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सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार का उद्देश्य

 

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार का उद्देश्य 

                                                               प्रो.अनेकांत कुमार जैन 

          सर्वविशुद्ध ज्ञानाधिकार का मूल उद्देश्य आत्मा के ऐसे शुद्ध स्वरूप को  बताना है, जो जीव को परद्रव्य और परभाव के मोह से मुक्त कर उसके ही निज ज्ञायक स्वभाव में उसे स्थित कर सके । आत्मा का वास्तविक स्वरूप ज्ञान और चेतना है, कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं। जब तक जीव अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं पहचानता, तब तक वह शरीर, कर्म, राग, द्वेष, सुख और दुःख के भावों में तादात्म्य स्थापित करके स्वयं को कर्ता और भोक्ता मानता रहता है।

          आचार्य कुन्दकुन्द स्वर्ण और कटक आदि आभूषणों का दृष्टान्त देकर समझाते हैं कि जैसे स्वर्ण अपने कंगन, कुण्डल आदि पर्यायों से अभिन्न है, वैसे ही प्रत्येक द्रव्य अपने गुणों और पर्यायों से अभिन्न है। किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य को उत्पन्न करता है। प्रत्येक द्रव्य अपने ही स्वभाव और सामर्थ्य से अपनी पर्याय में परिणमन करता है। इसी तात्त्विक आधार पर आत्मा और पुद्गल कर्म को दो स्वतंत्र द्रव्य मानते हुए शुद्ध निश्चय नय से कहा गया है कि आत्मा कर्मपुद्गल का कर्ता नहीं है । क्यों कि आत्मा कर्मरूप पुद्गल को उत्पन्न नहीं करता और कर्मपुद्गल आत्मा को उत्पन्न नहीं करता। इस प्रकार गाथा 308 से 310 में द्रव्य, गुण और पर्याय की अभिन्नता के साथ परद्रव्य के कर्तृत्व का निषेध किया गया है -

दवियं जं उप्पज्जइ गुणेहिं तं तेहिं जाणसु अणण्णं ।

         जह कडयादीहिं दु पज्जएहिं कणयं अणण्णमिह ॥308॥

जीवस्साजीवस्स दु जे परिणामा दु देसिदा सुत्ते ।

तं जीवमजीवं वा तेहिमणण्णं वियाणाहि ॥309॥

ण कुदोचि वि उप्पण्णो जम्हा कज्जं ण तेण सो आदा ।

उप्पादेदि ण किंचि वि कारणमवि तेण ण स होदि ॥310॥

कम्मं पडुच्च कत्त कत्तारं तह पडुच्च कम्माणि ।

उप्पज्जंति य णियमा सिद्धी दु ण दीसदे अण्णा ॥311॥

          अमृतचन्द्राचार्य इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि कर्तृत्व आत्मा का स्वभाव नहीं है, जैसे भोक्तृत्व भी उसका स्वभाव नहीं है। अज्ञान के कारण ही जीव कर्ता और भोक्ता बनता है। इसीलिए कलश में कहा गया है कि आत्मा का ज्ञानस्वभाव अकारक है।

कर्तृत्वं न स्वभावोऽस्य चितो वेदयितृत्ववत् ।

अज्ञानादेव कर्तायं तदभावादकारकः ।।[1]

 

 

इसका तात्पर्य यह है कि ज्ञान का कार्य ज्ञेय पदार्थों को जानना है, उन्हें उत्पन्न करना अथवा उनका कर्ता बनना नहीं। जैसे नेत्र सामने स्थित अग्नि को देखता है, किंतु न उसे जलाता है और न उसकी उष्णता का भोक्ता बनता है, वैसे ही शुद्ध ज्ञान कर्मबन्ध, कर्मोदय, पुण्य, पाप, निर्जरा और मोक्ष को जानता है, किंतु शुद्ध निश्चय नय से उनका कर्ता या भोक्ता नहीं होता।[2]

          यहाँ प्रश्न उठता है कि यदि आत्मा अकर्ता है, तो फिर कर्मबन्ध और संसार कैसे होता है? इसका उत्तर यह है कि संसार का मूल अज्ञान से उत्पन्न राग, द्वेष, मोह और स्वपर के एकत्व की मिथ्या मान्यता है,न कि आत्मा का शुद्ध स्वरूप । जीव कर्मोदय के निमित्त से होने वाले विभाव परिणामों में अपने स्वरूप का आरोप करता है और कर्मपुद्गल भी जीव के रागादि परिणामों के निमित्त से कर्मरूप पर्याय में परिणमित होता है। इस प्रकार दोनों के बीच परस्पर निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध से बन्ध और संसार का व्यवहार सिद्ध होता है।[3] गाथा 312 और 313 इसी पारस्परिक निमित्तता को स्पष्ट करती हैं। अतः कर्मबन्ध आत्मा का सहज स्वभाव नहीं, बल्कि अज्ञान की परिणति है। कलश 195 का भाव इसी में निहित है कि आत्मा अपने निजरस से विशुद्ध और ज्ञानज्योति से परिपूर्ण होने पर भी अज्ञान के प्रभाव से बन्ध को प्राप्त होता दिखाई देता है –

