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भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में जैनधर्म, साहित्य और संस्कृति का योगदान

भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में   
   जैनधर्म, साहित्य और संस्कृति का      
                  योगदान 
               प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी,
     (राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित),
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, जैनदर्शन विभाग,
सम्पूर्णानन्द संस्कृतविश्वविद्यालय,वाराणसी।
         पृष्ठभूमि— वर्तमान केंद्रीय सरकार ने अपने भारत देश के प्राचीन मूलभूत मूल्यों, इसकी बहुमूल्य विरासत. संस्कृति और उपेक्षित हो रहीं अपनी पहचान एवं अक्षय ज्ञाननिधि के संरक्षण, संवर्धन और इन सबकी पुनः स्थापना हेतु काफ़ी गंभीरता से कार्य कर रही है. इसीलिए भारतीय ज्ञान परम्परा,इस पर आधारित शैक्षिक पाठ्यक्रमों का निर्माण तथा भारतीय संस्कृति का तथ्यों पर आधारित इतिहास का लेखनकार्य–ये सभी कार्य नव क्रांति के रूप में कार्यान्वित हो रहे हैं. इससे देशवासियों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति स्वाभिमान युक्त आशा का संचार हुआ है. सरकार की नीति सबके प्रति समान है, किन्तु बाद में जिन्हें इसे कार्यान्वित करना है, वे इसे ऐकांगी मानकर चलते नज़र आ रहे हैं. उन्हें यह देखकर चलना चाहिए कि इस देश में बौद्ध, जैन आदि और भी अन्यान्य प्राचीन समृद्ध परम्परायें भी हैं, जिनका सम्पूर्ण विश्व में भारत का सम्मान बढ़ाने और विश्वगुरू के रूप में प्रतिष्ठित करने में महनीय योगदान रहा है.
           इस सबके बाबजूद भारतीय ज्ञान परम्परा विषयक यू. जी. सी. अथवा देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों को उठाकर देखलें, तब पता चलता है क़ि इसमें एक परम्परा विशेष के पाठ्यक्रम का ही बाहुल्य है. बौद्ध, जैन परम्परा के तो नामोल्लेख मात्र हैं. इनके योगदान का सही प्रतिनिधित्व उनमें नहीं हुआ है.इसका कारण संभवतः इन पाठ्यक्रमों आदि के निर्माण में 
इन परम्पराओं के विद्वानों का सहयोग नहीं लिया गया. 
      यही बात वर्तमान में इतिहास लेखन के चल रहे कार्य के विषय में भी है. यदि भारतवर्ष का सही इतिहास लेखन का कार्य करना है, तब इन परम्पराओं के प्राकृत, पालि, संस्कृत, अपभ्रंश आदि भाषाओं के विशाल प्राचीन  साहित्य में उल्लिखित इतिहास लेखन सम्बन्धी तथ्यों का उपयोग करना आवश्यक है, अन्यथा इतिहास लेखन अधूरा जैसा ही रहेगा.
                 यहाँ मेरे आलेख का विषय “भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में जैनधर्म, साहित्य और संस्कृति का योगदान”है. अतः यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है क़ि भारतीय ज्ञान परम्परा विषयक पाठ्यक्रम में और इतिहास लेखन में जैन परम्परा का अवदान  और क्यों आवश्यक है?
