*महात्मा गांधी का जिनवाणी प्रेम*
महात्मा गांधी और जैन धर्म का संबंध केवल अहिंसा की अवधारणा तक सीमित नहीं था। जैन साधना, जैन शास्त्र, जैन साहित्य और जैन विद्वानों के प्रति उनके मन में गहरी आत्मीयता और श्रद्धा थी। उनके अपने शब्दों में जैन धर्म और जैन समाज के प्रति व्यक्त भाव इस संबंध के एक महत्त्वपूर्ण पक्ष को सामने रखते हैं।
मुंबई में आयोजित एक जैन कॉन्फ्रेंस में महात्मा गांधी ने एक व्याख्यान प्रस्तुत किया था। उस अवसर पर उन्होंने जैन धर्म और जैन समाज के प्रति अपनी आत्मीयता व्यक्त करते हुए कहा था-
*मेरे लिए तो मुक्ति का दरवाजा अहिंसा धर्म का पलना है। मुझ पर जैन भाइयों की इस कदर कृपादृष्टि है कि मुझको उनकी लेना देनी है। भारतवर्ष में एक सगे भाई के समान भाईबंदी के साथ रहने का दावा जैन ही कर सकते हैं।*
आगे उन्होंने कहा।
*मेरे परम मित्र डॉक्टर प्राणजीवन जैन हैं, जिनके चरित्र का मुझको सम्मान है। रायचंद भाई मेरे मित्र थे और शहर मुंबई में मेरे रहने का जो स्थान है, वह भी एक देवाशंकर जैन भाई का है। सफर के मध्य मुझे बहुत से जैन भाइयों से अक्सर वास्ता पड़ा है और बहुत से उस समय मुझसे पूछते हैं कि क्या आप जैन हैं? इस प्रश्न के उत्तर में मैं यदि ‘नहीं’ कहूँ तो उनको दुःख अनुभव करते देखता हूँ। इसका मतलब इसके सिवा और कुछ नहीं कि यदि मैं जैन होता तो ठीक इससे उनका प्रेम मेरी ओर होता, ऐसा मैं ख्याल करता हूँ क्योंकि जिस बात को वे मानते हैं, उस पर मैं अमल करता हूँ।*
इसी संदर्भ में गांधीजी ने अपने जैन शास्त्र अध्ययन का उल्लेख करते हुए कहा था।
*मैं वकील हूँ और मैंने जैन शास्त्रों का किसी कदर अभ्यास भी किया है और श्रद्धा भी है।*
यह कथन केवल जैन धर्म के प्रति गांधीजी की सामान्य सहानुभूति को ही नहीं दर्शाता, बल्कि जैन शास्त्रों के प्रति उनके अध्ययन और श्रद्धा की ओर भी संकेत करता है।
*जैन ग्रंथों की स्थिति पर गांधीजी की चिंता*
जब माणिकलाल जेठाभाई ने अहमदाबाद में एक सार्वजनिक पुस्तकालय की स्थापना की, तब उसका उद्घाटन महात्मा गांधीजी ने किया। उस अवसर पर उन्होंने एक अत्यंत मार्मिक भाषण दिया था।
उन्होंने कहा-
*गुजरात में जैन धर्म की पुस्तकों के अनेक भंडार हैं, परंतु वे वणिकों के घर हो रहे हैं। वे उन ग्रंथों को सुंदर रेशमी वस्त्रों में लपेटकर रखे हुए हैं। ग्रंथों की यह दशा देखकर मेरा हृदय आहत हो रोता है।*
आगे गांधीजी ने जैन ग्रंथों के संरक्षण के साथ साथ उनके अध्ययन और परिचय की आवश्यकता पर भी गंभीर प्रश्न उठाते हुए कहा-
*पुस्तकालय में जैन धर्म के उपलब्ध जैन ग्रंथ एकत्र हों, इतना ही क्यों? जब आज किसी भी जैनी को ठीक यह पता नहीं है कि कौन कौन से जैन ग्रंथ विशेष हैं, तब भला कहिए कि वर्तमान में जैनी अयोग्य हैं या नहीं? प्रोफेसर हीरालाल जी की योजना, जो प्रगट हो चुकी है, इस कलंक को मिटाने का ही उपाय बताती है। क्या जैन श्रीमान् उसको सफल बनाएँगे?*
गांधीजी के ये कथन जैन ग्रंथ संपदा के प्रति उनकी चिंता, जैन साहित्य के संरक्षण की आवश्यकता और उसके व्यापक अध्ययन की अपेक्षा को स्पष्ट रूप से सामने रखते हैं।
संदर्भ :
ये समाचार उन दिनों के समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए थे। श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के जैन दर्शन विभाग द्वारा आयोजित विशिष्ट व्याख्यानमाला में डॉ. अमित जैन (चाणक्य वार्ता) ने ‘स्वतंत्रता संग्राम में जैन’ विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया था। उस अवसर पर उन्होंने समाचार पत्र की कटिंग सहित इन तथ्यों को उजागर किया था। मैंने उस समय अपनी डायरी में जो नोट्स बनाए थे, उनके कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
महात्मा गांधी और जैन धर्म के संबंधों का यह पक्ष अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। गांधीजी के विचारों, उनके अहिंसा दर्शन, जैन आचार विचार तथा जैन विद्वानों एवं साहित्य के साथ उनके संपर्क के संदर्भ में अभी और गहन एवं प्रामाणिक अनुसंधान की आवश्यकता है।
आज आवश्यकता है कि गांधीजी पर जैन धर्म के प्रभाव का गहन अनुसंधान हो और उसे प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर सभी के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
प्रो. अनेकान्त कुमार जैन
डीन, दर्शन संकाय
अध्यक्ष, जैन दर्शन विभाग
श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
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