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संदेश

Dr Hemchand Jain Hem

Respected Pandit ji  sadar charan sparsh 🙏🙏🙏 Thank you very much for your kind and encouraging words. I am truly grateful for your warm congratulations and blessings on my appointment as Dean at L.B.S. New Delhi. I am also thankful for your appreciation of my composition on the sacred Namoskar Mahamantra. Your mention of the earlier work by Dr. Nemi Chand Ji Shastri is valuable, and I deeply respect the contributions made by such eminent scholars. If my work is considered meaningful, it is only due to the inspiration received from our rich scholarly and spiritual tradition. I also fondly remember that about fifteen years ago, when my critical article on revered Dadaji titled “डॉ हुकुमचंद भारिल्ल होने के मायने "  was published in Jainpath Pradarshak and Samanvaya Vani, you had encouraged me then as well. Such thoughtful encouragement from a senior and distinguished scholar like you has always been a great source of motivation for me. Your good wishes mean a lot t...
हाल की पोस्ट

महावीर और बुद्ध : मीडिया की अज्ञानता से युद्ध

महावीर और बुद्ध  : मीडिया की अज्ञानता से युद्ध  Anekant Kumar Jain  यह सचमुच आश्चर्य का विषय है कि आज के समय में, जब सूचना और ज्ञान के असंख्य साधन उपलब्ध हैं, तब भी अनेक मीडिया हाउस और पत्रकार तीर्थंकर महावीर और भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं और चित्रों में अंतर नहीं कर पाते, या शायद जानबूझकर नहीं करना चाहते। महावीर जयंती जैसे पवित्र और विशिष्ट अवसरों पर भी कई बार बुद्ध की तस्वीरें प्रकाशित, प्रचारित और प्रसारित कर दी जाती हैं। यह केवल एक सामान्य भूल मानकर टाल देने योग्य बात नहीं है, क्योंकि यह गलती एक-दो बार नहीं बल्कि वर्षों से बार-बार दोहराई जा रही है। यदि इसे महज अज्ञानता या भ्रम कहा जाए, तब भी यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसा उलटा उदाहरण शायद ही कभी देखने में क्यों नहीं आता कि बुद्ध जयंती के अवसर पर तीर्थंकर महावीर के चित्र प्रकाशित किए जाएँ। यही कारण है कि अब यह संदेह भी उठने लगा है कि कहीं यह कोई सुनियोजित उपेक्षा या षड़यंत्र तो नहीं, क्योंकि लंबे समय से इस विषय पर मीडिया का ध्यान आकृष्ट कराया जा रहा है, फिर भी गलती लगातार दोहराई जा रही है। फिर भी संतुलित द...

रिसर्च एक कला है जिसे सभी नहीं कर सकते

रिसर्च एक कला है जिसे सभी नहीं कर सकते प्रो.अनेकांत कुमार जैन शिक्षा में जिस चीज को अनिवार्य किया जाता है एक दिन उसका ही बाजार बन जाता है फिर चाहे शोध पत्र का प्रकाशन हो किसी ग्रंथ का प्रकाशन हो या फिर शोध प्रबंध /पी एचडी  हो ! जैसे हर कोई बांसुरी नहीं बजा सकता, तबला नहीं बजा सकता कत्थक नहीं कर सकता , कविता नहीं लिख सकता, अभिनय नहीं कर सकता ,क्यों कि प्रत्येक व्यक्ति की फितरत अलग-अलग होती है जरूरी नहीं कि शिक्षा से जुड़े सभी लोग शोध कर ही लें या उनकी अभिरुचि शोध में हो ही ,क्योंकि शोध एक कला है उसके लिए एक जज्बा एक इच्छा और कुछ कर गुजरने की तमन्ना बहुत आवश्यक होती है तभी समर्पण भी जीवन में आता है ।   इनके बिना जो भी शोध होता है वह शोध नहीं होता है वह संकलन होता है वहां शोध की गुणवत्ता का दूर-दूर तक नामो निशान तक नहीं होता । जब तक शोध एक कला की तरह है तब तक उसकी गरिमा बरकरार रहती है लेकिन जब उसे अनिवार्य तत्व बना दिया जाता है अर्थात बिना उसके नियुक्ति नहीं प्रमोशन नहीं तब वह मजबूरी भी बन जाता है और लोग जिन्हें शोध में रुचि नहीं है समर्पण नहीं है वह मजबूरी में ...

