क्षमा करना और मांगना आसान नहीं होता प्रो अनेकांत कुमार जैन, नई दिल्ली वो पूछ लेते मिज़ाज़ मेरा, बस इतना ही था इलाज़ मेरा। जैन धर्म में क्षमावाणी का पर्व मनाया जाता है। क्षमा आत्मा का स्वभाव है। उसे केवल भीतर धारण करना ही पर्याप्त नहीं, व्यवहार में अपनी वाणी के माध्यम से उसे प्रकट करना भी आवश्यक है। किन्हीं कारणों से जिनसे हमारी बोलचाल बंद हो गई है, उनसे संवाद आरंभ करने का सबसे सहज और सुंदर माध्यम क्षमावाणी हो सकती है। संवादहीनता धीरे धीरे मन में कटुता और कषायों को जन्म देती है। एक छोटी सी बात वर्षों की दूरी बन जाती है और फिर वही दूरी अहंकार, क्रोध और बैर का रूप ले लेती है। इसके विपरीत संवाद मन की गाँठों को खोलता है, दूरी को कम करता है और संबंधों में सहजता लौटाता है। यह केवल आध्यात्मिक अनुभव नहीं, एक मनोवैज्ञानिक सत्य भी है। क्षमावाणी बड़े और छोटे का भेद भी मिटाती है। छोटा पहले कहे और बड़ा बाद में बोले, ऐसा कोई नियम नहीं है। बड़े भी पहले बोल सकते हैं। बल्कि कई बार बड़ा वही होता है जो अपने पद, प्रतिष्ठा और अहंकार से ऊपर उठकर स्वयं पहल करता है। क्षमा माँगने के ल...
*संयम और तप में क्या अंतर है ?* प्रो.अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली यद्यपि संयम और तप एक ही सिक्के के दो पहलु हैं तथा मोक्षमार्ग में ये दोनों ही अनिवार्य तत्त्व हैं, इनमें से किसी का भी महत्त्व कम नहीं हैं, एक नज़र में ये लगते भी एक जैसे हैं , बोलते समय भी संयम के साथ तप अपने आप जुड़ जाता है । हम कहते हैं कि बिना संयम-तप धारण किये कुछ भी नहीं होगा । किन्तु जिनागम में लगभग प्रत्येक जगह इनकी व्युत्पत्ति अर्थ ,परिभाषा ,भेद प्रभेद सब कुछ अलग अलग प्रतिपादित किये गए हैं, इसके बाद भी अलग अलग ग्रंथों में कहीं संयम की मुख्यता से प्रतिपादन किया गया है कहीं तप की मुख्यता से । जहाँ संयम की प्रधानता ज्यादा है वहां तप को भी संयम के अंतर्गत गर्भित करके कथन किया गया है , जहाँ तप की मुख्यता से कथन है वहां संयम को तप के ही अंग के रूप में कह दिया जाता है । कहीं कहीं स्थूल रूप से संयम और तप को एक अर्थ में भी कहा गया है । किन्तु ये सब विवक्षा और अभिप्राय के भेद से कथन है । जिन्हें चारों अनुयोगों की कथन पद्धति का अभ्यास है वे इन्हें सही सही समझ लेते हैं ,उन्हें कहीं भी विरोध भासित नहीं ह...