श्रुतपंचमी पर विशेष -
श्रुततीर्थ विरासत का रक्षक कौन है ?
Prof Anekant Kumar Jain
Dean – School of Philosophy
Shri Lalbahadur Shastri National
Sanskrit University
New Delhi – 110016
प्रायः जब तीर्थ की चर्चा करते हैं तो हमारा ध्यान भी मात्र सम्मेदशिखर आदि
तीर्थ स्थानों पर ही जाता है किन्तु यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि जैन परंपरा
में ‘श्रुतं गणधरा वा तीर्थमित्युच्यते’ (भगवती आराधना / विजयोदया टीका 302/516/6) कहकर ‘श्रुत’ को तथा ‘तीर्थमागम:’(समाधिशतक/ टी./2/222/24) कहकर ‘आगम’ आदि को भी उसी तरह तीर्थ स्वीकार किया गया है । इतना ही नहीं बल्कि आचार्य कुंदकुंद यहाँ तक
कहते हैं कि
जं णिम्मलं
सुधम्मं सम्मत्तं संजमं णाणं।
तं
तित्थजिणमग्गे हवेइ जदि संतिभावेण।।(बोधपाहुड/27)
अर्थात् जिनमार्ग में उत्तम
क्षमादि धर्म,सम्यक्त्व,संयम और यथार्थ ज्ञान - ये
तीर्थ हैं। ये भी जब शांत भाव सहित हों तब निर्मल तीर्थ है।
अतः स्पष्ट है कि जहाँ हमें एक
तरफ अयोध्या ,सम्मेदशिखर आदि प्राचीन शाश्वत तीर्थों की रक्षा किसी भी कीमत
पर करना चाहिए वहीँ दूसरी तरफ तीर्थंकर भगवान् महावीर की वाणी ,तत्त्वज्ञान ,जैनधर्म-दर्शन ,प्राकृत
भाषा और उसमें निबद्ध आगम आदि का भी संरक्षण और संवर्धन उतनी ही निष्ठा,समर्पण और जिम्मेदारी पूरक अनिवार्य रूप से अवश्य करना चाहिए ।
वर्तमान में श्रुत की स्थिति
समयसार ,रत्नकरंड श्रावकाचार ,द्रव्यसंग्रह ,तत्त्वार्थसूत्र आदि - ये ग्रंथ तो मंदिरों शिविरों में भी पढ़े और पढ़ाये
जाते हैं । आधुनिक रीति से MA जैन विद्या में भी यत्किंचित
इनका या इनके विषयों का अध्ययन अध्यापन हो जाता है ।लेकिन प्रवचनसार, आप्तमीमांसा,प्रमेयरत्नमाला,न्यायदीपिका,परीक्षामुखसूत्र , प्रमाणमीमांसा,प्रमेयकमल मार्त्तण्ड,स्याद्वाद मंजरी,षड्दर्शनसमुच्चय, अष्टसहस्त्री जैसे ग्रंथ मूल रूप
से शास्त्री और आचार्य की कक्षाओं में संस्कृत और प्राकृत भाषा की रीति से पढ़े और
पढ़ाये जाते हैं । इनके बिना विद्यार्थी प्रवचनकार,विधानाचार्य,प्रतिष्ठाचार्य आदि तो बन सकता है लेकिन
जैन दर्शन का अधीत अधिकारी विद्वान् दार्शनिक मनीषी नहीं
बन सकता - यह एक यथार्थ तथ्य है ।
परंपरागत संस्कृत शिक्षा में
रुचिवंत विद्यार्थियों की निरंतर कमी के कारण अध्यापकों और विद्यार्थियों के
अभ्यास की कमी के चलते अष्टसहस्री,प्रमेयकमलमार्त्तण्ड,तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकालंकार आदि कई महत्त्वपूर्ण वृहत्काय दुरूह लगने
वाले ग्रंथ पाठ्यक्रम से दूर करने पड़े - यह एक प्रायोगिक यथार्थ है ।
सुविधा की दृष्टि से जो आरंभिक ग्रंथ पाठ्यक्रमों में रखे गए - सर्वत्र