AI के दौर में दिगम्बर जैन साधना और डिजिटल सेंसरशिप

AI के दौर में दिगम्बर जैन साधना और डिजिटल सेंसरशिप प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली  अभी हाल ही में महावीर जयंती के अवसर पर मीडिया और सरकारी विज्ञापनों में वस्त्र (विशेष कर धोती)सहित भगवान् महावीर का चित्र प्रकाशित कर बधाइयां दी गई । इसके साथ साथ अजैन तो छोड़िए कई जैन बंधुओं ने भी महावीर की जगह बुद्ध की फोटो लगा कर महावीर जयंती की बधाइयां दीं ।अपने प्रचार की भूख में अज्ञानता और प्रमाद इस कदर हावी है कि क्या लिख रहे हैं क्या छाप रहे हैं इसका भी होश नहीं है ।  सांध्य महालक्ष्मी अखबार ने पहली बार एक लेख में AI और प्राचीन दिगम्बर जैन परंपरा से जुड़ी इन्हीं समस्याओं से संबंधित एक लेख पढ़ कर प्रसन्नता हुई कि वे एक पत्रकारिता का कर्त्तव्य भी सही तरीके से निभा रहे हैं।  वास्तविकता यह है कि आज दुनिया तेजी से Artificial Intelligence और सोशल मीडिया के युग में प्रवेश कर चुकी है। इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने जानकारी को वैश्विक स्तर पर फैलाने का अभूतपूर्व माध्यम प्रदान किया है। लेकिन तकनीकी प्रगति के साथ-साथ कुछ ऐसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं, जिनका संबंध सांस्कृतिक और...

भगवान् महावीर का संदेश : “जानो और जाने दो”

भगवान् महावीर का संदेश : “जानो और जाने दो” प्रो अनेकांत कुमार जैन भगवान् महावीर का संदेश “जियो और जीने दो” विश्वभर में अहिंसा और सह-अस्तित्व के सिद्धांत के रूप में प्रसिद्ध हुआ। किंतु उनके उपदेशों में एक और अत्यंत गहन आध्यात्मिक सूत्र मिलता है—“जानो और जाने दो”। यह संदेश मनुष्य को जीवन के प्रति सही दृष्टि देता है और आत्मा की वास्तविक प्रकृति को समझने का मार्ग दिखाता है। जैन दर्शन के अनुसार संसार में अनंत प्रकार के पदार्थ, परिस्थितियाँ और अनुभव उपस्थित हैं। मनुष्य का स्वभाव प्रायः यह होता है कि वह इन पदार्थों को केवल जानता ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़ भी जाता है। यही जुड़ाव या आसक्ति दुःख और बंधन का कारण बनती है। भगवान् महावीर ने इसलिए यह स्पष्ट किया कि संसार के पदार्थों के प्रति केवल ज्ञान होना चाहिए, आसक्ति नहीं। अर्थात् उन्हें जानो, समझो, परंतु उनसे अपने मन को बाँधो मत; उन्हें जाने दो। “जानो” का अर्थ है—वस्तुओं, परिस्थितियों और भावों के वास्तविक स्वरूप को समझना। जीवन में अच्छे और बुरे, दोनों प्रकार के अनुभव आते हैं। जैन दर्शन यह नहीं कहता कि उनसे आँखें बंद कर ली जाएँ; बल्...

महावीर जयंती का बदलता स्वरूप

महावीर जयंती का बदलता स्वरूप  प्रो अनेकांत कुमार जैन  कभी महावीर जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि विचारों का पर्व भी हुआ करती थी। उस दिन मंच सजते थे—केवल पूजा के लिए नहीं, बल्कि चिंतन के लिए भी। नगर के जैन और जैनेतर विद्वान, साहित्यकार, कवि, बुद्धिजीवी, नेता—सभी एकत्र होकर भगवान महावीर के जीवन, उनके दर्शन, अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत के गूढ़ संदेशों पर मंथन करते थे।बाद में उनके विचार छपते थे जो संदर्भ बनते थे ।  आज दृश्य बदल गया है। महावीर जयंती अब अधिकतर पूजन-अभिषेक, झूलनोत्सव, प्रभात फेरी और सामूहिक भोज तक सिमटती जा रही है। उत्सव है—पर विमर्श नहीं। श्रद्धा है—पर संवाद नहीं। आस्था है—पर आत्ममंथन कहीं खो गया है। क्या यह विडंबना नहीं कि जिन भगवान महावीर ने हमें सोचने, प्रश्न करने और सत्य की खोज का मार्ग दिखाया, उनके ही जन्मोत्सव पर हम विचार करना छोड़ बैठे हैं? क्या हम उनके दर्शन को जी रहे हैं, या केवल परंपराओं को निभा रहे हैं? समय की मांग है कि हम इस प्रवृत्ति पर पुनर्विचार करें। महावीर जयंती को फिर से “विचार जयंती” बनाएं—जहाँ मंचों पर केवल भजन नहीं, बल्कि बहस ह...

