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सत्य की खोज और मोह का नाश

*सत्य की खोज और मोह का नाश* प्रो.अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली १/११/२०२६ सत्य की खोज तो  भव्य जीवों के  किसी भी उम्र में शुरू हो सकती है ,लेकिन वृद्धावस्था में जीवन के सारे सांसारिक अनुभव चख लेने के बाद वास्तविक अर्थों में जीवन का रहस्य समझना चाहता है तो उसे समझाना ज्यादा कठिन नहीं होता क्यों कि आधे से अधिक ज्ञान तो उसे जीवन के कटु अनुभवों से प्रायोगिक तौर पर भी हो चुका होता है ।  वृद्धा अवस्था में भी चेतना जाग जाये - यह भी सौभाग्य है ,अन्यथा अन्यान्य तो विषय भोगों की तृष्णा में ही बुढ़ापा काटते है और उसी में तड़प कर मर जाते हैं ।  *एक बुजुर्ग साधर्मी भाई ने पूछा है कि मोह का क्षय कैसे करें ? कोई शॉर्ट कट बताओ ?*  उन्होंने फोन पर तीन चार प्रश्न किए हैं और उसके समाधान देने का मैंने अपनी अल्प प्रज्ञा और अनुभव से प्रयास किया है ,जिन्हें सभी के हितार्थ मैं लिखने का प्रयास कर रहा हूं -   *मेरे दुखों का मूल कारण क्या है ?*  मोह ही असली दुख का कारण है और  मोह का क्षय ही आत्म शांति की महत्त्वपूर्ण साधना है.  *मोह का कारण क्या है ?*  अज्ञानता ...
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विशुद्ध समयसार मय हुई दिल्ली

*विशुद्ध समयसार मय हुई दिल्ली* 10 अक्टूबर 2026 का दिन देश की राजधानी दिल्ली के लिए ऐतिहासिक था । दिल्ली आने वाली सौ से अधिक ट्रेनों को अचानक रद्द कर दिया गया , पूरी दिल्ली में लगभग 40000 पुलिस और अर्ध सैनिक बल बैरीकेट लगा कर सारी बॉर्डर को सील करके , चौराहे चौराहे पर सघन जांच कर रहे थे ...उद्देश्य था *जंतर मंतर के प्रदर्शन को रोकना*  उधर इसी दिन दिल्ली के ऋषभ विहार में समयसार की समयदेशना पर आधारित तीन दिन की राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी का आगाज हुआ जिसमें पूरे देश के 30 वरिष्ठ जैन विद्वान् पंडित एकत्रित हुए और आचार्य विशुद्ध सागर महाराज के सर्व विशुद्ध ज्ञानाधिकार पर अद्वितीय क्रांतिकारी आध्यात्मिक प्रवचन हुए और इसका भी उद्देश्य था आध्यात्मिक जैनधर्म में बढ़ रहे *जंतर मंतर के प्रदर्शन को रोकना* ।  उधर सरकार प्रदर्शनकारियों को समझा रही थी , इधर आचार्य श्री भी प्रदर्शनकारियों को समझा रहे थे कि जैन धर्म प्रदर्शन का नहीं आत्मदर्शन का धर्म है ।  आचार्य श्री ने एक दिन पहले तक देश के दर्जनों प्रतिष्ठाचार्यों को मूर्ति प्रतिष्ठा के सूत्र दिए फिर समयसार गोष्ठी में मूर्तिमान की प्रतिष...

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार का उद्देश्य

  सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार का उद्देश्य                                                                 प्रो.अनेकांत कुमार जैन            सर्वविशुद्ध ज्ञानाधिकार का मूल उद्देश्य आत्मा के ऐसे शुद्ध स्वरूप को   बताना है , जो जीव को परद्रव्य और परभाव के मोह से मुक्त कर उसके ही निज ज्ञायक स्वभाव में उसे स्थित कर सके । आत्मा का वास्तविक स्वरूप ज्ञान और चेतना है , कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं। जब तक जीव अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं पहचानता , तब तक वह शरीर , कर्म , राग , द्वेष , सुख और दुःख के भावों में तादात्म्य स्थापित करके स्वयं को कर्ता और भोक्ता मानता रहता है।           आचार्य कुन्दकुन्द स्वर्ण और कटक आदि आभूषणों का दृष्टान्त देकर समझाते हैं कि जैसे स्वर्ण अपने कंगन , कुण्डल आदि पर्यायों से अभिन्न है , वैसे ही प्रत्येक द्रव्य ...

