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लिफ़्ट लगाइये, पर सीढ़ियाँ खत्म करके नहीं

सादर प्रकाशनार्थ

*लिफ़्ट लगाइये, पर सीढ़ियाँ खत्म करके नहीं*

( कहीं समर्थ में असमर्थ न हो जाए संस्कृत विद्या संरक्षण का स्वप्न )

 - आचार्य अनेकांत कुमार जैन 

शिक्षा सुधार की दिशा में डिजिटलीकरण और ऑनलाइन व्यवस्था निश्चय ही एक क्रांतिकारी कदम है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है, अभिलेख सुरक्षित हुए हैं, समय की बचत हुई है और अनेक प्रकार की अनियमितताओं पर भी नियंत्रण लगा है। सरकार का उद्देश्य भी यही है कि प्रत्येक विद्यार्थी को समान अवसर मिले और प्रवेश प्रक्रिया सरल, निष्पक्ष तथा पारदर्शी बने। इस दृष्टि से डिजिटल व्यवस्था का स्वागत किया जाना चाहिए।

लेकिन हर व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह जमीन पर कितनी उपयोगी सिद्ध हो रही है। समस्या डिजिटलीकरण नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब किसी व्यवस्था को विकल्प के रूप में न रखकर अनिवार्य बना दिया जाता है और उसके साथ चलने वाली मानवीय व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाता है।

संस्कृत की पारंपरिक शिक्षा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

आज सामान्यतः विद्यार्थियों का झुकाव रोजगारपरक विषयों की ओर अधिक है। संस्कृत, प्राकृत, दर्शन और भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन के लिए वैसे ही बहुत कम विद्यार्थी आते हैं। देश के अधिकांश संस्कृत महाविद्यालय और गुरुकुल विद्यार्थियों की कमी से जूझ रहे हैं। जो कुछ विद्यार्थी भारतीय संस्कृति, भाषा और दर्शन के संरक्षण की भावना से इन संस्थानों तक पहुँचते हैं, वे किसी विज्ञापन या आकर्षण के कारण नहीं आते। वे समाज, गुरुओं और विद्वानों के लंबे प्रोत्साहन के बाद यहाँ तक पहुँचते हैं।

ऐसे विद्यार्थियों को प्रवेश दिलाना ही अपने आप में एक साधना होती है।

पहले प्रवेश की प्रक्रिया बहुत सरल थी। विद्यार्थी आवेदन पत्र भरता था। अंकपत्र और आवश्यक प्रमाण पत्र लगाता था। संस्था उसका सत्यापन करती थी। लेखा विभाग में शुल्क जमा होता था और प्रवेश हो जाता था। इस पूरी प्रक्रिया में यदि कहीं कोई कठिनाई आती थी तो शिक्षक, कर्मचारी या वरिष्ठ विद्यार्थी वहीं बैठकर उसकी सहायता कर देते थे। विद्यार्थी अकेला नहीं होता था।

आज वही प्रक्रिया अनेक चरणों में बँट गई है।

पहले सीयूईटी का पंजीकरण करो। फिर परीक्षा दो। फिर संस्था का चयन करो। फिर अलग पोर्टल पर पंजीकरण करो। फिर ऑनलाइन शुल्क जमा करो। फिर काउंसलिंग में आओ। फिर ऑनलाइन प्रवेश शुल्क जमा करो। और यह सब निश्चित समय सीमा के भीतर करो।

जो विद्यार्थी महानगरों में रहते हैं, डिजिटल व्यवस्था से परिचित हैं और जिनके पास हर समय इंटरनेट, बैंकिंग और तकनीकी सहायता उपलब्ध है, उनके लिए यह सामान्य बात हो सकती है। लेकिन क्या देश का प्रत्येक विद्यार्थी इसी परिस्थिति में है ?

प्रतिवर्ष के अनुभव कुछ और ही कहानी कहते हैं।

किसी तरह एक गुरुकुल के विद्यार्थी को प्रवेश के लिए तैयार किया। उसने समय पर सीयूईटी का आवेदन नहीं किया। फिर नॉन सीयूईटी पंजीकरण के लिए समझाया। कई दिन तक पोर्टल ही नहीं चला। किसी तरह चला तो उसमें माँगी गई जानकारियाँ वह भर नहीं पाया। किसी तरह सब भरवाया गया तो बैंक सर्वर ने भुगतान स्वीकार नहीं किया। काउंसलिंग में आया तो शुल्क की राशि साथ लेकर आया। लेखा विभाग में गया तो बताया गया कि नगद नहीं लिया जाएगा। आपके मोबाइल पर लिंक आएगा। कई दिन तक लिंक नहीं आया। जब आया तो भुगतान कई बार असफल हुआ। अंत में वह निराश होकर किसी सामान्य विश्वविद्यालय में चला गया।

यह केवल एक विद्यार्थी की कहानी नहीं है। लगभग हर संस्था के पास ऐसे अनेक अनुभव हैं।

संस्कृत शिक्षा की एक विशेषता और भी है। यहाँ केवल युवा ही नहीं आते। अनेक वरिष्ठ नागरिक भी आत्मज्ञान, शास्त्र अध्ययन और आध्यात्मिक जिज्ञासा के कारण प्रवेश लेते हैं। वे डिग्री के लिए नहीं, ज्ञान के लिए आते हैं। लेकिन जब प्रवेश की पहली शर्त ही डिजिटल दक्षता बन जाए तो उनका उत्साह स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाता है।

