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जैनदर्शन विभागों/महाविद्यालयों के गंभीर शास्त्री विद्वानों के लिए आवश्यक पंचसूत्रीय मार्गदर्शन

वर्णी जयंती पर विशेष

*जैनदर्शन विभागों/ महाविद्यालयों के गंभीर शास्त्री विद्वानों के लिए आवश्यक पंचसूत्रीय मार्गदर्शन*

पूज्य क्षुल्लक गणेश प्रसाद वर्णी जी ने अपने संपूर्ण संघर्ष पूर्ण जीवन काल में एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य किया था और वह था जैनदर्शन तत्वज्ञान संस्कृत भाषा प्राकृत भाषा के ज्ञान और प्रशिक्षण के लिए अन्यान्य संस्थाओं की स्थापना । उनमें से अधिकांश संस्थाएं सौ वर्ष या उससे अधिक समय की भी हो गई हैं । उनके इस आंदोलन के फल स्वरूप उनकी ही स्थापित संस्थाओं के स्नातकों ने और भी अनेक नई संस्थाएं इसी उद्देश्य को लेकर स्थापित करवाई हैं जिनसे वर्तमान की नई पीढ़ी भी शास्त्री / आचार्य / Phd जैसे कोर्स करके विद्वत्ता के क्षेत्र में कार्य कर रहीं हैं । उन 
जैन महाविद्यालयों में अध्ययनरत उन शास्त्री विद्वानों एवं विदुषियों के लिए जिन्होंने परिश्रम पूर्वक जैनाचार्यों द्वारा लगभग सभी मूलभूत प्राकृत- संस्कृत  ग्रंथों का भली भांति अध्ययन करके उनमें प्रवीणता प्राप्त कर ली है और जो आजीवन जैनविद्या, जैनदर्शन एवं प्राकृत आगमों के अध्ययन-अध्यापन, अनुसंधान और संरक्षण के क्षेत्र में समर्पित होकर कार्य करना चाहते हैं, निम्नलिखित पाँच सूत्र अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं-

1. *‘मेरी जीवन गाथा’ एवं विद्वानों के साहित्य का गंभीर अध्ययन करें*

पूज्य गणेशप्रसाद वर्णी जी की ‘मेरी जीवन गाथा’ भाग 1 एवं 2 का अनिवार्य रूप से अध्ययन करना चाहिए। यह केवल आत्मकथा नहीं, बल्कि एक ऐसे साधक-विद्वान के संघर्ष, स्वाध्याय, आत्मनिर्माण और ज्ञान-साधना की प्रेरक यात्रा है, जिससे गंभीरता से अध्ययन करने वाले विद्यार्थी को अपने जीवन की दिशा निर्धारित करने में विशेष प्रेरणा मिल सकती है।

इसके अलावा  जैनविद्या के महान् मनीषियों में पंडित कैलाशचंद शास्त्री जी , पंडित फूलचंद जी सिद्धांत शास्त्री जी , पंडित सुखलाल संघवी जी ,पंडित महेंद्र कुमार न्यायाचार्य जी ,पंडित दरबारी लाल जी कोठिया, पंडित जगनमोहनलाल शास्त्री जी ,पंडित प्रो उदयचंद जैन जी,प्रो.सागरमल जैन जी और डॉ.हुकुमचंद भारिल्ल जी,  कम से कम इन 9 दिवंगत विद्वानों के द्वारा हिंदी संस्कृत में लिखा गया जैनदर्शन विषयक साहित्य बिना किसी संप्रदाय मोह और आग्रह के गहनता से अवश्य पढ़ें । 

2. *अपनी उच्च शिक्षा का व्यापक और सुनियोजित आधार तैयार करें*

जो शास्त्री विद्वान अथवा विदुषी जीवन भर आजीविका की चिंता से अपेक्षाकृत निश्चिंत होकर जैनदर्शन, जैनविद्या और तत्त्वज्ञान के अध्ययन-अध्यापन एवं अनुसंधान को अपना जीवन-कार्य बनाना चाहते हैं, उन्हें शास्त्री के बाद अपनी उच्च शिक्षा को व्यापक बनाना चाहिए।

जैनविद्या, जैनदर्शन, जैन इतिहास एवं पुरातत्त्व के गहन अध्ययन के साथ MA in Hindu Studies, Indian Knowledge Systems (IKS), Yoga Sciences जैसे संबंधित विषयों में उच्च शिक्षा प्राप्त करना, तत्पश्चात NET/JRF तथा पूर्ण समर्पण और कठोर परिश्रम के साथ Ph.D. करना उनके लिए उपयोगी मार्ग हो सकता है।

इस प्रकार अपनी विशेषज्ञता को केवल एक सीमित विषय तक न रखकर भारतीय ज्ञान-परंपरा के व्यापक अकादमिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ना चाहिए।

3. *प्राकृत, संस्कृत और अंग्रेजी-तीनों भाषाओं में प्रवीणता प्राप्त करें*

जैनविद्या और प्राकृत आगमों के गंभीर अध्येता के लिए प्राकृत और संस्कृत का सुदृढ़ ज्ञान अनिवार्य है; वहीं वर्तमान उच्च शिक्षा और शोध के व्यापक क्षेत्र में प्रभावी सहभागिता के लिए अंग्रेजी पर भी पर्याप्त अधिकार आवश्यक है।

