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श्रुत तीर्थ का संरक्षक है चातुर्मास

 श्रुत तीर्थ का संरक्षक है चातुर्मास


Prof. Anekant Kumar Jain

Dean, School of Philosophy

Shri Lal Bahadur Shastri National Sanskrit University

New Delhi – 110016


प्रायः जब तीर्थ की चर्चा होती है तो हमारा ध्यान केवल सम्मेदशिखर, अयोध्या आदि तीर्थस्थलों की ओर जाता है। किन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि जैन परम्परा में केवल तीर्थस्थलों को ही नहीं, बल्कि श्रुत को भी तीर्थ कहा गया है। इसीलिए कहा गया है

श्रुतं गणधरा वा तीर्थमित्युच्यते।’

(भगवती आराधना, विजयोदया टीका)

इसी प्रकार ‘तीर्थमागमः’ (समाधिशतक टीका) कहकर आगम को भी तीर्थ की संज्ञा प्रदान की गई है।

आचार्य कुन्दकुन्ददेव तो इससे भी आगे बढ़कर कहते हैं—

जं णिम्मलं सुधम्मं सम्मत्तं संजमं णाणं।

तं तित्थजिणमग्गे हवेइ जदि संतिभावेण।।

(बोधपाहुड २७)

अर्थात् जिनमार्ग में उत्तम धर्म, सम्यक्त्व, संयम और यथार्थ ज्ञान ही तीर्थ हैं। जब ये सब शान्त भाव सहित होते हैं, तभी वे निर्मल तीर्थ कहलाते हैं।

स्पष्ट है कि जैसे अयोध्या, सम्मेदशिखर, गिरनार आदि शाश्वत तीर्थों की रक्षा हमारा कर्तव्य है, उसी प्रकार तीर्थंकर भगवान् महावीर की वाणी, जैन धर्म-दर्शन, तत्त्वज्ञान, प्राकृत भाषा तथा उसमें निबद्ध आगम-साहित्य का संरक्षण और संवर्धन भी उतना ही आवश्यक है। यदि भौतिक तीर्थ हमारी श्रद्धा के केन्द्र हैं, तो श्रुत तीर्थ हमारी आध्यात्मिक चेतना का आधार है।

वर्तमान में श्रुत की स्थिति

समयसार, रत्नकरण्ड श्रावकाचार, द्रव्यसंग्रह और तत्त्वार्थसूत्र जैसे ग्रंथ आज भी मंदिरों, शिविरों तथा विश्वविद्यालयों में किसी न किसी रूप में पढ़े और पढ़ाए जाते हैं। आधुनिक पाठ्यक्रमों, विशेषकर एम.ए. जैनविद्या में भी इनका परिचय मिल जाता है।

किन्तु प्रवचनसार, आप्तमीमांसा, प्रमेयरत्नमाला, न्यायदीपिका, परीक्षामुखसूत्र, प्रमाणमीमांसा, प्रमेयकमलमार्तण्ड, स्याद्वादमञ्जरी, षड्दर्शनसमुच्चय, अष्टसहस्री जैसे दार्शनिक ग्रंथ मूलतः संस्कृत और प्राकृत की पारम्परिक अध्ययन-पद्धति से ही समझे जा सकते हैं। इनके बिना कोई व्यक्ति प्रवचनकार, विधानाचार्य अथवा प्रतिष्ठाचार्य तो बन सकता है, किन्तु जैन दर्शन का प्रामाणिक दार्शनिक विद्वान् बनना अत्यन्त कठिन है। यह केवल मत नहीं, अनुभव का निष्कर्ष है।

संस्कृत और प्राकृत के गंभीर अध्ययन में विद्यार्थियों की घटती रुचि तथा प्रशिक्षित अध्यापकों की कमी के कारण अष्टसहस्री, प्रमेयकमलमार्तण्ड, तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकालंकार जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ धीरे-धीरे पाठ्यक्रमों से बाहर होते गए। यह किसी सिद्धान्त का नहीं, बल्कि एक कटु व्यावहारिक यथार्थ का परिणाम है।

स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि सुविधा की दृष्टि से पाठ्यक्रमों में रखे गए अपेक्षाकृत सरल ग्रंथ भी विद्यार्थियों को कठिन प्रतीत होने लगे हैं। जबकि यही ग्रंथ जैन दर्शन की गहराई तक पहुँचने का प्रवेश-द्वार हैं।

