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दिसंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भारतीय ज्ञान परंपरा में प्राकृत भाषा का नया वर्ष

भारतीय ज्ञान परंपरा में प्राकृत भाषा का नया वर्ष   प्राकृत भाषा भारतीय ज्ञान परंपरा की एक ऐसी मूल कड़ी है जिसे समझने और समझाने में मनीषियों ने सैकड़ो वर्षों तक अथक श्रम किया है । कभी भारत की जन जन की मातृ भाषा और जन भाषा से समादृत रही प्राकृत भाषा अपने भीतर भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐसे रत्नों को सहेजे हुए हैं जिनकी जानकारी के अभाव में भारतीय ज्ञान परंपरा का इतिहास अधूरा ही रह जाता है ।  आज से 10 वर्ष पूर्व 2015 में प्राकृत गाथा लेखन के अभ्यास में जीवन की प्रथम रचना नव वर्ष पर की थी ,और इसे 2014 में आचार्य विद्यानंद मुनिराज की प्रेरणा से प्रारंभ प्राकृत भाषा की प्रथम पत्रिका 'पागद भासा' में प्रकाशित भी किया था ।  पासामि उसवेलाए, संणाणसुज्जजुत्तो णववस्सं । होहिइ पाइयवस्सं, आगमणवसुज्जं उदिस्सइ ।। 1/1/2015 भावार्थ - मैं उषा बेला में सम्यग्ज्ञान रूपी सूर्य से युक्त नववर्ष को देखता हूँ जो प्राकृतभाषा के वर्ष के रूप में होगा और आगम ज्ञान का नया सूर्य उगेगा । इसमें एक भावना व्यक्त की थी,उस समय लगा था कि यह कोरी कल्पना है ,लेकिन कहते हैं न कि सच्चे दिल से जो भावना की ...

जैन बनें जैन बनाएं

BE JAIN .....................FOLLOW THE NEW JAINISM  जैनधर्म बलात धर्मान्तरण के पक्ष में कभी नहीं रहा |यह स्वेक्षा का पक्षधर है |कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी जाति का हो वह जन्मना न सही,कुछ नियमों का पालन करके  कर्मणा जैन तो बन सकता है | जो जन्मना जैन हैं उन्हें भी यदि वे जैन नियमों का पालन नहीं करते हैं तो नामधारी जैन ही कहा जाता है | फिर भी धर्मान्तरण के ज्वलंत मुद्दों के बीच यदि कोई आत्मकल्याण की शुद्ध भावना से स्वेक्षा से जैन होना चाहे तो निम्नलिखित ५ साधारण न्यूनतम आचारसंहिता का पालन करके आज से जैन होने की शुरुआत कर सकता है - धर्म का नाम - नव-जैन ( न्यू जैनिज़्म )  उद्देश्य - करुणा और आत्म विशुद्धि  प्राथमिक नियम - १.प्रतिदिन स्नान करके णमोकार महामंत्र का मात्र नौ बार पाठ करें | २.शुद्ध शाकाहारी भोजन ही करें | ३.नशे का सेवन न करें | ४.पञ्च अणुव्रतों का यथा शक्ति पालन करें  | ५.क्रोध -मान-माया-लोभ से बचने का प्रयास करें | उपनियम - १.सभी से अभिवादन में जय जिनेन्द्र कहें | २.सभी धर्मों का सम्मान करें |किसी की निंदा न करें | ३.राष्ट्र विरोधी किसी भी गतिविधि में...

चार्वाक : दर्शन की नन्हीं सी जान दुश्मन हजार

चार्वाक : दर्शन की नन्हीं सी जान दुश्मन हजार  ICPR और भोगीलाल लहेरचन्द इन्स्टीट्यूट ऑफ इण्डोलाजी दिल्ली द्वारा सर्वज्ञता विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार(5/12/25) में वहाँ के यशस्वी निदेशक आदरणीय प्रो विजय कुमार जैन जी ने मुझे चार्वाक दर्शन का पक्ष रखने का आग्रह किया । मैंने उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए ,इसे स्वीकार भी किया ।   मैंने पूरी ईमानदारी से प्रयास किया और चार्वाक के प्रति पूर्वाग्रह युक्त 'खाओ पीओ मौज उड़ाओ' मानसिकता की समीक्षा करने का प्रयास किया और कहा कि चार्वाक वह है जो सवाल करता है , जो सवाल करता है, वह विकास करता है , आज किसी पंथ या सम्प्रदाय के रूप में चार्वाक भले ही प्रतिष्ठित न हो लेकिन भौतिकवाद के प्रतिनिधि के रूप में वह हर जगह ,हर दिल में प्रतिष्ठित है ,उसे किसी संगठन की जरूरत नहीं है ।  'सवाल' करने की हिम्मत का नाम है - चार्वाक  तानाशाही के खिलाफ बगावत का नाम है - चार्वाक  ईश्वर पर जिरह करने का जिगरा रखने का नाम है - चार्वाक  सदियों से जिसने सवाल किया उसका मखौल उड़ाया गया ,उसे व्यभिचारी और इन्...

नंगेपन को आधुनिकता और दिगम्बरत्व को अश्लीलता समझने की भूल में भारतीय समाज

नंगेपन को आधुनिकता और दिगम्बरत्व को अश्लीलता समझने की भूल में भारतीय समाज प्रो.डॉ अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली   दिगंबर जैन सम्प्रदाय के परम आराध्य जिनेन्द्र देव या तीर्थंकरों की खड्गासन मुद्रा में निर्वस्त्र और नग्न प्रतिमाओं को लेकर तथा दिगम्बर जैन मुनियों के नग्न विहार पर खासे संवाद और विवाद होते रहते हैं | नग्नता को अश्लीलता के परिप्रेक्ष्य में भी देखकर पीके जैसी फिल्मों में इसे मनोविनोद के केंद्र भी बनाने जैसे प्रयास होते रहते हैं |  आये दिन आज के शिक्षित और ज्ञान युक्त विकसित समाज के बीच भी त्याग तपस्या की मूर्ति स्वरूप दिगम्बर जैन मुनि जब सम्पूर्ण भारत में नंगे पैर पैदल बिहार करके जगत को अध्यात्म, अहिंसा ,शांति और भाई चारे का संदेश देते हैं तब कई बार असामाजिक तत्त्व उन्हें अपमानित करने और कष्ट पहुंचाने का कार्य करके अपने अज्ञान का और अशिष्टता का परिचय देते रहते हैं । दिगम्बर साधना के पीछे,दिगंबर जैन मूर्तियों के पीछे जो दर्शन है ,जो अवधारणा है उसे समझे बिना ही अनेक अज्ञानी लोग कुछ भी कथन करने से पीछे नहीं रहते | इस विषय को आज के विकृत समाज को समझाना असं...