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विद्यार्थियों से एक निवेदन

*विद्यार्थियों से एक निवेदन*        प्रो.अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली                                                १३/०७/२६ डिग्री धारण करना सिर्फ इसका पासपोर्ट है कि आप इंटरव्यू कक्ष में घुसने के लायक बने हैं , वहां विजय प्राप्त करने के लिए अच्छे ज्ञान और व्यक्तित्व के साथ कई तरह के कौशल की भी आवश्यकता होती है ।  डिग्री धारियों के पास काम नहीं है और काम देने वाले कहते हैं हमारे काम के लायक लोग नहीं हैं ।  मैं जब भी उत्साह विहीन ,लक्ष्य विहीन सिर्फ परीक्षा पास करने और डिग्री लेने के उद्देश्य से पढ़ने वाले विद्यार्थियों को देखता हूं तो उन्हें सलाह देने की इच्छा होती है कि तुम पढ़ाई लिखाई छोड़ क्यों नहीं देते ? क्यों अपना ,अपने मां बाप का समय और पैसा बर्बाद कर रहे हो ? कोई और काम-धाम देख लो ,वहां इतना समय और धन लगाओगे तो कहीं न कहीं पहुंच ही जाओगे ।  पढ़ाई करना है पर कुछ सीखने का जज़्बा नहीं है , phd की डिग्री चाहिए पर शोधकार्य के प्रत...
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चातुर्मास की एक अद्भुत घटना

*चातुर्मास की एक अद्भुत घटना* नगर में चातुर्मास की घोषणा से चारों तरफ उत्साह का वातावरण था । आचार्य जी का नगर प्रवेश होने वाला था ,समाज ने पूरे नगर को दुल्हन की तरह सजा दिया था । सरकार ने भी स्वागत की पूरी व्यवस्था की थी ।  आचार्य श्री की ससंघ भव्य अगवानी हुई ,अगवानी में जिलाधिकारी,विधायक ,जैन विद्वान्  ,नगर श्रेष्ठी आदि अन्यान्य गणमान्य लोग भी अग्रिम पंक्ति में उपस्थित थे । अगवानी के अनंतर धर्म सभा प्रारंभ हुई । समाज ने सर्व प्रथम पूरे संघ की अष्ट द्रव्य से पूजन की,सभी के सम्मान का कार्यक्रम भी था । आचार्य श्री ने समाज के अध्यक्ष को कुछ  निर्देश दिए । समाज के अध्यक्ष ने सर्वप्रथम नगर में प्रतिदिन प्रवचन स्वाध्याय आदि करवाने वाले विद्वान् मनीषी जी को सम्मान हेतु मंच पर आमंत्रित किया और बहुत बहुमान के साथ उनका अभिनंदन किया और प्रशंसा की । इसके अनंतर जिलाधिकारी महोदय और विधायक जी का सम्मान बहुमान किया और सभा प्रारंभ हुई । सभी ने बहुत प्रेरक वक्तव्य दिए । अंत में जिलाधिकारी जी ने अपने महत्वपूर्ण भाषण में कहा *जो समाज पहले चारित्राधिकारी और ज्ञानाधिकारी का सम्मान बहुमान करती ...