जैन ज्ञान परम्परा का महत्व और योगदान —
         भारतीय ज्ञान परम्परा के विकास में जैन परम्परा का सभी क्षेत्रों में बहुमूल्य योगदान है, चाहे मूर्तिकला, शिल्पकला, स्थापत्य कला हो, चाहे विविध साहित्य की विधाएं हों अथवा दार्शनिक आध्यात्मिक तात्विक और सैद्धांतिक चिंतन की सर्वोच्च अवधारणाएं हों– इन सभी क्षेत्रों में जैन परम्परा का बहुमूल्य योगदान प्राचीनकाल से ही रहा है।  जहाँ तक साहित्य की बात है तो साहित्य की सभी विधाओं में जैनाचार्यों ने भारतीय भाषाओंऔर इनके बहुविध साहित्य के विकास में बहुमूल्य योगदान को  युगों-युगों तक याद किया जाता रहेगा ।     
     महान् जैनाचार्यों ने स्व-पर कल्याण हेतु संयममार्ग पर चलते हुए अपने अनुभूत उच्च तत्त्वज्ञान-विज्ञान के द्वारा संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश तथा विभिन्न देशी भाषाओं के साथ ही अनेक प्राचीन भारतीय भाषाओं में धर्म,दर्शन,आध्यात्मिक-तत्त्वचिंतन,तर्कशास्त्र,व्याकरण,ज्योतिष,रस,छन्द,अलंकार, काव्य,महाकाव्य,संगीत,नाटक,समाज विज्ञान,राजनीति,कला,संस्कृति,आयुर्वेद,
अर्थशास्त्र,इतिहास,गणित,ज्योतिष,यंत्र-मंत्र-तंत्र– इन सभी विषयों के साथ ही–     
    भूगोल,खगोल,वास्तुशास्त्र,मूर्ति-कला, सहज मानवीय जीवनमूल्यों तथा बहुमूल्य व्यावहारिक एवं नैतिक जीवन-पद्धतियों से सम्बन्धित एक से बढ़कर एक सहस्रों ग्रन्थों का सृजन किया है तथा आज भी कर रहे हैं।ऐसा कोई विषय अछूता नहीं रहा, जिसका विचार-विमर्श प्राचीन जैन साहित्य में न हुआ हो । , 
       अपने देश के ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के साहित्य मनीषी, जिन्होंने जैन साहित्य का गहराई से अवलोकन किया है, वे जैनाचार्यों के इस समुज्वल ज्ञान एवं अद्भुत प्रतिभा के समक्ष नतमस्तक हुए बिना नहीं रहते। उनका मानना है कि सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति, सभ्यता, समाज, धर्म, राजनीति, और अर्थनीति आदि विभिन्न विधाओं का सम्पूर्ण ज्ञान जैन साहित्य के अध्ययन के बिना अधूरा है.
    हमारे दूरदर्शी आचार्यों ने अपने ग्रन्थों तथा शिलालेखों आदि में वह मूल्यवान ऐतिहासिक सामग्री संरक्षित कर रखी है, जिसका इतिहास- लेखन में व्यापक उपयोग आवश्यक है। यद्यपि आत्मप्रशंसा से बचने के लिए हमारे कुछ प्रमुख आचार्यों ने अपने एवं अपनी परम्परा के विषय में बहुत कम लिखा या कुछ भी नहीं लिखा है। अतः हमारे विद्वानों को इतिहास लिखने के लिए विशाल वाङ्मय तथा शिलालेखों, प्रशस्तियों आदि से यत्र-तत्र बिखरी हुई सामग्री तथा सन्दर्भों को जोड़कर किस प्रकार साहित्य और संस्कृति के इतिहास की रचना करनी पड़ी, ये कठिनाईयां ऐसे लेखक विद्वान् ही जान-समझ सकते हैं। फिर भी भारतीय इतिहास के लेखन का यह एक सर्वांगीण विवेचन महत्वपूर्ण कार्य है.  