पहले आत्मा से मिलना चाहिए

पहले आत्मा से मिलना चाहिए  प्रो अनेकान्त कुमार जैन ,नई दिल्ली  मनुष्य को समय-समय पर अपने भीतर की ओर भी लौटना चाहिए। यदि उसे अनुभव हो कि वह धीरे-धीरे बाह्य जगत से दूरी बना रहा है, तो उसे इसे तुरंत दुर्बलता नहीं मानना चाहिए। कई बार यह दूरी आत्मा की पुकार होती है—शुद्धात्म की ओर लौटने की एक सूक्ष्म प्रेरणा। जब बाह्य चेतना संबंधों, अपेक्षाओं और भूमिकाओं में अत्यधिक उलझ जाती है, तब आंतरिक चेतना थक जाती है। उस समय आत्मानुभव की साधना की आवश्यकता होती है ताकि हम नई ऊर्जा और उत्साह से भर सकें । गहरे एकांत और आत्मानुभव का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम अपने दैनिक कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन हो जाएं । जो सच्चे आत्मानुभवी थे उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया । बल्कि उन्होंने बाह्य कार्य अधिक कुशलता और ऊर्जा के साथ सफलता पूर्वक संपादित किये बिना चेहरे पर शिकन लाये । आसक्त मनुष्य बाह्य कार्यो को कुशलता पूर्वक करता है और अनासक्त मनुष्य बाह्य कार्यों में शिथिलता या उदासीनता रखता है - यह हमने गलत अवधारणा विकसित की है । बाहर की अस्तव्यस्तता अंदर की अस्तव्यस्तता की द्योतक भी होत...

The Vīra Nirvāṇa Saṁvat: Ancient India's Oldest Calendar System

The Vīra Nirvāṇa Saṁvat: Ancient India's Oldest Calendar System In the rich tapestry of India's chronological traditions, one calendar system stands as a testament to the antiquity of Jain civilization yet remains relatively unknown in mainstream historical discourse. The Vīra Nirvāṇa Saṁvat, commemorating the spiritual liberation of 24th Tȋrthankara Bhagwān Mahāvīra, represents not merely a method of time-reckoning but a profound marker of cultural continuity that predates many of the world's most recognized calendrical systems. Recent archaeological discoveries and epigraphic evidence have brought renewed attention to this ancient era, challenging conventional assumptions about the development of systematic time-keeping in the Indian subcontinent. Historical Origins and Establishment Teerthankar Mahaveera attained Nirvāṇa (spiritual salvation) on the New Moon of Kartik Krishna month, coinciding with what is now celebrated as Diwali, in 527 BCE. The following day, Kartik S...

