तन और मन पुण्णम्मि ण रमे मणं, कायं तह वि णेहि पुण्णस्स कम्मे । पावम्मि ण रमे मणं, काओ वि मणं अणुकड्ढइ खलु ॥ भावार्थ : पुण्य में मन न भी रमे, तो भी तन को पुण्य-कर्म में ले जाओ ; पाप में मन रमे, तब भी तन को वहाँ मत ले जाओ क्योंकि तन भी निश्चय ही मन को अपनी ओर खींच लेता है। अभिप्राय : मन की चिंता मत करो ,पहले अपने तन को सम्भालो । पाप में मन जाए तो जाए , मगर तन को जाने से बचाना चाहिए । इसी प्रकार पुण्य कार्य में मन न लगे तब भी तन को ले जाना चाहिए । क्यों कि तन जहाँ रहता है मन वहाँ वापस आता ही आता है । प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली १७/०९/२६
शुभ चिंतकों की प्रतिभा अम्हेहि ण भासंति वि, अम्हाणं सव्वजणेहि भासंति । ण पेच्छिउं इच्छंति वि, दिट्ठी अम्हेसु णिवेसिया ॥ भावार्थ (हमें न चाहने वाले) हमसे बात तक नहीं करते, पर हमारे बारे में सभी से बात करते हैं। वे हमें देखना भी नहीं चाहते, फिर भी उनकी दृष्टि सदा हम पर ही लगी रहती है (यही उनकी सबसे बड़ी प्रतिभा है ) । प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली १५/०९/२६