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संदेश

प्रचंड वैराग्य का निमित्त बन रहा है 2020

*प्रचंड वैराग्य का निमित्त बन रहा है 2020* लगभग रोज ही आये दिन हम अपने गुरुओं ,रिश्तेदारोँ, परिजनों,मित्रों तथा अन्यान्य लोगों का वियोग सहन कर रहे हैं । 2020 में कॅरोना ने हमें अनित्य की सिर्फ भावना ही नहीं करवायी है बल्कि प्रयोग भी करवाया है । इसके बाद भी हम आजकल अपने ही साधर्मी,सहकर्मी,सह निवासी,पड़ोसी  जनों से भी कितना द्वेष करने लगे हैं ।  हम अक्सर उन जीवों की रक्षा की चिंता,उनसे क्षमा प्रार्थना तो करते हुए दिखते हैं जो आंखों से दिखाई तक नहीं देते किन्तु जो सामने दिख रहे हैं,जो हमारे साथ रह रहे हैं, जिनसे हमारे साक्षात सरोकार हैं उनकी विराधना ,असातना की चिंता नहीं करते हैं । प्रत्युत अन्य लोगों की अपेक्षा उनसे ही ज्यादा द्वेष कर रहे हैं । जरा जरा सी बात पर उन्हें नीचा दिखाने और उनका अपमान करने से बाज नहीं आते । लोग रोज मर रहे हैं और हम अमरता के भ्रम में जी रहे हैं और जरा से परिग्रह के लिए दूसरों को कष्ट देकर पाप बांधे जा रहे हैं । जीवन में परिवर्तन नहीं कर रहे,कषाय कम नहीं कर रहे और सोच रहे हैं कि 11000/- की बोली लेकर सब पाप धुल जाएंगे । पिछले कई महीनों से शोक संदेश पढ़ रहे हैं ,उस प

न तेरी न मेरी

न तेरी न मेरी ..... 1. वैक्सीन अभी तक इसलिए नहीं आ पाई क्यों कि अनुसंधान से ज्यादा व्यापार की चिंता है कि इसकी कमाई पहले कौन करेगा । 2. लोग वैक्सीन के भरोसे न रहें , आनी होती तो अभी तक आ गयी होती । 3. हमें जगह जगह पोस्टर लगा कर यह उपदेश दिया गया कि कॅरोना के साथ जीना सीखिए , हम सीख रहे हैं लेकिन लगता है वो ही तैयार नहीं है । 4. दिल्ली में मरीज इसलिए ज्यादा आ रहे हैं क्यों कि ज्यादा हैं ,न कि जांच ज्यादा हो रही है इसलिए । 5. दावा किया जा रहा है ये जो वैक्सीन आने वाली है उसका असर 95% होगा । यानि इससे अच्छे तो हमारे साबुन हैं जो 99.9% सुरक्षा देने का दावा कर रहे हैं । 6. जब वायरस का माप हमारी एक कोशिका से 10 लाख गुना छोटा है तो किसी भी किस्म के मास्क के द्वारा  उससे बचाव कैसे हो रहा है ? यह समझ में नहीं आ रहा । 2000₹ जुर्माने से अर्थ व्यवस्था जरूर सुधर जाएगी । 7. संक्रमण से बचने के लिए शारीरिक दूरी का नियम और उपदेश भी ठीक उतना ही प्रभावशाली है जितना कि जनसंख्या वृद्धि रोकने के लिए ब्रह्मचर्य का उपदेश । 8. अब स्कूल तब खुलेंगे जब भावी पीढ़ी ऑनलाइन क्लासों से अंधी और बहरी हो जाएगी और शिक्षक म

