परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष बहुत पुराना है । परम्पराएं जड़ से जोड़े रखती हैं लेकिन जड़ भी बनाती हैं और आधुनिकता बाह्य विकास तो देती है लेकिन जड़ से उखाड़ देती है । हम न ही जड़ होना चाहते हैं और न ही जड़ से उखाड़ना चाहते हैं । आधुनिकता को पूर्व के साथ निरंतरता बनाए रखने के लिए परंपरा और उसकी ऊर्जा चेतना की आवश्यकता होती है , इसलिए उसका लाभ लेने के लिए उसके साथ रहने की वकालत करती है और उसका हस्तक्षेप भी अपने लाभ के लिए चाहती है ,लेकिन कुछ समय बाद हस्तक्षेप के प्रक्रिया उल्टी हो जाती है । आधुनिकता अपनी शक्तिशाली शर्तों के अनुरूप परंपरा को ढालने का प्रयास करती है । परंपरा मजबूरी में क्षद्म आधुनिकता की शिकार होने लगती है ,उसे अपने वजूद की रक्षा के लिए भी आधुनिकता का सहारा चाहिए होता है और अपनी मूल जड़ को भी सुरक्षित रखने की जिद होती है । परंपरा से पहले समन्वय की बात से शुरुआत होती है और फिर वह विलय में तब्दील हो जाती है । आधुनिकता की जींस पेंट पहनकर ऊपर से परंपरा का कुर्ता पहन कर काम चलाना पड़ता है । और ज्यादा एडजेस्ट करना हो तो , धोती भी पेंट की तरह सिली सिलाई पहनकर ऊप...
श्रुतपंचमी पर विशेष - श्रुततीर्थ विरासत का रक्षक कौन है ? Prof Anekant Kumar Jain Dean – School of Philosophy Shri Lalbahadur Shastri National Sanskrit University New Delhi – 110016 प्रायः जब तीर्थ की चर्चा करते हैं तो हमारा ध्यान भी मात्र सम्मेदशिखर आदि तीर्थ स्थानों पर ही जाता है किन्तु यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि जैन परंपरा में ‘ श्रुतं गणधरा वा तीर्थमित्युच्यते’ ( भगवती आराधना / विजयोदया टीका 302/516/6) कहकर ‘श्रुत’ को तथा ‘तीर्थमागम:’ (समाधिशतक/ टी./ 2/222/24 ) कहकर ‘आगम’ आदि को भी उसी तरह तीर्थ स्वीकार किया गया है । इतना ही नहीं बल्कि आचार्य कुंदकुंद यहाँ तक कहते हैं कि जं णिम्मलं सुधम्मं सम्मत्तं संजमं णाणं। तं तित्थजिणमग्गे ...