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सत्य की खोज और मोह का नाश

*सत्य की खोज और मोह का नाश*

प्रो.अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली
१/११/२०२६

सत्य की खोज तो  भव्य जीवों के  किसी भी उम्र में शुरू हो सकती है ,लेकिन वृद्धावस्था में जीवन के सारे सांसारिक अनुभव चख लेने के बाद वास्तविक अर्थों में जीवन का रहस्य समझना चाहता है तो उसे समझाना ज्यादा कठिन नहीं होता क्यों कि आधे से अधिक ज्ञान तो उसे जीवन के कटु अनुभवों से प्रायोगिक तौर पर भी हो चुका होता है । 

वृद्धा अवस्था में भी चेतना जाग जाये - यह भी सौभाग्य है ,अन्यथा अन्यान्य तो विषय भोगों की तृष्णा में ही बुढ़ापा काटते है और उसी में तड़प कर मर जाते हैं । 

*एक बुजुर्ग साधर्मी भाई ने पूछा है कि मोह का क्षय कैसे करें ? कोई शॉर्ट कट बताओ ?* 
उन्होंने फोन पर तीन चार प्रश्न किए हैं और उसके समाधान देने का मैंने अपनी अल्प प्रज्ञा और अनुभव से प्रयास किया है ,जिन्हें सभी के हितार्थ मैं लिखने का प्रयास कर रहा हूं - 

 *मेरे दुखों का मूल कारण क्या है ?* 

मोह ही असली दुख का कारण है और  मोह का क्षय ही आत्म शांति की महत्त्वपूर्ण साधना है.

 *मोह का कारण क्या है ?* 

अज्ञानता ही मोह की मूल जड़ है । बिना अज्ञानता दूर हुए मोह नष्ट होना तो दूर कम भी नहीं हो सकता । 

 *अज्ञानता क्या है ?* 

खुद के वास्तविक स्वरूप की सच्ची समझ न होना ही अज्ञानता है । 

 *यह अज्ञानता दूर कैसे होगी ?* 

सिर्फ और सिर्फ स्वाध्याय से ,जितना समय हो सके जिनवाणी के मर्म को समझने में लगाइये । सिर्फ प्रवचन सुनना ही नहीं , बल्कि स्वयं शास्त्र खोलकर प्रतिज्ञा बद्ध होकर स्वयं पढ़ना ही असली स्वाध्याय है । 
मोह कम करने के लिए यह ही प्रथम शुरुआत है ।

 *मोह क्या है ?* 

सामान्य भाषा में लोग सगे संबंधियों के प्रति अत्यधिक प्रेम और  वस्तुओं में अत्यधिक आसक्ति को मोह कहते हैं । इससे रहित होने को मोह छूट जाना मानते हैं , परन्तु उसकी जड़ पर ध्यान नहीं देते हैं ... थोड़ा उसकी जड़ को समझते हैं ....

 मोहनीय कर्म को समस्त कर्मों में सर्वाधिक शक्तिशाली माना गया है, क्योंकि यही आत्मा के वास्तविक स्वरूप के बोध और अनुभव को प्रभावित करता है।

मोह का क्षय बाहरी त्याग, तपस्या अथवा पूजा पाठ के साथ साथ , वास्तव में आत्मस्वरूप की सच्ची पहचान से होता है।

 मोहनीय कर्म के दो प्रमुख भेद हैं:

* दर्शनमोहनीय कर्म - जो आत्मा के यथार्थ श्रद्धान को विकृत करता है।

* चारित्रमोहनीय कर्म - जो आत्मा को राग-द्वेष, कषाय और विषयासक्ति में प्रवृत्त करता है।

चारित्रमोहनीय कर्म के अंतर्गत चार प्रमुख कषाय आती हैं 

* क्रोध - आत्मिक शान्ति का विनाश।

* मान -अहंकार एवं श्रेष्ठत्व का भाव।

* माया - कपट एवं छल की प्रवृत्ति।

* लोभ - संग्रह एवं आसक्ति की प्रवृत्ति।

इन चारों कषायों को क्रमशः कम करना ही मोहक्षय की दिशा में आगे बढ़ना है।

*मोह क्षय के प्रमुख उपाय*

 *(1) आत्मानुभूति एवं स्वभाव की पहचान* 

आत्मा और शरीर, आत्मा और मन, आत्मा और बाह्य पदार्थों के भेद का निरन्तर चिन्तन करना। यह समझना कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त वीर्य है।