अकर्ता जीवोऽयं स्थित इति विशुद्धः स्वरसतः

स्फु रच्चिज्जयोतिर्भिश्छुरितभुवनाभोगभवनः ।

तथाप्यस्यासौ स्याद्यदिह किल बन्धः प्रकृतिभिः

स खल्वज्ञानस्य स्फु रति महिमा कोऽपि गहनः ।।[4]

इसी प्रकार अज्ञानी उदय में आए हुए कर्मफल को अपना मानकर सुख में हर्ष और दुःख में विषाद करता है, जबकि ज्ञानी उस कर्मफल को अपने शुद्ध स्वरूप से भिन्न जानता है। गाथा 316 से 318 का आशय है कि ज्ञानी शुभ और अशुभ कर्मफल को उसके वास्तविक स्वरूप में जानता है, किंतु उसमें आत्मबुद्धि करके तन्मय नहीं होता। वह जानता है कि कर्म का फल मधुर है अथवा कटु, पर पंचेन्द्रिय सुख को आत्मा का सहज परमानन्द नहीं मानता। यही ज्ञान और अज्ञान का वास्तविक अन्तर है।[5]

          इस अधिकार का उद्देश्य केवल आत्मा को अकर्ता सिद्ध करना नहीं, बल्कि जीव को उस मिथ्या कर्तृत्व और भोक्तृत्व से मुक्त करना है जो संसार का मूल कारण है। अकर्तृत्व का यह सिद्धान्त व्यवहार नय का निषेध नहीं करता, बल्कि शुद्ध निश्चय नय से आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध कराता है। व्यवहार में कर्म, बन्ध, पुण्य, पाप, निर्जरा और मोक्ष का कथन अपनी मर्यादा में सत्य है, किंतु परमार्थ से आत्मा का अखण्ड ज्ञानस्वभाव इन समस्त परभावों से भिन्न है। अतः शुद्धात्मा की उपलब्धि के लिए बाह्य पदार्थों को अपना मानने की वृत्ति, राग द्वेष और मोह का परित्याग तथा स्वपर भेदविज्ञान आवश्यक है।

          जब जीव यह अनुभव करने लगता है कि मैं राग नहीं, द्वेष नहीं, शरीर नहीं और उदित कर्मफल नहीं, बल्कि इन सबको जानने वाला चेतन ज्ञायक हूँ, तब उसका दृष्टिकोण संसाराभिमुखता से आत्माभिमुखता की ओर मुड़ता है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और शुद्धोपयोग इसी आत्माभिमुख परिणति के स्वरूप हैं। इस प्रकार सर्वविशुद्ध ज्ञानाधिकार का परम उद्देश्य आत्मा को परद्रव्य के कर्तृत्व और कर्मफल के भोक्तृत्व की मिथ्या मान्यता से विमुक्त कर उसके शाश्वत, अखण्ड और विशुद्ध ज्ञानस्वभाव में प्रतिष्ठित करना है। इसी आत्मानुभूति में वीतरागता, बन्धन से निवृत्ति और मोक्षमार्ग की वास्तविक दिशा निहित है।

          इस प्रकार जो स्वयं अन्य का कर्ता नहीं बनता और न अन्य द्रव्यों को अपना कर्ता बनाता है। किन्तु दर्शन, ज्ञान और चारित्र-स्वरूप अपने आत्मस्वभाव में स्थित रहता है वह स्वसमय है और इसके विपरीत जो अपने अज्ञानभाव को निमित्तकर, संचित हुए पुद्‌गल कर्मों-का कर्ता बनकर तथा उनको निमित्त कर उत्पन्न होनेवाली राग-द्वेष और नरक-नारकादि विविध प्रकार की पर्याय को आत्मस्वरूप मानकर उनमें रसमाण होता है वह परसमय है यह सिद्ध होता है।[6]

