*जैन महाविद्यालयों के गंभीर शास्त्री विद्वानों के लिए आवश्यक पंचसूत्रीय मार्गदर्शन जैन महाविद्यालयों में अध्ययनरत उन शास्त्री विद्वानों एवं विदुषियों के लिए, जो आजीवन जैनविद्या, जैनदर्शन एवं प्राकृत आगमों के अध्ययन-अध्यापन, अनुसंधान और संरक्षण के क्षेत्र में समर्पित होकर कार्य करना चाहते हैं, निम्नलिखित पाँच सूत्र अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं- 1. *‘मेरी जीवन गाथा’ का गंभीर अध्ययन करें* पूज्य गणेशप्रसाद वर्णी जी की ‘मेरी जीवन गाथा’ भाग 1 एवं 2 का अनिवार्य रूप से अध्ययन करना चाहिए। यह केवल आत्मकथा नहीं, बल्कि एक ऐसे साधक-विद्वान के संघर्ष, स्वाध्याय, आत्मनिर्माण और ज्ञान-साधना की प्रेरक यात्रा है, जिससे गंभीरता से अध्ययन करने वाले विद्यार्थी को अपने जीवन की दिशा निर्धारित करने में विशेष प्रेरणा मिल सकती है। 2. *अपनी उच्च शिक्षा का व्यापक और सुनियोजित आधार तैयार करें* जो शास्त्री विद्वान अथवा विदुषी जीवन भर आजीविका की चिंता से अपेक्षाकृत निश्चिंत होकर जैनदर्शन, जैनविद्या और तत्त्वज्ञान के अध्ययन-अध्यापन एवं अनुसंधान को अपना जीवन-कार्य बनाना चाहते हैं, उन्हें शास्त्री के बाद अपनी उच्च शिक्षा ...
क्षमा करना और मांगना आसान नहीं होता प्रो अनेकांत कुमार जैन, नई दिल्ली वो पूछ लेते मिज़ाज़ मेरा, बस इतना ही था इलाज़ मेरा। जैन धर्म में क्षमावाणी का पर्व मनाया जाता है। क्षमा आत्मा का स्वभाव है। उसे केवल भीतर धारण करना ही पर्याप्त नहीं, व्यवहार में अपनी वाणी के माध्यम से उसे प्रकट करना भी आवश्यक है। किन्हीं कारणों से जिनसे हमारी बोलचाल बंद हो गई है, उनसे संवाद आरंभ करने का सबसे सहज और सुंदर माध्यम क्षमावाणी हो सकती है। संवादहीनता धीरे धीरे मन में कटुता और कषायों को जन्म देती है। एक छोटी सी बात वर्षों की दूरी बन जाती है और फिर वही दूरी अहंकार, क्रोध और बैर का रूप ले लेती है। इसके विपरीत संवाद मन की गाँठों को खोलता है, दूरी को कम करता है और संबंधों में सहजता लौटाता है। यह केवल आध्यात्मिक अनुभव नहीं, एक मनोवैज्ञानिक सत्य भी है। क्षमावाणी बड़े और छोटे का भेद भी मिटाती है। छोटा पहले कहे और बड़ा बाद में बोले, ऐसा कोई नियम नहीं है। बड़े भी पहले बोल सकते हैं। बल्कि कई बार बड़ा वही होता है जो अपने पद, प्रतिष्ठा और अहंकार से ऊपर उठकर स्वयं पहल करता है। क्षमा माँगने के ल...