क्या जैन धर्म के होने वाले हैं दो नए भेद ? प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली १२/०४/२६ दुनिया में प्रायः धर्म, दर्शन और अध्यात्म इन तीनों को अलग अलग मानकर पढ़ाया और समझाया जाता रहा है। मानो धर्म, पूजा पाठ और अनुष्ठानों का विषय हो और दर्शन अध्यात्म केवल विचारकों की बौद्धिक चर्चा। किंतु जैन परंपरा की यह विशेषता रही है कि यहाँ यह विभाजन संभव नहीं है। यहाँ धर्म, दर्शन और अध्यात्म परस्पर पूरक हैं। आप चाहें तो भी इनके पवित्र संबंधों को छिन्न भिन्न नहीं कर सकते । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र रूप रत्नत्रय में ही जैन धर्म का वास्तविक स्वरूप निहित है। दर्शन के बिना धर्म कर्मकांड बन जाता है और धर्म के बिना दर्शन अध्यात्म केवल बौद्धिक व्यायाम रह जाता है। आज की भाषा में मैं जैनदर्शन को ' ट्रिपल AAA ' के सिद्धांत के साथ प्रचारित करना चाहता हूँ जिसे मैंने डॉ.मेधावी जैन के साथ Dharma for life में अपने एक पॉडकास्ट धर्म दर्शन और विज्ञान में बखूबी व्याख्यायित किया है । यह है अहिंसा ,अनेकांत और अकर्त्तावाद । अब अपरिग्रह को अहिंसा के अंतर्गत की समझाएंगे । लेकिन तीसरा ...