सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

भारतीय ज्ञान परंपरा में प्राकृत भाषा का नया वर्ष

भारतीय ज्ञान परंपरा में प्राकृत भाषा का नया वर्ष  

प्राकृत भाषा भारतीय ज्ञान परंपरा की एक ऐसी मूल कड़ी है जिसे समझने और समझाने में मनीषियों ने सैकड़ो वर्षों तक अथक श्रम किया है । कभी भारत की जन जन की मातृ भाषा और जन भाषा से समादृत रही प्राकृत भाषा अपने भीतर भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐसे रत्नों को सहेजे हुए हैं जिनकी जानकारी के अभाव में भारतीय ज्ञान परंपरा का इतिहास अधूरा ही रह जाता है । 

आज से 10 वर्ष पूर्व 2015 में प्राकृत गाथा लेखन के अभ्यास में जीवन की प्रथम रचना नव वर्ष पर की थी ,और इसे 2014 में आचार्य विद्यानंद मुनिराज की प्रेरणा से प्रारंभ प्राकृत भाषा की प्रथम पत्रिका 'पागद भासा' में प्रकाशित भी किया था । 

पासामि उसवेलाए, संणाणसुज्जजुत्तो णववस्सं ।
होहिइ पाइयवस्सं, आगमणवसुज्जं उदिस्सइ ।।
1/1/2015
भावार्थ - मैं उषा बेला में सम्यग्ज्ञान रूपी सूर्य से युक्त नववर्ष को देखता हूँ जो प्राकृतभाषा के वर्ष के रूप में होगा और आगम ज्ञान का नया सूर्य उगेगा ।

इसमें एक भावना व्यक्त की थी,उस समय लगा था कि यह कोरी कल्पना है ,लेकिन कहते हैं न कि सच्चे दिल से जो भावना की जाती है वह निःसार नहीं होती है ,देखते ही देखते भारत में 2015 से लेकर 2025 के बीच प्राकृत भाषा का नया सूर्य थोड़ा तो उगा है यह मानना पड़ेगा । अनेक नए रचनाकार उदित हुए , अनेक साधुओं ने प्राकृत भाषा को अपना मिशन बनाया ,ग्रंथों की टीकाएँ लिखीं , काव्य लिखे,निबंध लिखे ,कथाएं लिखीं ,नए ग्रंथों का सृजन किया ,अनेक कार्यशालाएं ,प्रशिक्षण शिविर लगाए , राष्ट्रिय अंताराष्ट्रिय संगोष्ठी सम्मेलन हुए, अनेक नए अध्येता बने,आम जन में प्राकृत एवं जैनागम से BA MA करने वालों और नेट JRF करने वालों की संख्या में वृद्धि हुई ।  इसी बीच पागद भासा के अंक भी प्रकाशित होते रहे । प्राकृत भाषा में समाचार लेखन पहली बार हो रहा था । प्राकृत के नये रचनाकारों को एक अनुकूल मंच भी मिला । कुल मिलाकर एक उत्साह का वातावरण बना ।

स्वयं प्रधानमंत्री आदरणीय नरेंद्र मोदी जी द्वारा कई बार संसद और अन्य बड़े मंचों पर वक्तव्य में प्राकृत भाषा में कथन और इसका उल्लेख एक क्रांति की तरह सामने आया । 

भारत सरकार ने जब नई शिक्षा नीति 2020 में भारतीय भाषा को महत्त्व देना शुरू किया तो शिक्षा की  सारी कायनात ही बदल गई और उसके एजेंडे में प्राकृत भाषा का नाम होना किसी चमत्कार से कम नहीं था । 

सरकार के द्वारा 2024 में प्राकृत भाषा को क्लासिकल भाषा घोषित करने के अभूतपूर्व कदम ने इस दम तोड़ती भारतीय भाषा को वेंटिलेटर का काम किया । उसे ऑक्सीजन मिला और आम जन में इस प्राचीन भारतीय मातृ भाषा के प्रति एक चेतना का संचार हुआ । 

यह सब इसलिए चमत्कृत कर देने वाला था क्यों कि इससे पूर्व विद्वानों एवं साधुओं द्वारा लाख प्रयास करने और भी इस तरह की चेतना का संचार नहीं हो पा रहा था । उनके लगभग 200 वर्षों के अथक प्रयासों से यह भाषा बस जीवित बनी हुई थी ।