       संस्कृत, प्राकृत, पालि, अपभ्रंश जैसी हमारी अनेक भारतीय प्राचीन भाषाएँ विशाल सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं, प्राचीन ज्ञान की रक्षा करती हैं और सामूहिक पहचान को सुदृढ़ करती हैं। ये समृद्ध परंपरायें हमारी रचनात्मक अभिव्यक्ति को संरक्षित करते हुए समुदायों को एकजुट करती हैं। इन भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन विविधता में एकता को मजबूत करता है और भारत की विरासत को बनाए रखता है।
       इन प्राचीन भारतीय भाषाओं में प्राकृत भाषा अनेक शताब्दियों तक भारतीय जनमानस की प्रमुख जनभाषा रही है। इससे सम्पूर्ण भारतीय भाषायें, इनका साहित्य, इतिहास, संस्कृति, परम्परायें, लोकजीवन और सम्पूर्ण जन-गण-मन प्रभावित एवं ओतप्रोत सदा से रहा है। यही कारण है कि प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषाओं को अनेक भारतीय भाषाओं की जननी होने का गौरव प्राप्त है।
         भारतीय जन-जीवन की सहज, मधुर और प्राचीनतम लोक-भाषा होने से प्राकृत भाषा को तीर्थंकर महावीर और गौतम बुद्ध ने अपने उपदेशों  का माध्यम तो बनाया ही, साथ ही अनेक प्राचीन महाकवियों, संस्कृत नाटककारों, अलंकार-शास्त्रियों,गद्यकारों ने प्राकृत भाषा को अपने उत्कृष्ट साहित्य सृजन का माध्यम बनाकर भारतीय साहित्य को सपूर्ण विश्व साहित्य में उत्कृष्टता प्रदान कराके अपने भारतदेश को विश्वगुरु की उपाधि से विभूषित कराया ।    
   यह बहुत ही गौरव का विषय है कि अक्टूबर सन् २०२४ में हमारी लोकप्रिय भारत सरकार द्वारा मराठी, पालि आदि भाषाओं के साथ ही प्राकृत भाषा को भी शास्त्रीय भाषा की मान्यता मिलना अपने आप में बहुत बढ़ी उपलब्धि है.इससे प्राकृत भाषा और इसके हर विषय और प्रत्येक विधा में उपलब्ध विशाल साहित्य के संरक्षण,संवर्धन, विकास और प्रचार-प्रसार के  साथ ही विभिन्न शैक्षिक पाठ्यक्रमों में समायोजित किए जाने के मार्ग प्रशस्त होंगे.
      वस्तुतः प्राकृत भाषा का विशाल आगम साहित्य आध्यात्मिक, दार्शनिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चिंतन से आप्लावित तो है ही, साथ ही यह चिरन्तन युगों की आर्थिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक यथार्थतः के बोध से भी परिपूर्ण है.इसीलिए वर्तमान में उपलब्ध विशाल जैन आगम साहित्य और उसकी निर्युक्ति, चूर्णी, भाष्य आदि विविध व्याख्या साहित्य तथा विविध साहित्यिक विधाओं में रचित आगमेतर साहित्य की अक्षय ज्ञाननिधि हमारी बहुमूल्य विरासत है । भारतीय इतिहास की अनेक दुर्लभ रिक्तताओं को भरने और भ्रान्तियों को दूर करने में यह विशाल साहित्य पूर्णतः सक्षम है.
   इस विशाल प्राकृत साहित्य में प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति से संबंधित बहुमूल्य सामग्री बिखरी हुई है।सम्पूर्ण प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन में इसका उपयोग किया जाना आवश्यक है। क्योंकि प्राचीन भारतीय इतिहास की अनेक अनिर्णीत तिथियों एवं घटनाओं के निर्धारण एवं सत्यापन में भी यह साहित्य अत्यधिक सहायक सिद्ध हो सकता है। 
      प्रो० राजाराम जी जैन ने अपनी पुस्तक "जैन पाण्डुलिपियाँ एवं शिलालेख : एक परिशीलन"(श्री गणेशवर्णी संस्थान वाराणसी में सन् २००७ में प्रकाशित के पृ० ४६-४७)में मध्यकालीन अनेक जैन पाण्डुलिपियों की प्रशस्तियों के आधार पर मध्यकाल के अनेक महाराजाओं आदि के शासनकाल, उनकी राजधानियों, तत्कालीन शहरों, इनका सही समय निकालकर प्रस्तुत किया है, जबकि इतिहास जगत् में इनके विषय में सही तिथियों आदि का विवरण उपलब्ध नहीं हैं। जबकि प्राचीन जैन शास्त्रों,पाण्डुलिपियों और उनकी प्रशस्तियों, अनेक शिलालेखों में भारतीय इतिहास के अनेक तथ्य प्रामाणिक और स्पष्ट रूप में उल्लिखित हैं।