मेरा स्पष्ट मत है कि यदि उमास्वामी, समन्तभद्र, सिद्धसेन, पूज्यपाद, अकलंक, विद्यानन्द, माणिक्यनन्दि, प्रभाचन्द्र, हरिभद्र और हेमचन्द्र जैसे महान् आचार्यों ने संस्कृत में तर्क, प्रमाण और दर्शन का विपुल साहित्य न रचा होता, तो जैन धर्म केवल एक धार्मिक परम्परा बनकर रह जाता। भारतीय दर्शन की मुख्य धारा में आज जैन दर्शन जिस सम्मान के साथ प्रतिष्ठित है, उसके पीछे इन महापुरुषों का असाधारण बौद्धिक योगदान है।

बंद होते विद्यालय और परीक्षा बोर्ड

एक समय था जब देश के विभिन्न भागों में ऐसे जैन परीक्षा बोर्ड सक्रिय थे, जो न्याय, दर्शन और आगम के गंभीर अध्ययन की परम्परा को जीवित रखते थे। पाथर्डी, इन्दौर, कलकत्ता, मुंबई आदि केन्द्रों से न्यायतीर्थ, न्यायदिवाकर, न्यायशिरोमणि जैसी उपाधियाँ कठोर परीक्षाओं के उपरान्त प्रदान की जाती थीं। अनेक साधु और विद्वान् इन परीक्षाओं में सम्मिलित होकर अपनी विद्वत्ता का परिचय देते थे। पुराने विद्वानों के नाम के साथ जुड़ी ये उपाधियाँ उसी समृद्ध श्रुत-परम्परा की साक्षी हैं।

आज प्रश्न यह है कि वे परीक्षा बोर्ड कहाँ चले गए? वे अध्ययन-केन्द्र क्यों निष्क्रिय हो गए? श्रुत तीर्थ के इन सशक्त माध्यमों के प्रति यह उदासीनता क्यों उत्पन्न हुई? इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

जो लोग केवल तात्कालिक प्रसिद्धि को ही उपलब्धि मानते हैं, उन्हें भी यह विचार करना चाहिए कि आचार्य कुन्दकुन्द, समन्तभद्र, पूज्यपाद, अकलंक, विद्यानन्द, प्रभाचन्द्र और हेमचन्द्र जैसे महापुरुष आज भी किस कारण स्मरण किए जाते हैं। उनकी अमरता का आधार न सत्ता थी, न सम्पत्ति और न जनसमूह का आकर्षण। उनका वास्तविक तीर्थ-प्रवर्तन श्रुत तीर्थ का प्रवर्तन था। इसी कारण सहस्राब्दियों के बाद भी उनका ज्ञान आज हमारे बीच जीवित है।

प्रवचन तत्काल प्रेरणा दे सकते हैं, किन्तु स्थायी संरक्षण उच्चकोटि के शास्त्र-लेखन, अध्ययन और अध्यापन से ही सम्भव होता है।

समय के साथ आधुनिक शिक्षा में रोजगार, कौशल विकास, कम्प्यूटर ज्ञान आदि का समावेश आवश्यक था। यह परिवर्तन स्वाभाविक भी है। किन्तु दुःख इस बात का है कि इस प्रक्रिया में मूल शास्त्रों का अध्ययन धीरे-धीरे हाशिये पर पहुँचता गया। संस्कृत और प्राकृत के पारम्परिक अध्ययन की ज्योति आधुनिकता की चकाचौंध के बीच मन्द पड़ती दिखाई देती है।

प्रकाशित दुर्लभ शास्त्र भी नष्ट हो रहे हैं

अनेक संस्कृत विद्यालय और महाविद्यालय वर्षों से रिक्त पड़े पदों को ही अपनी नियति मान चुके हैं। जो नियमित अध्यापक उपलब्ध हैं, उनमें से भी अनेक प्रवचन, पूजापाठ, ज्योतिष अथवा अन्य सामाजिक कार्यों में अपनी अतिरिक्त ऊर्जा और समय लगाने के लिए विवश हैं। यह किसी एक व्यक्ति का दोष नहीं, बल्कि एक व्यापक शैक्षिक और सामाजिक संकट का संकेत है।

