*जीवन का महान् अवसर चूकना नहीं चाहिए* प्रो.अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली (१०/०८/२६ प्रातः ४ बजे) आश्चर्य है कि अपने आत्मा की चर्चा से ही कई धर्मी जीवों को भी कोफ़्त होती है । धर्म के नाम पर भी हमें विषय भोगों की भांति बाहर का शोर ही पसंद है ,जिन्हें बाहर के शोर में रुचि है उन्हें अंदर का संगीत कैसे सुनाई देगा ? पहले तो अनादि से पर में ही सुख खोजने के संस्कार हैं और दूसरे जो साधन स्वयं से मिलवाने वाले थे उनके कार्य बदल दिए गए हैं, हमारी रुचि भी पलट दी गई है , कई तरह के भ्रम डाल दिए गए हैं । हमारे मूल शास्त्रों में जरूर वे बातें सुरक्षित हैं । लेकिन स्वाध्याय को हतोत्साहित किया जा रहा है । ऐसी दशा में अपने स्वयं के विवेक के अलावा कोई रास्ता हमारे पास बचा नहीं है । उम्र थोड़ी है और काम बहुत ज्यादा हैं । हमें कौन सा काम ऐसा करना है जिससे हमारा भव सुधर जाये ये विचार करना है । जीव के कल्याण की पहली शर्त है कि अंदर में अपने ही आत्मा की रुचि होना चाहिए। जिसको वास्तव में अध्यात्म का रस हो और अपने आत्मा का कल्याण करने की लगन हो ऐसे जीव को ही अपने आत्म स्वरूप की ब...