इसके लिए प्रतिदिन शास्त्र स्वाध्याय आवश्यक है । शास्त्र स्वयं पढ़ना ही श्रेष्ठतम उपाय है । 

 *(2) सम्यग्दर्शन की प्राप्ति* 

देव, शास्त्र और गुरु के प्रति यथार्थ श्रद्धा तथा तत्त्वों का सम्यक् श्रद्धान। मिथ्यात्व का निवारण मोहक्षय की प्रथम महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

इसके लिए भी प्रतिदिन शास्त्र स्वाध्याय आवश्यक है । शास्त्र स्वयं पढ़ना ही श्रेष्ठतम उपाय है । 

 *(3) कषायों को कम करना* 

क्रोध के स्थान पर क्षमा, मान के स्थान पर विनय, माया के स्थान पर सरलता और लोभ के स्थान पर संतोष का अभ्यास करना।

बिना सही ज्ञान के इन पर विजय भी मुश्किल है अतः इसके लिए भी प्रतिदिन शास्त्र स्वाध्याय आवश्यक है । शास्त्र स्वयं पढ़ना ही श्रेष्ठतम उपाय है । 

 *(4) समभाव का अभ्यास* 

प्रिय-अप्रिय, लाभ-अलाभ, मान-अपमान तथा सुख-दुःख की परिस्थितियों में समभाव का अभ्यास करना। वस्तुओं के प्रति ममत्व कम करना।

इसके लिए भी प्रतिदिन शास्त्र स्वाध्याय आवश्यक है । शास्त्र स्वयं पढ़ना ही श्रेष्ठतम उपाय है । 

 *(5) बारह भावनाओं का चिन्तन* 

विशेष रूप से अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि और धर्म भावनाओं का बार-बार चिन्तन करना। इससे बाह्य पदार्थों के प्रति आसक्ति कमजोर होती है।

इसके लिए स्वाध्याय के साथ मौन रहकर आत्मचिंतन ,ध्यान बहुत आवश्यक है । 

 *(6) तप एवं संयम* 

व्रत उपवास आदि
बाह्य तप के साथ साथ आभ्यन्तर तप पर विशेष ध्यान देना है। इनमें प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान प्रमुख हैं।

*मोह क्षय का रामबाण सूत्र*

मोह का मूल कारण परपदार्थों में आत्मबुद्धि और ममत्व है। जब यह जीव शरीर को आत्मा, परपदार्थों को अपना तथा क्षणिक इंद्रिय सुख को वास्तविक सुख मानता है, तभी मोह की प्रवृत्ति सुदृढ़ हो जाती है।

इसलिए मोहक्षय का वास्तविक उपाय है -
*ज्ञाता-दृष्टा भाव में स्थित होकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप का अनुभव करना।*

 मोह को केवल दबाना मोहक्षय नहीं है। 

*दैनिक जीवन में मोहक्षय के प्रयोग*

प्रतिदिन इन पाँच बातों का अभ्यास किया जा सकता है:

* किसी के प्रति क्रोध उत्पन्न हो तो तत्काल प्रतिक्रिया न देकर क्षमा का भाव रखना।

* प्रशंसा और निन्दा दोनों में अप्रभावित रहकर आत्मस्थ रहने का अभ्यास करना।

* प्रतिदिन कुछ समय ध्यान करना और आत्मा और शरीर के भेद का चिन्तन करना।

* रात्रि में सामायिक करके सोना एवं आत्मनिरीक्षण करना कि आज किन परिस्थितियों में राग-द्वेष और कषाय उत्पन्न हुए, उन दोषों का प्रायश्चित करना।  

*अवश्य चिंतन*: 

जब सम्यग्दर्शन से मिथ्यात्व दूर होता है, सम्यग्ज्ञान से आत्मस्वरूप का बोध होता है और सम्यक्चारित्र से कषायों का उन्मूलन होता है, तब जीव आत्म का अनुभव करता है और क्रमशः वीतरागता को प्राप्त करता  है।

परपदार्थों से ममत्व की निवृत्ति, कषायों की शुद्धि और आत्मस्वभाव में स्थिरता ही मोहक्षय की वास्तविक साधना है। 

पूर्ण मोह क्षय मुनि व्रत अंगीकार करने के अनंतर ही होता है ।

गृहस्थ व्यक्ति मोह को कम करने का सतत अभ्यास करता है , जब वह अच्छे कार्यों के लिए निःस्वार्थ धन का दान करता है - तब वह धन के मोह को कम करता है ।  

