके धन्य हो गए ।
दिल्ली के प्राचीन मंदिरों में जाओ तो लगता है हम फिर वही शताब्दियों पूर्व उसी वातावरण में पहुंच गए जब पंडित दौलतराम जी जैसे जिनवाणी के उपासक अपनी तत्वज्ञान की वाणी से श्रावकों का मोक्षमार्ग प्रशस्त करते थे ।
वैदवाडा के उस मंदिर में एक माली सामग्री एकत्रित कर रहा था । हमने सहज ही उससे पूछा - भाई , यहां नियमित शास्त्र स्वाध्याय होता है ?

नहीं... कभी नहीं होता - उसका स्पष्ट उत्तर था । मुझे आश्चर्य हुआ । मैने कहा- ऐसा क्यों कहते हो भाई , दशलक्षण पर्व में तो होता होगा ?
बोला - हां ,उसी समय होता है - बस ।

मैंने उसे समझाते हुए कहा - तो ऐसा क्यों कहते हो कि कभी नहीं होता ? कोई भी पूछे तो बोला करो होता है , मगर कभी कभी विशेष अवसरों पर होता है ।

मैंने उसे तो समझा दिया , लेकिन मेरा मन आंदोलित हो उठा ? ये क्या हो रहा है ? बात सिर्फ वैदवाडा के मंदिर की नहीं है , ऐसा अनुभव आए दिन कई मंदिरों में देखने को मिलता है ।कई जगह ऐसी भी हैं जहां दशलक्षण में भी प्रवचन नहीं होते । कमोबेश अधिकांश की स्थिति ऐसी ही है । बहुत कम मंदिर ऐसे हैं जहां नियमित स्वाध्याय होता है और जहां होता है वहां का वातावरण भी अलग ही होता है ।

हम महावीर को मानते हैं यह सच है किन्तु महावीर की नहीं मानते यह उससे भी बड़ा कड़वा सच है । मानेंगे तब जब उनकी सुनेंगे ।
हमारा तो ये हाल हो रहा है कि मंदिर में भी हम सिर्फ सुनाने जाते हैं । यह वन वे ट्रैफिक ठीक नहीं है ।
सुनाने के साथ साथ हमें महावीर की सुननी भी चाहिए । सुनेंगे कहां से जब शास्त्र सभा ही नहीं होगी ?

फिर एक दिन मैं अपने घर के समीप स्थित गुरुद्वारा अपने एक सिक्ख मित्र के साथ गया । वहां देखा कि एक विद्वान् बैठकर गुरु ग्रंथ साहिब को संगीत के साथ बांच रहे हैं । लोग मत्था टेक कर आ रहे हैं , जा रहे हैं ।
कुछ सज्जन सर पर रुमाल बांधकर चुपचाप बैठकर गुरुवाणी सुन रहे हैं । थोड़ी देर रुकने के बाद देखा कि वहां कोई नहीं था लेकिन वे गुरुवाणी लगातार पढ़ रहे थे ।

क्या हम जैन मंदिर में ऐसा नहीं कर सकते ?
अक्सर यह कह कर शास्त्र सभा नहीं चलाई जाती कि कोई सुनने तो आता नहीं है ?या यह कहकर कि शास्त्र पढ़ेगा कौन ? इत्यादि

समाधान के लिए कुछ सुझाव रख रहा हूं । यदि इन्हें अपनाया जाय तो शास्त्र सभा पुनः गुलजार  हो सकती हैं -

१. प्रत्येक मंदिर की कैमेटी में अनेक पद होते हैं उनमें एक पद *शास्त्र सभा मंत्री* का भी अवश्य हो , उस पर चयनित श्रावक की जिम्मेदारी शास्त्र सभाओं के संचालन , पाठशाला के संचालन, पुस्तकालय के रखरखाव आदि की हो ।

२. समाज में कोई न कोई श्रावक या श्राविका ऐसी जरूर होती है जो स्वभाव से ही स्वाध्याय शील और रूचिवंत होते हैं उनसे निवेदन करें कि सभी की सुविधानुसार एक समय निश्चित करें और सभी की रुचि के अनुसार किसी भी अनुयोग के ग्रंथ का नियमित वाचन प्रारंभ करवा दें ।

३. कोई सुने या न सुने ,आप नियमित क्रम अवश्य चलाएं । एक निश्चित समय में जिनवाणी मंदिर में गूंजनी जरूर चाहिए ।

४. समय समय पर किन्हीं विद्वान्  या विदुषी को साप्ताहिक या मासिक रूप से आमंत्रित कर विशेष प्रवचन या गोष्ठी का आयोजन अवश्य करें ।

५.मुनिराज या आर्यिका माता जी जिन भी मंदिर में विराजें वहां वहां अपनी सत्प्रेरणा से नियमित शास्त्र सभाओं को पुनः जीवित अवश्य करावें ।

६. मंदिर के सूचना स्थल पर शास्त्र सभा का एक बोर्ड स्थाई रूप से हो जिसमें शास्त्र सभा का समय, वक्ता,शास्त्र का विषय स्पष्ट रूप से उल्लिखित हो । प्रत्येक आने जाने वाले दर्शनार्थी को यह पता होना चाहिए कि इस जिनालय में शास्त्र सभा चलती है ।

