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थोवं सारं भणिय ंथोड़ा बोलो पर सारपूर्ण प्राकृत गाथा

थोवं सारं भणियं
थोड़ा बोलो पर सारपूर्ण 



भासणं ण जाणामि त्ति, वयणं आरंभयंति बहुवयणा ।
भणमाणा बहु वदंति, अंते तं खलु सच्चयंति ।। १ ।।

भावार्थ :

मुझे भाषण देना नहीं आता - ऐसा कहकर बहुत-से लोग अपना वक्तव्य आरम्भ करते हैं; फिर वे बहुत बोलते हैं , और अंत में सचमुच अपने ही उसी कथन को सत्य सिद्ध कर देते हैं।


अभिप्राय :

बहुत से लोग अपना भाषण इस वाक्य से प्रारंभ करते हैं कि उन्हें बोलना नहीं आता है ,और अंत में अपने ही इस वचन को सत्य सिद्ध कर के ही  दम लेते हैं ।


गंभीरभावहीणं, वयणदीहं पवड्ढंति बहुवयणा ।
थोवं सारं भणियं, सारवयणं खलु धीराणं ।। २।।

भावार्थ

गंभीर भाव से रहित वचन को बहुत वक्ता लंबा करते जाते हैं। थोड़ा ही बोलना चाहिए, पर सारयुक्त; निश्चय ही सारपूर्ण वचन धीर पुरुषों का होता है।

अभिप्राय 

वक्ता अपने वक्तव्य की गहराई की कमी को लंबाई में पूरा करते हैं । सच है थोड़ा बोलना चाहिए लेकिन सार्थक बोलना चाहिए।


प्रो.अनेकांत कुमार जैन,
नई दिल्ली 
११/०९/२६

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