🪔*दीपक कहता है*...... *जोइक्खो गिलइ तमं तं चिय उग्गिलइ कज्जलमिसेणं।* *अहवा सुद्धसहावा हियए कलुसं न धारेति॥* (जयवल्लभ ‘वज्जालग्गं’, गाथा 776) 🪔 ज्योतिष्को गिलति तमस्तदेवोद्गिरति कज्जलमिषात्। अथवा शुद्धस्वभावा हृदि कलुषं न धारयन्ति॥ 🪔🪔🪔🪔 ( संस्कृत छायानुवाद रत्नदेव(1337 ई. )) अर्थात् ,ज्योतिष्क अथवा दीपक अंधकार को अपने भीतर निगल जाता है और उसी अंधकार को काजल के रूप में बाहर उगल देता है। स्वयं जलकर, स्वयं को तिल-तिल गलाकर वह चारों ओर प्रकाश बिखेर देता है अथवा, जिनका स्वभाव शुद्ध और निर्मल होता है, वे अपने हृदय में किसी प्रकार की मलिनता नहीं रखते। भाव यह है कि संसार का अंधकार अपने भीतर समाहित करने पर भी सज्जन व्यक्ति अपने हृदय की निर्मलता नहीं खोता। *अहिंसा का सन्देश* ...