परंपरा और आधुनिकता

परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष बहुत पुराना है । परम्पराएं  जड़ से जोड़े रखती हैं लेकिन जड़ भी बनाती हैं और आधुनिकता बाह्य विकास तो देती है लेकिन जड़ से उखाड़ देती है । हम न ही जड़ होना चाहते हैं और न ही जड़ से उखाड़ना चाहते हैं । आधुनिकता को पूर्व के साथ निरंतरता बनाए रखने के लिए परंपरा और उसकी ऊर्जा चेतना की आवश्यकता होती है , इसलिए उसका लाभ लेने के लिए उसके साथ रहने की वकालत करती है और उसका हस्तक्षेप भी अपने लाभ के लिए चाहती है ,लेकिन कुछ समय बाद हस्तक्षेप के प्रक्रिया उल्टी हो जाती है । आधुनिकता अपनी शक्तिशाली शर्तों के अनुरूप परंपरा को ढालने का प्रयास करती है । परंपरा मजबूरी में क्षद्म आधुनिकता की शिकार होने लगती है ,उसे अपने  वजूद की रक्षा के लिए भी आधुनिकता का सहारा चाहिए होता है और अपनी मूल जड़ को भी सुरक्षित रखने की जिद होती है ।  परंपरा से पहले समन्वय की बात से शुरुआत होती है और फिर वह विलय में तब्दील हो जाती है ।  आधुनिकता की जींस पेंट पहनकर ऊपर से परंपरा का कुर्ता पहन कर काम चलाना पड़ता है । और ज्यादा एडजेस्ट करना हो तो , धोती भी पेंट की तरह सिली सिलाई पहनकर ऊप...

श्रुततीर्थ विरासत का रक्षक कौन है ?

  श्रुतपंचमी पर विशेष - श्रुततीर्थ विरासत   का रक्षक कौन है ? Prof Anekant Kumar Jain Dean – School of Philosophy Shri Lalbahadur Shastri National Sanskrit University New Delhi – 110016 प्रायः जब तीर्थ की चर्चा करते हैं तो हमारा ध्यान भी मात्र सम्मेदशिखर आदि तीर्थ स्थानों पर ही जाता है किन्तु यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि जैन परंपरा में ‘ श्रुतं गणधरा वा तीर्थमित्युच्यते’ ( भगवती आराधना / विजयोदया टीका 302/516/6) कहकर ‘श्रुत’ को तथा ‘तीर्थमागम:’ (समाधिशतक/   टी./ 2/222/24 ) कहकर ‘आगम’ आदि को भी उसी तरह तीर्थ स्वीकार किया गया है   । इतना ही नहीं बल्कि आचार्य कुंदकुंद यहाँ तक कहते हैं कि                     जं णिम्मलं सुधम्मं सम्मत्तं संजमं णाणं।                                  तं तित्थजिणमग्गे ...

जैन श्रमण संस्कृति का वास्तविक प्रतीक कौन ? भरत या बाहुबली ?

जैन परंपरा के तीर्थंकर ऋषभदेव का उल्लेख वेदों और वैदिक पुराणों में भी किया गया है । जैन विद्वानों ने जैन परंपरा की प्राचीनता इनके सामने सिद्ध करने के लिए इनके संदर्भ प्रचुर मात्रा में दिए ,अनेक ग्रंथ लिखे ,शोध पत्र लिखे । ये जो कार्य हुआ ,वह निश्चित ही प्रशंसनीय है किंतु  उसमें आज भी कई लेखक और पोस्टर निर्माता तक जैन आगम के संदर्भों को उल्लिखित या तो करते ही नहीं है या बहुत कम करते हैं । अभी ऋषभदेव जयंती पर भी जैन मीडिया प्लेटफॉर्म से कुछ वीडियो और रील फैलाए गए जिसमें सारे इंटरव्यू जैनेतर लोगों के थे ,मात्र जैनेतर प्रमाणों से भरपूर उस वीडियो को मैंने सराहना के साथ साथ सावधान भी किया था । उसमें एक दो जैन मुनियों और विद्वानों के वक्तव्य और जैन आगमों  के उद्धरण भी होने चाहिए थे ।  दिल्ली में एक चातुर्मास के  भव्य कार्यक्रमों में जिसमें बड़े बड़े नेता मंत्री आते रहे ,उन्हें भरत से भारत का एक बड़ा एलबम इसलिए भेंट किया गया ताकि वे अपने मंत्रालयों कार्यालयों घरों में उसे टांगें , उसमें भी जो श्लोक लिखा था वह श्रीमद्भागवत का ही था , किसी भी जैन शास्त्रों का इससे संबंधित कोई ...

