रिसर्च एक कला है जिसे सभी नहीं कर सकते प्रो.अनेकांत कुमार जैन शिक्षा में जिस चीज को अनिवार्य किया जाता है एक दिन उसका ही बाजार बन जाता है फिर चाहे शोध पत्र का प्रकाशन हो किसी ग्रंथ का प्रकाशन हो या फिर शोध प्रबंध /पी एचडी हो ! जैसे हर कोई बांसुरी नहीं बजा सकता, तबला नहीं बजा सकता कत्थक नहीं कर सकता , कविता नहीं लिख सकता, अभिनय नहीं कर सकता ,क्यों कि प्रत्येक व्यक्ति की फितरत अलग-अलग होती है जरूरी नहीं कि शिक्षा से जुड़े सभी लोग शोध कर ही लें या उनकी अभिरुचि शोध में हो ही ,क्योंकि शोध एक कला है उसके लिए एक जज्बा एक इच्छा और कुछ कर गुजरने की तमन्ना बहुत आवश्यक होती है तभी समर्पण भी जीवन में आता है । इनके बिना जो भी शोध होता है वह शोध नहीं होता है वह संकलन होता है वहां शोध की गुणवत्ता का दूर-दूर तक नामो निशान तक नहीं होता । जब तक शोध एक कला की तरह है तब तक उसकी गरिमा बरकरार रहती है लेकिन जब उसे अनिवार्य तत्व बना दिया जाता है अर्थात बिना उसके नियुक्ति नहीं प्रमोशन नहीं तब वह मजबूरी भी बन जाता है और लोग जिन्हें शोध में रुचि नहीं है समर्पण नहीं है वह मजबूरी में ...
AI के दौर में दिगम्बर जैन साधना और डिजिटल सेंसरशिप प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली अभी हाल ही में महावीर जयंती के अवसर पर मीडिया और सरकारी विज्ञापनों में वस्त्र (विशेष कर धोती)सहित भगवान् महावीर का चित्र प्रकाशित कर बधाइयां दी गई । इसके साथ साथ अजैन तो छोड़िए कई जैन बंधुओं ने भी महावीर की जगह बुद्ध की फोटो लगा कर महावीर जयंती की बधाइयां दीं ।अपने प्रचार की भूख में अज्ञानता और प्रमाद इस कदर हावी है कि क्या लिख रहे हैं क्या छाप रहे हैं इसका भी होश नहीं है । सांध्य महालक्ष्मी अखबार ने पहली बार एक लेख में AI और प्राचीन दिगम्बर जैन परंपरा से जुड़ी इन्हीं समस्याओं से संबंधित एक लेख पढ़ कर प्रसन्नता हुई कि वे एक पत्रकारिता का कर्त्तव्य भी सही तरीके से निभा रहे हैं। वास्तविकता यह है कि आज दुनिया तेजी से Artificial Intelligence और सोशल मीडिया के युग में प्रवेश कर चुकी है। इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने जानकारी को वैश्विक स्तर पर फैलाने का अभूतपूर्व माध्यम प्रदान किया है। लेकिन तकनीकी प्रगति के साथ-साथ कुछ ऐसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं, जिनका संबंध सांस्कृतिक और...