*चातुर्मास की एक अद्भुत घटना* नगर में चातुर्मास की घोषणा से चारों तरफ उत्साह का वातावरण था । आचार्य जी का नगर प्रवेश होने वाला था ,समाज ने पूरे नगर को दुल्हन की तरह सजा दिया था । सरकार ने भी स्वागत की पूरी व्यवस्था की थी । आचार्य श्री की ससंघ भव्य अगवानी हुई ,अगवानी में जिलाधिकारी,विधायक ,जैन विद्वान् ,नगर श्रेष्ठी आदि अन्यान्य गणमान्य लोग भी अग्रिम पंक्ति में उपस्थित थे । अगवानी के अनंतर धर्म सभा प्रारंभ हुई । समाज ने सर्व प्रथम पूरे संघ की अष्ट द्रव्य से पूजन की,सभी के सम्मान का कार्यक्रम भी था । आचार्य श्री ने समाज के अध्यक्ष को कुछ निर्देश दिए । समाज के अध्यक्ष ने सर्वप्रथम नगर में प्रतिदिन प्रवचन स्वाध्याय आदि करवाने वाले विद्वान् मनीषी जी को सम्मान हेतु मंच पर आमंत्रित किया और बहुत बहुमान के साथ उनका अभिनंदन किया और प्रशंसा की । इसके अनंतर जिलाधिकारी महोदय और विधायक जी का सम्मान बहुमान किया और सभा प्रारंभ हुई । सभी ने बहुत प्रेरक वक्तव्य दिए । अंत में जिलाधिकारी जी ने अपने महत्वपूर्ण भाषण में कहा *जो समाज पहले चारित्राधिकारी और ज्ञानाधिकारी का सम्मान बहुमान करती ...
परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष बहुत पुराना है । परम्पराएं जड़ से जोड़े रखती हैं लेकिन जड़ भी बनाती हैं और आधुनिकता बाह्य विकास तो देती है लेकिन जड़ से उखाड़ देती है । हम न ही जड़ होना चाहते हैं और न ही जड़ से उखाड़ना चाहते हैं । आधुनिकता को पूर्व के साथ निरंतरता बनाए रखने के लिए परंपरा और उसकी ऊर्जा चेतना की आवश्यकता होती है , इसलिए उसका लाभ लेने के लिए उसके साथ रहने की वकालत करती है और उसका हस्तक्षेप भी अपने लाभ के लिए चाहती है ,लेकिन कुछ समय बाद हस्तक्षेप के प्रक्रिया उल्टी हो जाती है । आधुनिकता अपनी शक्तिशाली शर्तों के अनुरूप परंपरा को ढालने का प्रयास करती है । परंपरा मजबूरी में क्षद्म आधुनिकता की शिकार होने लगती है ,उसे अपने वजूद की रक्षा के लिए भी आधुनिकता का सहारा चाहिए होता है और अपनी मूल जड़ को भी सुरक्षित रखने की जिद होती है । परंपरा से पहले समन्वय की बात से शुरुआत होती है और फिर वह विलय में तब्दील हो जाती है । आधुनिकता की जींस पेंट पहनकर ऊपर से परंपरा का कुर्ता पहन कर काम चलाना पड़ता है । और ज्यादा एडजेस्ट करना हो तो , धोती भी पेंट की तरह सिली सिलाई पहनकर ऊप...