इन सबके बीच जो विद्वान् आज भी निष्ठापूर्वक शास्त्रों के संरक्षण और संवर्धन में लगे हुए हैं, उन्हें अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल पाता। आधुनिक उपयोगिता की कसौटी पर उनकी साधना का मूल्यांकन किया जाता है, जबकि वे वस्तुतः हमारी ज्ञान-परम्परा की अंतिम कड़ी को सुरक्षित रखने का प्रयत्न कर रहे हैं।

एक बात अत्यन्त गंभीरता से विचार करने योग्य है। हम प्राचीन पाण्डुलिपियों की खोज में तो अत्यधिक उत्साह दिखाते हैं, किन्तु यह शायद ही कभी सोचते हैं कि संपादित, अनूदित और प्रकाशित ग्रंथों की वर्तमान स्थिति क्या है। उनमें से अनेक का पुनर्प्रकाशन वर्षों से नहीं हुआ। व्यावसायिक दृष्टिकोण के कारण उनका पुनर्मुद्रण लगातार कठिन होता जा रहा है। परिणामस्वरूप अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ धीरे-धीरे दुर्लभ होते जा रहे हैं।

पीडीएफ ने निस्संदेह अध्ययन को सरल बनाया है, किन्तु वह मुद्रित ग्रंथ का विकल्प नहीं हो सकती। यह सुविधा का एक अच्छा माध्यम है, परन्तु यदि मूल ग्रंथ ही लुप्त हो जाएँ, तो भविष्य में हमारी पूरी निर्भरता डिजिटल प्रतियों पर रह जाएगी। सुविधा का यह मधुर समाधान कहीं हमारे मूल ज्ञान-स्रोतों के अस्तित्व के लिए संकट न बन जाए, इस पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।

स्थिति इससे भी अधिक चिंताजनक तब प्रतीत होती है, जब परिवारों में पीढ़ियों से संकलित दुर्लभ ग्रंथों को रद्दी समझकर बेच दिया जाता है अथवा मंदिरों में बोरी भरकर पहुँचा दिया जाता है। यह केवल पुस्तकों का परित्याग नहीं है, बल्कि ज्ञान-संस्कृति के प्रति बदलती मानसिकता का द्योतक है।

वास्तव में विडम्बना यह है कि हमारे घरों में अनावश्यक वस्तुओं के लिए पर्याप्त स्थान है, उन्हें सुरक्षित रखने के लिए अलमारियाँ हैं, किन्तु शास्त्रों के लिए स्थान नहीं है। यह केवल स्थानाभाव का प्रश्न नहीं, बल्कि हमारी बदलती प्राथमिकताओं का दर्पण है। कभी-कभी मन में पीड़ा के साथ यह विचार भी आता है कि शायद हम शास्त्रों की अपेक्षा जूतों का महत्त्व अधिक समझने लगे हैं। यह स्थिति आत्ममंथन की अपेक्षा रखती है।

मुझे स्वयं अनेक बार मंदिरों में रखी ऐसी बोरियों से दुर्लभ प्रकाशित ग्रंथ खोजने का अवसर मिला है, जो आज बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें हाथ में लेकर बार-बार यही अनुभव हुआ कि जिन ग्रंथों की रक्षा का दायित्व हमारा था, वे किसी बाहरी आक्रमण से नहीं, बल्कि हमारी अपनी उदासीनता से लुप्त होते जा रहे हैं।

तत्त्वज्ञान के अध्ययन की भावना क्षीण होना एक अलग चिंता का विषय है, किन्तु उससे भी अधिक दुःखद यह है कि अब शास्त्रों के प्रति बहुमान और महिमा-बोध भी निरन्तर कम होता जा रहा है। अधिक से अधिक हम जिनवाणी अथवा सरस्वती के समक्ष एक अर्घ अर्पित कर स्वयं को कृतकृत्य मान लेते हैं, जबकि वास्तविक श्रद्धा शास्त्रों के अध्ययन, संरक्षण और संवर्धन में प्रकट होती है।

हम गिरनार, सम्मेदशिखर और अन्य तीर्थों की रक्षा के लिए स्वाभाविक रूप से चिंतित रहते हैं, क्योंकि वहाँ बाह्य संकट दिखाई देता है। किन्तु ये ग्रंथ भी हमारे श्रुत तीर्थ हैं। इन पर किसी दूसरे ने अधिकार नहीं किया। इनका सबसे बड़ा संकट हमारी अपनी उदासीनता है। यदि यह स्थिति बनी रही, तो इनका विनाश किसी बाहरी शक्ति के कारण नहीं, बल्कि हमारे ही हाथों होगा।