इन तीनों भाषाओं को केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने के साधन के रूप में नहीं, बल्कि मूल ग्रंथों के अध्ययन, शोध, लेखन, अनुवाद और अंतरराष्ट्रीय अकादमिक संवाद के माध्यम के रूप में विकसित करना चाहिए।

4. *शोध एवं पाठ-संपादन की व्यावहारिक दक्षताएँ विकसित करें*

केवल शास्त्रीय ज्ञान पर्याप्त नहीं है। एक गंभीर जैनविद्या शोधार्थी को पांडुलिपि-संपादन, पाठालोचन, अनुवाद, प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन तथा उच्च स्तरीय शोध-लेखन में भी दक्षता प्राप्त करनी चाहिए।

विशेष रूप से मूल स्रोतों के आधार पर शोध करना, प्रमाणों का सम्यक् उपयोग करना, संदर्भ-संपन्न अकादमिक लेखन करना तथा शोध को आधुनिक अकादमिक मानकों के अनुरूप प्रस्तुत करना सीखना चाहिए।

5. *वक्तृत्व कला, अकादमिक प्रस्तुति और व्यापक दृष्टिकोण का निरंतर विकास करें तथा नई तकनीक में कौशल प्राप्त करें*

अपने ज्ञान को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए वक्तृत्व-कौशल, अकादमिक प्रस्तुति-कौशल और तार्किक अभिव्यक्ति का निरंतर विकास करना चाहिए।

इसके लिए कार्यशालाओं, सेमिनारों, संगोष्ठियों, व्याख्यानों और अकादमिक चर्चाओं में गंभीरता, समर्पण और मन लगाकर भाग लेना चाहिए,केवल प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए नहीं।

विभिन्न विषयों के विद्वानों को सुनना, प्रश्न करना, संवाद करना और अपनी दृष्टि का निरंतर विस्तार करना ही एक गंभीर अध्येता को व्यापक अकादमिक व्यक्तित्व प्रदान करता है।

आज ज्ञान प्रस्तुति तकनीक के माध्यम से प्रस्तुत होता है - इसलिए कंप्यूटर ,इंटरनेट,वेबसाइट, पीपीटी,ODL,AI आदि डिजिटल कौशल प्रायः प्रत्येक जगह अनिवार्य हो गए हैं । आपको शास्त्र ज्ञान भी होना चाहिए साथ साथ उसकी प्रस्तुति हेतु अत्याधुनिक तकनीक का भी कौशल होना चाहिए । 

*एक व्यापक अवसर का क्षेत्र*

ये विषय और प्रवृत्तियाँ जैनविद्या एवं प्राकृत आगमों की मूल प्रकृति से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। वर्तमान समय में इनसे संबंधित कार्यक्षेत्र केवल पारंपरिक जैन संस्थाओं तक सीमित नहीं हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों, केंद्र सरकार की भाषा एवं ज्ञान-परंपरा से संबंधित संस्थाओं, IKS Division, विभिन्न सरकारी परियोजनाओं, Manuscript Mission तथा IIT और अन्य उच्च शिक्षण एवं शोध संस्थानों में भारतीय ज्ञान-परंपरा, भाषा, दर्शन, पांडुलिपि एवं संबंधित क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के पद और परियोजनाएँ समय-समय पर सामने आते रहते हैं।

इन क्षेत्रों में विषय-विशेषज्ञता के साथ भाषायी दक्षता, शोध-कौशल और आधुनिक अकादमिक प्रशिक्षण रखने वाले योग्य लोगों की आवश्यकता निरंतर बनी हुई है।

*छह वर्ष का संकल्प*

यदि कोई विद्यार्थी शास्त्री के बाद एकनिष्ठ होकर, अनावश्यक प्रपंचों से स्वयं को दूर रखते हुए, धैर्य और अनुशासन के साथ लगभग छह वर्षों तक एक स्पष्ट लक्ष्य को सामने रखकर कठोर परिश्रम करता है, तो वह अपने लिए एक सुदृढ़ अकादमिक भविष्य का निर्माण कर सकता है।

इसके माध्यम से वह सम्मानजनक और स्थिर आजीविका प्राप्त करते हुए जीवन भर जैनविद्या, जैनदर्शन और प्राकृत आगमों की महत्त्वपूर्ण एवं व्यापक सेवा भी कर सकता है।

उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करने का नहीं, बल्कि अपने ज्ञान, भाषा, शोध, व्यक्तित्व और दृष्टि -इन सभी का समन्वित विकास करने का होना चाहिए । 
धार्मिक और सांप्रदायिक कट्टरता , दुराग्रह , कर्मकांड और उसकी आक्रामक प्रस्तुति , अंध श्रद्धा , आदि आपको किसी संप्रदाय का प्रवक्ता बना सकती है किंतु अकादमिक शोध दृष्टि न होने से विश्वविद्यालय का प्रवक्ता बनने में यही चीजें बाधक भी बनती हैं । 

इस प्रकार सावधानी पूर्वक शुद्ध हृदय से की गई समन्वित तैयारी एक गंभीर शास्त्री को भविष्य के सक्षम अध्यापक, शोधकर्ता और जैनविद्या के प्रभावी विद्वान् के रूप में स्थापित कर सकती है।

 -   प्रो. अनेकांत कुमार जैन
डीन, दर्शन संकाय
श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
संपर्क:
deandarshan@slbsrsv.ac.in

30 सितंबर 2026,वर्णी जयंती

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