७. किन्हीं कारण से अभी रोज न चल सके तो सप्ताह में एक दिन चला कर यह प्रारंभ अवश्य कर दें फिर एक एक दिन बढ़ाते जाएं ।

यह बात स्वीकार कर लीजिए यदि जैन शास्त्रों की सभा न हो तो हमारे जिनालय अधूरे हैं । उन्हें अधूरा न रखें , सम्पूर्ण बनाएं ।

आपका यह छोटा सा योगदान ,  एक छोटी सी शुरुआत जिनवाणी तथा जैन धर्म दर्शन की सुरक्षा ,संवर्धन में नया कीर्तिमान स्थापित कर सकता है और अनेक भव्य जीवों का मोक्षमार्ग प्रशस्त कर सकता है ।

धन्यवाद

Wednesday, January 16, 2019

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्य जैन विद्या एवं प्राकृत से संबंधित शोध पत्रिकाएं

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्य जैन विद्या एवं प्राकृत से संबंधित शोध पत्रिकाएं

प्रो अनेकांत कुमार जैन , नई दिल्ली

वर्तमान में जैन विद्या एवं प्राकृत भाषा से संबंधित बहुत कम शोध पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं । शोधकार्य करने वालों को पी एच डी के लिए तथा कॉलेज या विश्वविद्यालय में  पदोन्नति प्राप्त करने वालों को अपना शोध पत्र उन्हीं पत्रिकाओं में प्रकाशित करना चाहिए जो यू जी सी की सूची में सम्मिलित हों । अन्यथा वे मान्य नहीं होते हैं । यू जी सी की वेबसाइट पर प्राकृत या जैन विद्या का अलग से सेक्शन नहीं है । अतः ये पत्रिकाएं अलग अलग दर्ज हैं जिन्हें खोजने में शोधार्थियों को बहुत समस्या होती है । इस समस्या के निदान के लिए मैंने यूजीसी की वेबसाइट पर कुछ समय पहले बहुत खोजकर निम्नलिखित जैन दर्शन एवं प्राकृत की शोध पत्रिकाओं के नाम निकाले हैं वे निम्नलिखित है -

Section- Philosophy

1. Anekant - SL. No. 436 , Journal No. 41337
2. Tulsi pragya 470/ 42139
3. Arhat Vachan 437 / 41376
4. Jain sprit 450 / 41733
5. Jin Manjari 452. / 41741
6. Vaishali Institute research bulletin 471/ 42140

Section – Sanskrit

7.Jain Journal 5 /41045
8.International Journal for Jain studies 7 / 41049
9. Gyan Deshna 8 /42322

Other sections

10.Pali Prakrit Anusheelan  1/ 40860
11. Prakrit Teerth  2/ 40982
12.Prakrit Vidya 4 / 40979

हमने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को एक वृहद सूची बना कर प्रेषित की थी जिसमें अन्य पत्रिकाओं के नाम भी सम्मिलित थे । वे नाम भी पहले सूची में आ गए थे किन्तु नए नियमों के लागू होने के बाद उपरोक्त 12 शोध जनरल ही सूची में दिख रहे हैं । कुछ और भी हो सकते हैं । जिन्हें अन्य sections में खोजना चाहिए । इसके अलावा भी अन्य अनेक शोधपत्रिकाएं ऐसी भी सूची में हैं जो सभी विषयों के शोध पत्र प्रकाशित करती हैं |

UGC द्वारा  दिनांक  १४/०१/२०१९ को जारी एक जनसूचना के अनुसार  उपरोक्त पत्रिकाएं भी स्वयं को नए नियमों के तहत अद्यतन अवश्य कर लें क्यों कि इनका भी पुनः मूल्याङ्कन होगा और निर्धारित मानक के अनुरूप न होने पर ये भी भविष्य में सूची से हट सकती हैं ।
प्रमुख नियमों में यह कुछ नियम यह है कि शोध पत्रिका में प्रकाशित होने वाले शोध पत्र विशेषज्ञों द्वारा मूल्यांकित करने के बाद ही प्रकाशित किये जाएँ ,जिसके लिए शोध पत्रिका की एक मूल्याङ्कन परिषद् बननी चाहिए जिनके सदस्यों के नाम का प्रकाशन प्रत्येक अंक में उनके ईमेल तथा फ़ोन नंबर सहित हो |  शोध पत्रिका की एक वेबसाइट हो जिसमें भी ये सभी सूचनाएँ अन्य नियमों के साथ अद्यतन होती रहें |

शोध पत्रिका की जाँच समय समय पर होती रहेगी कि उसका स्तर गिर तो नहीं रहा ? UGC की वेबसइट पर शोध पत्रिका को स्केल पॉइंट देकर सम्मिलित किया जायेगा |नियम न पालन करने की दशा में शोध पत्रिका को कभी भी सूची से हटाया भी जा सकता है |

संस्थाओं अथवा प्रकाशकों के द्वारा जो भी शोध पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं उन्हें यदि सूची में सम्मिलित होना है तो उन्हें U.G.C. website पर उल्लिखित नियमों के अनुसार शोध पत्रिकाएं प्रकाशित करना चाहिए तथा UGC द्वारा निर्धारित प्रोटोकॉल के माध्यम से ही सूची में सम्मिलित होने हेतु आवेदन करना चाहिए ।

Saturday, December 29, 2018

सत्य की खोज

*सत्य की खोज*

प्रो अनेकांत कुमार जैन
२५/१२/२०१८
drakjain2016@gmail.com

एक बार एक बड़े दार्शनिक ने ' *आत्मा के अस्तित्व* ' विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय pसंगोष्ठी का आयोजन किया । पूरी दुनिया से विद्वान्,साधु,महात्मा, पादरी,,दार्शनिक इकट्ठा हुए ।

पहले ही दिन उन सबसे बड़े दार्शनिक ने पूछा - कितने लोग मानते हैं कि आत्मा है?