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए  प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली  आजकल विचित्र किस्म का अवसाद चल रहा है । लोग आपसे बहुत तीव्रता से जुड़ते हैं जो अक्सर असहज होता है ,उन्हें आप रोक नहीं पाते ,कारण भी जान नहीं पाते,फिर यह सिलसिला कुछ वर्षों तक चलता है , उन रिश्तों में आप भी सामान्य और सहज नहीं रह पाते हैं ,थोड़ा बहुत जुड़ ही जाते हैं ।  फिर कुछ वर्षों में एक दिन अचानक उन्हीं लोगों का न जाने क्यों रुख बदल जाता है । जो इतने प्रिय हो रहे थे अचानक वे ही बहुत औपचारिक हो जाते हैं । पहले जैसे नहीं रह जाते ,बदल जाते हैं । और पूछने पर भी उसका कारण नहीं बताते , कोई भूल या गलत फहमी हो गई हो तो उसे तभी दूर किया जा सकता है जब उसकी चर्चा की जाय और उसे रेखांकित किया जाय ।  मिलते पहले जैसे ही हैं ,अभिवादन आदि भी करते हैं , कुछ नहीं, बस सब कुछ पहले जैसा नहीं रह जाता ।  इसी बीच पता चलता है एक बिचौलिया मध्य में आ गया , वह दोनों से जुड़ता है,और उन दोनों के मन में एक दूसरे के विरुद्ध एक नहीं हजार गलत फहमियां खड़ी करता है ।  और हम मान लेते हैं ,आपस में उसका स्पष्टी...

धर्म प्रवचन /शास्त्र स्वाध्याय /पाठशाला/ शिविर आदि का प्रचार क्यों जरूरी है ?

*धर्म प्रवचन /शास्त्र स्वाध्याय /पाठशाला/ शिविर आदि का प्रचार क्यों जरूरी है ?* प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली  अक्सर ऐसा देखा जाता है कि धर्म के क्षेत्र की अन्य क्रियाएं जैसे पंचकल्याणक,विधान,शोभा यात्रा,जयंती आदि अनेक गतिविधियों का प्रचार प्रसार बहुत जोर शोर से किया जाता है । उसमें भीड़ एकत्रित करने के लिए अन्यान्य स्थानों से नियमित बसें आदि भी चलवाई जाती हैं । टीवी चैनलों अखबारों पर उसके विज्ञापन प्रकाशित होते हैं । इन सबके लिए बहुत व्यय भी किया जाता है । तब जाकर ये कार्यक्रम सफल होते हैं । किंतु यदि कहीं नियमित शास्त्र स्वाध्याय और कक्षा प्रवचन,ज्ञान शिविर,पाठशाला आदि चल रहे हों तो उसका प्रचार प्रसार उसका विज्ञापन तो छोड़ो कभी कभी मंदिर जी के सूचना बोर्ड पर उसकी सूचना भी नहीं लिखी होती है । कभी कभी वहां माइक आदि की व्यवस्था तक भी नहीं बन पाती है ।  विचार करें ! जब संसार के विषय भोग की सामग्री जैसे वस्त्र,भोजन,सोना,चांदी , सौन्दर्य प्रोडक्ट, मनोरंजन, कषाय  वृद्धि के अन्य संसाधन,  जिनके अनादि से गहन संस्कार हैं उनके लिए भी लाखों करोड़ों विज्ञापन में ...

भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में जैनधर्म, साहित्य और संस्कृति का योगदान

भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में       जैनधर्म, साहित्य और संस्कृति का                         योगदान                 प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी,      (राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित), पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, जैनदर्शन विभाग, सम्पूर्णानन्द संस्कृतविश्वविद्यालय,वाराणसी।          पृष्ठभूमि— वर्तमान केंद्रीय सरकार ने अपने भारत देश के प्राचीन मूलभूत मूल्यों, इसकी बहुमूल्य विरासत. संस्कृति और उपेक्षित हो रहीं अपनी पहचान एवं अक्षय ज्ञाननिधि के संरक्षण, संवर्धन और इन सबकी पुनः स्थापना हेतु काफ़ी गंभीरता से कार्य कर रही है. इसीलिए भारतीय ज्ञान परम्परा,इस पर आधारित शैक्षिक पाठ्यक्रमों का निर्माण तथा भारतीय संस्कृति का तथ्यों पर आधारित इतिहास का लेखनकार्य–ये सभी कार्य नव क्रांति के रूप में कार्यान्वित हो रहे हैं. इससे देशवासियों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति स्वाभिमान युक्त आशा का संचार हुआ है. सरकार की नीति सबके प्रति समान ह...