आज उस समय कल्पना लोक में गोते लगाते हुए इस गाथा को पुनः पढ़ता हूँ तो लगता है कि भले ही दस वर्ष पूर्व इसे कवि की एक कोरी कल्पना के रूप में समझा गया हो लेकिन आज की स्थितियां देखकर उसमें यथार्थता की गंध तो आनी शुरू हो गई है और मुझे पूरा विश्वास है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में प्राकृत भाषा का यह नया सूर्य एक दिन अपने प्रबल प्रताप में प्रकाशित होकर जगत  का अज्ञान अंधकार हर लेगा । 

प्रो अनेकान्त कुमार जैन ,नई दिल्ली 
1/1/26

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुंडलपुर के तीर्थंकर आदिनाथ या बड़े बाबा : एक पुनर्विचार

*कुंडलपुर के तीर्थंकर आदिनाथ या बड़े बाबा : एक पुनर्विचार* प्रो अनेकान्त कुमार जैन,नई दिल्ली drakjain2016@gmail.com मैं कभी कभी आचार्य समन्तभद्र के शब्द चयन पर विचार करता हूँ और आनंदित होता हूँ कि वे कितनी दूरदर्शिता से अपने साहित्य में उत्कृष्ट से उत्कृष्ट शब्द चयन पर ध्यान देते थे । एक दिन मैं अपने विद्यार्थियों को उनकी कृति रत्नकरंड श्रावकाचार पढ़ा रहा था । श्लोक था -  श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् । त्रिमूढापोढमष्टांङ्गं सम्यग्दर्शनमस्मयम् ॥ इसकी व्याख्या के समय एक छात्रा ने पूछा कि गुरुजी ! देव ,शास्त्र और गुरु शब्द संस्कृत का भी है , प्रसिद्ध भी है ,उचित भी है फिर आचार्य ने उसके स्थान पर आप्त,आगम और तपस्वी शब्द का ही प्रयोग क्यों किया ? जब  कि अन्य अनेक ग्रंथों में ,पूजा पाठादि में देव शास्त्र गुरु शब्द ही प्रयोग करते हैं । प्रश्न ज़ोरदार था । उसका एक उत्तर तो यह था कि आचार्य साहित्य वैभव के लिए भिन्न भिन्न पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग करते हैं जैसे उन्होंने अकेले सम्यग्दर्शन के लिए भी अलग अलग श्लोकों में अलग अलग शब्द प्रयोग किये हैं ।  लेकिन...

युवा पीढ़ी का धर्म से पलायन क्यों ? दोषी कौन ? युवा या समाज ? या फिर खुद धर्म ? पढ़ें ,सोचने को मजबूर करने वाला एक विचारोत्तेजक लेख ••••••••••••👇​

युवा पीढ़ी का धर्म से पलायन क्यों ? दोषी कौन ? युवा या समाज ? या फिर खुद धर्म ? पढ़ें ,सोचने को मजबूर करने वाला एक विचारोत्तेजक लेख ••••••••••••👇​Must read and write your view

युवा पीढ़ी को धर्म से कैसे जोड़ा जाय ?

  युवा पीढ़ी को धर्म से कैसे जोड़ा जाय ?                                      प्रो अनेकांत कुमार जैन , नई दिल्ली    युवावस्था जीवन की स्वर्णिम अवस्था है , बाल सुलभ चपलता और वृद्धत्व की अक्षमता - इन दो तटों के बीच में युवावस्था वह प्रवाह है , जो कभी तूफ़ान की भांति और कभी सहजता   से बहता रहता है । इस अवस्था में चिन्तन के स्रोत खुल जाते हैं , विवेक जागृत हो जाता है और कर्मशक्ति निखार पा लेती है। जिस देश की तरुण पीढ़ी जितनी सक्षम होती है , वह देश उतना ही सक्षम बन जाता है। जो व्यक्ति या समाज जितना अधिक सक्षम होता है। उस पर उतनी ही अधिक जिम्मेदारियाँ आती हैं। जिम्मेदारियों का निर्वाह वही करता है जो दायित्वनिष्ठ होता है। समाज के भविष्य का समग्र दायित्व युवापीढ़ी पर आने वाला है इसलिए दायित्व - ...