*महात्मा गांधी का जिनवाणी प्रेम* महात्मा गांधी और जैन धर्म का संबंध केवल अहिंसा की अवधारणा तक सीमित नहीं था। जैन साधना, जैन शास्त्र, जैन साहित्य और जैन विद्वानों के प्रति उनके मन में गहरी आत्मीयता और श्रद्धा थी। उनके अपने शब्दों में जैन धर्म और जैन समाज के प्रति व्यक्त भाव इस संबंध के एक महत्त्वपूर्ण पक्ष को सामने रखते हैं। मुंबई में आयोजित एक जैन कॉन्फ्रेंस में महात्मा गांधी ने एक व्याख्यान प्रस्तुत किया था। उस अवसर पर उन्होंने जैन धर्म और जैन समाज के प्रति अपनी आत्मीयता व्यक्त करते हुए कहा था- *मेरे लिए तो मुक्ति का दरवाजा अहिंसा धर्म का पलना है। मुझ पर जैन भाइयों की इस कदर कृपादृष्टि है कि मुझको उनकी लेना देनी है। भारतवर्ष में एक सगे भाई के समान भाईबंदी के साथ रहने का दावा जैन ही कर सकते हैं।* आगे उन्होंने कहा। *मेरे परम मित्र डॉक्टर प्राणजीवन जैन हैं, जिनके चरित्र का मुझको सम्मान है। रायचंद भाई मेरे मित्र थे और शहर मुंबई में मेरे रहने का जो स्थान है, वह भी एक देवाशंकर जैन भाई का है। सफर के मध्य मुझे बहुत से जैन भाइयों से अक्सर वास्ता पड़ा है और बहुत से उस समय मुझसे पूछते हैं कि क्य...
वर्णी जयंती पर विशेष *जैन महाविद्यालयों के गंभीर शास्त्री विद्वानों के लिए आवश्यक पंचसूत्रीय मार्गदर्शन* पूज्य क्षुल्लक गणेश प्रसाद वर्णी जी ने अपने संपूर्ण संघर्ष पूर्ण जीवन काल में एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य किया था और वह था जैनदर्शन तत्वज्ञान संस्कृत भाषा प्राकृत भाषा के ज्ञान और प्रशिक्षण के लिए अन्यान्य संस्थाओं की स्थापना । उनमें से अधिकांश संस्थाएं सौ वर्ष या उससे अधिक समय की भी हो गई हैं । उनके इस आंदोलन के फल स्वरूप उनकी ही स्थापित संस्थाओं के स्नातकों ने और भी अनेक नई संस्थाएं इसी उद्देश्य को लेकर स्थापित करवाई हैं जिनसे वर्तमान की नई पीढ़ी भी शास्त्री / आचार्य / Phd जैसे कोर्स करके विद्वत्ता के क्षेत्र में कार्य कर रहीं हैं । उन जैन महाविद्यालयों में अध्ययनरत उन शास्त्री विद्वानों एवं विदुषियों के लिए, जो आजीवन जैनविद्या, जैनदर्शन एवं प्राकृत आगमों के अध्ययन-अध्यापन, अनुसंधान और संरक्षण के क्षेत्र में समर्पित होकर कार्य करना चाहते हैं, निम्नलिखित पाँच सूत्र अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं- 1. *‘मेरी जीवन गाथा’ का गंभीर अध्ययन करें* पूज्य गणेशप्रसाद वर्णी जी की ‘मेरी जीवन ...