जब वह अपने रिश्तेदारों और सगे संबंधियों के प्रति ज्यादा चिंता करना बंद कर देता है और यह सोचना शुरू कर देता है कि ये सब अपने अपने पुण्य पाप को भोग रहे हैं , मेरा इसमें कुछ भी कर्त्तापन नहीं है  - तब वह मोह को कम करता है । 

मेरे बाद भी इनका जीवन इनके ही पुण्य पाप कर्म के फल के अनुसार चलेगा - इसमें मेरा कुछ भी कर्तृत्व नहीं रहेगा - ऐसा चिंतन उसके मोह को कम करता है । 

इनका मेरे प्रति जो प्रेम है ,वह भी इनका मोह है , स्वार्थ है । 

वह विचार करता है 
जैसे भिन्न दिशाओं से उड़कर आए पंछी एक रात एक ही वृक्ष पर रुकते हैं और सुबह होते ही अपनी अपनी दिशाओं में उड़ जाते हैं , वैसे ही मेरा जो घर संसार है वह उसी वृक्ष की तरह है , मेरे जो नाते रिश्तेदार सगे संबंधी हैं वे उन पंछियों की तरह हैं, यह जो रात है वह हमारा पारिवारिक काल है , जिसकी जब सुबह होगी उड़ जाएगा , मेरी भी जब सुबह होगी ,मैं भी उड़ जाऊंगा । 

उसके बाद कोई किसी का नहीं।  सारा रोना धोना यहीं का है । 

वह सोचता है - यह मनुष्य जन्म , उच्च जैन कुल बहुत , वीतरागी जिनेंद्र देव जैसा निमित्त ,जिनवाणी का स्वाध्याय बहुत महा भाग्य से मिला है , अगर हम इसका उपयोग नहीं कर पाए और आयु पूरी हो गई तो कोई उपाय नहीं बचेगा  । 

फिर दूसरा जन्म न जाने किस पर्याय में मिले , वहाँ सोचने समझने की क्षमता भी होगी कि नहीं होगी ? 

इसलिए अपनी मृत्यु की आकांक्षा करना उसकी सोचना भी महापाप है , मूर्खता है । आयु कर्म पूरा हो जाएगा तो वह अपने आप हो जाएगी । बल्कि बुद्धिमानी इस बात में है कि किसी तरह निर्दोष औषधि दवाई आदि का सेवन करके , स्वास्थ्य के अनुकूल ही व्रत उपवास करके  अपने जीवन को सुरक्षित रखने का पूर्ण प्रयास करना चाहिए । 

अब मुझे जीवन भोग के लिए नहीं बल्कि योग के लिए चाहिए । अब व्यर्थ की बातों में समय नहीं गंवाना है ,अब पर्याय की चिंता नहीं करनी है अब अपने शुद्ध द्रव्य को देखने जानने और अनुभव करने का प्रयास करना है । 

मुझे अब किसी को समझाना नहीं है , अब खुद समझना है । मुझे किसी से तर्क नहीं करना है , बल्कि अपना अनुभव करना है । मुझे अब धन नहीं ज्ञान अर्जित करना है । क्यों कि धन मेरे साथ नहीं जाएगा , ज्ञान मेरे साथ जाएगा । 

जो धन मेरे पास है वह खर्च करना है और पुण्य अर्जित करना है । 

कोई मुझे न पूछे , शादी विवाह ,सभा ,सम्मेलन आदि में न बुलाए तो परेशान नहीं होना है ,बल्कि उसे अच्छा समझना है कि उसने मेरा समय बचाया । उसका उपकार मानना है । और पूछे, बुलाये तो दूर से ही बधाई देकर निपटाना है । अपना समय बचाना है । 

जो काम जीवन भर किया , जिसे सबसे ज्यादा समय दिया  अब उससे बचना है बल्कि शेष समय अपनी निज साधना में लगाना है ।

किसी से कुछ कहना नहीं है , मांगना नहीं है , चाहिए नहीं है  , किसी से कुछ अपेक्षा भी नहीं करनी है । कोई इज्जत करे कि न करे ये उसकी समस्या है , अब मेरी समस्या नहीं है ,हमें तो बस अपना काम करना है । 

जिनवाणी ही परम औषधि है , वो ही सुरक्षित करेगी उसका सेवन करना है , उसमें जो जीवन सार बताया है उसे समझना है बस - मोह का क्षय अपने आप होगा - उसमें कुछ करना नहीं है । 

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