*वर्तमान का टीचर डरते हुए देता है निडरता का लेक्चर* बहुत हुई शिक्षक दिवस की बधाइयां । आज शिक्षक दिवस पर हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि डरता हुआ शिक्षक निडर पीढ़ी नहीं बना सकता और भय के अधीन शिक्षा स्वतंत्र समाज का निर्माण नहीं कर सकती। विचार कीजिए कि जो शिक्षक अपनी आजीविका की सुरक्षा के कारण सच बोलने से डरता है, वह विद्यार्थियों को सत्य के लिए खड़े होने का साहस कितने समय तक सिखा पाएगा? प्रशासन को भी सिर्फ शिक्षा की व्यवस्था करना चाहिए, कभी भी शिक्षक / विचारक/ विद्वान् की चेतना को नियंत्रित नहीं करना चाहिए। देश में यह तय करना चाहिए कि शिक्षक केवल आदेशों का पालन करने वाला कर्मचारी बनकर न रहे । वह विचारक बने, प्रश्नकर्ता बने और समाज के विवेक का प्रतिनिधि बने। यदि शिक्षक /विचारक / विद्वान् भी किसी आग्रह , विचारधारा या शक्ति के नियंत्रण में रहेगा तो समाज में कौन सा वर्ग बचेगा जो सही गलत का भेद दिखलायेगा ? सही दिशा बतलाएगा ? शिक्षक कमजोर होगा तो समाज कमजोर होगा, समाज कमजोर होगा तो राष्ट्र कमजोर होगा । आज स्थिति यह है कि शिक्षक समाज में वह वैचारिक ऊर्जा और परि...
उत्थापकयन्त्रं(lift)स्थापयन्तु, सोपानानि(Stairs)तु मा विनाशयन्त (क्वचित् ‘समर्थ’-पोर्टलस्य कारणेन संस्कृतविद्यासंरक्षणस्य स्वप्नमेव असमर्थं न भवेत्) - आचार्यः अनेकान्तकुमारजैनः शिक्षाक्षेत्रे सुधारस्य दिशि अङ्कीकरणम् (Digitalisation) अन्तर्जालाधारितव्यवस्था च निःसन्देहं क्रान्तिकारी पदक्षेपः। एताभ्यां पारदर्शिता वर्धिता, अभिलेखाः सुरक्षिताः जाताः, समयस्य संरक्षणं अभवत्, अनेकप्रकाराणाम् अनियमिततानामपि नियन्त्रणं सम्भवम् अभवत्। शासनस्य प्रयोजनमपि तदेव यत् प्रत्येकं विद्यार्थिनं समानः अवसरः प्राप्नुयात् तथा प्रवेशप्रक्रिया सरला, निष्पक्षा, पारदर्शिनी च भवेत्। अतः अस्मिन् दृष्टिकोणे अङ्कीकरणाधारितव्यवस्थायाः स्वागतमेव कर्तव्यम्। किन्तु कस्यापि व्यवस्थायाः सफलता तेनैव ज्ञायते यत् सा व्यवहारभूमौ कियत् उपयोगिनी सिद्ध्यति। समस्या अङ्कीकरणे नास्ति। समस्या तदा आरभते यदा काचित् व्यवस्था विकल्परूपेण न स्थाप्यते, अपितु अनिवार्या क्रियते, तया सह सम्बद्धा मानवीयव्यवस्था च सम्पूर्णतया निराक्रियते। संस्कृतस्य पारम्परिकशिक्षा अस्याः स्थितेः सर्वश्रेष्ठम् उदाहरणम् अस्ति। अद्य सामान्यतः विद्यार्थिनः रोजगा...