सादर प्रकाशनार्थ *लिफ़्ट लगाइये, पर सीढ़ियाँ खत्म करके नहीं* ( कहीं समर्थ में असमर्थ न हो जाए संस्कृत विद्या संरक्षण का स्वप्न ) - आचार्य अनेकांत कुमार जैन शिक्षा सुधार की दिशा में डिजिटलीकरण और ऑनलाइन व्यवस्था निश्चय ही एक क्रांतिकारी कदम है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है, अभिलेख सुरक्षित हुए हैं, समय की बचत हुई है और अनेक प्रकार की अनियमितताओं पर भी नियंत्रण लगा है। सरकार का उद्देश्य भी यही है कि प्रत्येक विद्यार्थी को समान अवसर मिले और प्रवेश प्रक्रिया सरल, निष्पक्ष तथा पारदर्शी बने। इस दृष्टि से डिजिटल व्यवस्था का स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन हर व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह जमीन पर कितनी उपयोगी सिद्ध हो रही है। समस्या डिजिटलीकरण नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब किसी व्यवस्था को विकल्प के रूप में न रखकर अनिवार्य बना दिया जाता है और उसके साथ चलने वाली मानवीय व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाता है। संस्कृत की पारंपरिक शिक्षा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज सामान्यतः विद्यार्थियों का झुकाव रोजगारपरक विषयों की ओर अधिक है। संस्कृत, प्राकृत, दर्शन...
*विद्यार्थियों से एक निवेदन* प्रो.अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली १३/०७/२६ डिग्री धारण करना सिर्फ इसका पासपोर्ट है कि आप इंटरव्यू कक्ष में घुसने के लायक बने हैं , वहां विजय प्राप्त करने के लिए अच्छे ज्ञान और व्यक्तित्व के साथ कई तरह के कौशल की भी आवश्यकता होती है । डिग्री धारियों के पास काम नहीं है और काम देने वाले कहते हैं हमारे काम के लायक लोग नहीं हैं । मैं जब भी उत्साह विहीन ,लक्ष्य विहीन सिर्फ परीक्षा पास करने और डिग्री लेने के उद्देश्य से पढ़ने वाले विद्यार्थियों को देखता हूं तो उन्हें सलाह देने की इच्छा होती है कि तुम पढ़ाई लिखाई छोड़ क्यों नहीं देते ? क्यों अपना ,अपने मां बाप का समय और पैसा बर्बाद कर रहे हो ? कोई और काम-धाम देख लो ,वहां इतना समय और धन लगाओगे तो कहीं न कहीं पहुंच ही जाओगे । पढ़ाई करना है पर कुछ सीखने का जज़्बा नहीं है , phd की डिग्री चाहिए पर शोधकार्य के प्रत...