महावीर और बुद्ध : मीडिया की अज्ञानता से युद्ध Anekant Kumar Jain यह सचमुच आश्चर्य का विषय है कि आज के समय में, जब सूचना और ज्ञान के असंख्य साधन उपलब्ध हैं, तब भी अनेक मीडिया हाउस और पत्रकार तीर्थंकर महावीर और भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं और चित्रों में अंतर नहीं कर पाते, या शायद जानबूझकर नहीं करना चाहते। महावीर जयंती जैसे पवित्र और विशिष्ट अवसरों पर भी कई बार बुद्ध की तस्वीरें प्रकाशित, प्रचारित और प्रसारित कर दी जाती हैं। यह केवल एक सामान्य भूल मानकर टाल देने योग्य बात नहीं है, क्योंकि यह गलती एक-दो बार नहीं बल्कि वर्षों से बार-बार दोहराई जा रही है। यदि इसे महज अज्ञानता या भ्रम कहा जाए, तब भी यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसा उलटा उदाहरण शायद ही कभी देखने में क्यों नहीं आता कि बुद्ध जयंती के अवसर पर तीर्थंकर महावीर के चित्र प्रकाशित किए जाएँ। यही कारण है कि अब यह संदेह भी उठने लगा है कि कहीं यह कोई सुनियोजित उपेक्षा या षड़यंत्र तो नहीं, क्योंकि लंबे समय से इस विषय पर मीडिया का ध्यान आकृष्ट कराया जा रहा है, फिर भी गलती लगातार दोहराई जा रही है। फिर भी संतुलित द...
रिसर्च एक कला है जिसे सभी नहीं कर सकते प्रो.अनेकांत कुमार जैन शिक्षा में जिस चीज को अनिवार्य किया जाता है एक दिन उसका ही बाजार बन जाता है फिर चाहे शोध पत्र का प्रकाशन हो किसी ग्रंथ का प्रकाशन हो या फिर शोध प्रबंध /पी एचडी हो ! जैसे हर कोई बांसुरी नहीं बजा सकता, तबला नहीं बजा सकता कत्थक नहीं कर सकता , कविता नहीं लिख सकता, अभिनय नहीं कर सकता ,क्यों कि प्रत्येक व्यक्ति की फितरत अलग-अलग होती है जरूरी नहीं कि शिक्षा से जुड़े सभी लोग शोध कर ही लें या उनकी अभिरुचि शोध में हो ही ,क्योंकि शोध एक कला है उसके लिए एक जज्बा एक इच्छा और कुछ कर गुजरने की तमन्ना बहुत आवश्यक होती है तभी समर्पण भी जीवन में आता है । इनके बिना जो भी शोध होता है वह शोध नहीं होता है वह संकलन होता है वहां शोध की गुणवत्ता का दूर-दूर तक नामो निशान तक नहीं होता । जब तक शोध एक कला की तरह है तब तक उसकी गरिमा बरकरार रहती है लेकिन जब उसे अनिवार्य तत्व बना दिया जाता है अर्थात बिना उसके नियुक्ति नहीं प्रमोशन नहीं तब वह मजबूरी भी बन जाता है और लोग जिन्हें शोध में रुचि नहीं है समर्पण नहीं है वह मजबूरी में ...