प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली
अक्सर ऐसा देखा जाता है कि धर्म के क्षेत्र की अन्य क्रियाएं जैसे पंचकल्याणक,विधान,शोभा यात्रा,जयंती आदि अनेक गतिविधियों का प्रचार प्रसार बहुत जोर शोर से किया जाता है । उसमें भीड़ एकत्रित करने के लिए अन्यान्य स्थानों से नियमित बसें आदि भी चलवाई जाती हैं । टीवी चैनलों अखबारों पर उसके विज्ञापन प्रकाशित होते हैं । इन सबके लिए बहुत व्यय भी किया जाता है । तब जाकर ये कार्यक्रम सफल होते हैं । किंतु यदि कहीं नियमित शास्त्र स्वाध्याय और कक्षा प्रवचन,ज्ञान शिविर,पाठशाला आदि चल रहे हों तो उसका प्रचार प्रसार उसका विज्ञापन तो छोड़ो कभी कभी मंदिर जी के सूचना बोर्ड पर उसकी सूचना भी नहीं लिखी होती है । कभी कभी वहां माइक आदि की व्यवस्था तक भी नहीं बन पाती है ।
विचार करें ! जब संसार के विषय भोग की सामग्री जैसे वस्त्र,भोजन,सोना,चांदी , सौन्दर्य प्रोडक्ट, मनोरंजन, कषाय वृद्धि के अन्य संसाधन, जिनके अनादि से गहन संस्कार हैं उनके लिए भी लाखों करोड़ों विज्ञापन में खर्च करो ,भोग के लिए उकसाओ ,तरह तरह के उपाय करो तब जाकर किसी तरह ये चीजें बिकती हैं , तब ऐसे समय में विषय भोग आदि से छुड़ाने वाले,वैराग्य वर्धक ,ज्ञान वर्धक , भव दुखों का एहसास कराने वाले , आत्म तत्व का अनुभव करवाने वाले प्रवचन स्वाध्याय कक्षा पाठशाला आदि में बिना प्रचार प्रसार के ,बिना अन्य प्रलोभन के ,बिना सूचना और बुलावे के लोग आ जाएं - ये कैसे संभव है ?
लोगों की रुचि बदल दी गई है ,लोग मात्र क्रियाओं में धर्म मान रहे हैं,ज्ञान की महिमा ही नहीं है ।
एक कवि सम्मेलन करवाते हैं तो कवियों के चित्र पोस्टर गली गली में चिपकवा देते हैं ,लेकिन यदि एक विद्वान् वक्ता किसी जैन दर्शन विषय को समझने समझाने बुलाते हैं तो उसका नाम भी सूचना पट्ट तक पर नहीं लिखते । इस ग्लैमर वर्ड में भी हम चाहते हैं प्रवचन स्वाध्याय आदि यह सब बिना किसी पुरुषार्थ के चले तो चले - हमें कुछ नहीं करना पड़े ।
इसीलिए नियमित शास्त्र स्वाध्याय,शिविर,पाठशाला में नए लोग आकर्षित नहीं होते हैं और पुराने लोगों की परंपरा समाप्त हो रही है ।
यह परंपरा
यदि कहीं किसी तरह चल भी रही है तो उसके हज़ार दुश्मन हैं। इसमें सच्ची बात सामने आती है ,लोगों को सच्चे धर्म का पता चलता है ,लोग असली नकली धर्मात्माओं का फर्क समझने लगते हैं । इसलिए नकली धर्मात्माओं को किसी न किसी बहाने यह बंद करवाने में ही अपनी सुरक्षा नज़र आती है ।
जिन शासन यदि भविष्य में बचेगा तो शास्त्र सभाओं से बचेगा । नए लोग यदि जैन बनेंगे तो इन्हीं शास्त्र सभाओं,शिविरों,पाठशालाओं से बनेंगे । धर्म तीर्थ यदि अभी तक चला है तो इन्हीं प्रक्रियाओं से चला है ।
इसलिए जो लोग समझदार हैं , वास्तव में जिन शासन की स्थाई सुरक्षा चाहते हैं , तो शास्त्र स्वाध्याय ,शास्त्र प्रकाशन और इसका जबरजस्त प्रचार प्रसार जितना हो सकें करें । इसके व्यय को व्यय न समझें , सच्चा इन्वेस्टमेंट मानें, यही भव से पार लगाएगा ,बाकी सब यहीं धरा रह जाएगा ।
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