आधे लोगों ने हाथ खड़े किए .

उस दार्शनिक ने उन सभी से हॉल के बाहर जाने को कह दिया ।

फिर बचे हुए लोगों से दार्शनिक ने पूछा कितने लोग हैं जो यह मानते हैं कि आत्मा नहीं है ?

बचे हुए सभी लोगों ने हाथ खड़े कर दिए ।

दार्शनिक ने उन्हें भी हॉल से बाहर भेज दिया ।

थोड़ी देर में सूचना अाई कि संगोष्ठी रद्द कर दी गई है सभी अपने घर वापस चले जाएं ।

चारों ओर अफरा तफरी मच गई । हम इतनी दूर से आए हैं ,और यह व्यवहार ? हमें क्यों बुलाया ?

वह दार्शनिक इतना प्रतिष्ठित था कि किसी ने उनसे कुछ कहने की हिम्मत नहीं की ।

फिर उनमें से कुछ बुजुर्गों ने कारण जानने का प्रयास किया । वह दार्शनिक इस दुविधा को समझ गया । उसने पुनः सभी को हॉल में आमंत्रित किया ।

अपने वक्तव्य में संगोष्ठी रद्द करने का कारण स्पष्ट करते हुए उस दार्शनिक ने कहा -

मैंने इस संगोष्ठी का आयोजन इसलिए किया था कि आत्मा है अथवा नहीं - इस बारे विचार विमर्श किया जाय । हम किसी निष्कर्ष में पहुंचने का प्रयास करेंगे ।

मुझे लगता था कि यह एक समस्या है अतः हम लोग संगोष्ठी के माध्यम से उसका समाधान करने की कोशिश करेंगे । लेकिन आप में से आधे लोग मानते हैं कि आत्मा है और आधे मानते हैं कि नहीं है , तो समस्या कहां है ?
और जब समस्या है ही नहीं तब संगोष्ठी का क्या औचित्य ?

आप लोग तो निष्कर्ष पर पहले ही पहुंचे हुए हैं तो सत्य की खोज कैसे करेंगे ?

सिर्फ अपनी मान्यता की पुष्टि करने इस संगोष्ठी में पधारे हैं । अगले की बात तो आप संगोष्ठी के बाद भी नहीं स्वीकारेंगे । पूर्वाग्रह से ग्रसित व्यक्ति के पास कोई समस्या नहीं होती । और जब समस्या ही नहीं है तो शोध खोज किसकी करेंगे ?

मैंने सत्य की खोज के लिए संगोष्ठी रखी थी न कि आपके पूर्व स्थापित सत्य के प्रचार के लिए ।

अतः मैंने इसे रद्द कर दिया है आप सभी से क्षमा याचना पूर्वक विदा चाहता हूं ।

उस दार्शनिक ने सबको हिला कर रख दिया । बाद में पता चला कि उस  दार्शनिक ने सत्य की खोज की प्रेरणा देने के लिए ही  सबको बुलाया था ।

In India we are very advance because we have the conclusion before the

मतभेद तो रहेंगे

'मत भेद तो रहेंगे '

प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली

३० /१२/२०१८

एक बार एक राजा को धर्म और दर्शन में बहुत रुचि हो गई । उसने राज्य के सभी दार्शनिकों और चिंतकों से क्रमशः उनके मत का मर्म समझा ।

लगभग सभी दार्शनिकों ने अपने मत की प्रशंसा की । और अपना अपना मत रखा । कोई कहता सबकुछ अनित्य है , कोई मानता सब कुछ नित्य है , कोई कहता नित्य अनित्य दोनों है । कोई कहता ईश्वर एक है ,कोई कहता अनेक है, कोई कहता ईश्वर है ही नहीं आदि आदि । यह सब सुनकर राजा को बहुत गुस्सा आ गया ।

उसने सभी दार्शनिकों को एक जेल में कैद कर दिया और कहा तुम सब मिलकर एक निर्णय कर लो फिर मुझे एक अंतिम निष्कर्ष बता देना तभी मैं तुम सबको रिहा करूंगा ।

सारे दार्शनिक चिंतित हो गए । सोचने लगे हम एक दर्शन कैसे बना सकते हैं ? जो पूर्व आचार्यों ने कहा है उसे हम कौन होते हैं बदलने वाले ? राजा को चाहिए कि कोई एक दर्शन जो उसे अच्छा लगे उसे अपना ले , बस । यह बात राजा तक पहुंचाई गई लेकिन राजा और क्रोधित हो गया ।

