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भगवान् महावीर का संदेश : “जानो और जाने दो”

भगवान् महावीर का संदेश : “जानो और जाने दो”

प्रो अनेकांत कुमार जैन

भगवान् महावीर का संदेश “जियो और जीने दो” विश्वभर में अहिंसा और सह-अस्तित्व के सिद्धांत के रूप में प्रसिद्ध हुआ। किंतु उनके उपदेशों में एक और अत्यंत गहन आध्यात्मिक सूत्र मिलता है—“जानो और जाने दो”। यह संदेश मनुष्य को जीवन के प्रति सही दृष्टि देता है और आत्मा की वास्तविक प्रकृति को समझने का मार्ग दिखाता है।

जैन दर्शन के अनुसार संसार में अनंत प्रकार के पदार्थ, परिस्थितियाँ और अनुभव उपस्थित हैं। मनुष्य का स्वभाव प्रायः यह होता है कि वह इन पदार्थों को केवल जानता ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़ भी जाता है। यही जुड़ाव या आसक्ति दुःख और बंधन का कारण बनती है। भगवान् महावीर ने इसलिए यह स्पष्ट किया कि संसार के पदार्थों के प्रति केवल ज्ञान होना चाहिए, आसक्ति नहीं। अर्थात् उन्हें जानो, समझो, परंतु उनसे अपने मन को बाँधो मत; उन्हें जाने दो।

“जानो” का अर्थ है—वस्तुओं, परिस्थितियों और भावों के वास्तविक स्वरूप को समझना। जीवन में अच्छे और बुरे, दोनों प्रकार के अनुभव आते हैं। जैन दर्शन यह नहीं कहता कि उनसे आँखें बंद कर ली जाएँ; बल्कि यह कहता है कि उनका सही ज्ञान प्राप्त करो। जब मनुष्य वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में जानता है, तभी वह विवेकपूर्ण निर्णय ले सकता है। इसलिए सभी पदार्थों का ज्ञान आवश्यक है।

परंतु ज्ञान के साथ-साथ विवेक भी आवश्यक है। जो वस्तु या भाव आत्महित के लिए उपादेय है, अर्थात् जो आत्मा की उन्नति, शांति और शुद्धि में सहायक है, उसे ग्रहण करना उचित है। इसके विपरीत जो अनावश्यक, हानिकारक या बंधन का कारण है, उसे हेय मानकर त्याग देना चाहिए। यही “जाने दो” का वास्तविक अर्थ है। इसका अर्थ यह नहीं कि संसार से भाग जाओ, बल्कि यह है कि अनावश्यक आसक्ति को छोड़ दो।

जैन दर्शन में आत्मा की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता बताई गई है—आत्मा ज्ञाता है, ग्राहक नहीं। अर्थात् आत्मा का स्वभाव जानना और देखना है, न कि हर वस्तु को पकड़कर अपने साथ जोड़ लेना। जब आत्मा अपने इस स्वभाव को भूल जाती है और बाहरी पदार्थों में आसक्त हो जाती है, तब वह कर्मबंध में फँस जाती है। परंतु जब वह केवल साक्षी भाव से जानती है और आसक्ति को छोड़ देती है, तब वह स्वतंत्र और शांत हो जाती है।

इस दृष्टि से “जानो और जाने दो” जीवन जीने का अत्यंत संतुलित और व्यावहारिक सूत्र है। यह हमें सिखाता है कि संसार में रहते हुए भी विवेकपूर्वक जीवन जिया जा सकता है—सबको जानो, समझो, परंतु उनमें उलझो मत। जो आत्मकल्याण के लिए उपयोगी है उसे स्वीकार करो और जो बंधन का कारण है उसे सहज भाव से छोड़ दो।

इस प्रकार भगवान् महावीर का यह संदेश मनुष्य को आंतरिक स्वतंत्रता, विवेक और आत्मज्ञान की दिशा में अग्रसर करता है। वास्तव में जब मनुष्य जानने की शुद्ध दृष्टि और त्याग की भावना को अपनाता है, तभी वह अपने आत्मस्वरूप के निकट पहुँच पाता है और जीवन में वास्तविक शांति का अनुभव करता है।

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