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तन और मन - प्राकृत गाथा

तन और मन 

पुण्णम्मि ण रमे मणं, कायं तह वि णेहि पुण्णस्स कम्मे ।
पावम्मि ण रमे मणं, काओ वि मणं अणुकड्ढइ खलु ॥

भावार्थ :

पुण्य में मन न भी रमे, तो भी तन को पुण्य-कर्म में ले जाओ ; पाप में मन रमे, तब भी तन को वहाँ मत ले जाओ क्योंकि तन भी निश्चय ही मन को अपनी ओर खींच लेता है।

अभिप्राय :

मन की चिंता मत करो ,पहले अपने तन को सम्भालो । पाप में मन जाए तो जाए , मगर तन को जाने से बचाना चाहिए ।  इसी प्रकार पुण्य कार्य में मन न लगे तब भी तन को ले जाना चाहिए । क्यों कि तन जहाँ रहता है मन वहाँ वापस आता ही आता है । 


प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली 
१७/०९/२६

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