अतः समय की माँग है कि मंदिरों, स्थानकों तथा तीर्थ-सुरक्षा से सम्बद्ध राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में श्रुत तीर्थ संरक्षण के लिए पृथक विभाग या प्रकोष्ठ स्थापित किए जाएँ। दुर्लभ ग्रंथों के संरक्षण, पुनर्प्रकाशन, डिजिटलीकरण, निजी ग्रंथालयों के अभिलेखन तथा युवा पीढ़ी में शास्त्र-अध्ययन की अभिरुचि विकसित करने के लिए संगठित प्रयास किए जाएँ।

हम सबका प्रयास होना चाहिए कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की इस अमूल्य निधि, जिनेन्द्र भगवान् की वाणी-रूपी ज्ञानदीप को यथाशक्ति प्रज्वलित रखें। कौन जानता है कि समय के इस अंधकार में आगे चलकर यही दीपक समाज को दिशा देने वाला प्रकाश बन जाए।

स्वाध्याय सभाओं का ह्रास और बदलती अभिरुचि वर्तमान समय में पंचकल्याणक, महामस्तकाभिषेक, चातुर्मास तथा अन्य बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन सम्पन्न कराना अपेक्षाकृत सरल प्रतीत होता है, किन्तु नियमित शास्त्र-स्वाध्याय की परम्परा को जीवित रखना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है।

वस्तुतः एक स्वाध्याय सभा के लिए बहुत अधिक साधनों की आवश्यकता नहीं होती। एक शास्त्र, उसे पढ़ाने वाला एक व्यक्ति, सुनने वाले कम से कम दो श्रोता और उन सबकी निर्मल भावना, बस इतना ही पर्याप्त है। इसके लिए करोड़ों रुपये के आयोजन, विशाल पण्डाल, ध्वनि-विस्तारक यंत्र, मंच, बैनर, पोस्टर अथवा भव्य व्यवस्थाओं की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी आज इन चार सरल बातों का संयोग अत्यन्त कठिन हो गया है। यह स्थिति केवल संसाधनों की नहीं, हमारी बदलती अभिरुचि की भी परिचायक है।

संभवतः इसी कारण शास्त्रों में स्वाध्याय को परम तप कहा गया है। आज स्थिति यह है कि 'परम' तो दूर, अनेक लोग उसे सामान्य तप भी मानने को तैयार नहीं हैं। आश्चर्य यह है कि यदि देवपूजा, अभिषेक, गुरु-भक्ति अथवा दान में कमी रह जाए तो समाज को उसकी चिंता होती है, किन्तु स्वाध्याय, संयम और तप की उपेक्षा सामान्य बात मान ली जाती है। विशेषतः यदि किसी स्थान पर नियमित स्वाध्याय सभा न हो, तो शायद ही किसी को उसकी कमी अनुभव होती हो। बल्कि कई बार समस्या स्वाध्याय के अभाव से नहीं, उसके प्रारम्भ होने से उत्पन्न होती है।

स्वाध्याय के मार्ग की विडम्बनाएँ

यदि किसी प्रकार किसी स्थान पर नियमित स्वाध्याय प्रारम्भ हो भी जाए, तो अनेक प्रकार के प्रश्न और शंकाएँ सामने आने लगती हैं। किसकी अनुमति से यह प्रारम्भ हुआ? यही ग्रंथ क्यों पढ़ाया जा रहा है? यही अनुयोग क्यों चुना गया? इसके पीछे कोई विशेष उद्देश्य तो नहीं? यह किसी पंथ विशेष का प्रचार तो नहीं? श्रोता कितने हैं? इससे लाभ क्या होगा? ऐसे प्रश्न अनेक बार विषय की अपेक्षा व्यक्ति पर अधिक केन्द्रित होते हैं और धीरे-धीरे स्वाध्याय का उत्साह ही क्षीण होने लगता है।

कभी-कभी कोई जिज्ञासु श्रोता तत्त्वज्ञान सुनने के लिए उत्सुक भी हो जाए, तो उसे निरुत्साहित करने वालों की भी कमी नहीं होती। उससे कहा जाता है कि पहले आचरण करो, केवल सुनने से क्या होगा, अभी इसकी आवश्यकता नहीं है। निश्चय ही आचरण सर्वोपरि है, किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि यथार्थ ज्ञान के बिना सम्यक् आचरण का मार्ग भी स्पष्ट नहीं होता। ज्ञान, श्रद्धा और आचरण एक-दूसरे के पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं।