यहाँ एक और प्रश्न विचारणीय है।

प्रवेश परीक्षा वहाँ आवश्यक होती है जहाँ हजारों अभ्यर्थी हों और सीटें सीमित हों। लेकिन संस्कृत शिक्षा में तो अनेक बार जितनी सीटें होती हैं उतने विद्यार्थी भी आवेदन नहीं करते। जब प्रतियोगिता ही नहीं है तो प्रवेश प्रक्रिया को इतना कठिन बनाने का औचित्य क्या है। यदि संस्था स्तर पर साक्षात्कार, योग्यता परीक्षण अथवा अन्य सरल माध्यम उपलब्ध हैं तो उन्हें पर्याप्त महत्व क्यों नहीं दिया जा सकता।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शिक्षा नीति का उद्देश्य केवल व्यवस्था बनाना नहीं होता। उसका उद्देश्य विद्यार्थियों को शिक्षा से जोड़ना भी होता है। यदि व्यवस्था इतनी जटिल हो जाए कि विद्यार्थी प्रवेश लेने से पहले ही लौट जाए तो हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि कहीं हम अनजाने में अपने ही उद्देश्य से दूर तो नहीं चले गए हैं।

डिजिटल व्यवस्था का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि मानवीय व्यवस्था समाप्त कर दी जाए। दोनों साथ साथ चल सकती हैं। जिस विद्यार्थी को ऑनलाइन सुविधा उपलब्ध है वह उसका उपयोग करे। जिसे सहायता चाहिए उसे संस्था के माध्यम से प्रवेश लेने की सुविधा भी मिलनी चाहिए। इससे पारदर्शिता भी बनी रहेगी और कोई विद्यार्थी केवल तकनीकी कारणों से शिक्षा से वंचित भी नहीं होगा।

आज सरकार भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत, भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की बात कर रही है। नई शिक्षा नीति भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि वास्तव में इन उद्देश्यों को सफल बनाना है तो प्रवेश प्रक्रिया को भी उसी भावना के अनुरूप बनाना होगा। नीति का मूल्यांकन केवल पोर्टल बनने से नहीं होगा। उसका मूल्यांकन इस बात से होगा कि उससे कितने विद्यार्थी शिक्षा से जुड़े।

मुझे एक उदाहरण बार बार याद आता है।

जब कोई आधुनिक भवन बनता है तो उसमें लिफ़्ट अवश्य लगाई जाती है। लेकिन सीढ़ियाँ कभी नहीं हटाई जातीं। क्योंकि यह सभी जानते हैं कि कभी बिजली चली जाएगी, कभी लिफ़्ट खराब हो जाएगी, कभी आपात स्थिति आ जाएगी। तब वही सीढ़ियाँ सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होती हैं। सामान्य दिनों में भी अनेक लोग स्वास्थ्य के लिए सीढ़ियों का ही उपयोग करते हैं।

लिफ़्ट सुविधा है।

सीढ़ियाँ आधार हैं।

संस्कृत शिक्षा में हमने कहीं यही गलती तो नहीं कर दी कि लिफ़्ट तो लगा दी, लेकिन सीढ़ियाँ ही तोड़ दीं।

पारंपरिक संस्कृत शिक्षा आज तक परंपरागत मानवीय संबंधों के कारण बची हुई है। यहाँ विद्यार्थी केवल पाठ्यक्रम पढ़ने नहीं आता। उसे अपनापन मिलता है, मार्गदर्शन मिलता है, भोजन मिलता है, संस्कार मिलते हैं और एक परिवार जैसा वातावरण मिलता है। इसी वात्सल्य के कारण वह टिकता है।

यदि हम यह अपेक्षा करें कि आज का विद्यार्थी स्वयं सारी डिजिटल औपचारिकताएँ पूरी करे, बार बार शुल्क जमा करे, किराये पर कमरा लेकर रहे और केवल संस्कृत प्रेम के कारण सारी कठिनाइयाँ सहता रहे, तो यह व्यवहारिक सोच नहीं है। आज की पीढ़ी यदि संस्कृत की ओर देखने का निर्णय भी करती है तो हमें उसका हाथ पकड़कर आगे बढ़ाना चाहिए, न कि उसके सामने नई नई प्रशासनिक बाधाएँ खड़ी करनी चाहिए।

इस पर भी यदि कई वर्षों के प्रयोग के बाद सब कुछ अच्छा हो गया होता तो कोई बात ही नहीं थी , अच्छा होने की बजाय उल्टा बिगड़ गया है ,कम से कम पारंपरिक संस्कृत विद्या के बारे में तो ऐसा कह ही सकते हैं । विद्यार्थी पहले की अपेक्षा और कम हो रहे हैं । 

मेरा विनम्र आग्रह केवल इतना है कि डिजिटलीकरण अवश्य हो, और अधिक हो, लेकिन उसे विकल्प रहने दीजिए, बाधा मत बनाइए। जहाँ आवश्यकता हो वहाँ संस्थाओं को सीमित स्तर पर मैनुअल सहायता और वैकल्पिक प्रवेश प्रक्रिया की अनुमति दीजिए। इससे न पारदर्शिता कम होगी, न व्यवस्था बिगड़ेगी, बल्कि उन विद्यार्थियों तक भी शिक्षा पहुँचेगी जिनके लिए यह व्यवस्था बनाई गई है।

आधुनिक भारत को लिफ़्ट भी चाहिए और सीढ़ियाँ भी।

लिफ़्ट सुविधा देती है।

लेकिन सीढ़ियाँ परंपरा को बचाए रखती हैं।

( दर्शनशास्त्रपीठ प्रमुख,श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,नई दिल्ली, फोन 9711397716 , anekant@slbsrsv.ac.in)

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