*णमोकार,नमोकार या नवकार मंत्र ? संशय क्यों ?*
Prof Anekant Kumar Jain , New Delhi
9 अप्रैल 2025 में सर्वप्रथम सम्पूर्ण विश्व में णमोकार मंत्र का अभूतपूर्व सामूहिक उच्चारण किया गया था ।इस वर्ष भी उसे उसी उत्साह से 9 अप्रैल को ही मनाया गया ।
JITO द्वारा आयोजित इस सराहनीय पहल का अनुमोदन करते हुए 9 अप्रैल 2025 में प्रधानमंत्री जी ने विज्ञान भवन से अद्भुत संबोधन भी दिया था।
निःसंदेह यह आयोजन अत्यंत प्रशंसनीय ,अनुकरणीय और अभूतपूर्व था । इतने विशाल आयोजन में गौरवपूर्ण अनुभूति के साथ साथ आम जन में एक संशय यह बना रहा कि सभी पोस्टरों में इसे ' नवकार दिवस' क्यों कहा गया जब कि मंत्र का नाम णमोकार मंत्र है ।
णमोकार,नमोकार या नवकार - इन तीनों का अर्थ एक ही है और वह है - नमस्कार ।
शौरसेनी(दिगम्बर) आगम में णमोकार शब्द मिलता है ।
अर्धमागधी(श्वेताम्बर) आगम में नमोकार शब्द मिलता है । बाद में कुछ प्राकृत और अपभ्रंश साहित्य में इसे ही नवकार शब्द से कहा है । प्राकृत और अपभ्रंश भाषा के कुछ विशेष नियमों के कारण यह परिवर्तन और पाठ भेद हमें मिलते हैं । यही कारण है कि अपभ्रंश भाषा के प्रभाव के कारण हिंदी विशेषकर पुरानी हिंदी ,गुजराती आदि में इसे 'नवकार' भी कहा जाने लगा । व्यवहार की दृष्टि से वर्तमान में श्वेताम्बर सम्प्रदाय में 'नवकार' शब्द ज्यादा प्रचलन में है ।
जिनप्रभसूरी रचित अपभ्रंश रचना 'नवकाररास' में नवकार शब्द का ही प्रयोग किया है । अतः हिंदी में नवकार शब्द अधिक प्रचलन में आ गया । आधुनिक हिंदी के भजन को इस रूप में भी कई लोग गाते हैं - ' नवकार मंत्र है न्यारा , हमको प्राणों से प्यारा' ।
नवकार शब्द प्रयोग में दिक्कत कोई नहीं है किंतु प्राचीन आगमों ,प्रतिक्रमण पाठ के मूल उद्धरणों और प्रमाण के रूप में प्राप्त पाठ को ही प्राकृत भाषा में इसे 'णमोकार ' अथवा 'नमोकार' या शुद्ध हिंदी में 'नमस्कार महामंत्र' ही कहा और बैनर ,पोस्टर आदि में प्रचारित किया जाता तो अधिक अच्छा होता ।
इस शब्द के प्रयोग की विडंबना हमें यह देखने को मिली कि भाषणों को सुनकर लगा कि 'नवकार' के नव का अर्थ नौ (9) लगाया गया जबकि इसका अर्थ नमस्कार है ।
इसी भ्रम के कारण फिर 9 अप्रैल,9 संख्या का महत्त्व , नौ दुर्गा ,नवतत्त्व सभी इसी घेरे में आते चले गए । वो इसलिए क्यों कि प्रायः नव शब्द का अर्थ नौ या नया ही लगाया जाता है अतः यहाँ भी न्याय शास्त्र के 'नवकंबलोsयंदेवदत्त:' की तरह अनजाने में मिथ्या अर्थ ग्रहण होता चला गया ।
इसलिए हमें शब्द प्रयोगों को लेकर बहुत सावधान रहना चाहिए और बहुत सोच समझ कर निर्णय करना चाहिए ।
अभी भी समय है, हमारा सुझाव है कि इसे नवकार दिवस की बजाय णमोकार दिवस के रूप में प्रचारित किया जाए, ताकि इसका सही अर्थ होता रहे।
अतः मेरा निवेदन है कि हमें जिनागम के आलोक में सर्वांगीण चिंतन करना चाहिए और उभय अतिवाद से बचना चाहिए ।
मन्त्रों के साधक अध्यात्म और विज्ञान से दूर न हों और विज्ञान तथा अध्यात्म के चिन्तक मन्त्र के महत्त्व को एक सिरे से न नकारें –यही मंगल भावना है ।
टिप्पणियाँ