बड़ी मुसीबत है

स्वाध्याय और तत्त्वचर्चा के क्षेत्र में कार्य करने वाले विद्वानों की स्थिति भी कम विचित्र नहीं है। यदि कोई विद्वान् निःस्वार्थ भाव से निःशुल्क प्रवचन करे, तो कहा जाता है कि इसके पीछे अवश्य कोई छिपा हुआ उद्देश्य होगा। कोई संस्था इसका व्यय वहन करती होगी, किसी पंथ का प्रचार होगा अथवा कोई दीर्घकालीन योजना होगी। लोगों को सहज सेवा पर विश्वास करने की अपेक्षा संदेह करना अधिक सरल लगता है।

दूसरी ओर यदि वही विद्वान् सम्मानपूर्वक प्रदान की गई मानधन-राशि स्वीकार कर ले, तो उस पर जिनवाणी का व्यापार करने, निर्माल्य भोगने, लोभी होने अथवा बिक जाने जैसे आरोप लगाने में भी देर नहीं लगती। दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति नहीं, बल्कि ज्ञान की प्रतिष्ठा आहत होती है। ऐसे वातावरण में अनेक योग्य विद्वान् स्वयं को उपेक्षित अनुभव करने लगते हैं।

विडम्बना यह है कि दूसरी ओर यदि कोई कवि, गायक अथवा मंचीय कलाकार पर्याप्त पारिश्रमिक लेकर धार्मिक मंचों पर मनोरंजन करे, तो समाज उसका सम्मान करता है। उसके पोस्टर लगते हैं, स्वागत होता है और उसकी लोकप्रियता का गुणगान किया जाता है। किन्तु जो व्यक्ति गंभीर शास्त्र-चर्चा द्वारा समाज की वैचारिक चेतना को समृद्ध करना चाहता है, उसे संदेह, उपेक्षा और आरोपों का सामना करना पड़ता है। यह प्रवृत्ति निश्चय ही चिंतनीय है।

इन परिस्थितियों का परिणाम यह हुआ कि अनेक स्थानों पर नियमित स्वाध्याय की परम्परा लगभग समाप्त होती जा रही है। पर्युषण और दशलक्षण जैसे ज्ञान-प्रधान पर्वों में भी अनेक स्थानों पर शास्त्र-अध्ययन केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। यदि कहीं होता भी है, तो उसके प्रति अपेक्षित गंभीरता और उत्साह दिखाई नहीं देता। श्रोताओं की अपेक्षाएँ भी बदल गई हैं। तत्त्वचर्चा, वैराग्य और दर्शन की अपेक्षा मनोरंजन, प्रसंग, हास्य और हल्की-फुल्की कथाओं की माँग अधिक दिखाई देती है। ऐसे वातावरण में यदि कोई विद्वान् धैर्यपूर्वक मूल ग्रंथों का अध्ययन-अध्यापन कराता है, तो वह वास्तव में एक कठिन साधना का निर्वाह कर रहा होता है।

वास्तविक श्रोता

फिर भी इन सब परिस्थितियों के बीच कुछ ऐसे साधक आज भी हैं, जो किसी के बहकावे में आए बिना, अपने चित्त को निर्मल और एकाग्र रखकर जिनवाणी का श्रवण करते हैं। वे प्रशंसा, प्रसिद्धि, मनोरंजन या सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए नहीं, बल्कि आत्मकल्याण की भावना से शास्त्रसभा में उपस्थित होते हैं। वास्तव में वही स्वाध्याय रूपी परम तप के अधिकारी हैं।

स्वाध्याय में न किसी की मान-बढ़ाई होती है, न माल्यार्पण, न विशेष सम्मान और न ही व्यक्तिगत प्रशंसा। वहाँ चमत्कार, प्रदर्शन और प्रलोभन नहीं होते। वहाँ केवल तत्त्व का प्रतिपादन होता है, आत्मदोषों का संकेत होता है और आत्मोन्नति का मार्ग बताया जाता है। जो व्यक्ति इन सभी बाह्य आकर्षणों से ऊपर उठकर केवल सत्य को ग्रहण करने की भावना से शास्त्र सुनता और उसका मनन करता है, वही वास्तविक अर्थ में तपस्वी है।