          यहाँ यह तो है कि ये राग-द्वेष और नर-नारकादि पर्यायें पुद्गल-कर्मों का कार्य नहीं है। परन्तु आत्मा में इनकी उत्पत्ति का मूल कारण अज्ञान भाव है, इसलिए यह आत्मा जब तक अज्ञानी हुआ संसार में परिभ्रमण करता रहता है तभी तक वह इनका कर्ता होता है। किन्तु ज्ञानी होने पर उसके पुद्गल कर्मों को निमित्त कर उत्पन्न होने वाली इन पर्यायों में आत्मबुद्धि का सुत्तरां त्याग हो जाता है, इसलिए उस समय इनके कदाचित् होने पर भी निश्चय से वह इनका कर्ता नहीं होता ।[7]

          यद्यपि यह बात थोड़ी विलक्षण तो लगती है कि ज्ञानी जीव के कुछ काल तक ये राग-द्वेष और नर-नारकादि पर्यायें होती रहती हैं फिर भी वह इनका कर्ता नहीं होता। परन्तु इसमें विलक्षणता की कोई बात नहीं है।[8] कारण कि ज्ञानी जीव का जो स्वात्मा है वह न नारकी है, न तिर्यंच है, न मनुष्य है और न देव है। न मार्गणास्थान है, न गुणस्थान है और न जीवस्थान है। न बालक है, न वृद्ध है और न तरुण है। न राग है, न द्वेष और न मोह है। न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक है। इन सबका न कारण है, न कर्ता है, न कारयिता है और न अनुमोदना करनेवाला है। वह तो कर्म, नोकर्म और विभाव भावों से रहित एकमात्र ज्ञायक स्वभाव है, इसलिए वह ज्ञानी अवस्था में अपने ज्ञायकभाव से तन्मय हुई एकमात्र शुद्ध पर्याय का ही कर्ता होता है। नरक आदि रूप परात्मा का तन्मय होकर कर्ता नहीं होता। और यह ठीक भी है क्योंकि जिस समय जो जिस भावरूप परिणमता है वह उस समय उसका कर्ता होता है।[9]

          तात्पर्य यह है कि सम्यग्दृष्टि के श्रद्धान में रागादि भाव मेरे हैं ऐसा अभिप्राय नहीं रहता, इसलिए वह उन रागादि भावों का अकर्ता है ।अतः आत्मा अन्य का कर्ता होता है इस अनादि लोकरुढ़ व्यवहार को छोड़कर सिद्धान्तरूप में यही मानना उचित है कि जिस समय जो जिस भावरूप से परिणमता है उस समय वह उस भाव का कर्ता होता है।

          इस प्रकार लोक व्यवहार की दृष्टि से कर्ता-कर्मकी पद्धति का जो क्रम है वह ठीक न होकर वस्तुमर्यादा की दृष्टि से कर्ता-कर्मपद्धति-का क्रम किस प्रकार ठीक है ,उसे ही ग्रहण करना चाहिए ।[10]



[1] समयसार कलश 194

[2] ण वि कुव्वइ ण वि वेयइ णाणी कम्माइं बहुपयाराइं ।

जाणइ पुण कम्मफलं बंधं पुण्णं च पावं च ॥

दिट्ठी जहेव णाणं अकारयं तह अवेदयं चेव ।

जाणइ य बंधमोक्खं कम्मुदयं णिज्जरं चेव ॥ समयसार गाथा 10/ 319, 320

[3] चेदा दु पयडीअट्ठं उप्पज्जइ विणस्सइ ।

पयडी वि चेययट्ठं उप्पज्जइ विणस्सइ ॥

एवं बंधो उ दोण्हं पि अण्णोण्णप्पच्चया हवे ।

अप्पणो पयडीए य संसारो तेण जायदे ॥- समयसार गाथा 10/ 312, 313

 

[4] समयसार कलश 195

[5] अण्णाणी कम्मफलं पयडिसहावट्ठिदो दु वेदेदि ।

णाणी पुण कम्मफलं जाणदि उदिदं ण वेदेदि ॥

ण मुयदि पयडिमभव्वो सुट्‌ठु वि अज्झाइदूण सत्थाणि ।

गुडदुद्धं पि पिबंता ण पण्णया णिव्विसा होंति ॥

णिव्वेयसमावण्णो णाणी कम्मप्फलं वियाणेदि ।

महुरं कडुयं बहुविहमवेयओ तेण सो होइ ॥                  - समयसार गाथा 10/ 316, 317

[6] जैन तत्वमीमांसा १७३-१७६

 

[7] जैन तत्वमीमांसा १७३-१७६

[8] जैन तत्वमीमांसा १७३-१७६

[9] समयसार गाथा 130-131

[10] जैन तत्वमीमांसा १७३-१७६

 

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