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दीपक कहता है....

🪔*दीपक कहता है*......

*जोइक्खो गिलइ तमं तं चिय उग्गिलइ कज्जलमिसेणं।*
*अहवा सुद्धसहावा हियए कलुसं न धारेति॥*   
                                      (जयवल्लभ  ‘वज्जालग्गं’, गाथा 776)
🪔
ज्योतिष्को गिलति तमस्तदेवोद्गिरति कज्जलमिषात्।
अथवा शुद्धस्वभावा हृदि कलुषं न धारयन्ति॥ 
    🪔🪔🪔🪔                                    ( संस्कृत छायानुवाद रत्नदेव(1337 ई. ))

अर्थात् ,ज्योतिष्क अथवा दीपक अंधकार को अपने भीतर निगल जाता है और उसी अंधकार को काजल के रूप में बाहर उगल देता है। स्वयं जलकर, स्वयं को तिल-तिल गलाकर वह चारों ओर प्रकाश बिखेर देता है अथवा, जिनका स्वभाव शुद्ध और निर्मल होता है, वे अपने हृदय में किसी प्रकार की मलिनता नहीं रखते। भाव यह है कि संसार का अंधकार अपने भीतर समाहित करने पर भी सज्जन व्यक्ति अपने हृदय की निर्मलता नहीं खोता।

*अहिंसा का सन्देश*

🪔दीपक कहता है कि मैं केवल मिट्टी का एक छोटा-सा दीपक नहीं हूँ; मैं अहिंसा हूँ, मैं करुणा हूँ, मैं जीव-दया हूँ। मैं स्वयं जलकर तुम्हें जीने का अर्थ समझाता हूँ। मैं तुम्हें सिखाता हूँ कि प्रकाश बाँटने के लिए पहले स्वयं जलना पड़ता है । 

आज के इलेक्ट्रोनिक दीयों ने प्रकाश तो दिया है लेकिन ऐसा लगता है मानो अंधकार को निगलना और उसका काजल बनाकर उगलना ही बंद कर दिया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने प्रकाश के साधन तो असंख्य बना लिए, लेकिन अपने भीतर का अंधकार मिटाना भूल गए। हमारे घरों में रोशनी बढ़ती जा रही है, लेकिन दिलों में अंधेरा गहराता जा रहा है। दीपावली का वैभव बढ़ रहा है, पर जीवों के प्रति दया, करुणा और संवेदना निरंतर घटती जा रही है।हमारी आतिशबाजियाँ हमारे आसपास के पशुओं पक्षियों कीट पतंगों के लिए कितनी प्राण घातक होती हैं ? हमारी आँखें रोशनी के प्रति सजग हैं, लेकिन किसी जीव की पीड़ा देखने के लिए बंद हैं। हमारे हाथ दीप जलाने के लिए उठते हैं, लेकिन किसी असहाय प्राणी की रक्षा के लिए आगे नहीं बढ़ते।
🌇                                          *चिरागों के सिलसिले इस कदर डाले हैं ।*
*ज़ेहन में अँधेरा है और बाहर उजाले हैं ।।*   

*परोपकार का सन्देश* 

🪔‘दिया’(दीपक) कहता है मैंने खुद को और संसार को सिर्फ ज्ञान का प्रकाश ‘दिया’ है , मैं स्वयं भी प्रकाशित होता हूँ और पर को भी प्रकाशित करता हूँ ,आत्मा के ज्ञान गुण की तरह मैं स्व-पर प्रकाशक हूँ , मैंने अंधकार को सिर्फ पिया नहीं है , काजल भी उगला है और वह भी प्रकाशित ही करता है, जिससे माताएं अंखियाँ संवारती हैं,नन्हें-मुन्हों की भी और स्वयं की भी ....आँखों का अंजन संस्कार भी ज्योति बढ़ाता...ज्ञेयों का ज्ञान करवाता है, और काजल माथे पर लगा हो आपको तो बुरी नजरों से बचाता है , मेरा नाम ‘दिया’ इसलिए भी पड़ा क्यों कि मैंने सिर्फ दिया ही दिया है और लिया है तो सिर्फ अन्धकार ।

*अनेकांत और सहअस्तित्व का सन्देश*

🪔दीपक कहता है कि मैं अन्धकार को नष्ट नहीं करता बल्कि उसके अस्तित्त्व को स्वीकारता हूँ और उसे पीकर,उसका काजल बनाकर उसे भी प्रकाश के कार्य में लगा देता हूँ , किसी दूसरे को प्रकाशित करने के लिए उसका अस्तित्व मिटाना नहीं, उसका अस्तित्व स्वीकार करना पड़ता है । अंधकार से ही मेरा अस्तित्व है ,सूर्य के प्रकाश में मुझे कौन पूछता है ? इसलिए मैं अंधकार को अपने पास समेट लेता हूँ – ‘दिया तले अँधेरा’

*राष्ट्र प्रेम : मन को मिट्टी से जोड़ो*

🪔 दीपक कहता है कि इस दीपावली चाहे सोने , चाँदी के दीपक भी सजाते हो तो सजाओ, अपने घर-आँगन को हजारों विद्युत् दीपों से जगमगाते हो तो जगमगाओ;मोमबत्तियां लगाते हो तो लगाओ लेकिन जरा सोचना कि मिट्टी में भी प्राण हैं, मिट्टी से बने इस शरीर में भी प्राण हैं और मिट्टी से भिन्न दिखाई देने वाले अन्य जीवों में भी प्राण हैं। 

इसीलिए मिट्टी का दिया केवल स्वयं प्रकाशित होकर सिर्फ बाहरी अंधकार को ही दूर नहीं करता था, वह दूसरों के जीवन में भी प्रकाश भरने की प्रेरणा देता है । मेरी एक छोटी-सी विनती है कि - 

इस दीपावली
एक मिट्टी का दिया भी
जरूर लाना
ताकि कुम्हार के
घर भी दीपावली मन सके..
और तुम्हारा मन भी
देश की मिट्टी से जुड़ सके...

🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔

राग द्वेष तिरोहित कर 
वीतरागता विकसित कर 
प्रकाशित कर निज ज्ञान दीप्ति 
भवदीय दीप पर्व मंगलमय हो 

शुभकामनाओं के साथ 

प्रो. अनेकांत कुमार जैन, डीन - दर्शन संकाय , अध्यक्ष - जैन दर्शन विभाग ,श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,नई दिल्ली
5/11/26

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