थोवं सारं भणियं थोड़ा बोलो पर सारपूर्ण भासणं ण जाणामि त्ति, वयणं आरंभयंति बहुवयणा । भणमाणा बहु वदंति, अंते तं खलु सच्चयंति ।। १ ।। भावार्थ : मुझे भाषण देना नहीं आता - ऐसा कहकर बहुत-से लोग अपना वक्तव्य आरम्भ करते हैं; फिर वे बहुत बोलते हैं , और अंत में सचमुच अपने ही उसी कथन को सत्य सिद्ध कर देते हैं। अभिप्राय : बहुत से लोग अपना भाषण इस वाक्य से प्रारंभ करते हैं कि उन्हें बोलना नहीं आता है ,और अंत में अपने ही इस वचन को सत्य सिद्ध कर के ही दम लेते हैं । गंभीरभावहीणं, वयणदीहं पवड्ढंति बहुवयणा । थोवं सारं भणियं, सारवयणं खलु धीराणं ।। २।। भावार्थ गंभीर भाव से रहित वचन को बहुत वक्ता लंबा करते जाते हैं। थोड़ा ही बोलना चाहिए, पर सारयुक्त; निश्चय ही सारपूर्ण वचन धीर पुरुषों का होता है। अभिप्राय वक्ता अपने वक्तव्य की गहराई की कमी को लंबाई में पूरा करते हैं । सच है थोड़ा बोलना चाहिए लेकिन सार्थक बोलना चाहिए। प्रो.अनेकांत कुमार जैन, नई दिल्ली ११/०९/२६
*वर्तमान का टीचर डरते हुए देता है निडरता का लेक्चर* बहुत हुई शिक्षक दिवस की बधाइयां । आज शिक्षक दिवस पर हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि डरता हुआ शिक्षक निडर पीढ़ी नहीं बना सकता और भय के अधीन शिक्षा स्वतंत्र समाज का निर्माण नहीं कर सकती। विचार कीजिए कि जो शिक्षक अपनी आजीविका की सुरक्षा के कारण सच बोलने से डरता है, वह विद्यार्थियों को सत्य के लिए खड़े होने का साहस कितने समय तक सिखा पाएगा? प्रशासन को भी सिर्फ शिक्षा की व्यवस्था करना चाहिए, कभी भी शिक्षक / विचारक/ विद्वान् की चेतना को नियंत्रित नहीं करना चाहिए। देश में यह तय करना चाहिए कि शिक्षक केवल आदेशों का पालन करने वाला कर्मचारी बनकर न रहे । वह विचारक बने, प्रश्नकर्ता बने और समाज के विवेक का प्रतिनिधि बने। यदि शिक्षक /विचारक / विद्वान् भी किसी आग्रह , विचारधारा या शक्ति के नियंत्रण में रहेगा तो समाज में कौन सा वर्ग बचेगा जो सही गलत का भेद दिखलायेगा ? सही दिशा बतलाएगा ? शिक्षक कमजोर होगा तो समाज कमजोर होगा, समाज कमजोर होगा तो राष्ट्र कमजोर होगा । आज स्थिति यह है कि शिक्षक समाज में वह वैचारिक ऊर्जा और परि...