श्रुत तीर्थ का संरक्षक है चातुर्मास Prof. Anekant Kumar Jain Dean, School of Philosophy Shri Lal Bahadur Shastri National Sanskrit University New Delhi – 110016 प्रायः जब तीर्थ की चर्चा होती है तो हमारा ध्यान केवल सम्मेदशिखर, अयोध्या आदि तीर्थस्थलों की ओर जाता है। किन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि जैन परम्परा में केवल तीर्थस्थलों को ही नहीं, बल्कि श्रुत को भी तीर्थ कहा गया है। इसीलिए कहा गया है ‘ श्रुतं गणधरा वा तीर्थमित्युच्यते।’ (भगवती आराधना, विजयोदया टीका) इसी प्रकार ‘तीर्थमागमः’ (समाधिशतक टीका) कहकर आगम को भी तीर्थ की संज्ञा प्रदान की गई है। आचार्य कुन्दकुन्ददेव तो इससे भी आगे बढ़कर कहते हैं— जं णिम्मलं सुधम्मं सम्मत्तं संजमं णाणं। तं तित्थजिणमग्गे हवेइ जदि संतिभावेण।। (बोधपाहुड २७) अर्थात् जिनमार्ग में उत्तम धर्म, सम्यक्त्व, संयम और यथार्थ ज्ञान ही तीर्थ हैं। जब ये सब शान्त भाव सहित होते हैं, तभी वे निर्मल तीर्थ कहलाते हैं। स्पष्ट है कि जैसे अयोध्या, सम्मेदशिखर, गिरनार आदि शाश्वत तीर्थों की रक्षा हमारा कर्तव्य है, उसी प्रकार तीर्थंकर भगवान् महावीर की वाणी, जैन धर्म-दर्शन, तत्...