अद्वितीय थे आचार्य ज्ञानसागर जी

*अद्वितीय थे आचार्य ज्ञानसागर जी* - प्रो अनेकान्त कुमार जैन  दीपावली की शाम जब हम घरों में ज्ञान के प्रतीक स्वरूप दीप प्रज्वलित कर रहे थे तभी सहसा एक दुखद समाचार मिला कि एक श्रुत ज्ञान दीप अभी अभी बुझ गया है ....।  सुनकर विश्वास ही नहीं हुआ कि  वर्तमान में जैन धर्म दर्शन संस्कृति की रक्षा का संकल्प लेकर एक अद्वितीय  जिनधर्म विजय अभियान लेकर चलने वाले ,जन जन की श्रद्धा के आसन पर विराजने वाले दिगम्बर जैन परंपरा के महान साधक आचार्य ज्ञान सागर जी की समाधि अचानक हो गयी है । अपने कुछ हाथ में नहीं था तो एकांत ध्यान में बैठकर महामंत्र का जाप किया और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की ।  मन में बचपन के वे दिन भी स्मृति पटल पर चलचित्र की भांति चलने लगे जब पिताजी( डॉ फूलचंद जैन प्रेमी जी) के साथ मैंने उनके सर्वप्रथम दर्शन तब किये थे जब वे बनारस पधारे थे । मेरी अभिरुचि को देखकर उन्होंने मुझे शाकाहार आदि पर लेख लिखने को प्रेरित किया था जो तब से आज तक सतत चल ही रहा है । मेरी तरह उन्होंने लाखों बच्चों और युवकों की प्रतिभा को अपनी प्रेरणा से जैन संस्कृति की सेवा करने को प्रेरित किया और लगाया है । 2003 में व

महावीर-णिव्वाण-दीवोसवो

  महावीर-णिव्वाण- दीवोस वो महावीर-णिव्वाण- दीवोस वो   जआ  अवचउ काल स्स   सेसतिणिवस्ससद्धअट्ठमासा ।   तआ होहि अंतिमा य महावीरस्स खलु देसणा ।।१।। जब  अवसर्पिणी  के  चतुर्थ काल के  तीन वर्ष साढ़े आठ मास  शेष थे तब भगवान् महावीर की अंतिम देशना हुई थी ।   कत्तियकिण्ह तेरसे  जोगणिरोहेण ते ठिदो झाणे ।    वीरो अत्थि य झाणे अओ पसिद्धझाणतेरसो ।।२।। योग निरोध करके  कार्तिक  कृष्णा त्रियोदशी को वे (भगवान् महावीर)ध्यान में स्थित हो गए ।और (आज) ‘वीर प्रभु ध्यान में हैं’ अतः यह दिन ध्यान तेरस के नाम से प्रसिद्ध है ।     चउदसरत्तिसादीए पच्चूस काले  पावाणयरीए  ।         ते   गमिय परिणिव्वुओ   देविहिं   अच्चीअ  माव से ।।३ ।। चतुर्दशी की रात्रि में स्वाति नक्षत्र रहते प्रत्यूषकाल में  वे ( भगवान् महावीर )   परिनिर्वाण को प्राप्त हुए  और अमावस्या को देवों के द्वारा पूजा हुई  ।   गोयमगणहरलद्धं अमावसरत्तिए य केवलणाणं  ।   णाणलक्खीपूया य   दीवोस वपव्वं  जणवएण   ।।४ ।। इसी अमावस्या की रात्रि को गौतम गणधर ने केवल ज्ञान प्राप्त किया ।लोगों ने केवल ज्ञान रुपी लक्ष्मी की पूजा की और दीपोत्सवपर्व  मनाया

शाकाहार हाईकू पंचक

*शाकाहार हाईकू पंचक* कुमार अनेकान्त, नई दिल्ली drakjain2016@gmail.com  11/11/2020 1. जीवन सार  हमारा शाकाहार न मांसाहार 2. खाकर मांस  पेट को कब्रिस्तान  मत बनाओ 3. रखो करुणा आहार शाकाहार जीवों की दया  4. मानव धर्म जीवन शाकाहार  सात्विक कर्म  5. अपनाएगा  हिन्दु मुसलमान सच्चा ईमान

