सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जबाब देह और जिम्मेदार भी बने जैन मीडिया

 

जबाब देह और जिम्मेदार भी बने जैन मीडिया

प्रो डॉ.अनेकांत कुमार जैन,संपादक –पागद भासा ,नई दिल्ली

जैन मीडिया में पहले सिर्फ प्रिंट मीडिया ही हुआ करता था जो विद्वान पत्रकारों के द्वारा संचालित और सम्पादित होता था ....इसलिए उसकी जबाबदेही और जिम्मेदारी स्वयमेव तय हो जाती थी | आज सोशल मीडिया और इन्टरनेट चैनल इतने अधिक सस्ते और सुगम हो गए हैं कि इसका सञ्चालन वे लोग भी करने लगे हैं जिन्हें जैन धर्म दर्शन संस्कृति और पत्रकारिता का कोई विशेष अनुभव और ज्ञान नहीं है अतः उनकी जबाब देहि और जिम्मेदारी संदेह के घेरे में है |

जैसे साधु संघों और समाज के अप्रिय प्रसंगों को भी प्रेस आजादी और सुधारवादी आन्दोलन के तहत नमक मिर्च लगाकर सब्सक्राइबर बढाने आदि के लिए उछाल तो देते हैं...किन्तु दो चार माह मामला शांत होने के बाद भी उनके विडियो हमेशा के लिए इन्टरनेट पर डले रहते हैं जो दूसरे ईर्ष्या करने वाले सम्प्रदायों के लिए हमेशा के लिए एक अच्छे खासे सबूत हो जाते हैं और श्रमण संस्कृति की महान साधना की परंपरा पर हमेशा के लिए अंकुश लगाते रहते हैं |

आम मीडिया और जैन मीडिया में सबसे बड़ा फर्क यही हो सकता है कि वे सिर्फ फायदे के लिए काम नहीं करें ....बल्कि अपने धर्म और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए दूरगामी सोच रखते हुए अपना निःस्वार्थ समर्पण रखें |कोई भी नया चैनल या अखबार चलायें तो उसमें समाज के अनुभवी ,वरिष्ठ और समझदार श्रेष्ठी , विद्वान ,पत्रकार आदि को परामर्शक अवश्य बनायें और सिर्फ नाम के लिए ही न बनायें , उनसे समय समय पर परामर्श आदि भी लेते रहें और उनकी सुनें और मानें भी |

बहुत बड़ी समस्या यह है कि आज मीडिया में धैर्य की बहुत कमी है |किसी भी तथ्य की जांच करने की या उसके अन्य पहलुओं पर विचार करने का समय उनके पास नहीं है, उल्टे सीधी सादी समस्या को भी बढ़ा चढ़ा कर छापना और दिखाना उन्हें इसलिए ज्यादा पसंद है कि इससे पाठकों और दर्शकों का ध्यान जल्दी आकर्षित किया जा सकता है | संस्कृत का एक प्रसिद्ध सुभाषित है –

घटं भिन्द्यात् पटं छिन्द्यात् कुर्याद्रासभरोहणम् |

येन केन प्रकारेण प्रसिद्ध: पुरुषो भवेत् ||

घड़े फोड़कर, कपड़े फाड़कर या गधे के ऊपर चढ़कर. कुछ लोग किसी भी तरह, कुछ भी करके लोकप्रिय होना चाहते हैं ||

           ऐसा करके आप मूर्खों में संभवतः लोकप्रिय हो सकते हैं और आपके सब्सक्राइबर बहुत बढ़ सकते हैं क्यों कि संसार में मूर्खों की ही जनसँख्या ज्यादा है किन्तु अच्छे लोगों में आपकी प्रतिष्ठा नहीं रहेगी यह निश्चित है | आप अपनी प्रामाणिकता खोकर ज्यादा कुछ भी अच्छा नहीं प्राप्त कर सकते | आप बनना ही चाहते हैं तो जैन बीबीसी बन कर दिखाइए तब आपकी गूँज वाशिंगटन तक सुनी और मानी जाएगी | लेकिन इसके लिए धैर्य और परिश्रम की बहुत आवश्यकता है जो अब कम दिखाई देता है |

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुंडलपुर के तीर्थंकर आदिनाथ या बड़े बाबा : एक पुनर्विचार

*कुंडलपुर के तीर्थंकर आदिनाथ या बड़े बाबा : एक पुनर्विचार* प्रो अनेकान्त कुमार जैन,नई दिल्ली drakjain2016@gmail.com मैं कभी कभी आचार्य समन्तभद्र के शब्द चयन पर विचार करता हूँ और आनंदित होता हूँ कि वे कितनी दूरदर्शिता से अपने साहित्य में उत्कृष्ट से उत्कृष्ट शब्द चयन पर ध्यान देते थे । एक दिन मैं अपने विद्यार्थियों को उनकी कृति रत्नकरंड श्रावकाचार पढ़ा रहा था । श्लोक था -  श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् । त्रिमूढापोढमष्टांङ्गं सम्यग्दर्शनमस्मयम् ॥ इसकी व्याख्या के समय एक छात्रा ने पूछा कि गुरुजी ! देव ,शास्त्र और गुरु शब्द संस्कृत का भी है , प्रसिद्ध भी है ,उचित भी है फिर आचार्य ने उसके स्थान पर आप्त,आगम और तपस्वी शब्द का ही प्रयोग क्यों किया ? जब  कि अन्य अनेक ग्रंथों में ,पूजा पाठादि में देव शास्त्र गुरु शब्द ही प्रयोग करते हैं । प्रश्न ज़ोरदार था । उसका एक उत्तर तो यह था कि आचार्य साहित्य वैभव के लिए भिन्न भिन्न पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग करते हैं जैसे उन्होंने अकेले सम्यग्दर्शन के लिए भी अलग अलग श्लोकों में अलग अलग शब्द प्रयोग किये हैं ।  लेकिन...

युवा पीढ़ी का धर्म से पलायन क्यों ? दोषी कौन ? युवा या समाज ? या फिर खुद धर्म ? पढ़ें ,सोचने को मजबूर करने वाला एक विचारोत्तेजक लेख ••••••••••••👇​

युवा पीढ़ी का धर्म से पलायन क्यों ? दोषी कौन ? युवा या समाज ? या फिर खुद धर्म ? पढ़ें ,सोचने को मजबूर करने वाला एक विचारोत्तेजक लेख ••••••••••••👇​Must read and write your view

युवा पीढ़ी को धर्म से कैसे जोड़ा जाय ?

  युवा पीढ़ी को धर्म से कैसे जोड़ा जाय ?                                      प्रो अनेकांत कुमार जैन , नई दिल्ली    युवावस्था जीवन की स्वर्णिम अवस्था है , बाल सुलभ चपलता और वृद्धत्व की अक्षमता - इन दो तटों के बीच में युवावस्था वह प्रवाह है , जो कभी तूफ़ान की भांति और कभी सहजता   से बहता रहता है । इस अवस्था में चिन्तन के स्रोत खुल जाते हैं , विवेक जागृत हो जाता है और कर्मशक्ति निखार पा लेती है। जिस देश की तरुण पीढ़ी जितनी सक्षम होती है , वह देश उतना ही सक्षम बन जाता है। जो व्यक्ति या समाज जितना अधिक सक्षम होता है। उस पर उतनी ही अधिक जिम्मेदारियाँ आती हैं। जिम्मेदारियों का निर्वाह वही करता है जो दायित्वनिष्ठ होता है। समाज के भविष्य का समग्र दायित्व युवापीढ़ी पर आने वाला है इसलिए दायित्व - ...