भारतीय ज्ञान परंपरा में प्राकृत भाषा का नया वर्ष प्राकृत भाषा भारतीय ज्ञान परंपरा की एक ऐसी मूल कड़ी है जिसे समझने और समझाने में मनीषियों ने सैकड़ो वर्षों तक अथक श्रम किया है । कभी भारत की जन जन की मातृ भाषा और जन भाषा से समादृत रही प्राकृत भाषा अपने भीतर भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐसे रत्नों को सहेजे हुए हैं जिनकी जानकारी के अभाव में भारतीय ज्ञान परंपरा का इतिहास अधूरा ही रह जाता है । आज से 10 वर्ष पूर्व 2015 में प्राकृत गाथा लेखन के अभ्यास में जीवन की प्रथम रचना नव वर्ष पर की थी ,और इसे 2014 में आचार्य विद्यानंद मुनिराज की प्रेरणा से प्रारंभ प्राकृत भाषा की प्रथम पत्रिका 'पागद भासा' में प्रकाशित भी किया था । पासामि उसवेलाए, संणाणसुज्जजुत्तो णववस्सं । होहिइ पाइयवस्सं, आगमणवसुज्जं उदिस्सइ ।। 1/1/2015 भावार्थ - मैं उषा बेला में सम्यग्ज्ञान रूपी सूर्य से युक्त नववर्ष को देखता हूँ जो प्राकृतभाषा के वर्ष के रूप में होगा और आगम ज्ञान का नया सूर्य उगेगा । इसमें एक भावना व्यक्त की थी,उस समय लगा था कि यह कोरी कल्पना है ,लेकिन कहते हैं न कि सच्चे दिल से जो भावना की ...
BE JAIN .....................FOLLOW THE NEW JAINISM जैनधर्म बलात धर्मान्तरण के पक्ष में कभी नहीं रहा |यह स्वेक्षा का पक्षधर है |कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी जाति का हो वह जन्मना न सही,कुछ नियमों का पालन करके कर्मणा जैन तो बन सकता है | जो जन्मना जैन हैं उन्हें भी यदि वे जैन नियमों का पालन नहीं करते हैं तो नामधारी जैन ही कहा जाता है | फिर भी धर्मान्तरण के ज्वलंत मुद्दों के बीच यदि कोई आत्मकल्याण की शुद्ध भावना से स्वेक्षा से जैन होना चाहे तो निम्नलिखित ५ साधारण न्यूनतम आचारसंहिता का पालन करके आज से जैन होने की शुरुआत कर सकता है - धर्म का नाम - नव-जैन ( न्यू जैनिज़्म ) उद्देश्य - करुणा और आत्म विशुद्धि प्राथमिक नियम - १.प्रतिदिन स्नान करके णमोकार महामंत्र का मात्र नौ बार पाठ करें | २.शुद्ध शाकाहारी भोजन ही करें | ३.नशे का सेवन न करें | ४.पञ्च अणुव्रतों का यथा शक्ति पालन करें | ५.क्रोध -मान-माया-लोभ से बचने का प्रयास करें | उपनियम - १.सभी से अभिवादन में जय जिनेन्द्र कहें | २.सभी धर्मों का सम्मान करें |किसी की निंदा न करें | ३.राष्ट्र विरोधी किसी भी गतिविधि में...