रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली आजकल विचित्र किस्म का अवसाद चल रहा है । लोग आपसे बहुत तीव्रता से जुड़ते हैं जो अक्सर असहज होता है ,उन्हें आप रोक नहीं पाते ,कारण भी जान नहीं पाते,फिर यह सिलसिला कुछ वर्षों तक चलता है , उन रिश्तों में आप भी सामान्य और सहज नहीं रह पाते हैं ,थोड़ा बहुत जुड़ ही जाते हैं । फिर कुछ वर्षों में एक दिन अचानक उन्हीं लोगों का न जाने क्यों रुख बदल जाता है । जो इतने प्रिय हो रहे थे अचानक वे ही बहुत औपचारिक हो जाते हैं । पहले जैसे नहीं रह जाते ,बदल जाते हैं । और पूछने पर भी उसका कारण नहीं बताते , कोई भूल या गलत फहमी हो गई हो तो उसे तभी दूर किया जा सकता है जब उसकी चर्चा की जाय और उसे रेखांकित किया जाय । मिलते पहले जैसे ही हैं ,अभिवादन आदि भी करते हैं , कुछ नहीं, बस सब कुछ पहले जैसा नहीं रह जाता । इसी बीच पता चलता है एक बिचौलिया मध्य में आ गया , वह दोनों से जुड़ता है,और उन दोनों के मन में एक दूसरे के विरुद्ध एक नहीं हजार गलत फहमियां खड़ी करता है । और हम मान लेते हैं ,आपस में उसका स्पष्टी...
*धर्म प्रवचन /शास्त्र स्वाध्याय /पाठशाला/ शिविर आदि का प्रचार क्यों जरूरी है ?* प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली अक्सर ऐसा देखा जाता है कि धर्म के क्षेत्र की अन्य क्रियाएं जैसे पंचकल्याणक,विधान,शोभा यात्रा,जयंती आदि अनेक गतिविधियों का प्रचार प्रसार बहुत जोर शोर से किया जाता है । उसमें भीड़ एकत्रित करने के लिए अन्यान्य स्थानों से नियमित बसें आदि भी चलवाई जाती हैं । टीवी चैनलों अखबारों पर उसके विज्ञापन प्रकाशित होते हैं । इन सबके लिए बहुत व्यय भी किया जाता है । तब जाकर ये कार्यक्रम सफल होते हैं । किंतु यदि कहीं नियमित शास्त्र स्वाध्याय और कक्षा प्रवचन,ज्ञान शिविर,पाठशाला आदि चल रहे हों तो उसका प्रचार प्रसार उसका विज्ञापन तो छोड़ो कभी कभी मंदिर जी के सूचना बोर्ड पर उसकी सूचना भी नहीं लिखी होती है । कभी कभी वहां माइक आदि की व्यवस्था तक भी नहीं बन पाती है । विचार करें ! जब संसार के विषय भोग की सामग्री जैसे वस्त्र,भोजन,सोना,चांदी , सौन्दर्य प्रोडक्ट, मनोरंजन, कषाय वृद्धि के अन्य संसाधन, जिनके अनादि से गहन संस्कार हैं उनके लिए भी लाखों करोड़ों विज्ञापन में ...