समस्या और बढ़ गई । कोई एक दूसरे दर्शन की बात मानने को राजी नहीं था  । कोई एक मान्यता नहीं बन पा रही थी । दार्शनिक कैद से मुक्त नहीं हो पा रहे थे ।
एक बार राजा को फिर से समझाने का प्रयास हुआ । इस बार यह कार्य जैन दार्शनिक को दिया गया ।

राजा ने संदेश पाते ही जैन दार्शनिक को महल में बुला लिया । वे जैन दर्शन के विद्वान् राजा से बोले - राजन , मैं आपके साथ नगर घूमना चाहता हूं । राजा उनके साथ सैर को निकल पड़े । रास्ते में कई चौराहे आए । नगर के चारों तरफ कई द्वार पड़े । कई उपवन पड़े ।

जैन दार्शनिक ने उन्हें सलाह दी कि राजन ,जब भी हम चौराहे पर आते हैं तो भ्रम होने लगता है कि हम कहां जाएं ? मेरी एक सलाह है कि आप  सारे चौराहे,दरवाजे समाप्त करके नगर में एक ही मार्ग और दरवाजा रखें ताकि समस्या न हो ।उपवन में ये अलग अलग रंग के फूल क्यूं हैं ? इन्हें भी एक ही रंग का करवा दीजिए ।

राजा सोच में पड़ गया ,बोला - असंभव है । चौराहे तो रहेंगे ही ,आपको जिस दिशा में जाना हो उस मार्ग का चुनाव कर लें तो समस्या नहीं होगी । उपवन में विभिन्न जातियों के विभिन्न रंगों के फूल हों तभी सुंदर लगते हैं अतः यह भी उचित नहीं है ।

जैन दार्शनिक ने बहुत विनम्रता पूर्वक राजा से कहा - ठीक यही बात हम आपको समझाना चाह रहे थे । दर्शन में मतभेद तो रहेंगे  । जिस प्रकार चौराहे समाप्त करके एक रास्ता निर्मित करना कठिन है ,असंभव है, उसी प्रकार सारे दर्शनों की मौलिकता , अपनी अपनी विचार धारा , सत्यानुभूति आदि समाप्त करके कोई एक मान्यता वाला दर्शन खड़ा करना भी असंभव है । सत्य बहु आयामी होता है । दार्शनिक उसके एक एक आयाम को देखकर उसकी व्याख्या अलग अलग कर देते हैं । यह इन दार्शनिकों की नादानी ही है कि ये अन्य दार्शनिकों को अपना विरोधी मानते हैं । जिस दिन ये सत्य के सभी आयाम देखना सीख जायेंगे उस दिन ये सुधर जाएंगे ।

लेकिन अभी भी ये सत्य के एक अंश की ही व्याख्या करते हैं । उसे सुरक्षित करने का प्रयास करते हैं ।

अब जब सत्य ही अनेक रूप है , विविध आयाम वाला है तो उसकी कोई एक व्याख्या कैसे हो सकती है ? इसलिए मतभेद तो रहेंगे । आप स्वयं चाहें तो सभी की बातें सुनकर समझकर एक नया अनुसंधान करें और स्वयं सत्य को देखने का अभ्यास करें ,फिर जो आपके अनुभव में आएगा वह भी सत्य होगा ।

राजा को भी तब जाकर समझ आया कि विभिन्नता , अनेकता का एक अलग सौंदर्य है । सत्य अनेक रूप है, सब एक जैसा हो जाएगा तो उर्वरता,सौंदर्य सब समाप्त हो जाएगा । उसने सभी दार्शनिकों से माफी मांगी और उन्हें रिहा कर दिया और स्वयं सत्य खोजने निकल पड़ा ।

उन जैन दार्शनिक विद्वान् ने अनेकांतवाद और सह अस्तित्व के सिद्धांत का  एक व्यावहारिक प्रयोग किया और सभी को रिहा करवा दिया ।

मां की कहानियां -१ *देवदर्शन की महिमा*

मां की कहानियां -१

*देवदर्शन की महिमा*

प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली
२९/१२/२०१८

अभी मां के पास बैठा तो हमेशा की तरह कुछ समझाने लगीं । एक कहानी सुनाकर देव दर्शन की महिमा बहुत विस्तार से बताई ।

एक लड़की की शादी एक ऐसे गांव में हो गई जहां देव दर्शन उपलब्ध ही नहीं था । लेकिन उसका पहले से नियम था कि देवदर्शन किए बिना वह अन्न ग्रहण नहीं करेगी ।
यह नियम उसने ससुराल में भी जारी रखा । अब वहां मंदिर ही नहीं था तो वह पहले दिन से ही भोजन न करे ।
उसके ससुराल वाले बहुत चिंतित हो गए ,क्या किया जाए ?

