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हमारी समीक्षाएं आलोचनाएं और कषाय

हमारी समीक्षाएं आलोचनाएं कब कषाय में परिवर्तित हो जाती हैं हमें स्वयं ही पता नहीं लगता ।  गुरुदेव और  दादा जी से हमने कुछ नहीं सीखा । सोनगढ़ में वर्तमान संतों का समागम होने पर वे स्वयं अगवानी हेतु जाते थे , साथ में बैठ कर प्रवचन करते थे । जिनके चित्र मुमुक्षु समाज को अपने अपने मंदिरों और स्वाध्याय भवनों में बड़े बड़े करके लगाने चाहिए । दादा जी ने भी हमेशा यही नीति अपनाई । अनेक पूज्य दिगम्बर संतों की अगवानी स्मारक में हुई है ।  समीक्षाएं अपनी जगह हैं , व्यवहार अपनी जगह । वर्तमान में सबसे बड़ा मिथ्यात्व है -  कट्टरता ,जो हर धर्म और पंथ को उसकी मूल भावना से भटकाती रही है । कभी आत्म निरीक्षण करना चाहिए कि हम किस तरह के समाज की कल्पना कर रहे हैं ? और उसे कहाँ ले जा रहे हैं ? आश्चर्य है कि ' संत साधु बन के विचरुं,वह घड़ी कब आएगी' की भावना और भजन गाने वाला एक मुमुक्षु वर्तमान में नग्न दिगम्बर मुद्रा को देखने मात्र से नफ़रत और कषाय में डूब जाता है । उनके प्रति अजैनों से भी ज्यादा कटु शब्द और घृणा अभिव्यक्त करता है । हम आपनी आगामी पीढ़ी को ज्ञान ट्रांसफर मुश्किल से कर पा...