जैन धर्म के होने वाले हैं दो नए भेद

क्या जैन धर्म के होने वाले हैं दो नए भेद ? प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली  १२/०४/२६ दुनिया में प्रायः धर्म, दर्शन और अध्यात्म इन तीनों को अलग अलग मानकर पढ़ाया और समझाया जाता रहा है। मानो धर्म, पूजा पाठ और अनुष्ठानों का विषय हो और दर्शन अध्यात्म केवल विचारकों की बौद्धिक चर्चा। किंतु जैन परंपरा की यह विशेषता रही है कि यहाँ यह विभाजन संभव नहीं है। यहाँ धर्म, दर्शन और अध्यात्म परस्पर पूरक हैं। आप चाहें तो भी इनके पवित्र संबंधों को छिन्न भिन्न नहीं कर सकते । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र रूप रत्नत्रय में ही जैन धर्म का वास्तविक स्वरूप निहित है। दर्शन के बिना धर्म कर्मकांड बन जाता है और धर्म के बिना दर्शन  अध्यात्म केवल बौद्धिक व्यायाम रह जाता है। आज की भाषा में मैं जैनदर्शन को ' ट्रिपल AAA ' के सिद्धांत के साथ प्रचारित करना चाहता हूँ जिसे मैंने डॉ.मेधावी जैन के साथ Dharma for life में अपने एक पॉडकास्ट धर्म दर्शन और विज्ञान में बखूबी व्याख्यायित किया है । यह है अहिंसा ,अनेकांत और अकर्त्तावाद । अब अपरिग्रह को अहिंसा के अंतर्गत की समझाएंगे । लेकिन तीसरा ...

राजेंद्र के शेखर जी का पत्र

णमोकार,नमोकार या नवकार मंत्र ? संशय क्यों ?

*णमोकार,नमोकार या नवकार मंत्र ? संशय क्यों ?* Prof Anekant Kumar Jain , New Delhi  9 अप्रैल 2025 में सर्वप्रथम सम्पूर्ण विश्व में णमोकार मंत्र का अभूतपूर्व सामूहिक उच्चारण किया गया था ।इस वर्ष भी उसे उसी उत्साह से 9 अप्रैल को ही मनाया गया ।   JITO द्वारा आयोजित इस सराहनीय पहल का अनुमोदन करते हुए 9 अप्रैल 2025 में प्रधानमंत्री जी ने विज्ञान भवन से अद्भुत संबोधन भी दिया था।  निःसंदेह यह आयोजन अत्यंत प्रशंसनीय ,अनुकरणीय और अभूतपूर्व था । इतने विशाल आयोजन में गौरवपूर्ण अनुभूति के साथ साथ आम जन में एक संशय यह बना रहा कि सभी पोस्टरों में इसे ' नवकार दिवस' क्यों कहा गया जब कि मंत्र का नाम णमोकार मंत्र है ।  णमोकार,नमोकार या नवकार - इन तीनों का अर्थ एक ही है और वह है - नमस्कार ।  शौरसेनी(दिगम्बर) आगम में णमोकार शब्द मिलता है ।  अर्धमागधी(श्वेताम्बर) आगम में नमोकार शब्द मिलता है । बाद में कुछ प्राकृत और अपभ्रंश साहित्य में इसे ही नवकार शब्द से कहा है । प्राकृत और अपभ्रंश भाषा के कुछ विशेष नियमों के कारण यह परिवर्तन और पाठ भेद हमें मिलते हैं । यही कारण है कि अपभ...