AI के दौर में दिगम्बर जैन साधना और डिजिटल सेंसरशिप
अभी हाल ही में महावीर जयंती के अवसर पर मीडिया और सरकारी विज्ञापनों में वस्त्र (विशेष कर धोती)सहित भगवान् महावीर का चित्र प्रकाशित कर बधाइयां दी गई । इसके साथ साथ अजैन तो छोड़िए कई जैन बंधुओं ने भी महावीर की जगह बुद्ध की फोटो लगा कर महावीर जयंती की बधाइयां दीं ।अपने प्रचार की भूख में अज्ञानता और प्रमाद इस कदर हावी है कि क्या लिख रहे हैं क्या छाप रहे हैं इसका भी होश नहीं है ।
सांध्य महालक्ष्मी अखबार ने पहली बार एक लेख में AI और प्राचीन दिगम्बर जैन परंपरा से जुड़ी इन्हीं समस्याओं से संबंधित एक लेख पढ़ कर प्रसन्नता हुई कि वे एक पत्रकारिता का कर्त्तव्य भी सही तरीके से निभा रहे हैं।
वास्तविकता यह है कि आज दुनिया तेजी से Artificial Intelligence और सोशल मीडिया के युग में प्रवेश कर चुकी है। इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने जानकारी को वैश्विक स्तर पर फैलाने का अभूतपूर्व माध्यम प्रदान किया है। लेकिन तकनीकी प्रगति के साथ-साथ कुछ ऐसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं, जिनका संबंध सांस्कृतिक और धार्मिक संवेदनशीलता से है। हाल के वर्षों में एक ऐसी ही समस्या दिगम्बर जैन परंपरा से जुड़ी हुई दिखाई दे रही है।
दिगम्बर जैन परंपरा में नग्नता (nakedness) को किसी भी प्रकार की अश्लीलता के रूप में नहीं देखा जाता। इसके विपरीत यह पूर्ण वैराग्य, अपरिग्रह और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है। “दिगम्बर” शब्द का अर्थ ही है — दिशाएँ जिनका वस्त्र हैं। यह उस साधना का संकेत है जिसमें मुनि संसार के सभी भौतिक परिग्रहों का त्याग कर केवल आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर होते हैं। जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ भी इसी आदर्श को दर्शाती हैं। भारतीय कला, संस्कृति और मंदिर परंपरा में इन प्रतिमाओं की हजारों वर्षों से पूजा होती आई है और इन्हें अत्यंत पवित्र दृष्टि से देखा जाता है।
किन्तु आधुनिक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और AI प्रणालियाँ अक्सर इस धार्मिक संदर्भ को समझ नहीं पातीं। अधिकतर सोशल मीडिया कंपनियों के नियम नग्नता को स्वचालित रूप से “adult content” की श्रेणी में रख देते हैं। परिणामस्वरूप जब दिगम्बर तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ या जैन मुनियों के चित्र ऑनलाइन साझा किए जाते हैं, तो कई बार उन्हें हटा दिया जाता है या AI उन्हें वस्त्रों के साथ पुनःनिर्मित कर देता है। यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं है; यह उस भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ की अनदेखी है जो इन प्रतिमाओं के पीछे निहित है।
यह स्थिति कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाती है। क्या तकनीकी एल्गोरिद्म को यह अधिकार होना चाहिए कि वे हजारों वर्षों पुरानी धार्मिक परंपराओं को अपने सीमित मानकों के आधार पर बदल दें? क्या वैश्विक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों को विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों की विशिष्टताओं को समझने का प्रयास नहीं करना चाहिए? जब शास्त्रीय कला, संग्रहालयों की मूर्तियाँ और प्राचीन पेंटिंग्स को सांस्कृतिक विरासत के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो धार्मिक प्रतीकों के साथ अलग व्यवहार क्यों किया जाए?
इस समस्या का समाधान केवल तकनीक को दोष देने से नहीं होगा। इसके लिए समाज, धार्मिक समुदाय और तकनीकी संस्थानों के बीच संवाद आवश्यक है। सबसे पहले, दिगम्बर जैन परंपरा के वास्तविक अर्थ और उसके आध्यात्मिक संदर्भ को व्यापक रूप से समझाया जाना चाहिए। जब लोग यह जानेंगे कि यह नग्नता किसी प्रकार की कामुकता नहीं बल्कि पूर्ण त्याग और आत्मसंयम का प्रतीक है, तो गलतफहमियाँ स्वतः कम होंगी।
दूसरा, जैन समाज और धार्मिक संस्थाओं को प्रमुख तकनीकी कंपनियों के साथ रचनात्मक संवाद स्थापित करना चाहिए। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की नीतियों में धार्मिक कला और आध्यात्मिक प्रतीकों के लिए विशेष अपवाद (exception) का प्रावधान किया जा सकता है। इससे AI प्रणालियाँ भी भविष्य में इन प्रतीकों को अधिक संवेदनशीलता के साथ पहचान सकेंगी।
तीसरा, जैन समुदाय को स्वयं भी डिजिटल माध्यमों में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। यदि प्रामाणिक लेख, वीडियो, डिजिटल संग्रहालय और शैक्षिक सामग्री तैयार की जाए, तो विश्व समुदाय को जैन दर्शन के गहरे आध्यात्मिक संदेश को समझने का अवसर मिलेगा। इससे AI प्रणालियों के प्रशिक्षण में भी सही सांस्कृतिक संदर्भ शामिल हो सकेंगे।
वास्तव में यह विषय केवल जैन धर्म तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न से जुड़ा है कि क्या आधुनिक तकनीक मानव सभ्यता की विविध सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए आगे बढ़ेगी या उन्हें एक ही मानक में ढालने का प्रयास करेगी। यदि तकनीक को वास्तव में वैश्विक और समावेशी बनाना है, तो उसे सांस्कृतिक विविधता के प्रति संवेदनशील बनाना अनिवार्य है।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि प्राचीन आध्यात्मिक परंपराएँ केवल अतीत की धरोहर नहीं हैं, बल्कि वे मानव सभ्यता के नैतिक और दार्शनिक आधार भी हैं। दिगम्बर जैन परंपरा की नग्नता को अश्लीलता के रूप में देखना एक गहरी गलतफहमी है। यह परंपरा त्याग, आत्मसंयम और आध्यात्मिक उत्थान के सर्वोच्च आदर्श को अभिव्यक्त करती है।
AI और डिजिटल तकनीक के इस युग में आवश्यक है कि तकनीकी प्रगति और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। तभी हम ऐसी डिजिटल दुनिया का निर्माण कर पाएँगे जो न केवल आधुनिक हो, बल्कि अपनी प्राचीन आध्यात्मिक विरासत के प्रति भी सम्मानपूर्ण और संवेदनशील हो।
यदि हम ऐसा नहीं कर सके भविष्य की पीढ़ी दिगंबरत्व के सही मायने नहीं समझ पाएगी और यह भारत की यह महत्वपूर्ण धार्मिक विरासत लुप्त होने लग जाएगी ।
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