   आज भी देश के शताधिक शास्त्रभण्डारों,पुस्तकालयों, संग्रहालयों, जैन मन्दिरों, विभिन्न तथा निजी संग्रहालयों में हजारों हस्तलिखित ग्रन्थ नष्टप्रायः होने की स्थिति में पहुंच रहे हैं और अपने उद्धार की प्रतीक्षा में पड़े हुए हैं। हमारी उपेक्षा के चलते कितना ही साहित्य नष्ट हो गया और कितना निरन्तर नष्ट हो रहा है ।  आज अनेक जैनाचार्यों की महत्वपूर्ण कृतियां ऐसी हैं, जिनके उल्लेख तो मिलते हैं, किन्तु अनुपलब्ध हैं अथवा कुछ आधी-अधूरी ही प्राप्त हैं। इनकी खोज विभिन्न शास्त्रभण्डारों में योजनाबद्ध रूप में किया जाना अपेक्षित है।इनमें इतिहास लेखन की अपार सम्भावनायें मानते हुए निरन्तर पूरा करने हेतु प्रयत्नशील रहना भी आवश्यक है ।
          इतिहास लेखन की आधारभूत सामग्री, चूंकि कहीं एक जगह एकत्र सुलभ होने के बजाय पूरे भारत में बिखरी हुई है, इसलिए उसका अवलोकन, अध्ययन, विश्लेषण किसी एक व्यक्ति द्वारा संभव नहीं है। इसके लिए कुछ विद्वानों की टीमें ( टोलियां) बनाकर कार्य कराना भी आवश्यक है। जो विभिन्न क्षेत्रों की बिखरी सामग्री का अलग-अलग अनुशीलन और विश्लेषण करें और अन्त में सभी विद्वान् मिलकर विश्लेषित सामग्री का समायोजन करें, तब जाकर वास्तविक इतिहास का स्थापत्य निर्मित होगा ।इससे मात्र जैन संस्कृति का  पोषण नहीं किया, अपितु इन प्रयासों से सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति विकसित और गौरवान्वित होती है.क्योंकि जैन संस्कृति भी सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति की एक अति प्राचीन प्रमुख धारा है. भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में इस धारा का अपना विशेष महत्व है.   
        अपने देश के गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु, दिल्ली, मध्यप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेशआदि अनेक प्रांतों में जैन समाज के सहयोग से स्थापित प्राचीन शास्त्र भण्डारों के साथ ही अन्यान्य शोध संस्थानों,निजी पुस्तकालयों के इन हस्तलिखित शास्त्र भण्डारों ने प्राचीन शास्त्रों की पाण्डु‌लिपियों के संरक्षण में महनीय योगदान किया है। उनमें जैसलमेर, अहमदाबाद, पालिताना, पाटन, बीकानेर, नागौर, लाडनूं, चुरू, जयपुर, अजमेर, व्यावर, श्रीमहावीरजी, वाराणसी, आगरा, दिल्ली, इन्दौर बीना, उज्जैन, आरा, वैशाली, सोलापुर, कोल्हापूर, फलटन, बाहुबलि, कारंजा, मैसूर, श्रवणबेलगोला, बिद्री, अर्हन्तगिरि, कनकगिरि, मद्रास आदि अनेक प्रसिद्ध नगरों में स्थापित जैन शोध संस्थानों एवं शास्त्र भण्डारों ने हमारी इस अमूल्य धरोहर का संरक्षण संवर्धन संस्कृति के विकास में इनके बहुमूल्य योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। 
               यद्यपि इस अमूल्य ज्ञान-निधि के संरक्षण की ओर केन्द्र सरकार का ध्यान भी पूरे देश के हस्तलिखित ग्रन्थों के सूचीकरण एवं शास्त्रभण्डारों के सर्वेक्षण की ओर गया है.और यह कार्य किया भी जा रहा है,कई योजनाएं चल भी रहीं  हैं। 
हमें पूरा विश्वास और आशा है क़ि सरकार और समाज -इन दोनों के प्रयासों से सभी परम्पराओं  का समान प्रतिनिधित्व भारतीय ज्ञान परम्परा के पाठ्यक्रम निर्धारण और इतिहास लेखन में नये-नये आयाम स्थापित करते हुए अपनी भारतीय संस्कृति को गौरव बढ़ाने में सहयोग प्रदान करेगा. धन्यवाद. जय भारत. जय हिन्द.
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 लेखक–प्रो० डॉ० फूलचन्द जैन प्रेमी,              
निवास- अनेकान्त विद्या भवनम्, बी० २३ / ४५ पी-६, शारदानगर, खोजवाँ, संतोषी माता मन्दिर के पास,वाराणसी-२२१०१० फोन.नं०9670863335 09450179254 Email anekantif@gmail.com
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