भगवान् महावीर का संदेश : “जानो और जाने दो” प्रो अनेकांत कुमार जैन भगवान् महावीर का संदेश “जियो और जीने दो” विश्वभर में अहिंसा और सह-अस्तित्व के सिद्धांत के रूप में प्रसिद्ध हुआ। किंतु उनके उपदेशों में एक और अत्यंत गहन आध्यात्मिक सूत्र मिलता है—“जानो और जाने दो”। यह संदेश मनुष्य को जीवन के प्रति सही दृष्टि देता है और आत्मा की वास्तविक प्रकृति को समझने का मार्ग दिखाता है। जैन दर्शन के अनुसार संसार में अनंत प्रकार के पदार्थ, परिस्थितियाँ और अनुभव उपस्थित हैं। मनुष्य का स्वभाव प्रायः यह होता है कि वह इन पदार्थों को केवल जानता ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़ भी जाता है। यही जुड़ाव या आसक्ति दुःख और बंधन का कारण बनती है। भगवान् महावीर ने इसलिए यह स्पष्ट किया कि संसार के पदार्थों के प्रति केवल ज्ञान होना चाहिए, आसक्ति नहीं। अर्थात् उन्हें जानो, समझो, परंतु उनसे अपने मन को बाँधो मत; उन्हें जाने दो। “जानो” का अर्थ है—वस्तुओं, परिस्थितियों और भावों के वास्तविक स्वरूप को समझना। जीवन में अच्छे और बुरे, दोनों प्रकार के अनुभव आते हैं। जैन दर्शन यह नहीं कहता कि उनसे आँखें बंद कर ली जाएँ; बल्...
महावीर जयंती का बदलता स्वरूप प्रो अनेकांत कुमार जैन कभी महावीर जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि विचारों का पर्व भी हुआ करती थी। उस दिन मंच सजते थे—केवल पूजा के लिए नहीं, बल्कि चिंतन के लिए भी। नगर के जैन और जैनेतर विद्वान, साहित्यकार, कवि, बुद्धिजीवी, नेता—सभी एकत्र होकर भगवान महावीर के जीवन, उनके दर्शन, अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत के गूढ़ संदेशों पर मंथन करते थे।बाद में उनके विचार छपते थे जो संदर्भ बनते थे । आज दृश्य बदल गया है। महावीर जयंती अब अधिकतर पूजन-अभिषेक, झूलनोत्सव, प्रभात फेरी और सामूहिक भोज तक सिमटती जा रही है। उत्सव है—पर विमर्श नहीं। श्रद्धा है—पर संवाद नहीं। आस्था है—पर आत्ममंथन कहीं खो गया है। क्या यह विडंबना नहीं कि जिन भगवान महावीर ने हमें सोचने, प्रश्न करने और सत्य की खोज का मार्ग दिखाया, उनके ही जन्मोत्सव पर हम विचार करना छोड़ बैठे हैं? क्या हम उनके दर्शन को जी रहे हैं, या केवल परंपराओं को निभा रहे हैं? समय की मांग है कि हम इस प्रवृत्ति पर पुनर्विचार करें। महावीर जयंती को फिर से “विचार जयंती” बनाएं—जहाँ मंचों पर केवल भजन नहीं, बल्कि बहस ह...