महात्मा गांधी का जिनवाणी प्रेम

*महात्मा गांधी का जिनवाणी प्रेम* महात्मा गांधी और जैन धर्म का संबंध केवल अहिंसा की अवधारणा तक सीमित नहीं था। जैन साधना, जैन शास्त्र, जैन साहित्य और जैन विद्वानों के प्रति उनके मन में गहरी आत्मीयता और श्रद्धा थी। उनके अपने शब्दों में जैन धर्म और जैन समाज के प्रति व्यक्त भाव इस संबंध के एक महत्त्वपूर्ण पक्ष को सामने रखते हैं। मुंबई में आयोजित एक जैन कॉन्फ्रेंस में महात्मा गांधी ने एक व्याख्यान प्रस्तुत किया था। उस अवसर पर उन्होंने जैन धर्म और जैन समाज के प्रति अपनी आत्मीयता व्यक्त करते हुए कहा था- *मेरे लिए तो मुक्ति का दरवाजा अहिंसा धर्म का पलना है। मुझ पर जैन भाइयों की इस कदर कृपादृष्टि है कि मुझको उनकी लेना देनी है। भारतवर्ष में एक सगे भाई के समान भाईबंदी के साथ रहने का दावा जैन ही कर सकते हैं।* आगे उन्होंने कहा। *मेरे परम मित्र डॉक्टर प्राणजीवन जैन हैं, जिनके चरित्र का मुझको सम्मान है। रायचंद भाई मेरे मित्र थे और शहर मुंबई में मेरे रहने का जो स्थान है, वह भी एक देवाशंकर जैन भाई का है। सफर के मध्य मुझे बहुत से जैन भाइयों से अक्सर वास्ता पड़ा है और बहुत से उस समय मुझसे पूछते हैं कि क्य...

जैनदर्शन विभागों/महाविद्यालयों के गंभीर शास्त्री विद्वानों के लिए आवश्यक पंचसूत्रीय मार्गदर्शन

वर्णी जयंती पर विशेष *जैनदर्शन विभागों/ महाविद्यालयों के गंभीर शास्त्री विद्वानों के लिए आवश्यक पंचसूत्रीय मार्गदर्शन* पूज्य क्षुल्लक गणेश प्रसाद वर्णी जी ने अपने संपूर्ण संघर्ष पूर्ण जीवन काल में एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य किया था और वह था जैनदर्शन तत्वज्ञान संस्कृत भाषा प्राकृत भाषा के ज्ञान और प्रशिक्षण के लिए अन्यान्य संस्थाओं की स्थापना । उनमें से अधिकांश संस्थाएं सौ वर्ष या उससे अधिक समय की भी हो गई हैं । उनके इस आंदोलन के फल स्वरूप उनकी ही स्थापित संस्थाओं के स्नातकों ने और भी अनेक नई संस्थाएं इसी उद्देश्य को लेकर स्थापित करवाई हैं जिनसे वर्तमान की नई पीढ़ी भी शास्त्री / आचार्य / Phd जैसे कोर्स करके विद्वत्ता के क्षेत्र में कार्य कर रहीं हैं । उन  जैन महाविद्यालयों में अध्ययनरत उन शास्त्री विद्वानों एवं विदुषियों के लिए जिन्होंने परिश्रम पूर्वक जैनाचार्यों द्वारा लगभग सभी मूलभूत प्राकृत- संस्कृत  ग्रंथों का भली भांति अध्ययन करके उनमें प्रवीणता प्राप्त कर ली है और जो आजीवन जैनविद्या, जैनदर्शन एवं प्राकृत आगमों के अध्ययन-अध्यापन, अनुसंधान और संरक्षण के क्षेत्र में समर...