उदासीनता के कारण वे भी कठिन लगने लगे हैं । जब कि मेरा मानना है कि जैन परंपरा
में उमास्वामी,समन्तभद्र,सिद्धसेन,पूज्यपाद,अकलंक,विद्यानंद,मणिक्यनंदी,प्रभाचंद्र,हरिभद्र,हेमचंद्र जैसे दिग्गज जैन आचार्य न होते और इन्होंने संस्कृत में तार्किक
और दार्शनिक ग्रंथों का प्रणयन न किया होता तो जैन धर्म मात्र धर्म बनकर रह जाता
वह दर्शन की श्रेणी अपना स्थान नहीं बना पाता । आज यदि अन्य भारतीय दर्शनों के साथ
कदम से कदम मिलाकर जैनदर्शन चल रहा है तो इन आचार्यों का बहुत बड़ा योगदान है।
बंद होते विद्यालय और परीक्षा बोर्ड
पहले पूरे भारत में कुछ ऐसे
जैन परीक्षा बोर्ड थे जो इन्हीं ग्रंथों की परीक्षा लेते थे और न्यायतीर्थ , न्यायदिवाकर , न्यायशिरोमणि आदि
उपाधियाँ कठिन परीक्षा के बाद प्रदान करते थे , आपने पुराने
विद्वानों के नाम के साथ इस तरह की उपाधियों को अवश्य सुना होगा । इसमें पाथर्डी,इंदौर,कलकत्ता,मुंबई आदि बड़े शहरों में ये परीक्षा बोर्ड संचालित होते थे और अन्यान्य
साधु भी इन परीक्षाओं को उत्तीर्ण करते थे । अब ये परीक्षा बोर्ड कहाँ गए ? ये श्रुत तीर्थ क्यों बंद हो गए या क्यों उदासीन हैं ? इस बारे में कौन सोचता है ? मात्र अपनी प्रसिद्धि
चाहने वाले लोगों को भी यह विचार करना चाहिए कि आचार्य कुंदकुंद , आचार्य समन्तभद्र ,आचार्य पूज्यपाद , आचार्य अकलंक आदि अनेक आचार्य किस तीर्थ प्रवर्तन के कारण आज तक प्रसिद्ध
हैं ? निःसंदेह ‘ श्रुततीर्थ प्रवर्तन के कारण वे आज दो हजार
वर्ष बाद भी जीवित हैं । प्रवचनों और भाषणों से भी मात्र तत्कालीन लाभ होता है ,
स्थायी रक्षण तो उच्च कोटि के शास्त्र लेखन से ही हुआ है।
अब आज आधुनिक पाठ्यक्रम में
युग की आवश्यकता ,रोजगार,कंप्यूटर ज्ञान,कौशल विकास आदि के आवश्यक संयोजन के कारण आरंभिक ग्रंथ भी धीरे धीरे
हाशिये पर जा रहे हैं । संस्कृत-प्राकृत के
मूल ग्रंथ का पारंपरिक अभ्यास व्यावहारिक विकास के ग्लैमर के आगे उसकी चकाचौंध में मात्र टिमटिमा रहा है ।
अनेक संस्कृत विद्यालय और
महाविद्यालय खाली पड़े पदों को ही स्थायी समझने लगे हैं । जो नियमित अध्यापक हैं
उनमें से अनेक अपने कर्तव्य से विमुख होकर प्रवचन,पूजापाठ,ज्योतिष आदि
सामाजिक कार्यों में अपनी अतिरिक्त आय के साधन तलाश रहे हैं । इन सबके बाद भी जो
विद्वान् इन शास्त्रों के संरक्षण संवर्धन में लगे भी हैं उन्हें आधुनिक से
तुलनात्मक न होने के कारण निरंतर हतोत्साहित होना पड़ रहा है ।
प्रकाशित दुर्लभ शास्त्र भी नष्ट हो रहे
तर्क चाहें जो हों , परिस्थितियां चाहे जो हों लेकिन यह अवश्य विचार किया जाना
चाहिए कि हम पुरानी पाण्डुलिपियों की खोज क्यों कर रहे हैं जबकि संपादित ,अनुवादित और प्रकाशित साहित्य ही घनघोर उपेक्षा का शिकार हो रहा है ।
