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रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए 

प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली 
आजकल विचित्र किस्म का अवसाद चल रहा है । लोग आपसे बहुत तीव्रता से जुड़ते हैं जो अक्सर असहज होता है ,उन्हें आप रोक नहीं पाते ,कारण भी जान नहीं पाते,फिर यह सिलसिला कुछ वर्षों तक चलता है , उन रिश्तों में आप भी सामान्य और सहज नहीं रह पाते हैं ,थोड़ा बहुत जुड़ ही जाते हैं । 

फिर कुछ वर्षों में एक दिन अचानक उन्हीं लोगों का न जाने क्यों रुख बदल जाता है । जो इतने प्रिय हो रहे थे अचानक वे ही बहुत औपचारिक हो जाते हैं । पहले जैसे नहीं रह जाते ,बदल जाते हैं । और पूछने पर भी उसका कारण नहीं बताते , कोई भूल या गलत फहमी हो गई हो तो उसे तभी दूर किया जा सकता है जब उसकी चर्चा की जाय और उसे रेखांकित किया जाय । 

मिलते पहले जैसे ही हैं ,अभिवादन आदि भी करते हैं ,
कुछ नहीं, बस सब कुछ पहले जैसा नहीं रह जाता । 

इसी बीच पता चलता है एक बिचौलिया मध्य में आ गया , वह दोनों से जुड़ता है,और उन दोनों के मन में एक दूसरे के विरुद्ध एक नहीं हजार गलत फहमियां खड़ी करता है । 
और हम मान लेते हैं ,आपस में उसका स्पष्टीकरण भी नहीं करते । संवाद हीनता इसे और अधिक पुष्ट करती है । धीरे धीरे अलगाव बढ़ता जाता है । कहने को संबंध होते तो हैं पर वो फेड पड़ जाते हैं ,उनके रंग गाढ़े नहीं होते । 

हमारी फितरत है कि जल्दी किसी से ज्यादा जुड़ते नहीं है ,और अगर कैसे भी करके जुड़ गए तो जल्दी टूटते भी नहीं है चाहे तुम कितना भी संबंध हल्का कर लो । हम जल्दी इसलिए नहीं टूटते क्यों कि हमें दया आती है ,करुणा आती है कि तुम दूसरों की बुद्धि पर चलने लगे हो । कोई तुम्हें मेरे खिलाफ भड़काता है तो मुझे उस पर क्रोध नहीं आता , उल्टे तुम पर दया आती है क्यों कि भड़कते तो तुम हो । 

आज नहीं तो कल हमारे बीच ऐसे अनेक किरदार आते रहेंगे जिन्हें तुम्हारे हमारे मधुर संबंध रास नहीं आयेंगे । वो मीठा जहर घोलने से बाज नहीं आयेंगे । तुम अगर अपना विवेक अपनी बुद्धि से काम नहीं लोगे तो कभी सुखी नहीं हो सकते । वो मुझे भी तुम्हारे खिलाफ भड़का सकता था ,मुझे याद है उसने एकाध बार हल्की सी कोशिश की थी ,लेकिन उसे अविश्वास के पौधे के लिए मेरी धरती बंजर दिखी ,इसलिए उसने आगे कोशिश नहीं की । तुम्हारी जमीन उसे अनुकूल लगी ,सो उसने अविश्वास का पौधा रोप दिया । रोज आकर चुपचाप उसे सींचता है ,खाद आदि भी डालता रहता है । अब वो पौधा धीरे धीरे बड़ा हो रहा है । एक दिन वह पौधा पेड़ बन जाएगा । उसकी जड़ें और गहरी हो जाएंगी । वो तो चला जाएगा लेकिन यह पेड़ वैसा ही बना रहेगा । 

अभी वह पौधा है , तुम चाहो तो उखाड़ सकते हो ,कल को उखाड़ भी नहीं पाओगे । 

हो सकता है तुम्हें विवेक जागृत हो जाए ,उसके द्वारा आंखों में बांधी गई पट्टी खुल जाए और तुम अपनी बुद्धि से सोच सको , अपनी आंखों से देख सको । 

आज तक जितने भी संबंध टिके हैं वे इसी आशा पर टिके हैं । 

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए 
टूटे से फिर न जुड़े ,जुड़े गांठ पड़ जाए

१४/०४/२६

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