*धर्म प्रवचन /शास्त्र स्वाध्याय /पाठशाला/ शिविर आदि का प्रचार क्यों जरूरी है ?* प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली अक्सर ऐसा देखा जाता है कि धर्म के क्षेत्र की अन्य क्रियाएं जैसे पंचकल्याणक,विधान,शोभा यात्रा,जयंती आदि अनेक गतिविधियों का प्रचार प्रसार बहुत जोर शोर से किया जाता है । उसमें भीड़ एकत्रित करने के लिए अन्यान्य स्थानों से नियमित बसें आदि भी चलवाई जाती हैं । टीवी चैनलों अखबारों पर उसके विज्ञापन प्रकाशित होते हैं । इन सबके लिए बहुत व्यय भी किया जाता है । तब जाकर ये कार्यक्रम सफल होते हैं । किंतु यदि कहीं नियमित शास्त्र स्वाध्याय और कक्षा प्रवचन,ज्ञान शिविर,पाठशाला आदि चल रहे हों तो उसका प्रचार प्रसार उसका विज्ञापन तो छोड़ो कभी कभी मंदिर जी के सूचना बोर्ड पर उसकी सूचना भी नहीं लिखी होती है । कभी कभी वहां माइक आदि की व्यवस्था तक भी नहीं बन पाती है । विचार करें ! जब संसार के विषय भोग की सामग्री जैसे वस्त्र,भोजन,सोना,चांदी , सौन्दर्य प्रोडक्ट, मनोरंजन, कषाय वृद्धि के अन्य संसाधन, जिनके अनादि से गहन संस्कार हैं उनके लिए भी लाखों करोड़ों विज्ञापन में ...
भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में जैनधर्म, साहित्य और संस्कृति का योगदान प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी, (राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित), पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, जैनदर्शन विभाग, सम्पूर्णानन्द संस्कृतविश्वविद्यालय,वाराणसी। पृष्ठभूमि— वर्तमान केंद्रीय सरकार ने अपने भारत देश के प्राचीन मूलभूत मूल्यों, इसकी बहुमूल्य विरासत. संस्कृति और उपेक्षित हो रहीं अपनी पहचान एवं अक्षय ज्ञाननिधि के संरक्षण, संवर्धन और इन सबकी पुनः स्थापना हेतु काफ़ी गंभीरता से कार्य कर रही है. इसीलिए भारतीय ज्ञान परम्परा,इस पर आधारित शैक्षिक पाठ्यक्रमों का निर्माण तथा भारतीय संस्कृति का तथ्यों पर आधारित इतिहास का लेखनकार्य–ये सभी कार्य नव क्रांति के रूप में कार्यान्वित हो रहे हैं. इससे देशवासियों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति स्वाभिमान युक्त आशा का संचार हुआ है. सरकार की नीति सबके प्रति समान ह...