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संयम और तप में अंतर - प्रो अनेकांत कुमार जैन

*संयम और तप में क्या अंतर है ?*

प्रो.अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली

यद्यपि संयम और तप एक ही सिक्के के दो पहलु हैं तथा मोक्षमार्ग में ये दोनों ही अनिवार्य तत्त्व हैं, इनमें से किसी का भी महत्त्व कम नहीं हैं, एक नज़र में ये लगते भी एक जैसे हैं , बोलते समय भी संयम के साथ तप अपने आप जुड़ जाता है । 

हम कहते हैं कि बिना संयम-तप धारण किये कुछ भी नहीं होगा । किन्तु जिनागम में लगभग प्रत्येक जगह इनकी व्युत्पत्ति अर्थ ,परिभाषा ,भेद प्रभेद सब कुछ अलग अलग प्रतिपादित किये गए हैं, इसके बाद भी अलग अलग ग्रंथों में कहीं संयम की मुख्यता से प्रतिपादन किया गया है कहीं तप की मुख्यता से । 

जहाँ संयम की प्रधानता ज्यादा है वहां तप को भी संयम के अंतर्गत गर्भित करके कथन किया गया है , जहाँ तप की मुख्यता से कथन है वहां संयम को तप के ही अंग के रूप में कह दिया जाता है । कहीं कहीं स्थूल रूप से संयम और तप को एक अर्थ में भी कहा गया है । किन्तु ये सब विवक्षा और अभिप्राय के भेद से कथन है । 

जिन्हें चारों  अनुयोगों की कथन पद्धति का अभ्यास है वे इन्हें सही सही समझ लेते हैं ,उन्हें कहीं भी विरोध भासित नहीं होता है । फिर भी एक प्रश्न तो सहज बनता ही है कि संयम और तप एक ही हैं तो दो अलग अलग शब्द प्रयोग क्यों किये जाते हैं या उनमें एक ही परिवार के मात्र बड़े भाई और छोटे भाई जैसा ही भेद है ? तो दोनों में से  किसी एक को मुख्य करके दूसरे को उसके अंतर्गत ही क्यों नहीं गिना दिया गया ?

 ये सभी जिज्ञासाएं प्रायः लोगों के मन में चलती रहती हैं , समानता तो उनमें जो है सो है ,यहाँ मैंने आगम के आधार पर संयम और तप में मात्र कुछ अंतर समझने का प्रयास किया है जो आप सभी के पठनार्थ प्रस्तुत है -  

1. प्रायः आगम में संयम का क्रम हमेशा पहले आता है बाद में तप आता है , क्यों कि जो संयमी होगा वही तप कर सकता है । बिना संयम के तप संभव नहीं है ।

2. कोई मनुष्य सिर्फ़ संयमी हो सकता है ,जरूरी नहीं कि वह तपस्वी हो किन्तु कोई तपस्वी संयमी न हो ऐसा नहीं हो सकता ।

3. संयम का लक्षण कहा है सम्यक् यमो वा संयम:।=(इन्द्रियों पर) सम्यक् रूप से यम अर्थात् नियंत्रण संयम है। (धवला 7/2,1,3/7/3)

4. तप का लक्षण लिखा है- तिण्णं रयणाणमाविब्भावट्ठमिच्छाणिरोहो।(धवला 13/5,4,26/54/12)
तीनों रत्नों को प्रगट करने के लिए इच्छानिरोध को तप कहते हैं ।
देहस्येंद्रिययाणां च तापं करोतीत्यनशनादि तप इत्युच्यते। (राजवार्तिक) 
 देह और इंद्रियों की विषय प्रवृत्ति को रोककर उन्हें तपा देते हैं। अत: ये तप कहे जाते हैं।

 - इससे स्पष्ट है कि इन्द्रियों की विषयभोग की प्रवृत्ति को नियंत्रित करना संयम है और उन्हें रोक देना तप है ।

5. संयम में नियंत्रण की मुख्यता है तप में निरोध की मुख्यता है।

6.संयम में इच्छा होती है किन्तु नियंत्रित ,तप में इच्छा होती ही नहीं है । 

7.संयम में मनुष्य भोजन करेगा किन्तु थोडा करेगा ,तप में भोजन करेगा ही नहीं , उसकी इच्छा भी नहीं करेगा , उपवास करेगा ।

8. कम बोलना संयम है , मौन रहना तप है ।

9. संयम में प्रवृत्ति की मुख्यता  है , तप में निवृत्ति की  प्रधानता है । 

10. संयम अधिकतर लोग कर सकते है ,तप सभी नहीं कर सकते ।

11. संयम तप तक पहुँचने का अभ्यास है । 

12. आगम में संयम के दो भेद कहे हैं – प्राणी संयम और इन्द्रिय संयम 

13. किन्तु तप के दो भिन्न भेद हैं – बाह्य तप और अभ्यंतर तप

14. प्राणी संयम में एक इन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक की हिंसा से बचने की मुख्यता है ,जो संयम रूप है,तप नहीं ।

15. इन्द्रिय संयम में इन्द्रियों के नियंत्रण की मुख्यता है ,उनके निरोध की नहीं ।अतः वह तप नहीं है ।

16. स्थूल रूप से बहिरंग तप अनशन , अवमौदर्य आदि में संयम जैसा कुछ लग सकता है किन्तु  अन्तरंग तप के भेदों में संयम शब्द लगा कर देखें तो स्वयं ही भिन्नता भासित होती है ।

17. जैसे प्रायश्चित्त तप है वह संयम नहीं है , विनय में तप के स्थान पर ‘विनय संयम’ जैसा उचित नहीं बैठेगा ,इसी तरह स्वाध्याय एक तप है कोई उसे संयम नहीं कहेगा आदि ।

18. ऐसा लगता है संयम में संवर की मुख्यता ज्यादा रहती है , और तप में निर्जरा की मुख्यता ज्यादा रहती है (यद्यपि दोनों में संवर और निर्जरा होती है किन्तु यहाँ मुख्यता की अपेक्षा विचार है )

19. संयम का लक्ष्य है कर्मों का आस्रव कम से कम हो , तप का लक्ष्य है बंधे हुए कर्मों की अधिक से अधिक निर्जरा हो ।

20. मात्र संयम से पूर्ण निर्जरा और मोक्ष संभव नहीं , किन्तु संयम पूर्वक तप से यह संभव है ।

21. सामाजिक व्यावहारिक जीवन में संयम की मुख्यता ज्यादा होती है ।

20. आध्यात्मिक जीवन में तप की मुख्यता ज्यादा होती है ।

21. चारित्र में दोनों आते हैं । किन्तु उनमें भी व्रत,समिति को संयम कहा जा सकता है और गुप्तियों और परिषह जय को तप कहा जा सकता है ।

निवेदन :

यह एक प्रयास है ,इसमें और भी विचार हो सकते हैं , यहाँ कोई दुराग्रह नहीं है , यदि कहीं कोई वाक्य आगमानुकूल सिद्ध न हो तो उन्हें संशोधित भी किया जा सकता है ।

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