उसे बहुत समझाया गया ,लेकिन उसने समझौता नहीं किया । उन्हीं दिनों गांव में एक बैलगाड़ी आयी ,जिसमें प्रतिष्ठित मूर्तियां रखी थीं , एक पापड़ी वाल जी यह कार्य करते थे ,अनेक मूर्तियां बनवा कर गांव गांव में विराजमान करवाते थे ।
ससुराल वालों ने एक मूर्ति देने की बात कही । उन्होंने कहा बिना जिनालय के मूर्ति कैसे दें ? तो ससुर जी ने एक जिनालय निर्माण का संकल्प किया और मूर्ति विराजमान करवाई ।

एक बहु के संकल्प के कारण उस गांव में जिनालय बन गया ।

इस बहू ने बाद में एक संतान को जन्म दिया ,जो बाद में जाकर वात्सल्यमूर्ती आचार्य विमल सागर जी बना ।

मां ने बताया ऐसी मां हो तो संतान भी उससे ज्यादा महान पैदा होती है ।

मां ने बताया आज उन्हीं *आचार्य विमल सागर जी महाराज* की *जन्म जयंती* है जिन्होंने स्वयं की साधना के साथ साथ लाखों लोगों को धर्म मार्ग में लगाया और जिनवाणी का प्रचार प्रसार किया ।

अब मां के पास बैठेंगे तो  कोई न कोई नई सीख या प्रेरणा तो मिल ही जाती है ।

Thursday, December 20, 2018

जब एक बंगाली ने अपनाया शाकाहार - -- -

जब एक बंगाली ने अपनाया शाकाहार - -- -

- डॉ०अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली ,२०/१२/२०१८

आज गोमटेश बाहुबली के दर्शनार्थ सीढ़ी चढ़ रहा था ,एक सज्जन माथे पर तिलक लगाए ,अपनी धर्म पत्नी के साथ उतर रहे थे । उन्होंने पूछा आप कहां से ? दिल्ली से - मैंने जबाव दिया ।

अकेले या फैमिली के साथ ?

अकेले ।

क्यों ?

किसी काम से बैंगलोर तक आना हुआ तो सोचा  दर्शन भी कर लूं ।

मैंने पूछा - आप कहां से ?

बोले - पश्चिम बंगाल से ।
और आज मैंने अभिषेक भी किया ।

उनकी पत्नी बोली - हमने मना किया किन्तु वहां एक पुजारी बोला , यहां तक आए हो तो अभिषेक तो जरूर करो ,इसलिए किया ।

मैंने पूछा - आपने मना क्यों किया ?

क्यों कि हम लोग जैन नहीं हैं ।
वो बोला कुछ नहीं होता , आप अपना नाम गोत्र बोलो और धोती पहन कर आओ बस ।
फिर हमने अभिषेक किया , बहुत आनंद आया ।

मैंने कहा - अच्छा किया , बहुत सौभाग्य से ये अवसर मिलता है ।

मैंने सहज ही पूछा - आप मांसाहारी तो नहीं है ?

हां - उनका उत्तर था ।

किसी ने इस बारे में आपसे कुछ नहीं पूछा ?

नहीं ।

आप कितने साल के हैं ?

मैं ६० , पत्नी ५६

मैंने सावधानी पूर्वक बहुत मनोवैज्ञानिक तरीके से उनसे बात करना प्रारंभ किया -
आपको पता है यदि उम्र  १०० की मानी जाए तो आप आधे से ज्यादा जिंदगी मांसाहार से बिता चुके हैं ? आज अहिंसा के मसीहा ने आपको अपने चरणों में जगह दी है । हो सकता है यह किसी नए जीवन की शुरुआत हो । अब आप दोनों बाकी बची हुई जिंदगी शाकाहार पूर्वक बिता कर देखो । हो सकता है कोई नया करिश्मा जिंदगी में होने वाला हो ।
जी तो मैं भी रहा हूं ,बिना किसी जीव जंतु को कष्ट दिए । किसी को जीवन नहीं दे सकते तो मारे क्यों ? और उसे खाएं क्यों ? जबकि मुझे पेट भरने के लिए बहुत स्वादिष्ट शाकाहारी खाना उपलब्ध है ।

किसी मांसाहारी को अभिषेक की अनुमति नहीं है , यदि आप आज से नियम ले लें तो आप अनेक पापों से बच जाएंगे ।

मेरी बात सुनकर वे भाव विभोर हो गए और बोले हम दोनों आज से शाकाहार का संकल्प लेते हैं । हाथ जोड़कर मेरे पैर छूने लगे । मैंने रोका तो बोले भगवान् जैसा ही गुरु होता है जो हमें राह दिखाता है ।

--+-+-+-+-+-+-+-+-+-

मैंने कई बार पूजा की है , कई बार अभिषेक किया है,कई बार तीरथ किए हैं । लेकिन उनके संकल्प से मुझे लगा कि आज ये सब करना सार्थक हो गया ।

हम किस बेहोशी में जी रहे हैं ? कहां गए संकल्प दिलाने और प्रेरणा देने वाले ? हम 'मद्य मांस मधु ' भी नहीं बचा पा रहे हैं ?

हम गर्भ गृह के बाहर यह बोर्ड यह पट्टी क्यों नहीं लगा पा रहे हैं कि जिसका तीन मकार का त्याग नहीं वे कृपया दूर से ही दर्शन करें , गर्भ गृह में प्रवेश करके अभिषेक आदि न करें ? जब कि ऐसे बोर्ड हम जब चाहे लगा देते हैं कि अमुक जगह से प्रकाशित जिनवाणी न पढ़ें या मंदिर में न रखें ।ये हमारी आपकी विडम्बना है ।

अपने में भी रोज शांति धारा और अभिषेक की बोली लेकर या बिना लिए करने वालों की पंक्तियों में भी कम से कम ऐसे लोग  न हों ।- इतना अनुशासन तो जरूरी है ।

मुझे लगा कि कहना भी जरूर चाहिए । आज मैं उन वरिष्ठ युगल से इतना संवाद नहीं करता तो वे प्रेरणा कैसे प्राप्त करते और कैसे अपना जीवन सुधारते ?

