पहले आत्मा से मिलना चाहिए प्रो अनेकान्त कुमार जैन ,नई दिल्ली मनुष्य को समय-समय पर अपने भीतर की ओर भी लौटना चाहिए। यदि उसे अनुभव हो कि वह धीरे-धीरे बाह्य जगत से दूरी बना रहा है, तो उसे इसे तुरंत दुर्बलता नहीं मानना चाहिए। कई बार यह दूरी आत्मा की पुकार होती है—शुद्धात्म की ओर लौटने की एक सूक्ष्म प्रेरणा। जब बाह्य चेतना संबंधों, अपेक्षाओं और भूमिकाओं में अत्यधिक उलझ जाती है, तब आंतरिक चेतना थक जाती है। उस समय आत्मानुभव की साधना की आवश्यकता होती है ताकि हम नई ऊर्जा और उत्साह से भर सकें । गहरे एकांत और आत्मानुभव का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम अपने दैनिक कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन हो जाएं । जो सच्चे आत्मानुभवी थे उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया । बल्कि उन्होंने बाह्य कार्य अधिक कुशलता और ऊर्जा के साथ सफलता पूर्वक संपादित किये बिना चेहरे पर शिकन लाये । आसक्त मनुष्य बाह्य कार्यो को कुशलता पूर्वक करता है और अनासक्त मनुष्य बाह्य कार्यों में शिथिलता या उदासीनता रखता है - यह हमने गलत अवधारणा विकसित की है । बाहर की अस्तव्यस्तता अंदर की अस्तव्यस्तता की द्योतक भी होत...