व्यावसायिकता की मानसिकता से उनका पुनर्प्रकाशन दुर्लभ हो गया है । पीडीएफ जैसे
मीठे जहर हमें कामचलाऊ समाधान तो दे रहे हैं लेकिन उनके मूल अस्तित्त्व को भी
चुनौती दे रहे हैं ।
वर्तमान का परिवार अपने घर
में माँ बाप द्वारा संकलित ग्रंथों को रद्दी समझकर या तो बेंच दे रहा है या फिर
मंदिरों में उस साहित्य की बोरियां भिजवा कर अपना पल्ला झाड रहा है ,यह भी कम
आश्चर्य का विषय नहीं है कि हमारे घरों में अनावश्यक जूते चप्पलों का ढेर है और
उन्हें संभाल कर रखने के लिए अलमारियां हैं लेकिन शास्त्र रखने को जगह नहीं है ,
वो शायद इसलिए कि हम अब जूतों के लायक ही बचे हैं , शास्त्र धारण करने की हमारी
औकात नहीं बची । मैं स्वयं उन बोरियों में से ऐसे ग्रन्थ खोज कर लाया जो दुर्लभ
हैं ,प्रकाशित हैं किन्तु अब अनुपलब्ध हैं ।दिलों से से शास्त्र पढ़कर तत्त्वज्ञान
और आत्मकल्याण की उत्कृष्ट भावना तो नष्ट हो ही गई है , उसके प्रति बहुमान और
महिमा भी अब नहीं बची है । ज्यादा हुआ तो मंदिर में जिनवाणी या सरस्वती का एक अर्घ
चढ़ा कर खुद को कृत कृत्य मान रहे हैं ।
हम अपने गिरनार आदि तीर्थों
के लिए चिंतित रहते हैं क्यों कि अन्य लोगों ने उस पर कब्ज़ा कर लिया है ,किन्तु ये ग्रन्थ भी हमारे श्रुत तीर्थ हैं ,इन पर तो किसी ने कब्ज़ा नहीं किया है , ये तो सिर्फ
और सिर्फ स्वयं हमारी उदासीनता के कारण नष्ट हो रहे हैं। हमारे मंदिरों ,स्थानकों
तथा वर्तमान में कार्यरत तीर्थ सुरक्षा से सम्बंधित राष्ट्रिय अंतर्राष्ट्रीय
संस्थाओं को श्रुत तीर्थ रक्षण का भी एक विभाग और एक पद अपनी संस्थाओं में स्थापित
करना चाहिए और श्रुत तीर्थ विरासत का भी रक्षण होना चाहिए ।
हम सभी की कोशिश होनी चाहिए
कि थोड़ा ही सही पर भारतीय ज्ञान परंपरा की इस अमूल्य निधि जिनेन्द्र भगवान् की
वाणी रुपी ज्ञान का दीपक कम से कम जलता तो रहे ,क्या पता युग के इस अंधकार से आगे कभी यही उबार दे ।
स्वाध्याय सभाओं का ह्रास और बदलती अभिरुचि
वर्तमान में पंचकल्याणक , महामस्तकाभिषेक,चातुर्मास आदि और बड़े बड़े धार्मिक आयोजन करवाना फिर भी आसान लगता है किंतु
नियमित शास्त्र स्वाध्याय चलाना बहुत कठिन दिखाई देता है । जबकि स्वाध्याय शास्त्र
सभा में कम से कम सिर्फ चार चीजें चाहिए 1. एक शास्त्र चाहिए 2.एक पढ़ने वाला 3.कम
से कम दो सुनने वाले 4.सुनने सुनाने वाले की पवित्र भावना, बस । इसके लिए तो करोड़ो की बोली,लाखों के टेंट और स्पीकर साउंड,भोजन व्यवस्था ,पोस्टर ,बैनर,पूजन सामग्री के
खर्च आदि आदि भी जरूरी नहीं होते । जब कि
अन्य कार्यक्रम के लिए ये बहुत जरूरी और अनिवार्य हैं । फिर भी मात्र इन चार सहज
