रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली आजकल विचित्र किस्म का अवसाद चल रहा है । लोग आपसे बहुत तीव्रता से जुड़ते हैं जो अक्सर असहज होता है ,उन्हें आप रोक नहीं पाते ,कारण भी जान नहीं पाते,फिर यह सिलसिला कुछ वर्षों तक चलता है , उन रिश्तों में आप भी सामान्य और सहज नहीं रह पाते हैं ,थोड़ा बहुत जुड़ ही जाते हैं । फिर कुछ वर्षों में एक दिन अचानक उन्हीं लोगों का न जाने क्यों रुख बदल जाता है । जो इतने प्रिय हो रहे थे अचानक वे ही बहुत औपचारिक हो जाते हैं । पहले जैसे नहीं रह जाते ,बदल जाते हैं । और पूछने पर भी उसका कारण नहीं बताते , कोई भूल या गलत फहमी हो गई हो तो उसे तभी दूर किया जा सकता है जब उसकी चर्चा की जाय और उसे रेखांकित किया जाय । मिलते पहले जैसे ही हैं ,अभिवादन आदि भी करते हैं , कुछ नहीं, बस सब कुछ पहले जैसा नहीं रह जाता । इसी बीच पता चलता है एक बिचौलिया मध्य में आ गया , वह दोनों से जुड़ता है,और उन दोनों के मन में एक दूसरे के विरुद्ध एक नहीं हजार गलत फहमियां खड़ी करता है । और हम मान लेते हैं ,आपस में उसका स्पष्टी...
क्या जैन धर्म के होने वाले हैं दो नए भेद ? प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली १२/०४/२६ दुनिया में प्रायः धर्म, दर्शन और अध्यात्म इन तीनों को अलग अलग मानकर पढ़ाया और समझाया जाता रहा है। मानो धर्म, पूजा पाठ और अनुष्ठानों का विषय हो और दर्शन अध्यात्म केवल विचारकों की बौद्धिक चर्चा। किंतु जैन परंपरा की यह विशेषता रही है कि यहाँ यह विभाजन संभव नहीं है। यहाँ धर्म, दर्शन और अध्यात्म परस्पर पूरक हैं। आप चाहें तो भी इनके पवित्र संबंधों को छिन्न भिन्न नहीं कर सकते । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र रूप रत्नत्रय में ही जैन धर्म का वास्तविक स्वरूप निहित है। दर्शन के बिना धर्म कर्मकांड बन जाता है और धर्म के बिना दर्शन अध्यात्म केवल बौद्धिक व्यायाम रह जाता है। आज की भाषा में मैं जैनदर्शन को ' ट्रिपल AAA ' के सिद्धांत के साथ प्रचारित करना चाहता हूँ जिसे मैंने डॉ.मेधावी जैन के साथ Dharma for life में अपने एक पॉडकास्ट धर्म दर्शन और विज्ञान में बखूबी व्याख्यायित किया है । यह है अहिंसा ,अनेकांत और अकर्त्तावाद । अब अपरिग्रह को अहिंसा के अंतर्गत की समझाएंगे । लेकिन तीसरा ...