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संदेश

मार्च, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भगवान् महावीर का संदेश : “जानो और जाने दो”

भगवान् महावीर का संदेश : “जानो और जाने दो” प्रो अनेकांत कुमार जैन भगवान् महावीर का संदेश “जियो और जीने दो” विश्वभर में अहिंसा और सह-अस्तित्व के सिद्धांत के रूप में प्रसिद्ध हुआ। किंतु उनके उपदेशों में एक और अत्यंत गहन आध्यात्मिक सूत्र मिलता है—“जानो और जाने दो”। यह संदेश मनुष्य को जीवन के प्रति सही दृष्टि देता है और आत्मा की वास्तविक प्रकृति को समझने का मार्ग दिखाता है। जैन दर्शन के अनुसार संसार में अनंत प्रकार के पदार्थ, परिस्थितियाँ और अनुभव उपस्थित हैं। मनुष्य का स्वभाव प्रायः यह होता है कि वह इन पदार्थों को केवल जानता ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़ भी जाता है। यही जुड़ाव या आसक्ति दुःख और बंधन का कारण बनती है। भगवान् महावीर ने इसलिए यह स्पष्ट किया कि संसार के पदार्थों के प्रति केवल ज्ञान होना चाहिए, आसक्ति नहीं। अर्थात् उन्हें जानो, समझो, परंतु उनसे अपने मन को बाँधो मत; उन्हें जाने दो। “जानो” का अर्थ है—वस्तुओं, परिस्थितियों और भावों के वास्तविक स्वरूप को समझना। जीवन में अच्छे और बुरे, दोनों प्रकार के अनुभव आते हैं। जैन दर्शन यह नहीं कहता कि उनसे आँखें बंद कर ली जाएँ; बल्...

महावीर जयंती का बदलता स्वरूप

महावीर जयंती का बदलता स्वरूप  प्रो अनेकांत कुमार जैन  कभी महावीर जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि विचारों का पर्व भी हुआ करती थी। उस दिन मंच सजते थे—केवल पूजा के लिए नहीं, बल्कि चिंतन के लिए भी। नगर के जैन और जैनेतर विद्वान, साहित्यकार, कवि, बुद्धिजीवी, नेता—सभी एकत्र होकर भगवान महावीर के जीवन, उनके दर्शन, अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत के गूढ़ संदेशों पर मंथन करते थे।बाद में उनके विचार छपते थे जो संदर्भ बनते थे ।  आज दृश्य बदल गया है। महावीर जयंती अब अधिकतर पूजन-अभिषेक, झूलनोत्सव, प्रभात फेरी और सामूहिक भोज तक सिमटती जा रही है। उत्सव है—पर विमर्श नहीं। श्रद्धा है—पर संवाद नहीं। आस्था है—पर आत्ममंथन कहीं खो गया है। क्या यह विडंबना नहीं कि जिन भगवान महावीर ने हमें सोचने, प्रश्न करने और सत्य की खोज का मार्ग दिखाया, उनके ही जन्मोत्सव पर हम विचार करना छोड़ बैठे हैं? क्या हम उनके दर्शन को जी रहे हैं, या केवल परंपराओं को निभा रहे हैं? समय की मांग है कि हम इस प्रवृत्ति पर पुनर्विचार करें। महावीर जयंती को फिर से “विचार जयंती” बनाएं—जहाँ मंचों पर केवल भजन नहीं, बल्कि बहस ह...

तीर्थंकर महावीर का भारत पर प्रभाव

तीर्थंकर महावीर का भारत पर प्रभाव प्रो.अनेकान्त कुमार जैन , आचार्य- जैनदर्शन विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली  9711397716 drakjain2016@gmail.com https://youtube.com/@anekantkumarjain भगवान महावीर ने ईसा की छठी शताब्दी पूर्व से ही प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की परम्परा को अक्षुण्ण रखते हुए अहिंसा की सूक्ष्म व्याख्यायें की और जीव हिंसा ही सबसे बड़ा अधर्म है इस बात की घोषणा की थी। चाहे कितना भी बड़ा धर्म क्यों न हो, अच्छाइयां और बुराइयां हर धर्म में उपस्थित हो जाती हैं। धर्म अपने आप में एक पवित्र तीर्थ है किन्तु उसको धारण करने वाले अनुयायी व्यक्तिगत कमजोरियों को धर्म का जामा पहना कर उसे व्याख्यायित करते हैं और स्वयं के दोषों का आरोप धर्म या सम्प्रदाय पर आ जाता है। धर्म से इन्हीं कमियों को दूर करने के लिए अनेक महात्माओं ने आलोचनायें की हैं और यही कारण है कि धर्म उन दलदलों से थोड़ा-बहुत तो बच पाया । भगवान महावीर ने जो अहिंसा,शाकाहार का क्रान्तिकारी सन्देश दिया उसका जबरजस्त प्रभाव पूरे भारतीय जनमानस पर पड़ा। उसके स्वर जैन परम्परा में तो गूं...

पहले आत्मा से मिलना चाहिए

पहले आत्मा से मिलना चाहिए  प्रो अनेकान्त कुमार जैन ,नई दिल्ली  मनुष्य को समय-समय पर अपने भीतर की ओर भी लौटना चाहिए। यदि उसे अनुभव हो कि वह धीरे-धीरे बाह्य जगत से दूरी बना रहा है, तो उसे इसे तुरंत दुर्बलता नहीं मानना चाहिए। कई बार यह दूरी आत्मा की पुकार होती है—शुद्धात्म की ओर लौटने की एक सूक्ष्म प्रेरणा। जब बाह्य चेतना संबंधों, अपेक्षाओं और भूमिकाओं में अत्यधिक उलझ जाती है, तब आंतरिक चेतना थक जाती है। उस समय आत्मानुभव की साधना की आवश्यकता होती है ताकि हम नई ऊर्जा और उत्साह से भर सकें । गहरे एकांत और आत्मानुभव का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम अपने दैनिक कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन हो जाएं । जो सच्चे आत्मानुभवी थे उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया । बल्कि उन्होंने बाह्य कार्य अधिक कुशलता और ऊर्जा के साथ सफलता पूर्वक संपादित किये बिना चेहरे पर शिकन लाये । आसक्त मनुष्य बाह्य कार्यो को कुशलता पूर्वक करता है और अनासक्त मनुष्य बाह्य कार्यों में शिथिलता या उदासीनता रखता है - यह हमने गलत अवधारणा विकसित की है । बाहर की अस्तव्यस्तता अंदर की अस्तव्यस्तता की द्योतक भी होत...