Thursday, December 6, 2018

अनेकांत दृष्टि से निमित्त-उपादान के सम्बन्ध की सामाजिक और आध्यात्मिक मीमांसा


अनेकांत दृष्टि से निमित्त-उपादान के सम्बन्ध की सामाजिक और आध्यात्मिक मीमांसा
प्रो.अनेकान्त कुमार जैन
दर्शन जगत में कारण-कार्य व्यवस्था हमेशा  से एक विमर्शणीय विषय रहा है। र्इश्वरवादी तो इस जगत को एक कार्य मानकर कारण की खोज र्इश्वर तक कर डालते हैं। जैनदर्शन ने कारण-कार्य-मीमांसा पर बहुत गहरा चिन्तन किया है। कार्योत्पत्ति में पाँच कारणों के समवाय की घोषणा करते हुए जैनाचार्य वैज्ञानिकता का परिचय तो देते ही हैं, साथ ही अकर्तावाद के सिद्धान्त की पुष्टि भी करते हैं। र्इसा की दूसरी-तीसरी शती के महान आचार्य सिद्धसेन सन्मतिसूत्र में लिखते हैं-
कालो सहाव णियर्इ पुव्वकयं पुरिस कारणेगंता।
मिच्छत्तं  ते  चेव    समासओ  होंति  सम्मत्तं।। 353
इसमें काल, स्वभाव, नियति, निमित्त (पूर्वकृत) और पुरुषार्थ- इन पाँचों से किसी कार्य की उत्पत्ति होती है- यह स्वीकार किया गया है। इन पाँचों में से किसी एक कारण को ही कारण मान लेना एकांत है, मिथ्यात्व है। पाँचों को बराबर महत्त्व देकर उन्हें कारण मानना अनेकान्त है, सम्यक्त्व है।
एक सुप्रसिद्ध वाक्य ‘निमित्त कुछ करता नहीं, निमित्त के बिना कुछ होता नहीं’- हमें वस्तु-स्वभाव समझाने का प्रयास कर रहा है। मैं मानता हूँ- जो यह कहता है कि निमित्त से कुछ नहीं होता, वह जैनदर्शन को नहीं जानता और जो यह कहता है कि निमित्त ही सब कुछ करता है, वह भी जैन दर्शन को नहीं जानता।
यहाँ धैर्य से समझने की आवश्यकता है। प्रत्येक द्रव्य का अपना-अपना उपादान होता है। उपादान में शक्ति न होक्षमता, योग्यता न हो तो लाखों -करोड़ों निमित्त भी मिल जायें, आ जायें तो भी द्रव्य को अपने अनुरूप परिणमा नहीं सकते। इसीलिए कहा गया कि निमित्त कुछ करता नहीं। दूसरी तरफ उपादान में कितनी ही सामथ्र्य हो यदि निमित्त उपस्थित  नहीं है तो वह परिणमन कर ही नहीं सकता। इसीलिए कहा है कि निमित्त के बिना कुछ होता नहीं। ये दोनों बातें सही हैं। हमें अनेकान्त दृष्टि से विचार करना चाहिए।
वर्तमान में समाज में दो तरह के लोग दिखार्इ दे रहे हैं जो अपनी रुचि और प्रियता के कारण किसी एक को ही सर्वाधिक महत्त्व देते हैं। वे दो तरह के लोग निम्न प्रकार से हैं-
1- निमित्त प्रिय लोग-
ये वो लोग हैं जिन्हें निमित्त के गीत गाने में आनन्द आता है। मजबूरी में ये उपादान की हाँ तो भरते हैं, पर उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, बाहरी क्रियाकाण्डों से ही कल्याण मानने के कारण रात-दिन उसी में मग्न रहते हैं, आत्मा की शुद्धता और उपादान की तरफ देखने या विचार करने का समय ही नहीं निकाल पाते हैं।