हमारी समीक्षाएं आलोचनाएं और कषाय

हमारी समीक्षाएं आलोचनाएं कब कषाय में परिवर्तित हो जाती हैं हमें स्वयं ही पता नहीं लगता ।  गुरुदेव और  दादा जी से हमने कुछ नहीं सीखा । सोनगढ़ में वर्तमान संतों का समागम होने पर वे स्वयं अगवानी हेतु जाते थे , साथ में बैठ कर प्रवचन करते थे । जिनके चित्र मुमुक्षु समाज को अपने अपने मंदिरों और स्वाध्याय भवनों में बड़े बड़े करके लगाने चाहिए । दादा जी ने भी हमेशा यही नीति अपनाई । अनेक पूज्य दिगम्बर संतों की अगवानी स्मारक में हुई है ।  समीक्षाएं अपनी जगह हैं , व्यवहार अपनी जगह । वर्तमान में सबसे बड़ा मिथ्यात्व है -  कट्टरता ,जो हर धर्म और पंथ को उसकी मूल भावना से भटकाती रही है । कभी आत्म निरीक्षण करना चाहिए कि हम किस तरह के समाज की कल्पना कर रहे हैं ? और उसे कहाँ ले जा रहे हैं ? आश्चर्य है कि ' संत साधु बन के विचरुं,वह घड़ी कब आएगी' की भावना और भजन गाने वाला एक मुमुक्षु वर्तमान में नग्न दिगम्बर मुद्रा को देखने मात्र से नफ़रत और कषाय में डूब जाता है । उनके प्रति अजैनों से भी ज्यादा कटु शब्द और घृणा अभिव्यक्त करता है । हम आपनी आगामी पीढ़ी को ज्ञान ट्रांसफर मुश्किल से कर पा...

भारतीय ज्ञान परंपरा में प्राकृत भाषा का नया वर्ष

भारतीय ज्ञान परंपरा में प्राकृत भाषा का नया वर्ष   प्राकृत भाषा भारतीय ज्ञान परंपरा की एक ऐसी मूल कड़ी है जिसे समझने और समझाने में मनीषियों ने सैकड़ो वर्षों तक अथक श्रम किया है । कभी भारत की जन जन की मातृ भाषा और जन भाषा से समादृत रही प्राकृत भाषा अपने भीतर भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐसे रत्नों को सहेजे हुए हैं जिनकी जानकारी के अभाव में भारतीय ज्ञान परंपरा का इतिहास अधूरा ही रह जाता है ।  आज से 10 वर्ष पूर्व 2015 में प्राकृत गाथा लेखन के अभ्यास में जीवन की प्रथम रचना नव वर्ष पर की थी ,और इसे 2014 में आचार्य विद्यानंद मुनिराज की प्रेरणा से प्रारंभ प्राकृत भाषा की प्रथम पत्रिका 'पागद भासा' में प्रकाशित भी किया था ।  पासामि उसवेलाए, संणाणसुज्जजुत्तो णववस्सं । होहिइ पाइयवस्सं, आगमणवसुज्जं उदिस्सइ ।। 1/1/2015 भावार्थ - मैं उषा बेला में सम्यग्ज्ञान रूपी सूर्य से युक्त नववर्ष को देखता हूँ जो प्राकृतभाषा के वर्ष के रूप में होगा और आगम ज्ञान का नया सूर्य उगेगा । इसमें एक भावना व्यक्त की थी,उस समय लगा था कि यह कोरी कल्पना है ,लेकिन कहते हैं न कि सच्चे दिल से जो भावना की ...

जैन बनें जैन बनाएं

BE JAIN .....................FOLLOW THE NEW JAINISM  जैनधर्म बलात धर्मान्तरण के पक्ष में कभी नहीं रहा |यह स्वेक्षा का पक्षधर है |कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी जाति का हो वह जन्मना न सही,कुछ नियमों का पालन करके  कर्मणा जैन तो बन सकता है | जो जन्मना जैन हैं उन्हें भी यदि वे जैन नियमों का पालन नहीं करते हैं तो नामधारी जैन ही कहा जाता है | फिर भी धर्मान्तरण के ज्वलंत मुद्दों के बीच यदि कोई आत्मकल्याण की शुद्ध भावना से स्वेक्षा से जैन होना चाहे तो निम्नलिखित ५ साधारण न्यूनतम आचारसंहिता का पालन करके आज से जैन होने की शुरुआत कर सकता है - धर्म का नाम - नव-जैन ( न्यू जैनिज़्म )  उद्देश्य - करुणा और आत्म विशुद्धि  प्राथमिक नियम - १.प्रतिदिन स्नान करके णमोकार महामंत्र का मात्र नौ बार पाठ करें | २.शुद्ध शाकाहारी भोजन ही करें | ३.नशे का सेवन न करें | ४.पञ्च अणुव्रतों का यथा शक्ति पालन करें  | ५.क्रोध -मान-माया-लोभ से बचने का प्रयास करें | उपनियम - १.सभी से अभिवादन में जय जिनेन्द्र कहें | २.सभी धर्मों का सम्मान करें |किसी की निंदा न करें | ३.राष्ट्र विरोधी किसी भी गतिविधि में...