सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार का उद्देश्य प्रो.अनेकांत कुमार जैन सर्वविशुद्ध ज्ञानाधिकार का मूल उद्देश्य आत्मा के ऐसे शुद्ध स्वरूप को बताना है , जो जीव को परद्रव्य और परभाव के मोह से मुक्त कर उसके ही निज ज्ञायक स्वभाव में उसे स्थित कर सके । आत्मा का वास्तविक स्वरूप ज्ञान और चेतना है , कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं। जब तक जीव अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं पहचानता , तब तक वह शरीर , कर्म , राग , द्वेष , सुख और दुःख के भावों में तादात्म्य स्थापित करके स्वयं को कर्ता और भोक्ता मानता रहता है। आचार्य कुन्दकुन्द स्वर्ण और कटक आदि आभूषणों का दृष्टान्त देकर समझाते हैं कि जैसे स्वर्ण अपने कंगन , कुण्डल आदि पर्यायों से अभिन्न है , वैसे ही प्रत्येक द्रव्य ...
*महात्मा गांधी का जिनवाणी प्रेम* महात्मा गांधी और जैन धर्म का संबंध केवल अहिंसा की अवधारणा तक सीमित नहीं था। जैन साधना, जैन शास्त्र, जैन साहित्य और जैन विद्वानों के प्रति उनके मन में गहरी आत्मीयता और श्रद्धा थी। उनके अपने शब्दों में जैन धर्म और जैन समाज के प्रति व्यक्त भाव इस संबंध के एक महत्त्वपूर्ण पक्ष को सामने रखते हैं। मुंबई में आयोजित एक जैन कॉन्फ्रेंस में महात्मा गांधी ने एक व्याख्यान प्रस्तुत किया था। उस अवसर पर उन्होंने जैन धर्म और जैन समाज के प्रति अपनी आत्मीयता व्यक्त करते हुए कहा था- *मेरे लिए तो मुक्ति का दरवाजा अहिंसा धर्म का पलना है। मुझ पर जैन भाइयों की इस कदर कृपादृष्टि है कि मुझको उनकी लेना देनी है। भारतवर्ष में एक सगे भाई के समान भाईबंदी के साथ रहने का दावा जैन ही कर सकते हैं।* आगे उन्होंने कहा। *मेरे परम मित्र डॉक्टर प्राणजीवन जैन हैं, जिनके चरित्र का मुझको सम्मान है। रायचंद भाई मेरे मित्र थे और शहर मुंबई में मेरे रहने का जो स्थान है, वह भी एक देवाशंकर जैन भाई का है। सफर के मध्य मुझे बहुत से जैन भाइयों से अक्सर वास्ता पड़ा है और बहुत से उस समय मुझसे पूछते हैं कि क्य...