2- उपादान प्रिय लोग-
ये वो लोग हैं जो बाहय क्रियाकाण्डों में आलसी होते हैं और उपादान के ही गीत गाकर निमित्त को ज्यादा महत्त्व नहीं देते। कर्इ शास्त्र-प्रमाण देने पर निमित्त का निषेध तो नहीं कर पाते हैं किन्तु उपादान के आगे उसे कुछ खास नहीं समझते हैं। कर्इ बार तो अतिरेक में निमित्त की सत्ता तक को चुनौती दे डालते हैं।
हम अपनी निजी प्रियता-अप्रियता के कारण रुचि-अरुचि के कारण ही वस्तु का जो मूल स्वभाव है वह समझ नहीं पाते हैं। उसका कारण यह है कि मनुष्य स्वभाव से कर्मशील होता है और हम क्या करें ? की हड़बडी़ वाली जिद उसे पहले हम क्या व कैसे जानें, समझें ? से कोसों दूर कर देती है। यदि हम कुछ समय के लिए क्या करें ? वाली कर्ता बुद्धि को दूर कर दें और पहले सिर्फ सिद्धान्त को और उसकी निरूपण -शैली को समझने की कोशिश करें तो शायद क्या करें? का समाधान मिल सकता है।
स्वयंभूस्तोत्र में आचार्य समन्तभद्र ने अनेकान्तोप्यनेकान्त: कह कर अनेकान्त को भी अनेकान्त स्वरूप बतलाया है। निमित्त और उपादान इन दोनों को स्वीकारना अनेकान्त दृष्टि है और किसी एक को ही मानकर दूसरे का सर्वथा निषेध कर देना एकान्त दृष्टि है। यह तो सही है पर अकेले निमित्त में भी एकान्त और अनेकान्त दोनों घटित हो सकते हैं, और अकेले उपादान में भी, धैर्य के साथ थोड़ा गहरार्इ में जायें तो शायद कोर्इ नर्इ बात समझ में आ जाये।
निमित्त सम्बन्धी अनेकान्त-
जो अनेकान्त की अस्ति-नास्ति वाली स्याद्वाद-सप्तभंगी को जानते हैं वे विचार करें कि निमित्त और उपादानयह दोनों भिन्न -भिन्न पदार्थ हैं, अत:-
१.दोनों पदार्थ अपने-अपने स्वरूप से अस्ति रूप हैं और दूसरे के स्वरूप से नास्ति रूप हैं।
२.अत: निमित्त स्वरूप से अस्तिरूप है और पररूप से नास्ति रूप हैं।
३.अत: उपादान में निमित्त का अभाव है, इस अपेक्षा से उपादान में निमित्त कुछ नहीं कर सकता।
निमित्त निमित्त का कार्य करता है, उपादान का कार्य नहीं करतायह निमित्त का अनेकान्त स्वरूप है। इस माध्यम से निमित्त का यथार्थ ज्ञान हो सकता है।
निमित्त सम्बन्धी एकान्त-
यदि कोर्इ माने निमित्त निमित्त का कार्य भी करता है और निमित्त उपादान का कार्य भी करता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि निमित्त अपने रूप से अस्ति रूप है और पर रूप से भी अस्ति रूप है। तब निमित्त पदार्थ में अस्ति-नास्ति रूप परस्पर विरुद्ध दो धर्म सिद्ध नहीं हुए, इसीलिए ऐसा मानना एकान्त है।
उपादान सम्बन्धी अनेकान्त-
जिस प्रकार निमित्त भिन्न पदार्थ है उसी प्रकार उपादान भी भिन्न पदार्थ है-
१.अत: उपादान स्वरूप से है, पररूप से नास्ति रूप है।
२.अत: उपादान उपादानरूप से है, निमित्त रूप से नास्ति है।
३.अत: निमित्त में उपादान का अभाव है, इस अपेक्षा से निमित्त में उपादान कुछ नहीं कर सकता।
उपादान-उपादान का कार्य करता है, निमित्त का कार्य नहीं करता। यह उपादान का अनेकान्त स्वरूप है। इस माध्यम से उपादान का यथार्थ ज्ञान हो सकता है।
उपादान सम्बन्धी एकान्त-
यदि कोर्इ माने उपादान उपादान का कार्य भी करता है और उपादान निमित्त का भी कार्य करता है तो इसका भी यही अर्थ हुआ कि उपादान स्वरूप से अस्तिरूप है और पर रूप से भी अस्तिरूप है। तब उपादान पदार्थ में अस्ति-नास्ति रूप परस्पर विरुद्ध दो धर्म घटित नहीं हुए, अत: ऐसा मानना एकान्त है।
निष्कर्ष यह है कि सबसे पहले हम निमित्त और उपादान इन दोनों की ही स्वयं-स्वयं में पृथक-पृथक पूर्ण स्वतंत्र सत्ता समझ लें, फिर इन दोनों के आपसी सम्बन्धों पर विमर्श करें । इतना समझ लेने पर ही कुछ समाधान की तरफ आगे बढ़ सकते हैं।
निष्कर्ष-
मैं मानता हूँ- इन तथ्यों को समझने के लिए आग्रह -रहित अत्यन्त धैर्य की आवश्यकता है। निमित्त उपादान में कुछ करता है या नहीं ? ये दोनों ही बातें चिन्तन सापेक्ष हैं, दार्शनिक दृष्टि तो यही है कि निमित्त की उपस्थिति  अनिवार्य है, किन्तु आध्यात्मिक  दृष्टि के अपने अलग मापदण्ड हैं, अध्यात्म में सूक्ष्मातिसूक्ष्म चिन्तन करके जीव अपने पौरुष को पूर्ण स्वतंत्र देखता है। परम शुद्ध स्वरूप निमित्त का मुहताज नहीं है। शुद्ध द्रव्य दृष्टि की सच्चार्इ यह है कि निमित्त का निषेध नहीं वरन उसका स्वरूप समझकर उसकी गुलामी से इन्कार कर देना। कथन तो यहां तक है कि निमित्त स्वत: अनुकूल परिणमन करेंगे, किन्तु तभी जब दृष्टि स्वभावसन्मुख होगी। निमित्त की सत्ता को स्वीकारना किन्तु इस स्वीकारोकित में उपादान की स्वतंत्रता को पराधीन कर देना संभवत: न्याय नहीं। यही अपेक्षा समयसार को भी दृष्टि प्रधान ग्रन्थ के रूप में मान्यता देती है।
