Tuesday, December 6, 2016

ये कैसा अनेकान्त ?

मैंने
जो भी पढ़ा
खुद को
और
खुद के
पक्ष को
पुष्ट करने के
लिए पढ़ा
तुम्हें पढ़कर
भी
यही किया
तुम्हें
तुम्हारे पक्ष को
कभी
समझने का
प्रयास भी
नहीं किया
तुम्हें पढ़ने का पुरुषार्थ
उसके पीछे बैठा मेरा
स्वार्थ
कि तुम्हें कर सकूँ असिद्ध
ताकि मैं हो सकूँ
स्वतः सिद्ध
मेरा स्वार्थी एकान्त
फिर भी
कहलाता अनेकान्त

- ©कुमार अनेकान्त 7/12/2016

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