महावीर जयंती का बदलता स्वरूप
प्रो अनेकांत कुमार जैन
कभी महावीर जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि विचारों का पर्व भी हुआ करती थी।
उस दिन मंच सजते थे—केवल पूजा के लिए नहीं, बल्कि चिंतन के लिए भी। नगर के जैन और जैनेतर विद्वान, साहित्यकार, कवि, बुद्धिजीवी, नेता—सभी एकत्र होकर भगवान महावीर के जीवन, उनके दर्शन, अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत के गूढ़ संदेशों पर मंथन करते थे।बाद में उनके विचार छपते थे जो संदर्भ बनते थे ।
आज दृश्य बदल गया है।
महावीर जयंती अब अधिकतर पूजन-अभिषेक, झूलनोत्सव, प्रभात फेरी और सामूहिक भोज तक सिमटती जा रही है। उत्सव है—पर विमर्श नहीं। श्रद्धा है—पर संवाद नहीं। आस्था है—पर आत्ममंथन कहीं खो गया है।
क्या यह विडंबना नहीं कि जिन भगवान महावीर ने हमें सोचने, प्रश्न करने और सत्य की खोज का मार्ग दिखाया, उनके ही जन्मोत्सव पर हम विचार करना छोड़ बैठे हैं?
क्या हम उनके दर्शन को जी रहे हैं, या केवल परंपराओं को निभा रहे हैं?
समय की मांग है कि हम इस प्रवृत्ति पर पुनर्विचार करें।
महावीर जयंती को फिर से “विचार जयंती” बनाएं—जहाँ मंचों पर केवल भजन नहीं, बल्कि बहस हो; केवल आरती नहीं, बल्कि आत्मचिंतन हो; केवल आयोजन नहीं, बल्कि जागरण हो।
क्योंकि महावीर केवल पूजने के लिए नहीं, समझने और जीने के लिए हैं।
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