सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

अक्टूबर, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विशुद्ध समयसार मय हुई दिल्ली

*विशुद्ध समयसार मय हुई दिल्ली* 10 अक्टूबर 2026 का दिन देश की राजधानी दिल्ली के लिए ऐतिहासिक था । दिल्ली आने वाली सौ से अधिक ट्रेनों को अचानक रद्द कर दिया गया , पूरी दिल्ली में लगभग 40000 पुलिस और अर्ध सैनिक बल बैरीकेट लगा कर सारी बॉर्डर को सील करके , चौराहे चौराहे पर सघन जांच कर रहे थे ...उद्देश्य था *जंतर मंतर के प्रदर्शन को रोकना*  उधर इसी दिन दिल्ली के ऋषभ विहार में समयसार की समयदेशना पर आधारित तीन दिन की राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी का आगाज हुआ जिसमें पूरे देश के 30 वरिष्ठ जैन विद्वान् पंडित एकत्रित हुए और आचार्य विशुद्ध सागर महाराज के सर्व विशुद्ध ज्ञानाधिकार पर अद्वितीय क्रांतिकारी आध्यात्मिक प्रवचन हुए और इसका भी उद्देश्य था आध्यात्मिक जैनधर्म में बढ़ रहे *जंतर मंतर के प्रदर्शन को रोकना* ।  उधर सरकार प्रदर्शनकारियों को समझा रही थी , इधर आचार्य श्री भी प्रदर्शनकारियों को समझा रहे थे कि जैन धर्म प्रदर्शन का नहीं आत्मदर्शन का धर्म है ।  आचार्य श्री ने एक दिन पहले तक देश के दर्जनों प्रतिष्ठाचार्यों को मूर्ति प्रतिष्ठा के सूत्र दिए फिर समयसार गोष्ठी में मूर्तिमान की प्रतिष...

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार का उद्देश्य

  सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार का उद्देश्य                                                                 प्रो.अनेकांत कुमार जैन            सर्वविशुद्ध ज्ञानाधिकार का मूल उद्देश्य आत्मा के ऐसे शुद्ध स्वरूप को   बताना है , जो जीव को परद्रव्य और परभाव के मोह से मुक्त कर उसके ही निज ज्ञायक स्वभाव में उसे स्थित कर सके । आत्मा का वास्तविक स्वरूप ज्ञान और चेतना है , कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं। जब तक जीव अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं पहचानता , तब तक वह शरीर , कर्म , राग , द्वेष , सुख और दुःख के भावों में तादात्म्य स्थापित करके स्वयं को कर्ता और भोक्ता मानता रहता है।           आचार्य कुन्दकुन्द स्वर्ण और कटक आदि आभूषणों का दृष्टान्त देकर समझाते हैं कि जैसे स्वर्ण अपने कंगन , कुण्डल आदि पर्यायों से अभिन्न है , वैसे ही प्रत्येक द्रव्य ...

महात्मा गांधी का जिनवाणी प्रेम

*महात्मा गांधी का जिनवाणी प्रेम* महात्मा गांधी और जैन धर्म का संबंध केवल अहिंसा की अवधारणा तक सीमित नहीं था। जैन साधना, जैन शास्त्र, जैन साहित्य और जैन विद्वानों के प्रति उनके मन में गहरी आत्मीयता और श्रद्धा थी। उनके अपने शब्दों में जैन धर्म और जैन समाज के प्रति व्यक्त भाव इस संबंध के एक महत्त्वपूर्ण पक्ष को सामने रखते हैं। मुंबई में आयोजित एक जैन कॉन्फ्रेंस में महात्मा गांधी ने एक व्याख्यान प्रस्तुत किया था। उस अवसर पर उन्होंने जैन धर्म और जैन समाज के प्रति अपनी आत्मीयता व्यक्त करते हुए कहा था- *मेरे लिए तो मुक्ति का दरवाजा अहिंसा धर्म का पलना है। मुझ पर जैन भाइयों की इस कदर कृपादृष्टि है कि मुझको उनकी लेना देनी है। भारतवर्ष में एक सगे भाई के समान भाईबंदी के साथ रहने का दावा जैन ही कर सकते हैं।* आगे उन्होंने कहा। *मेरे परम मित्र डॉक्टर प्राणजीवन जैन हैं, जिनके चरित्र का मुझको सम्मान है। रायचंद भाई मेरे मित्र थे और शहर मुंबई में मेरे रहने का जो स्थान है, वह भी एक देवाशंकर जैन भाई का है। सफर के मध्य मुझे बहुत से जैन भाइयों से अक्सर वास्ता पड़ा है और बहुत से उस समय मुझसे पूछते हैं कि क्य...