क्या समाधिमरण अपराध है ?
समाधि का सरल अर्थ है आत्मस्थ होना । एक साधक जीवन भर समाधि में रहता है। प्रत्येक सच्चे साधक की यह कामना होती है कि शरीरस्थ होकर मृत्यु को प्राप्त न हो । वह चाहता है कि स्वत: समागत मृत्यु के दिन भी मैं आत्मस्थ रहूं । समाधि पूर्वक मरण को समाधि मरण कहा जाता है । शरीर मुझे छोड़ दे उससे पूर्व मैं शरीर से आसक्ति तोड़ दूं । शरीर से आसक्ति तोड़ने की प्रक्रिया का नाम समाधिमरण है ।
दुनिया भर में शराब पीना अपराध नहीं माना जाता। सिगरेट पीना अपराध नहीं माना जाता। तम्बाकू, गुटखा और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन भी सामान्यतः अपराध की श्रेणी में नहीं आता। पंजीकृत वेश्यावृत्ति
को अपराध नहीं माना जाता ।
जबकि
इनके दुष्परिणामों के प्रति चिकित्सा विज्ञान लगातार चेतावनी देता है और इन्हें अनेक गंभीर रोगों तथा असमय मृत्यु का कारण मानता है।
प्रश्न यह है कि जो पदार्थ मनुष्य के शरीर और जीवन को क्रमशः विनाश की ओर ले जाते हैं, उनके सेवन को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर स्वीकार किया जाता है, तो जीवन के अंतिम चरण में स्वेच्छा से संयम, रागद्वेष का त्याग और देह के प्रति आसक्ति का क्रमशः क्षय करने वाली साधना को केवल मृत्यु से उसके संबंध के कारण संदेह की दृष्टि से क्यों देखा जाए?
जैन धर्म ही नहीं बल्कि भारतीय लगभग सभी धर्मों में समाधि साधना स्वीकृत है जो आजीवन चलती है । जैन धर्म दर्शन में स्वीकृत समाधि मरण की एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित साधना प्रक्रिया है । उसे आत्म हत्या कहना संगीन जुर्म है ।
सल्लेखना अथवा संथारा का आशय मृत्यु की इच्छा या जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन के स्वतः उत्पन्न अंतिम क्षणों को अधिक सजग, संयमित और आत्मोन्मुख बनाने की साधना है। इसमें मृत्यु की आकांक्षा बिल्कुल नहीं है बल्कि क्रोध मान
माया लोभ आदि कषायों के क्षय और आत्मशुद्धि की भावना प्रमुख है।
जैन धर्म में आत्महत्या को और मृत्यु की कामना को भी जघन्य पाप माना गया है ।
इसलिए इसे सामान्य आत्महत्या के साथ एक ही तराजू पर रखना जैन दर्शन की मूल भावना को समझे बिना किया गया निष्कर्ष है।
आधुनिक युग की यह विडम्बना है कि भोग की स्वतंत्रता सहज स्वीकार्य है, पर त्याग और तपस्या की स्वतंत्रता प्रश्नों के घेरे में आ जाती है।
ऋषि मुनियों की इस भूमि में यदि संयम भी अपराध समझा जाने लगेगा, तो धर्म कहाँ जाएगा?
आचार्य अनेकांत कुमार जैन
१८/०८/२६
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