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परंपरा और आधुनिकता

परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष बहुत पुराना है । परम्पराएं  जड़ से जोड़े रखती हैं लेकिन जड़ भी बनाती हैं और आधुनिकता बाह्य विकास तो देती है लेकिन जड़ से उखाड़ देती है । हम न ही जड़ होना चाहते हैं और न ही जड़ से उखाड़ना चाहते हैं । आधुनिकता को पूर्व के साथ निरंतरता बनाए रखने के लिए परंपरा और उसकी ऊर्जा चेतना की आवश्यकता होती है , इसलिए उसका लाभ लेने के लिए उसके साथ रहने की वकालत करती है और उसका हस्तक्षेप भी अपने लाभ के लिए चाहती है ,लेकिन कुछ समय बाद हस्तक्षेप के प्रक्रिया उल्टी हो जाती है । आधुनिकता अपनी शक्तिशाली शर्तों के अनुरूप परंपरा को ढालने का प्रयास करती है । परंपरा मजबूरी में क्षद्म आधुनिकता की शिकार होने लगती है ,उसे अपने  वजूद की रक्षा के लिए भी आधुनिकता का सहारा चाहिए होता है और अपनी मूल जड़ को भी सुरक्षित रखने की जिद होती है । 
परंपरा से
पहले समन्वय की बात से शुरुआत होती है और फिर वह विलय में तब्दील हो जाती है । 
आधुनिकता की जींस पेंट पहनकर ऊपर से परंपरा का कुर्ता पहन कर काम चलाना पड़ता है । और ज्यादा एडजेस्ट करना हो तो , धोती भी पेंट की तरह सिली सिलाई पहनकर ऊपर से चादर ओढ़ कर पूजा करनी पड़ती है ।

प्रो अनेकांत 
३०जून २०२६

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