क्षमा करना और मांगना आसान नहीं होता - प्रो अनेकांत कुमार जैन, नई दिल्ली

क्षमा करना और मांगना आसान नहीं होता  प्रो अनेकांत कुमार जैन, नई दिल्ली  वो पूछ लेते मिज़ाज़ मेरा, बस इतना ही था इलाज़ मेरा। जैन धर्म में क्षमावाणी का पर्व मनाया जाता है। क्षमा आत्मा का स्वभाव है। उसे केवल भीतर धारण करना ही पर्याप्त नहीं, व्यवहार में अपनी वाणी के माध्यम से उसे प्रकट करना भी आवश्यक है। किन्हीं कारणों से जिनसे हमारी बोलचाल बंद हो गई है, उनसे संवाद आरंभ करने का सबसे सहज और सुंदर माध्यम क्षमावाणी हो सकती है। संवादहीनता धीरे धीरे मन में कटुता और कषायों को जन्म देती है। एक छोटी सी बात वर्षों की दूरी बन जाती है और फिर वही दूरी अहंकार, क्रोध और बैर का रूप ले लेती है। इसके विपरीत संवाद मन की गाँठों को खोलता है, दूरी को कम करता है और संबंधों में सहजता लौटाता है। यह केवल आध्यात्मिक अनुभव नहीं, एक मनोवैज्ञानिक सत्य भी है। क्षमावाणी बड़े और छोटे का भेद भी मिटाती है। छोटा पहले कहे और बड़ा बाद में बोले, ऐसा कोई नियम नहीं है। बड़े भी पहले बोल सकते हैं। बल्कि कई बार बड़ा वही होता है जो अपने पद, प्रतिष्ठा और अहंकार से ऊपर उठकर स्वयं पहल करता है। क्षमा माँगने के ल...

संयम और तप में अंतर - प्रो अनेकांत कुमार जैन

*संयम और तप में क्या अंतर है ?* प्रो.अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली यद्यपि संयम और तप एक ही सिक्के के दो पहलु हैं तथा मोक्षमार्ग में ये दोनों ही अनिवार्य तत्त्व हैं, इनमें से किसी का भी महत्त्व कम नहीं हैं, एक नज़र में ये लगते भी एक जैसे हैं , बोलते समय भी संयम के साथ तप अपने आप जुड़ जाता है ।  हम कहते हैं कि बिना संयम-तप धारण किये कुछ भी नहीं होगा । किन्तु जिनागम में लगभग प्रत्येक जगह इनकी व्युत्पत्ति अर्थ ,परिभाषा ,भेद प्रभेद सब कुछ अलग अलग प्रतिपादित किये गए हैं, इसके बाद भी अलग अलग ग्रंथों में कहीं संयम की मुख्यता से प्रतिपादन किया गया है कहीं तप की मुख्यता से ।  जहाँ संयम की प्रधानता ज्यादा है वहां तप को भी संयम के अंतर्गत गर्भित करके कथन किया गया है , जहाँ तप की मुख्यता से कथन है वहां संयम को तप के ही अंग के रूप में कह दिया जाता है । कहीं कहीं स्थूल रूप से संयम और तप को एक अर्थ में भी कहा गया है । किन्तु ये सब विवक्षा और अभिप्राय के भेद से कथन है ।  जिन्हें चारों  अनुयोगों की कथन पद्धति का अभ्यास है वे इन्हें सही सही समझ लेते हैं ,उन्हें कहीं भी विरोध भासित नहीं ह...

तन और मन - प्राकृत गाथा

तन और मन  पुण्णम्मि ण रमे मणं, कायं तह वि णेहि पुण्णस्स कम्मे । पावम्मि ण रमे मणं, काओ वि मणं अणुकड्ढइ खलु ॥ भावार्थ : पुण्य में मन न भी रमे, तो भी तन को पुण्य-कर्म में ले जाओ ; पाप में मन रमे, तब भी तन को वहाँ मत ले जाओ क्योंकि तन भी निश्चय ही मन को अपनी ओर खींच लेता है। अभिप्राय : मन की चिंता मत करो ,पहले अपने तन को सम्भालो । पाप में मन जाए तो जाए , मगर तन को जाने से बचाना चाहिए ।  इसी प्रकार पुण्य कार्य में मन न लगे तब भी तन को ले जाना चाहिए । क्यों कि तन जहाँ रहता है मन वहाँ वापस आता ही आता है ।  प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली  १७/०९/२६

शुभ चिंतकों की प्रतिभा - प्राकृत गाथा

शुभ चिंतकों की प्रतिभा  अम्हेहि ण भासंति वि, अम्हाणं सव्वजणेहि भासंति ।  ण पेच्छिउं इच्छंति वि, दिट्ठी अम्हेसु णिवेसिया ॥ भावार्थ  (हमें न चाहने वाले) हमसे बात तक नहीं करते, पर हमारे बारे में सभी से बात करते हैं। वे हमें देखना भी नहीं चाहते, फिर भी उनकी दृष्टि सदा हम पर ही लगी रहती है (यही उनकी सबसे बड़ी प्रतिभा है ) । प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली १५/०९/२६