चीजों का संयोग आज के समय में कितना कठिन है । यह बहुत गंभीरता से विचारणीय है ।
शायद यही कारण है कि
स्वाध्याय को परम तप कहा गया है । मगर इसे 'परम'
तो छोड़ो कोई सामान्य तप भी मानने को तैयार नहीं है ।
प्रसन्नता की बात है कि श्रावक के छह कर्तव्यों में देव पूजा- अभिषेक न हो , गुरु पूजा न हो , दान न हो तो तो थोड़ी परेशानी दिखती भी है लेकिन दुख इस बात का है कि स्वाध्याय,संयम और तप न हो तो किसी को कोई परेशानी नहीं दिखाई देती ।
खासकर स्वाध्याय सभा न हो तो किसी को कोई परेशानी नहीं होती । बल्कि परेशानी तो तब
होती है जब वह हो ।
यदि किसी तरह कैसे भी करके
स्वाध्याय सभा हो तो कमेटी आदि वाले भी परेशान हो जाते हैं । किससे पूछकर ये शुरू
किया ?
यही वाला अनुयोग या ग्रंथ क्यों पढ़ा रहे ? इसके पीछे क्या साजिश है ? ये प्रवचन में हमारी कमियां तो नहीं गिना रहे ? फिर ये ही क्यों पढ़ा रहे हैं ? क्या और लोग नहीं हैं ?
सुनने वाले तो ज्यादा हैं नहीं फिर इसे चलाने से क्या फायदा
?
ये बीस पंथ वाले हैं या तेरापंथ वाले ?
किसी तरह किसी श्रोता की
रुचि शास्त्र सुनने में हो भी जाय तो उन्हें अच्छे तरीके से भड़काने वालों की भी
कमी नहीं हैं । उससे तो अच्छा तुम ये करो ,वो करो ,पहले आचरण पालो , सिर्फ सुनने से कुछ नहीं होगा - आदि आदि ।
बड़ी मुसीबत है
यदि प्रवचन करने वाले
विद्वान् निःस्वार्थ भाव से प्रवचन करते हैं तो उनके लिए 'ये जो शास्त्र सुना रहे हैं वो अपना पंथ फैलाने के लिए
निःशुल्क प्रवचन करते हैं ,इनका ये मिशन है ,इनका या इनके गुरु महाराज का कोई हिडेन एजेंडा होगा , इन्हें किसी संस्थान या ट्रस्ट से इस कार्य के लिए पैसा
मिलता होगा अन्यथा ये फ्री में इतना समय क्यों दे रहे हैं ? इनके चक्कर में मत आना ' -
और यदि कोई वक्ता सम्मान राशि स्वीकार कर ले तो 'ये तो जिनवाणी बेचते हैं' निर्माल्य का खाते हैं ,बहुत लालची हैं, बिके हुए हैं या इनसे अच्छा तो अन्य दूसरे वक्ता बोलते हैं
उनसे सुना करो ,
या इन्हें तो कुछ आता नहीं है ,इनसे ज्यादा तो तुम जानते ही हो ....इत्यादि इत्यादि कहकर
विद्वान् वक्ता की उपेक्षा और श्रोता का समर्पण कम करने की निरंतर कोशिश करते रहते
हैं । वक्ता की महिमा मिटाने का पूरा प्रयास किया जाता है ।
इसके विपरीत कोई कवि या गायक
लाखों रुपये लेकर भी मंच पर बैनर से नाम पढ़कर पुरानी कविता में नाम बदलकर गुरु
भगवंतों की महिमा गाये ,
धार्मिक मंचों पर मसखरे लगा कर सबका मनोरंजन करे तो किसी को
वह बिका हुआ ,लालची,निर्माल्य भोगी
नजर नहीं आता है । उसके पोस्टर लगवाते हैं ,उसका सम्मान बहुमान करते हैं उसकी महिमा गाते फिरते हैं ।
इन सब बातों का सार यह
