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महावीर और बुद्ध : मीडिया की अज्ञानता से युद्ध

महावीर और बुद्ध  : मीडिया की अज्ञानता से युद्ध 
Anekant Kumar Jain 

यह सचमुच आश्चर्य का विषय है कि आज के समय में, जब सूचना और ज्ञान के असंख्य साधन उपलब्ध हैं, तब भी अनेक मीडिया हाउस और पत्रकार तीर्थंकर महावीर और भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं और चित्रों में अंतर नहीं कर पाते, या शायद जानबूझकर नहीं करना चाहते। महावीर जयंती जैसे पवित्र और विशिष्ट अवसरों पर भी कई बार बुद्ध की तस्वीरें प्रकाशित, प्रचारित और प्रसारित कर दी जाती हैं। यह केवल एक सामान्य भूल मानकर टाल देने योग्य बात नहीं है, क्योंकि यह गलती एक-दो बार नहीं बल्कि वर्षों से बार-बार दोहराई जा रही है। यदि इसे महज अज्ञानता या भ्रम कहा जाए, तब भी यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसा उलटा उदाहरण शायद ही कभी देखने में क्यों नहीं आता कि बुद्ध जयंती के अवसर पर तीर्थंकर महावीर के चित्र प्रकाशित किए जाएँ। यही कारण है कि अब यह संदेह भी उठने लगा है कि कहीं यह कोई सुनियोजित उपेक्षा या षड़यंत्र तो नहीं, क्योंकि लंबे समय से इस विषय पर मीडिया का ध्यान आकृष्ट कराया जा रहा है, फिर भी गलती लगातार दोहराई जा रही है।

फिर भी संतुलित दृष्टि रखते हुए यदि इसे अज्ञानताजन्य भूल मान लिया जाए, तो यह और भी चिंता का विषय बन जाता है कि स्वयं को समाज का मार्गदर्शक कहने वाला मीडिया इतने सामान्य और स्पष्ट अंतर को भी समझने में असमर्थ क्यों दिखाई देता है। पत्रकारिता का दायित्व केवल समाचार प्रकाशित करना ही नहीं होता, बल्कि तथ्यों की शुद्धता और संवेदनशीलता बनाए रखना भी उसका मूल कर्तव्य है। जब धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ ऐसी लापरवाही दिखाई देती है, तो यह केवल त्रुटि नहीं बल्कि गंभीर असावधानी प्रतीत होती है।

वास्तव में जैन तीर्थंकरों और बुद्ध की मूर्तियों में कई स्पष्ट और मूलभूत भिन्नताएँ होती हैं, जिन्हें थोड़ा ध्यान देकर आसानी से पहचाना जा सकता है। भारतीय इतिहास और संस्कृति में जैन तथा बौद्ध दोनों ही परंपराएँ अत्यंत प्राचीन और समृद्ध हैं। पहली दृष्टि में ध्यानस्थ मुद्रा के कारण दोनों की प्रतिमाएँ कुछ लोगों को समान लग सकती हैं, किंतु थोड़े से ज्ञान और सूक्ष्म अवलोकन से इनके बीच के अंतर स्पष्ट रूप से समझे जा सकते हैं।

जैन तीर्थंकर और बुद्ध की प्रतिमाओं के बीच मुख्य अंतर इस प्रकार हैं ,

1. वस्त्र और स्वरूप
बुद्ध की प्रतिमाएँ सामान्यतः चीवर नामक वस्त्र धारण किए हुए दिखाई देती हैं, जो उनके शरीर को ढकता है। इसके विपरीत जैन दिगंबर परंपरा में तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ पूर्णतः नग्न होती हैं, जो त्याग और वैराग्य का प्रतीक है। श्वेतांबर परंपरा में प्रतिमाओं पर अत्यंत पतला और साधारण वस्त्र दर्शाया जाता है। इसलिए यदि प्रतिमा पूर्णतः नग्न है, तो वह निश्चित रूप से जैन तीर्थंकर की ही प्रतिमा है।

2. श्रीवत्स चिन्ह
जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाओं की छाती के मध्य भाग में ‘श्रीवत्स’ नामक एक विशिष्ट चिन्ह या उभार होता है। यह जैन मूर्तिकला की एक महत्वपूर्ण पहचान है। इसके विपरीत बुद्ध की प्रतिमाओं में छाती पर इस प्रकार का कोई चिन्ह नहीं पाया जाता।

