सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पंडित रवींद्र जी ,अमायन का वियोग जैन अध्यात्मजगत की अपूरणीय क्षति

पंडित ब्र. रवींद्र जी  'आत्मन',अमायन का वियोग जैन अध्यात्मजगत की अपूरणीय क्षति
सम्पूर्ण जैन समाज के लिए यह एक अत्यंत वैराग्य का प्रसंग है कि अमायन,भिंड(म.प्र.) से अध्यात्म की गंगा बहाने वाले अत्यंत निस्पृही ,संयमशील,बहु श्रुत स्वाध्यायशील,प्रवचन दिवाकर आदरणीय बड़े पंडित जी साहब का वियोग हो गया है । पंडित ब्र. रवींद्र जी  'आत्मन',अमायन का वियोग जैन अध्यात्मजगत की अपूरणीय क्षति है । 

मुझे कई बार आपके साक्षात प्रवचन सुनने ,चर्चा करने और उनके ग्रंथ पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । 

आप जैन तत्त्वज्ञान के गहरे विद्वान् थे । जिसे आपने अपने जीवन में भी बखूबी उतारा था । आपसे प्रेरित होकर अनेक युवा अध्यात्म मार्ग में लगे ,अनेकों ने व्रत अंगीकार किये । 
आपके द्वारा रचित अनेक आध्यात्मिक काव्य आज सभी के कंठों का हार बना हुआ है । आपकी आध्यात्मिक चेतना सिर्फ आप तक सीमित नहीं थी बल्कि आपके प्रवचनों और लेखनी के माध्यम से वह अनेकानेक भव्य जीवों का उद्धार करती थी । 

'अध्यात्म के साथ आचरण '- ये आपके जीवन का मूलमंत्र था ,इसे ही आपने अपने प्रवचनों में बताया और लेखनी में लिपिबद्ध किया था ।

मैं जैनागमों की मूल भाषा प्राकृत की इस गाथा के माध्यम से आपके पारमार्थिक अभ्युदय की कामना करता हूँ -

*मारणं य धम्मत्थं मरणं धम्मत्थं तप्परो होदि ।*
*चरणं खलु धम्मपहे दुल्लहो होंति मणुलोगे* ।।

मनुष्य लोक में लोग
धर्म के लिए दूसरों को मारने तैयार हैं ,धर्म के लिए स्वयं मरने तैयार हैं ,(लेकिन धर्मपथ पर चलने तैयार नहीं हैं) , धर्म पथ पर चलने वाले दुर्लभ हैं ।

विनयवंत

प्रो अनेकांत कुमार जैन 
आचार्य - जैनदर्शन विभाग ,श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,नई दिल्ली -16

एवं।

डॉ.रुचि जैन ,प्राकृत विद्याभवन,नई दिल्ली

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुंडलपुर के तीर्थंकर आदिनाथ या बड़े बाबा : एक पुनर्विचार

*कुंडलपुर के तीर्थंकर आदिनाथ या बड़े बाबा : एक पुनर्विचार* प्रो अनेकान्त कुमार जैन,नई दिल्ली drakjain2016@gmail.com मैं कभी कभी आचार्य समन्तभद्र के शब्द चयन पर विचार करता हूँ और आनंदित होता हूँ कि वे कितनी दूरदर्शिता से अपने साहित्य में उत्कृष्ट से उत्कृष्ट शब्द चयन पर ध्यान देते थे । एक दिन मैं अपने विद्यार्थियों को उनकी कृति रत्नकरंड श्रावकाचार पढ़ा रहा था । श्लोक था -  श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् । त्रिमूढापोढमष्टांङ्गं सम्यग्दर्शनमस्मयम् ॥ इसकी व्याख्या के समय एक छात्रा ने पूछा कि गुरुजी ! देव ,शास्त्र और गुरु शब्द संस्कृत का भी है , प्रसिद्ध भी है ,उचित भी है फिर आचार्य ने उसके स्थान पर आप्त,आगम और तपस्वी शब्द का ही प्रयोग क्यों किया ? जब  कि अन्य अनेक ग्रंथों में ,पूजा पाठादि में देव शास्त्र गुरु शब्द ही प्रयोग करते हैं । प्रश्न ज़ोरदार था । उसका एक उत्तर तो यह था कि आचार्य साहित्य वैभव के लिए भिन्न भिन्न पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग करते हैं जैसे उन्होंने अकेले सम्यग्दर्शन के लिए भी अलग अलग श्लोकों में अलग अलग शब्द प्रयोग किये हैं ।  लेकिन...

युवा पीढ़ी का धर्म से पलायन क्यों ? दोषी कौन ? युवा या समाज ? या फिर खुद धर्म ? पढ़ें ,सोचने को मजबूर करने वाला एक विचारोत्तेजक लेख ••••••••••••👇​

युवा पीढ़ी का धर्म से पलायन क्यों ? दोषी कौन ? युवा या समाज ? या फिर खुद धर्म ? पढ़ें ,सोचने को मजबूर करने वाला एक विचारोत्तेजक लेख ••••••••••••👇​Must read and write your view

युवा पीढ़ी को धर्म से कैसे जोड़ा जाय ?

  युवा पीढ़ी को धर्म से कैसे जोड़ा जाय ?                                      प्रो अनेकांत कुमार जैन , नई दिल्ली    युवावस्था जीवन की स्वर्णिम अवस्था है , बाल सुलभ चपलता और वृद्धत्व की अक्षमता - इन दो तटों के बीच में युवावस्था वह प्रवाह है , जो कभी तूफ़ान की भांति और कभी सहजता   से बहता रहता है । इस अवस्था में चिन्तन के स्रोत खुल जाते हैं , विवेक जागृत हो जाता है और कर्मशक्ति निखार पा लेती है। जिस देश की तरुण पीढ़ी जितनी सक्षम होती है , वह देश उतना ही सक्षम बन जाता है। जो व्यक्ति या समाज जितना अधिक सक्षम होता है। उस पर उतनी ही अधिक जिम्मेदारियाँ आती हैं। जिम्मेदारियों का निर्वाह वही करता है जो दायित्वनिष्ठ होता है। समाज के भविष्य का समग्र दायित्व युवापीढ़ी पर आने वाला है इसलिए दायित्व - ...