जैन आगमों में दीपोत्सव

*जैन आगमों में दीपोत्सव* प्रो.डॉ.अनेकांत कुमार जैन , आचार्य-जैन दर्शन विभाग ,श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय , नई दिल्ली-१६ drakjain2016@gmail.com दीपावली भारत का एक ऐसा पवित्र पर्व है जिसका सम्बन्ध भारतीय संस्कृति की सभी परम्पराओं से है |भारतीय संस्कृति के प्राचीन जैन धर्म में इस पर्व को मनाने के अपने मौलिक कारण हैं |आइये आज हम इस अवसर पर दीपावली के जैन महत्त्व को समझें |ईसा से लगभग ५२७  वर्ष पूर्व कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के समापन होते ही अमावस्या के लगभग प्रारम्भ में स्वाति नक्षत्र में जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर का वर्तमान में बिहार प्रान्त में स्थित पावापुरी से निर्वाण हुआ था। भारत की जनता  ने  प्रातः काल जिनेन्द्र भगवान की पूजा कर निर्वाण लाडू (नैवेद्य) चढा कर पावन दिवस को उत्साह पूर्वक मनाया । यह उत्सव आज भी अत्यंत आध्यात्मिकता के साथ देश विदेश में मनाया जाता है |इसी दिन रात्रि को शुभ-बेला में भगवान महावीर के प्रमुख प्रथम शिष्य गणधर गौतम स्वामी को केवल ज्ञान रुपी  लक्ष्मी की प्राप्ति हुई थी |  दिगंबर आचार्य जिनसे

सोशल मीडिया संबंधी श्रावकाचार

सोशल मीडिया संबंधी श्रावकाचार वर्तमान में जितनी तीव्रता से सोशल मीडिया का उपयोग बढ़ा है उससे कहीं ज्यादा तीव्रता से उसका दुरुपयोग भी बढ़ा है । इसलिए अब इससे संबंधित अपराधों के लिए  कानून भी निर्मित हो गए हैं तथा सजाएं भी मिल रही हैं जो कि कुछ वर्षों पहले तक संभव नहीं थी । आज यह आवश्यक हो गया है कि सोशल मीडिया पर कानून के साथ साथ सोशल कंट्रोल भी हो । हमें वर्तमान के अनुरूप अपनी प्रासंगिकता स्थापित करनी पड़ती है ।  कॅरोना काल में लॉक डाउन के कारण ज़ूम ,गूगल मीट,जिओ मीट, मीटिंग एप्प आदि का उपयोग उन लोगों ने भी सीखा जिन्हें मोबाइल लैपटॉप छूना भी पसंद न था । यूट्यूब,व्हाट्सएप,फ़ेसबुक,टेलीग्राम,इंस्टाग्राम,ट्विटर आदि जनसंचार के सबसे ज्यादा माध्यम बने हुए हैं । मोबाइल सभी के अधिकार और पहुंच में होने से आज इस पर कोई भी व्यक्ति किसी भी विषय पर कैसा भी लिख और लिखवा सकता है । कितने ही विषयों में ऐसा लगता है कि बंदरों के हाथों में उस्तरा लग गया है । इसके लिए अब हमें सोशल मीडिया संबंधी श्रावकाचार के नियम स्थापित करने होंगे और उनका कड़ाई से पालन भी करना और करवाना होगा ।अभी आरम्भ में सोशल मीडिया से उत्पन्न