3. लांछन या प्रतीक चिन्ह
जैन परंपरा में प्रत्येक तीर्थंकर का एक विशेष लांछन होता है, जो प्रतिमा के आधार या चरणों के पास अंकित किया जाता है। उदाहरण के लिए भगवान महावीर का लांछन सिंह है और भगवान पार्श्वनाथ का लांछन सर्प है। बुद्ध की प्रतिमाओं में इस प्रकार का कोई व्यक्तिगत पशु-चिन्ह नहीं होता।

4. मुद्राएँ
बुद्ध की प्रतिमाएँ अनेक प्रकार की मुद्राओं में मिलती हैं, जैसे भूमिस्पर्श मुद्रा, अभय मुद्रा, ध्यान मुद्रा और महापरिनिर्वाण की लेटी हुई मुद्रा। इसके विपरीत जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ मुख्यतः दो ही मुद्राओं में दिखाई देती हैं , पद्मासन अर्थात बैठी हुई ध्यान मुद्रा, और कायोत्सर्ग अर्थात सीधी खड़ी ध्यान मुद्रा।

5. सिर की बनावट
बुद्ध की प्रतिमाओं में सिर पर उष्णीष नामक उभरा हुआ भाग या गांठ दिखाई देती है, जो ज्ञान और आध्यात्मिक महानता का प्रतीक है। जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाओं में सामान्यतः ऐसा उभरा हुआ भाग नहीं होता, हालांकि बालों को घुँघराले रूप में दर्शाया जा सकता है।

6. पार्श्वनाथ और भ्रम की स्थिति
कई बार भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा को देखकर लोग भ्रमित हो जाते हैं, क्योंकि उनके सिर के ऊपर सर्प का छत्र बना होता है। किंतु यदि प्रतिमा नग्न है और उसके ऊपर सर्प का फन दिखाई दे रहा है, तो वह निस्संदेह जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ की ही प्रतिमा होती है, न कि बुद्ध की।

7. प्रभामंडल
बुद्ध की प्रतिमाओं का प्रभामंडल प्रायः अधिक अलंकृत और कलात्मक होता है, जबकि जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाओं में प्रभामंडल अपेक्षाकृत सरल और संयमित शैली में बनाया जाता है।

इन सभी बिंदुओं को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि जैन तीर्थंकरों और बुद्ध की प्रतिमाओं के बीच अंतर पहचानना कोई कठिन कार्य नहीं है। प्रश्न यह नहीं है कि अंतर समझना मुश्किल है, बल्कि यह है कि बार-बार ध्यान दिलाने के बावजूद भी मीडिया इस विषय में गंभीरता क्यों नहीं दिखा रहा। यदि यह केवल अज्ञानता है तो इसे दूर करने का प्रयास क्यों नहीं किया जा रहा, और यदि अज्ञानता नहीं है तो फिर इस निरंतर दोहराई जाने वाली गलती के पीछे क्या कारण है।

मीडिया समाज का मार्गदर्शक माना जाता है, इसलिए उससे अपेक्षा भी अधिक होती है। धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों के प्रति संवेदनशीलता और तथ्यात्मक शुद्धता बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है। महावीर जयंती जैसे अवसरों पर बुद्ध की तस्वीरें प्रकाशित करना केवल एक तकनीकी गलती नहीं बल्कि एक ऐसी लापरवाही है जो एक संपूर्ण परंपरा की पहचान को धुंधला कर देती है।

अब समय आ गया है कि मीडिया इस विषय को गंभीरता से ले और भविष्य में ऐसी त्रुटियों से बचे। थोड़ी सावधानी, थोड़ी जानकारी और थोड़ी संवेदनशीलता से यह समस्या तुरंत समाप्त हो सकती है। अन्यथा बार-बार दोहराई जाने वाली यह गलती केवल भूल नहीं बल्कि एक संदिग्ध प्रवृत्ति के रूप में देखी जाने लगेगी, और तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठेगा कि कहीं इसके पीछे कोई सुनियोजित षड़यंत्र तो नहीं।

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