स्वाध्याय की गणना अंतरंग तपों में की गई है, किन्तु उसका बहिरंग तप भी कम कठिन नहीं है। नियमित समय निकालना, मन को एकाग्र रखना, तत्त्व को ग्रहण करना और उसे जीवन में उतारने का प्रयत्न करना किसी भी दृष्टि से सरल साधना नहीं है। संभवतः इसी कारण आचार्यों ने स्वाध्याय को केवल तप नहीं, परम तप कहा है।

वास्तविक तीर्थ रक्षण और हमारा दायित्व

मेरी दृढ़ मान्यता है कि श्रुत तीर्थ का संरक्षण ही वास्तविक तीर्थ रक्षण है। जो व्यक्ति, संस्था अथवा समाज श्रुत के संरक्षण और संवर्धन में निष्ठापूर्वक कार्य करता है, मैं उसका हृदय से सम्मान करता हूँ, यथाशक्ति सहयोग देता हूँ और उसकी प्रशंसा करने में कभी संकोच नहीं करता।

इसके पीछे मेरा कोई व्यक्तिगत आग्रह नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि है। आरम्भ से ही मेरा झुकाव उपेक्षित को सुरक्षित करने की ओर रहा है। जिस कार्य के लिए समाज में पहले से ही व्यापक उत्साह हो, जहाँ प्रोत्साहन देने वाले हजारों हों और जहाँ धन का प्रवाह स्वतः हो रहा हो, वहाँ मेरी आवश्यकता अपेक्षाकृत कम है। ऐसे कार्यों की मैं दूर से अनुमोदना करता हूँ। किन्तु जहाँ उपेक्षा है, जहाँ संरक्षण की आवश्यकता है और जहाँ कार्यकर्ता कम हैं, वहाँ अपनी सीमित शक्ति और समय का उपयोग करना मुझे अधिक सार्थक प्रतीत होता है।

इसीलिए मेरा विश्वास है कि मेरी सामर्थ्य का जितना भी अंश समाज के काम आ सके, वह श्रुत तीर्थ के संरक्षण और संवर्धन में ही लगे। मेरी तरह यदि हजारों लोग भी इस दिशा में अपना छोटा-सा योगदान देने का संकल्प लें, तो तीर्थंकर महावीर की श्रुत-परम्परा को सुरक्षित रखना कठिन नहीं होगा। किन्तु यदि यह दायित्व कुछ गिने-चुने लोगों तक ही सीमित रहा, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अमूल्य विरासत को अक्षुण्ण रखना अत्यन्त कठिन होगा।

अतः यह किसी एक संस्था, सम्प्रदाय, मुनि, विद्वान् या विश्वविद्यालय का दायित्व नहीं है। यह सम्पूर्ण जैन समाज का सामूहिक उत्तरदायित्व है ।

चातुर्मास की प्रभावना और श्रुत संरक्षण

चातुर्मास केवल वर्षा ऋतु में साधु-संघ के एक स्थान पर विराजमान रहने का काल नहीं है। यह जैन समाज के आध्यात्मिक जागरण, आत्मचिंतन, स्वाध्याय और संस्कारों का सबसे महत्त्वपूर्ण अवसर है। इन दिनों स्वाभाविक रूप से धर्म के प्रति लोगों की आस्था, श्रद्धा और सहभागिता बढ़ जाती है। प्रवचन, पूजन, व्रत, उपवास, विधान, शिबिर और अनेक धार्मिक कार्यक्रम सम्पन्न होते हैं। निस्संदेह इन सबका अपना-अपना महत्त्व है।

किन्तु मेरे विचार से चातुर्मास की वास्तविक सफलता का मूल्यांकन केवल इन चार महीनों की गतिविधियों से नहीं होना चाहिए। वास्तविक प्रश्न यह है कि चातुर्मास समाप्त होने के बाद समाज को क्या स्थायी उपलब्धि मिली?

