हमारी समीक्षाएं आलोचनाएं कब कषाय में परिवर्तित हो जाती हैं हमें स्वयं ही पता नहीं लगता । गुरुदेव और दादा जी से हमने कुछ नहीं सीखा । सोनगढ़ में वर्तमान संतों का समागम होने पर वे स्वयं अगवानी हेतु जाते थे , साथ में बैठ कर प्रवचन करते थे । जिनके चित्र मुमुक्षु समाज को अपने अपने मंदिरों और स्वाध्याय भवनों में बड़े बड़े करके लगाने चाहिए । दादा जी ने भी हमेशा यही नीति अपनाई । अनेक पूज्य दिगम्बर संतों की अगवानी स्मारक में हुई है ।
समीक्षाएं अपनी जगह हैं , व्यवहार अपनी जगह । वर्तमान में सबसे बड़ा मिथ्यात्व है - कट्टरता ,जो हर धर्म और पंथ को उसकी मूल भावना से भटकाती रही है । कभी आत्म निरीक्षण करना चाहिए कि हम किस तरह के समाज की कल्पना कर रहे हैं ? और उसे कहाँ ले जा रहे हैं ? आश्चर्य है कि ' संत साधु बन के विचरुं,वह घड़ी कब आएगी' की भावना और भजन गाने वाला एक मुमुक्षु वर्तमान में नग्न दिगम्बर मुद्रा को देखने मात्र से नफ़रत और कषाय में डूब जाता है । उनके प्रति अजैनों से भी ज्यादा कटु शब्द और घृणा अभिव्यक्त करता है । हम आपनी आगामी पीढ़ी को ज्ञान ट्रांसफर मुश्किल से कर पाते हैं लेकिन नफरत ट्रांसफर आसानी से हो जाती है । यदि हम मित्र पक्ष द्वारा की जाने वाली कषाय और नफ़रत के प्रति उत्तर में ऐसा करते हैं तो यह और भी खतरनाक है । आश्चर्य तो यह भी होता है कि वस्तु स्वभाव की समझ रखने वाला ,आत्मानुभूति की भावना रखने वाला, क्रमबद्धपर्याय की श्रद्धा वाला और शास्त्र सभा में जिनवाणी को सुनाने वाला एक विद्वान् इस तरह की नफ़रत का शिकार कैसे हो जाता है ? पर में फेर फार की बुद्धि को मिथ्यात्त्व समझने वाला व्यक्ति साधुओं को सुधारने के लिये इस कदर उतावला हो जाता है कि उनके प्रति तिरस्कार और अपने अहंकार से त्रस्त हो जाता है । कभी आत्म मूल्यांकन करना चाहिए कि ये पर का मूल्यांकन करते करते हम कहीं अपने लक्ष्य से ही न भटक जाएं । शुद्धात्म भारिल्ल जी को जब मुनि प्रमाण सागर जी अपने मंच पर बोलने के लिए बुलाते हैं तो वे उनकी वाक्पटुता से ज्यादा उनकी विनम्रता के मुरीद हो जाते हैं । तब एक संदेश स्वतः प्रसारित होता है कि समाज एक सरोकार से चलता है नफरत की दीवार से नहीं ।
यह विडंबना नहीं तो और क्या है हम साथ में व्यापार आदि कर सकते हैं लेकिन साथ बैठकर प्रवचन नहीं सुन सकते । मनोविज्ञान की भाषा में यह एक किस्म का मनोविकार है जो समझ नहीं आता है । आपने एक फ़िल्म देखी होगी 'अपरिचित' , वह इसी तरह का मनोरोगी था । सबसे पहले हम अपने मन में अपने पक्ष में एक तर्क खड़ा करते हैं और फिर स्वयं को उसमें कैद करते हैं , फिर उसी तर्क के समर्थन में प्रमाण एकत्रित करते हैं और फिर उसी तर्क की कसौटी पर सारे जगत का मूल्यांकन करते हैं । जो उसमें फिट नहीं बैठता स्वतः ही उससे नफरत करने लगते हैं । इस तरह हम धर्म के नाम पर तीव्र कषाय के वशीभूत होकर स्वयं को ही ब्रह्म समझने लगते हैं और जगत को मिथ्या । यह रोग एक तरफा नहीं है , उभय पक्ष इसी मनो विकार से ग्रसित है । क्या करें ? तत्त्व विचार पूर्वक समता और सहजता रखना चाहिए - यही सार है ।
3/1/2026
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