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पहले आत्मा से मिलना चाहिए

पहले आत्मा से मिलना चाहिए 

प्रो अनेकान्त कुमार जैन ,नई दिल्ली 

मनुष्य को समय-समय पर अपने भीतर की ओर भी लौटना चाहिए। यदि उसे अनुभव हो कि वह धीरे-धीरे बाह्य जगत से दूरी बना रहा है, तो उसे इसे तुरंत दुर्बलता नहीं मानना चाहिए। कई बार यह दूरी आत्मा की पुकार होती है—शुद्धात्म की ओर लौटने की एक सूक्ष्म प्रेरणा। जब बाह्य चेतना संबंधों, अपेक्षाओं और भूमिकाओं में अत्यधिक उलझ जाती है, तब आंतरिक चेतना थक जाती है। उस समय आत्मानुभव की साधना की आवश्यकता होती है ताकि हम नई ऊर्जा और उत्साह से भर सकें ।

गहरे एकांत और आत्मानुभव का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम अपने दैनिक कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन हो जाएं । जो सच्चे आत्मानुभवी थे उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया । बल्कि उन्होंने बाह्य कार्य अधिक कुशलता और ऊर्जा के साथ सफलता पूर्वक संपादित किये बिना चेहरे पर शिकन लाये । आसक्त मनुष्य बाह्य कार्यो को कुशलता पूर्वक करता है और अनासक्त मनुष्य बाह्य कार्यों में शिथिलता या उदासीनता रखता है - यह हमने गलत अवधारणा विकसित की है । बाहर की अस्तव्यस्तता अंदर की अस्तव्यस्तता की द्योतक भी होती है । 

बाह्य संबंध खराब नहीं होते हैं । संबंध जीवन का अंग हैं, पर मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वह केवल भूमिका नहीं है। वह न केवल मित्र है, न केवल पुत्र, न केवल पति या पत्नी,वह मूलतः शुद्धात्म है। जब व्यक्ति स्वयं को केवल सामाजिक अपेक्षाओं से परिभाषित करने लगता है, तब भीतर का आत्मस्वर दब जाता है। इसलिए उसे समय-समय पर भूमिकाओं से निवृत्त होकर अपने स्वरूप में स्थित होना चाहिए। यह निवृत्ति पलायन नहीं, बल्कि स्व-स्थिति है।

यदि शब्द थका दें, तो मौन का अभ्यास भी करना चाहिए। जैन दर्शन में मौन केवल वाणी का त्याग नहीं, बल्कि चित्त की स्थिरता है। साधक को यह देखना चाहिए कि वह हर प्रश्न का उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं है। कभी-कभी “मैं शांति में हूँ” कहना पर्याप्त होना चाहिए। क्योंकि आत्मानुभव का पथ भीड़ में नहीं, अंतर्मन की एकांत साधना में खुलता है।

प्रेम को स्वीकार करना चाहिए, पर आसक्ति से सावधान रहना चाहिए। प्रेम यदि अपेक्षाओं से बँध जाए, तो वह बंधन बन सकता है। साधक को ऐसा प्रेम विकसित करना चाहिए जो करुणा हो, पर निर्भरता न हो; सान्निध्य हो, पर स्वत्व का विस्मरण न हो। यदि मन थका हुआ हो, तो पहले स्वयं को स्थिर करना चाहिए। असंतुलित मन से निभाए गए संबंध राग-द्वेष को जन्म देते हैं। शुद्धात्म की ओर अग्रसर होने के लिए राग-द्वेष का क्षय करना चाहिए।

एकांत को साधना-क्षेत्र बनाना चाहिए। प्रतिदिन कुछ समय स्वयं के साथ बैठना चाहिए, स्वाध्याय करना चाहिए, स्व-स्मरण के साथ। यह विचार करना चाहिए: “मैं वास्तव में कौन हूँ? क्या मैं केवल यह मन, यह देह, यह भूमिका हूँ? या मैं इन सबका साक्षी शुद्धात्म हूँ?” ऐसे प्रश्न आत्मानुभव के द्वार खोलते हैं। जब मनुष्य साक्षीभाव में स्थित होता है, तब बाहरी अपेक्षाएँ स्वतः हल्की होने लगती हैं।

यदि भीतर उदासी का अनुभव हो, तो उसे दबाना नहीं चाहिए; बल्कि सम्यक्‌ दृष्टि से देखना चाहिए। जैन अध्यात्म सिखाता है कि प्रत्येक बाहरी भाव अनित्य है। मनुष्य को अपने भावों को जानना चाहिए, पर उनसे तादात्म्य नहीं करना चाहिए। 

“मैं दुखी हूँ” के स्थान पर “दुख का भाव उपस्थित है”—ऐसी साक्षी दृष्टि विकसित करनी चाहिए। यही विवेक आत्मा को बंधन से मुक्त करता है।

रात्रि के शांत क्षणों में जब आत्म-परीक्षण हो, तो उसे आत्म-आलोचना नहीं, आत्म-जागरण बनाना चाहिए। अपनी सीमाओं को स्वीकार करना चाहिए और स्वयं को क्षमा करना चाहिए। क्योंकि क्षमा ही आत्मा की स्वाभाविक प्रकृति है। दूसरों की अपेक्षाओं से अधिक महत्व अपने अंतःकरण की शुद्धि को देना चाहिए।

यदि व्यक्ति को लगे कि वह इस समय किसी के भावनात्मक उत्तरदायित्व के लिए समर्थ नहीं है, तो उसे विनम्रता से सीमाएँ निर्धारित करनी चाहिए। पहले आत्म-स्थित होना चाहिए, फिर जगत में प्रवृत्त होना चाहिए। जैसे साधु पहले अंतरंग संयम को पुष्ट करता है, फिर बाह्य आचरण को सुदृढ़ करता है।

सबसे आवश्यक यह समझना चाहिए कि दूरी भी कभी-कभी आत्म-उन्नति का साधन होती है। जैसे साधक तप के माध्यम से कर्म-निर्जरा करता है, वैसे ही थोड़े विराम से चित्त की शुद्धि होती है। इस विराम में श्वास पर ध्यान देना चाहिए, आत्म-स्वरूप का चिंतन करना चाहिए, और यह स्मरण रखना चाहिए—“मैं शुद्धात्म हूँ, अनादि-अनंत, चेतन स्वरूप।”

अंततः मनुष्य को किसी से भागना नहीं चाहिए; उसे अपने भीतर स्थिर होना चाहिए। जब वह आत्मानुभव में स्थित हो जाता है, तब उसका समाज से जुड़ना भी अधिक निर्मल, अधिक सम्यक्‌ और अधिक करुणामय होता है। पहले आत्मा से मिलना चाहिए, तभी जगत से सही अर्थ में मिलना संभव होता है।

1/3/2026

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