यदि चार महीने बाद भी किसी नगर में नियमित स्वाध्याय सभा चल रही हो, कोई बंद पड़ी पाठशाला पुनः प्रारम्भ हो गई हो, संस्कृत और प्राकृत के अध्ययन के प्रति युवाओं में नई रुचि जागी हो, किसी परिवार में शास्त्र-संग्रह की परम्परा विकसित हुई हो, किसी संस्था ने दुर्लभ ग्रंथों के पुनर्प्रकाशन का संकल्प लिया हो अथवा किसी मंदिर में नियमित शास्त्र-अध्ययन की व्यवस्था प्रारम्भ हो गई हो, तब समझना चाहिए कि चातुर्मास वास्तव में सफल हुआ है। ऐसी उपलब्धियाँ ही चातुर्मास की स्थायी प्रभावना हैं।

मेरी हार्दिक भावना है कि चातुर्मास की प्रभावना का एक प्रमुख लक्ष्य श्रुत संरक्षण भी बने। प्रत्येक चातुर्मास के उपरान्त केवल यह न गिना जाए कि कितने कार्यक्रम हुए, कितनी बोलियाँ लगीं या कितने आयोजन सम्पन्न हुए; बल्कि यह भी देखा जाए कि कितनी नई स्वाध्याय सभाएँ प्रारम्भ हुईं, कितने विद्यार्थी शास्त्र-अध्ययन से जुड़े, कितने दुर्लभ ग्रंथ सुरक्षित हुए, कितने ग्रंथ पुनर्प्रकाशित हुए और ज्ञान-परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए कौन-से स्थायी कार्य प्रारम्भ हुए।

यदि प्रत्येक चातुर्मास समाज को कम-से-कम एक स्थायी स्वाध्याय केन्द्र, एक सुदृढ़ पाठशाला, एक समृद्ध ग्रंथालय अथवा एक नई अध्ययन-परम्परा दे सके, तो निश्चय ही यह उसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। धर्म का वास्तविक प्रभाव वही है जो उत्सव समाप्त होने के बाद भी समाज के जीवन में बना रहे।

उपसंहार

हम प्रायः तीर्थों की रक्षा की बात करते हैं और यह आवश्यक भी है। किन्तु स्मरण रखना चाहिए कि तीर्थ केवल पर्वतों, मंदिरों और पवित्र स्थलों का नाम नहीं है। तीर्थ वह भी है जो जीव को सम्यक्त्व, ज्ञान और मोक्षमार्ग की ओर ले जाए। इस दृष्टि से श्रुत स्वयं एक तीर्थ है, बल्कि वही तीर्थों का प्राण है।

यदि तीर्थस्थल सुरक्षित रहें और श्रुत नष्ट हो जाए, तो हमारी आध्यात्मिक परम्परा अधूरी रह जाएगी। किन्तु यदि श्रुत सुरक्षित रहेगा, तो वही आने वाली पीढ़ियों को तीर्थों का वास्तविक महत्त्व भी समझाएगा। इसलिए तीर्थ और श्रुत दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं; एक के बिना दूसरे की पूर्णता सम्भव नहीं है।

आज आवश्यकता केवल चिंता व्यक्त करने की नहीं, बल्कि संकल्प लेने की है। अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार यदि प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक परिवार, प्रत्येक संस्था और प्रत्येक समाज श्रुत संरक्षण का एक छोटा-सा उत्तरदायित्व स्वीकार कर ले, तो यह ज्ञान-परम्परा पुनः उसी गौरव के साथ प्रतिष्ठित हो सकती है, जिसके कारण जैन दर्शन विश्व के महान् दार्शनिक परम्पराओं में अपना विशिष्ट स्थान बनाए हुए है।

आइए, इस चातुर्मास में हम केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक ही सीमित न रहें, बल्कि श्रुत तीर्थ की रक्षा का भी संकल्प लें। जहाँ स्वाध्याय बंद हो गया है, वहाँ उसे पुनः प्रारम्भ करें। जहाँ पाठशालाएँ निष्क्रिय हैं, वहाँ उनमें प्राण फूँकें। जहाँ दुर्लभ ग्रंथ उपेक्षित पड़े हैं, उन्हें सुरक्षित करें। जहाँ युवाओं की रुचि कम हो रही है, वहाँ उन्हें ज्ञान की ओर प्रेरित करें।

यदि चातुर्मास की प्रभावना से समाज में श्रुत के प्रति श्रद्धा, स्वाध्याय के प्रति रुचि और संरक्षण के प्रति उत्तरदायित्व जागृत हो जाए, तो इससे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि चातुर्मास की और क्या हो सकती है?

श्रुत तीर्थ का संरक्षण ही वास्तविक तीर्थ रक्षण है। यही इस लेख का मूल संदेश है और यही हम सबका सामूहिक दायित्व भी।


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