निकलता है कि स्वाध्याय न ही हो तो सबसे अच्छा है , पूर्वोक्त कोई भी समस्या आएगी ही नहीं । यही कारण है कि नियमित तो छोड़ दीजिए ,अन्यान्य स्थानों पर तो पर्युषण दशलक्षण पर्वों पर भी अब
स्वाध्याय प्रवचन नहीं होते । या होते भी हैं तो उपेक्षा भाव से सिर्फ रस्म अदायगी
के लिए । उसमें भी लोगों को शाब्दिक मनोरंजन चाहिए,सास बहू के किस्से चाहिए अन्यथा तत्त्व और वैराग्य की बातें लोग सुनना भी नहीं
चाहते हैं । शाम को आरती भजन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दबाव के बीच कुछ
शास्त्र बांच लिया जाय तो बहुत बड़ी बात होती है ।
वास्तविक श्रोता
लेकिन फिर भी इन सब कष्टों
को सहन करके भी ,
किसी के भड़काने पर भी न भड़कते हुए , अपने उपयोग को निर्मल रखकर , चित्त को एकाग्र करके जो जिन वचनों को अत्यंत उत्साह और प्रीति पूर्वक सुनता
है वह ही स्वाध्याय जैसा परम तप कर पाता है । वह ही सम्यग्दर्शन का भी अधिकारी
होता है ।वास्तविक
स्वाध्याय में आपकी प्रशंसा नहीं होती, उल्टी आपकी कमियां गिनाई जाती हैं , आपको माला नहीं पहनाई जाती है , आपका नाम नहीं लिया जाता ,कोई विशेष सम्मान आदि नहीं किया जाता है ,कोई मान बढ़ाई नहीं होती है , कोई मसखरे नहीं
लगाए जाते हैं, मनोरंजन नहीं
किया जाता है ,
कोई चमत्कार नहीं दिखलाया जाता है , कोई प्रलोभन नहीं दिया जाता है ...मात्र आपके हित का उपदेश
और तत्त्वज्ञान दिया जाता है । यदि इन सभी सांसारिक आकर्षणों से भी परे जाकर , शास्त्र सभा में आकर मात्र आत्म कल्याण की भावना से आप शास्त्र सुन और गुन रहे
हैं तो आप वास्तव में परम तपस्वी हैं ।
स्वाध्याय की गिनती अंतरंग
तप में की जाती है किंतु इसका बहिरंग तप भी कम नहीं है । इसीलिए स्वाध्याय को परम
तप कहा गया है ।
वास्तविक तीर्थ रक्षण और हमारा दायित्व
श्रुत तीर्थ का संरक्षण ही
वास्तविक तीर्थ रक्षण है – ऐसी मेरी पक्की मान्यता है,जो यह कार्य करता है उसे ही
मैं प्रोत्साहित करता हूँ , उसकी ही प्रशंसा करता हूँ , उसके लिए ही जो मेरी शक्ति
है योगदान देता हूँ ,और ऐसा मैं इसलिए करता हूँ क्यों कि आरम्भ से मेरा झुकाव
उपेक्षित को सुरक्षित करने का रहा है , जिस चीज में पूरी दुनिया स्वतः उत्साहित है
तथा उसे और ज्यादा प्रोत्साहित करने वाले हजारों हैं ,दान आदि द्वारा जहाँ धनवर्षा
स्वतः हो रही है उसकी मैं दूर से अनुमोदना करना उचित समझता हूँ,मेरी सीमित शक्ति
और मेरा सीमित समय तो श्रुत तीर्थ के संरक्षण और संवर्धन में ही लगेगा – मेरी तरह
ऐसा आग्रह जब तक हज़ार दो हज़ार लोगों का यदि नहीं होगा तब तक तीर्थंकर महावीर के
वास्तविक श्रुत तीर्थ को बचा पाना बहुत मुश्किल है । अतः हमको आपको सबको मिलकर इसे
बचाना ही होगा ।

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