भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में जैनधर्म, साहित्य और संस्कृति का योगदान प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी, (राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित), पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, जैनदर्शन विभाग, सम्पूर्णानन्द संस्कृतविश्वविद्यालय,वाराणसी। पृष्ठभूमि— वर्तमान केंद्रीय सरकार ने अपने भारत देश के प्राचीन मूलभूत मूल्यों, इसकी बहुमूल्य विरासत. संस्कृति और उपेक्षित हो रहीं अपनी पहचान एवं अक्षय ज्ञाननिधि के संरक्षण, संवर्धन और इन सबकी पुनः स्थापना हेतु काफ़ी गंभीरता से कार्य कर रही है. इसीलिए भारतीय ज्ञान परम्परा,इस पर आधारित शैक्षिक पाठ्यक्रमों का निर्माण तथा भारतीय संस्कृति का तथ्यों पर आधारित इतिहास का लेखनकार्य–ये सभी कार्य नव क्रांति के रूप में कार्यान्वित हो रहे हैं. इससे देशवासियों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति स्वाभिमान युक्त आशा का संचार हुआ है. सरकार की नीति सबके प्रति समान ह...
क्या जैन धर्म के होने वाले हैं दो नए भेद ? प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली १२/०४/२६ दुनिया में प्रायः धर्म, दर्शन और अध्यात्म इन तीनों को अलग अलग मानकर पढ़ाया और समझाया जाता रहा है। मानो धर्म, पूजा पाठ और अनुष्ठानों का विषय हो और दर्शन अध्यात्म केवल विचारकों की बौद्धिक चर्चा। किंतु जैन परंपरा की यह विशेषता रही है कि यहाँ यह विभाजन संभव नहीं है। यहाँ धर्म, दर्शन और अध्यात्म परस्पर पूरक हैं। आप चाहें तो भी इनके पवित्र संबंधों को छिन्न भिन्न नहीं कर सकते । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र रूप रत्नत्रय में ही जैन धर्म का वास्तविक स्वरूप निहित है। दर्शन के बिना धर्म कर्मकांड बन जाता है और धर्म के बिना दर्शन अध्यात्म केवल बौद्धिक व्यायाम रह जाता है। आज की भाषा में मैं जैनदर्शन को ' ट्रिपल AAA ' के सिद्धांत के साथ प्रचारित करना चाहता हूँ जिसे मैंने डॉ.मेधावी जैन के साथ Dharma for life में अपने एक पॉडकास्ट धर्म दर्शन और विज्ञान में बखूबी व्याख्यायित किया है । यह है अहिंसा ,अनेकांत और अकर्त्तावाद । अब अपरिग्रह को अहिंसा के अंतर्गत की समझाएंगे । लेकिन तीसरा ...