🪔*दीपक कहता है*...... *जोइक्खो गिलइ तमं तं चिय उग्गिलइ कज्जलमिसेणं।* *अहवा सुद्धसहावा हियए कलुसं न धारेति॥* (जयवल्लभ ‘वज्जालग्गं’, गाथा 776) 🪔 ज्योतिष्को गिलति तमस्तदेवोद्गिरति कज्जलमिषात्। अथवा शुद्धस्वभावा हृदि कलुषं न धारयन्ति॥ 🪔🪔🪔🪔 ( संस्कृत छायानुवाद रत्नदेव(1337 ई. )) अर्थात् ,ज्योतिष्क अथवा दीपक अंधकार को अपने भीतर निगल जाता है और उसी अंधकार को काजल के रूप में बाहर उगल देता है। स्वयं जलकर, स्वयं को तिल-तिल गलाकर वह चारों ओर प्रकाश बिखेर देता है अथवा, जिनका स्वभाव शुद्ध और निर्मल होता है, वे अपने हृदय में किसी प्रकार की मलिनता नहीं रखते। भाव यह है कि संसार का अंधकार अपने भीतर समाहित करने पर भी सज्जन व्यक्ति अपने हृदय की निर्मलता नहीं खोता। *अहिंसा का सन्देश* ...
*सत्य की खोज और मोह का नाश* प्रो.अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली १/११/२०२६ सत्य की खोज तो भव्य जीवों के किसी भी उम्र में शुरू हो सकती है ,लेकिन वृद्धावस्था में जीवन के सारे सांसारिक अनुभव चख लेने के बाद वास्तविक अर्थों में जीवन का रहस्य समझना चाहता है तो उसे समझाना ज्यादा कठिन नहीं होता क्यों कि आधे से अधिक ज्ञान तो उसे जीवन के कटु अनुभवों से प्रायोगिक तौर पर भी हो चुका होता है । वृद्धा अवस्था में भी चेतना जाग जाये - यह भी सौभाग्य है ,अन्यथा अन्यान्य तो विषय भोगों की तृष्णा में ही बुढ़ापा काटते है और उसी में तड़प कर मर जाते हैं । *एक बुजुर्ग साधर्मी भाई ने पूछा है कि मोह का क्षय कैसे करें ? कोई शॉर्ट कट बताओ ?* उन्होंने फोन पर तीन चार प्रश्न किए हैं और उसके समाधान देने का मैंने अपनी अल्प प्रज्ञा और अनुभव से प्रयास किया है ,जिन्हें सभी के हितार्थ मैं लिखने का प्रयास कर रहा हूं - *मेरे दुखों का मूल कारण क्या है ?* मोह ही असली दुख का कारण है और मोह का क्षय ही आत्म शांति की महत्त्वपूर्ण साधना है. *मोह का कारण क्या है ?* अज्ञानता ...