विद्यार्थियों को पत्र

प्रिय विद्यार्थियों  आज आप सभी का डिप्लोमा जैन विद्या का द्वितीय सत्र पूरा हो गया है । कॅरोना की विपरीत परिस्थितियों में भी हम सभी ने अध्ययन एवं अध्यापन किया । आप सभी ने परीक्षा में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है । जहां तक मुझे लगता है जिन्होंने भी परीक्षा दी है, उनमें सभी उच्च श्रेणी से उत्तीर्ण होने वाले हैं । कई विद्यार्थी हमेशा कहते हैं कि हम तो बस पढ़ने आये थे , डिग्री लेने नहीं ,इसलिए वे परीक्षा नहीं देते हैं। किन्तु मेरा अनुभव रहा है जिनका लक्ष्य परीक्षा या डिग्री नहीं रहता ,वे गंभीरता से पढ़ते भी नहीं हैं ।  आप सभी ने परीक्षा के दौरान यह अनुभव किया होगा कि जब तक सकारात्मक तनाव हमारे ऊपर नहीं रहता तब तक हम भी जोर नहीं लगाते हैं । परीक्षा के निमित्त से स्वाध्याय और अध्ययन और गहरा होता है । अपने ज्ञान पर खुद का विश्वास बढ़ता है ।  चलिए , अब एक बहुत बड़े भार से तो आप निर्भार हो गए । औपचारिकताओं के बाद डिप्लोमा भी आपको प्राप्त हो ही जायेगा ।  लेकिन अब अवसर है गुरु दक्षिणा का । पिछले एक डेढ़ वर्षों में हमने मिलकर हर संभव आप सभी को अपनी तरफ से यथा शक्ति , यथा मति जैन विद्या का वह अमूल्य तत्त्

दसधम्मसारो की pdf

दसलक्षण धर्म पर सरल प्राकृत गाथाएं एवं सरल और संक्षिप्त हिंदी व्याख्या के साथ अब *दसधम्मसारो* ग्रंथ की पीडीएफ जैन ई लाइब्रेरी में भी उपलब्ध है आप  निम्नलिखित लिंक पर जाकर डाउन लोड कर सकते हैं -  धन्यवाद https://jainelibrary.org/book-detail/?srno=035362

तुम भी यार कॅरोना निकले

*तुम भी यार कॅरोना निकले*  झूठ ही बिकता रहा बाज़ार में, दाम बहुत पर ऊपर निकले । सच्चाई की भीख मांगने, लेकर हम कटोरा निकले ।। अंदर बैर बैठा ही रहा, मंदिर मस्जिद सैर को निकले । क्रीम पाउडर हल्दी उबटन , देखें कौन सलोना निकले ।। एहसानों को सह न पाए , अच्छे अच्छे सपोला निकले । उफ रिश्तों से इतनी दूरी, तुम भो यार कॅरोना निकले ।। कुमार अनेकान्त  14/08/2020

अनुभव

अनुभव को लिखा अनुभव  मुझे जैन विद्या प्राकृत भाषा रूप जिनवाणी का तत्वज्ञान परंपरा से प्राप्त हुआ है। मेरे माता पिता स्वयं इस विद्या के विशेषज्ञ हैं। उन्हीं की प्रेरणा पाकर के मुझे भी संस्कृत विद्या जैन दर्शन आदि विषयों के साथ अध्ययन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। गुरू जनों का मुझ पर बहुत उपकार हुआ और यही कारण है कि मैंने अपने संपूर्ण अध्ययन काल में इस विषय में उच्च से उच्च शिक्षा तथा इससे संबंधित समस्त शैक्षणिक योग्यताएं अर्जित करने का प्रयास किया ।  यह मेरा इस जन्म में बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि मुझे जैन दर्शन के माध्यम से  तत्त्व ज्ञान प्राप्त हुआ तथा उसी को प्रचारित प्रसारित करने के लिए अध्यापन करने के लिए तथा शोध कार्य करने के लिए सौभाग्य से आजीविका भी मिल गई। अध्ययन के दौरान यह अवश्य लगता था की मेरे कैरियर का क्या होगा ? किंतु मेरे माता पिता ने हिम्मत बंधाई और मैंने भी अन्यत्र न भटकते हुए यह सोच लिया था कि जो होगा सो होगा ,मेरी तरफ से कोई कमी नहीं रहनी चाहिए, बस । इसी विद्या से मैंने यह सीखा कि यदि पूरे परिश्रम भावना और समर्पण के साथ यदि कार्य किया जाए तो कोई ना कोई दिशा भी अवश्य म