जरा सोचें! द्रव्य में किस समय परिणमन नहीं है? जगत में किस समय निमित्त नहीं है? हमारे मानने या न मानने से वस्तु स्थिति तो बदलती नहीं है। स्पष्ट है कि जगत के प्रत्येक द्रव्य में प्रति समय परिणमन हो ही रहा है और निमित्त भी सदैव होता ही है तब फिर चिन्तन करें कि इस निमित्त के कारण यह हुआयह बात कहां तक टिकती है? और निमित्त न हो तो नहीं हो सकता , यह प्रश्न भी कहाँ तक टिकता है? यहाँ कार्य होने में और निमित्त होने में कहीं भी समय-भेद नहीं है।
यहाँ निमित्त का अस्तित्त्व कभी भी नैमित्तिक कार्य की पराधीनता नहीं बतलाता है। वह मात्र अपनी अपेक्षा नैमित्तिक कार्य को प्रकट करता है, जैसे- पूछा जाय कि निमित्त किसका? तब उत्तर दिया जायेगा कि जो नैमित्तिक कार्य हुआ उसका। यह सब बातें दृष्टि की हैं। हम संयोगी दृष्टि से भी देख सकते हैं, वियोगी दृष्टि से भी।
अनेकान्त का आध्यात्मिक  दृष्टिकोण यह है कि वहाँ मुख्यता गौणता का चिन्तन उपादेयता और हेयता के रूप में होने लगता है। यहाँ आत्मानुभव की प्रबल विधेयात्मकता शेष समस्त बन्धन स्वरूप प्रतीत होने वाले तत्वों के प्रति निषेधात्मक दृष्टिकोण की उत्पत्ति का सहज कारण बन जाती है।
सिद्धान्त तथा शास्त्रीयता का सहारा लेकर वस्तुस्वरूप को तो यहाँ भी समझा जाता है, किन्तु उसमें से आत्माराधना में जो साधक तत्त्व हैं उनको उपादेय तथा शेष अन्य को हेय बतलाया जाता है। इस क्षेत्र में सार-सार को गहि लहे, थोथा देइ उड़ाय -वाली सूकित का सहारा लिया जाता है। यहाँ जिसे हेय करना है, अतिरेक में उसके प्रति निषेध की भाषा भी मुखरित होने लगती है जो विवाद उत्पन्न करती है। पुत्र की धृष्टता से रुष्ट पिता उसे तू मेरे लिए मर गया तक कह देते हैं। यहाँ मात्र दृष्टि -परिवर्तन अर्थ है, वस्तु-परिवर्तन नहीं।
इसी प्रकार आध्यात्मिक  दृष्टि का कथन निमित्त कुछ नहीं करता का भी अभिप्राय समझना चाहिए कि निमित्त मेरे लिए कुछ नहीं। व्यवहार झूठा, जगत मिथ्या जैसे वाक्य मात्र दृष्टि - परिवर्तन की अपेक्षा से कहे जाते हैं, वस्तु -परिवर्तन की अपेक्षा से नहीं। अध्यात्म में भी निमित्ताधीन दृष्टि का निषेध है, निमित्त का नहीं। निमित्त को कर्ता कहा जाता है, क्योंकि भाषा अक्सर कर्ता वाली होती है, किन्तु यह व्यवहार है। वास्तव में वह सिर्फ उपस्थिति  के शाश्वत नियम के कारण ही कर्ता का आरोपी बन जाता है या हमारे द्वारा मान लिया जाता है यह भी एक सापेक्ष सत्य ही है।
वस्तु-स्थिति क्या है?
निमित्त स्वतंत्र है, वह अपना कार्य करता है। उपादान स्वतंत्र है, वह भी अपना कार्य करता है। दोनों एक साथ रहते हैं और अपना-अपना काम समय पर करते हैं। दोनों पदार्थ एक-दूसरे के लिए परिणमन नहीं कर रहे हैं, मात्र परस्पर उपकार कर रहे हैं। उपकार का अर्थ हमेशा कर्ता नहीं होता है।
दिखार्इ क्या देता है?
          निमित्त उपादान को परिणमा रहा है, उपादान निमित्त को परिणमा रहा है। दोनों का एक-दूसरे के बिना अस्तित्व नहीं यह शाश्वत नियम है। निमित्तप्रिय लोग सिर्फ निमित्त को देखते हैं तो उन्हें दिखार्इ देता है कि निमित्त चाहे तो कुछ भी बदल दे, उपादान तो निमित्ताधीन है। उपादानप्रिय लोग सिर्फ उपादान को देखते हैं तो उन्हें दिखार्इ देता है उपादान निमित्त को परिणमा देता है अत: वही बलवान है, निमित्त तो उसका नौकर है, इसलिए निमित्त तो उपादान के आधीन है | हम वो मानते हैं जो दिखार्इ देता है। सम्यग्दृष्टि मनुष्य दोनों को सिर्फ देखता है, पर मानता वह है जो वस्तु-स्थिति है।

अध्यक्ष जैनदर्शन विभाग ,दर्शन संकाय
दर्शन संकाय, श्री लाल बहादुर शास्त्रीराष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,
क़ुतुब सांस्थानिक क्षेत्र,नई दिल्ली ११००१६
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