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उत्थापकयन्त्रं(lift)स्थापयन्तु, सोपानानि(Stairs)तु मा विनाशयन्त

उत्थापकयन्त्रं(lift)स्थापयन्तु, सोपानानि(Stairs)तु मा विनाशयन्त (क्वचित् ‘समर्थ’-पोर्टलस्य कारणेन संस्कृतविद्यासंरक्षणस्य स्वप्नमेव असमर्थं न भवेत्) - आचार्यः अनेकान्तकुमारजैनः शिक्षाक्षेत्रे सुधारस्य दिशि अङ्कीकरणम् (Digitalisation) अन्तर्जालाधारितव्यवस्था च निःसन्देहं क्रान्तिकारी पदक्षेपः। एताभ्यां पारदर्शिता वर्धिता, अभिलेखाः सुरक्षिताः जाताः, समयस्य संरक्षणं अभवत्, अनेकप्रकाराणाम् अनियमिततानामपि नियन्त्रणं सम्भवम् अभवत्। शासनस्य प्रयोजनमपि तदेव यत् प्रत्येकं विद्यार्थिनं समानः अवसरः प्राप्नुयात् तथा प्रवेशप्रक्रिया सरला, निष्पक्षा, पारदर्शिनी च भवेत्। अतः अस्मिन् दृष्टिकोणे अङ्कीकरणाधारितव्यवस्थायाः स्वागतमेव कर्तव्यम्। किन्तु कस्यापि व्यवस्थायाः सफलता तेनैव ज्ञायते यत् सा व्यवहारभूमौ कियत् उपयोगिनी सिद्ध्यति। समस्या अङ्कीकरणे नास्ति। समस्या तदा आरभते यदा काचित् व्यवस्था विकल्परूपेण न स्थाप्यते, अपितु अनिवार्या क्रियते, तया सह सम्बद्धा मानवीयव्यवस्था च सम्पूर्णतया निराक्रियते। संस्कृतस्य पारम्परिकशिक्षा अस्याः स्थितेः सर्वश्रेष्ठम् उदाहरणम् अस्ति। अद्य सामान्यतः विद्यार्थिनः रोजगा...

क्या समाधि मरण अपराध है ? आत्महत्या है ?

क्या समाधिमरण अपराध है ? समाधि का सरल अर्थ है आत्मस्थ होना । एक साधक जीवन भर समाधि में रहता है। प्रत्येक सच्चे साधक की यह कामना होती है कि शरीरस्थ होकर मृत्यु को प्राप्त न हो । वह चाहता है कि स्वत: समागत मृत्यु के दिन भी मैं आत्मस्थ रहूं । समाधि पूर्वक मरण को समाधि मरण कहा जाता है । शरीर मुझे छोड़ दे उससे पूर्व मैं शरीर से आसक्ति तोड़ दूं । शरीर से आसक्ति तोड़ने की प्रक्रिया का नाम समाधिमरण है ।  दुनिया भर में शराब पीना अपराध नहीं माना जाता। सिगरेट पीना अपराध नहीं माना जाता। तम्बाकू, गुटखा और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन भी सामान्यतः अपराध की श्रेणी में नहीं आता। पंजीकृत वेश्यावृत्ति  को अपराध नहीं माना जाता । जबकि इनके दुष्परिणामों के प्रति चिकित्सा विज्ञान लगातार चेतावनी देता है और इन्हें अनेक गंभीर रोगों तथा असमय मृत्यु का कारण मानता है।  प्रश्न यह है कि जो पदार्थ मनुष्य के शरीर और जीवन को क्रमशः विनाश की ओर ले जाते हैं, उनके सेवन को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर स्वीकार किया जाता है, तो जीवन के अंतिम चरण में स्वेच्छा से संयम, रागद्वेष का त्याग और देह के प्रति आसक्ति क...

जीवन का महान् अवसर चूकना नहीं चाहिए

*जीवन का महान् अवसर चूकना नहीं चाहिए*  प्रो.अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली  (१०/०८/२६ प्रातः ४ बजे) आश्चर्य है कि अपने आत्मा की चर्चा से ही कई धर्मी जीवों को भी कोफ़्त होती है । धर्म के नाम पर भी हमें विषय भोगों की भांति बाहर का शोर ही पसंद है ,जिन्हें बाहर के शोर में रुचि है उन्हें अंदर का संगीत कैसे सुनाई देगा ?  पहले तो अनादि से पर में ही सुख खोजने के संस्कार हैं और दूसरे जो साधन स्वयं से मिलवाने वाले थे उनके कार्य बदल दिए गए हैं, हमारी रुचि भी पलट दी गई है , कई तरह के भ्रम डाल दिए गए हैं ।  हमारे मूल शास्त्रों में जरूर वे बातें सुरक्षित हैं । लेकिन स्वाध्याय को हतोत्साहित किया जा रहा है ।  ऐसी दशा में अपने स्वयं के विवेक के अलावा कोई रास्ता हमारे पास बचा नहीं है । उम्र थोड़ी है और काम बहुत ज्यादा हैं । हमें कौन सा काम ऐसा करना है जिससे हमारा भव सुधर जाये ये विचार करना है ।  जीव के कल्याण की पहली शर्त है कि अंदर में अपने ही आत्मा की रुचि होना चाहिए। जिसको वास्तव में अध्यात्म का रस हो और अपने आत्मा का कल्याण करने की लगन हो ऐसे जीव को ही अपने आत्म स्वरूप की ब...