हमारी समीक्षाएं आलोचनाएं कब कषाय में परिवर्तित हो जाती हैं हमें स्वयं ही पता नहीं लगता । गुरुदेव और दादा जी से हमने कुछ नहीं सीखा । सोनगढ़ में वर्तमान संतों का समागम होने पर वे स्वयं अगवानी हेतु जाते थे , साथ में बैठ कर प्रवचन करते थे । जिनके चित्र मुमुक्षु समाज को अपने अपने मंदिरों और स्वाध्याय भवनों में बड़े बड़े करके लगाने चाहिए । दादा जी ने भी हमेशा यही नीति अपनाई । अनेक पूज्य दिगम्बर संतों की अगवानी स्मारक में हुई है । समीक्षाएं अपनी जगह हैं , व्यवहार अपनी जगह । वर्तमान में सबसे बड़ा मिथ्यात्व है - कट्टरता ,जो हर धर्म और पंथ को उसकी मूल भावना से भटकाती रही है । कभी आत्म निरीक्षण करना चाहिए कि हम किस तरह के समाज की कल्पना कर रहे हैं ? और उसे कहाँ ले जा रहे हैं ? आश्चर्य है कि ' संत साधु बन के विचरुं,वह घड़ी कब आएगी' की भावना और भजन गाने वाला एक मुमुक्षु वर्तमान में नग्न दिगम्बर मुद्रा को देखने मात्र से नफ़रत और कषाय में डूब जाता है । उनके प्रति अजैनों से भी ज्यादा कटु शब्द और घृणा अभिव्यक्त करता है । हम आपनी आगामी पीढ़ी को ज्ञान ट्रांसफर मुश्किल से कर पा...
भारतीय ज्ञान परंपरा में प्राकृत भाषा का नया वर्ष प्राकृत भाषा भारतीय ज्ञान परंपरा की एक ऐसी मूल कड़ी है जिसे समझने और समझाने में मनीषियों ने सैकड़ो वर्षों तक अथक श्रम किया है । कभी भारत की जन जन की मातृ भाषा और जन भाषा से समादृत रही प्राकृत भाषा अपने भीतर भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐसे रत्नों को सहेजे हुए हैं जिनकी जानकारी के अभाव में भारतीय ज्ञान परंपरा का इतिहास अधूरा ही रह जाता है । आज से 10 वर्ष पूर्व 2015 में प्राकृत गाथा लेखन के अभ्यास में जीवन की प्रथम रचना नव वर्ष पर की थी ,और इसे 2014 में आचार्य विद्यानंद मुनिराज की प्रेरणा से प्रारंभ प्राकृत भाषा की प्रथम पत्रिका 'पागद भासा' में प्रकाशित भी किया था । पासामि उसवेलाए, संणाणसुज्जजुत्तो णववस्सं । होहिइ पाइयवस्सं, आगमणवसुज्जं उदिस्सइ ।। 1/1/2015 भावार्थ - मैं उषा बेला में सम्यग्ज्ञान रूपी सूर्य से युक्त नववर्ष को देखता हूँ जो प्राकृतभाषा के वर्ष के रूप में होगा और आगम ज्ञान का नया सूर्य उगेगा । इसमें एक भावना व्यक्त की थी,उस समय लगा था कि यह कोरी कल्पना है ,लेकिन कहते हैं न कि सच्चे दिल से जो भावना की ...