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जून, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

परंपरा और आधुनिकता

परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष बहुत पुराना है । परम्पराएं  जड़ से जोड़े रखती हैं लेकिन जड़ भी बनाती हैं और आधुनिकता बाह्य विकास तो देती है लेकिन जड़ से उखाड़ देती है । हम न ही जड़ होना चाहते हैं और न ही जड़ से उखाड़ना चाहते हैं । आधुनिकता को पूर्व के साथ निरंतरता बनाए रखने के लिए परंपरा और उसकी ऊर्जा चेतना की आवश्यकता होती है , इसलिए उसका लाभ लेने के लिए उसके साथ रहने की वकालत करती है और उसका हस्तक्षेप भी अपने लाभ के लिए चाहती है ,लेकिन कुछ समय बाद हस्तक्षेप के प्रक्रिया उल्टी हो जाती है । आधुनिकता अपनी शक्तिशाली शर्तों के अनुरूप परंपरा को ढालने का प्रयास करती है । परंपरा मजबूरी में क्षद्म आधुनिकता की शिकार होने लगती है ,उसे अपने  वजूद की रक्षा के लिए भी आधुनिकता का सहारा चाहिए होता है और अपनी मूल जड़ को भी सुरक्षित रखने की जिद होती है ।  परंपरा से पहले समन्वय की बात से शुरुआत होती है और फिर वह विलय में तब्दील हो जाती है ।  आधुनिकता की जींस पेंट पहनकर ऊपर से परंपरा का कुर्ता पहन कर काम चलाना पड़ता है । और ज्यादा एडजेस्ट करना हो तो , धोती भी पेंट की तरह सिली सिलाई पहनकर ऊप...

श्रुत तीर्थ का संरक्षक है चातुर्मास

  श्रुत तीर्थ का संरक्षक है चातुर्मास Prof. Anekant Kumar Jain Dean, School of Philosophy Shri Lal Bahadur Shastri National Sanskrit University New Delhi – 110016 प्रायः जब तीर्थ की चर्चा होती है तो हमारा ध्यान केवल सम्मेदशिखर, अयोध्या आदि तीर्थस्थलों की ओर जाता है। किन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि जैन परम्परा में केवल तीर्थस्थलों को ही नहीं, बल्कि श्रुत को भी तीर्थ कहा गया है। इसीलिए कहा गया है ‘ श्रुतं गणधरा वा तीर्थमित्युच्यते।’ (भगवती आराधना, विजयोदया टीका) इसी प्रकार ‘तीर्थमागमः’ (समाधिशतक टीका) कहकर आगम को भी तीर्थ की संज्ञा प्रदान की गई है। आचार्य कुन्दकुन्ददेव तो इससे भी आगे बढ़कर कहते हैं— जं णिम्मलं सुधम्मं सम्मत्तं संजमं णाणं। तं तित्थजिणमग्गे हवेइ जदि संतिभावेण।। (बोधपाहुड २७) अर्थात् जिनमार्ग में उत्तम धर्म, सम्यक्त्व, संयम और यथार्थ ज्ञान ही तीर्थ हैं। जब ये सब शान्त भाव सहित होते हैं, तभी वे निर्मल तीर्थ कहलाते हैं। स्पष्ट है कि जैसे अयोध्या, सम्मेदशिखर, गिरनार आदि शाश्वत तीर्थों की रक्षा हमारा कर्तव्य है, उसी प्रकार तीर्थंकर भगवान् महावीर की वाणी, जैन धर्म-दर्शन, तत्...

जैन श्रमण संस्कृति का वास्तविक प्रतीक कौन ? भरत या बाहुबली ?

जैन परंपरा के तीर्थंकर ऋषभदेव का उल्लेख वेदों और वैदिक पुराणों में भी किया गया है । जैन विद्वानों ने जैन परंपरा की प्राचीनता इनके सामने सिद्ध करने के लिए इनके संदर्भ प्रचुर मात्रा में दिए ,अनेक ग्रंथ लिखे ,शोध पत्र लिखे । ये जो कार्य हुआ ,वह निश्चित ही प्रशंसनीय है किंतु  उसमें आज भी कई लेखक और पोस्टर निर्माता तक जैन आगम के संदर्भों को उल्लिखित या तो करते ही नहीं है या बहुत कम करते हैं । अभी ऋषभदेव जयंती पर भी जैन मीडिया प्लेटफॉर्म से कुछ वीडियो और रील फैलाए गए जिसमें सारे इंटरव्यू जैनेतर लोगों के थे ,मात्र जैनेतर प्रमाणों से भरपूर उस वीडियो को मैंने सराहना के साथ साथ सावधान भी किया था । उसमें एक दो जैन मुनियों और विद्वानों के वक्तव्य और जैन आगमों  के उद्धरण भी होने चाहिए थे ।  दिल्ली में एक चातुर्मास के  भव्य कार्यक्रमों में जिसमें बड़े बड़े नेता मंत्री आते रहे ,उन्हें भरत से भारत का एक बड़ा एलबम इसलिए भेंट किया गया ताकि वे अपने मंत्रालयों कार्यालयों घरों में उसे टांगें , उसमें भी जो श्लोक लिखा था वह श्रीमद्भागवत का ही था , किसी भी जैन शास्त्रों का इससे संबंधित कोई ...