रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली आजकल विचित्र किस्म का अवसाद चल रहा है । लोग आपसे बहुत तीव्रता से जुड़ते हैं जो अक्सर असहज होता है ,उन्हें आप रोक नहीं पाते ,कारण भी जान नहीं पाते,फिर यह सिलसिला कुछ वर्षों तक चलता है , उन रिश्तों में आप भी सामान्य और सहज नहीं रह पाते हैं ,थोड़ा बहुत जुड़ ही जाते हैं । फिर कुछ वर्षों में एक दिन अचानक उन्हीं लोगों का न जाने क्यों रुख बदल जाता है । जो इतने प्रिय हो रहे थे अचानक वे ही बहुत औपचारिक हो जाते हैं । पहले जैसे नहीं रह जाते ,बदल जाते हैं । और पूछने पर भी उसका कारण नहीं बताते , कोई भूल या गलत फहमी हो गई हो तो उसे तभी दूर किया जा सकता है जब उसकी चर्चा की जाय और उसे रेखांकित किया जाय । मिलते पहले जैसे ही हैं ,अभिवादन आदि भी करते हैं , कुछ नहीं, बस सब कुछ पहले जैसा नहीं रह जाता । इसी बीच पता चलता है एक बिचौलिया मध्य में आ गया , वह दोनों से जुड़ता है,और उन दोनों के मन में एक दूसरे के विरुद्ध एक नहीं हजार गलत फहमियां खड़ी करता है । और हम मान लेते हैं ,आपस में उसका स्पष्टी...