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विद्यार्थियों से एक निवेदन

*विद्यार्थियों से एक निवेदन*

       प्रो.अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली 
                                              १३/०७/२६

डिग्री धारण करना सिर्फ इसका पासपोर्ट है कि आप इंटरव्यू कक्ष में घुसने के लायक बने हैं , वहां विजय प्राप्त करने के लिए अच्छे ज्ञान और व्यक्तित्व के साथ कई तरह के कौशल की भी आवश्यकता होती है । 

डिग्री धारियों के पास काम नहीं है और काम देने वाले कहते हैं हमारे काम के लायक लोग नहीं हैं । 

मैं जब भी उत्साह विहीन ,लक्ष्य विहीन सिर्फ परीक्षा पास करने और डिग्री लेने के उद्देश्य से पढ़ने वाले विद्यार्थियों को देखता हूं तो उन्हें सलाह देने की इच्छा होती है कि तुम पढ़ाई लिखाई छोड़ क्यों नहीं देते ? क्यों अपना ,अपने मां बाप का समय और पैसा बर्बाद कर रहे हो ? कोई और काम-धाम देख लो ,वहां इतना समय और धन लगाओगे तो कहीं न कहीं पहुंच ही जाओगे । 

पढ़ाई करना है पर कुछ सीखने का जज़्बा नहीं है , phd की डिग्री चाहिए पर शोधकार्य के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं है ।phd प्रवेश के समय अन्यान्य अभ्यर्थियों को देखता हूं जिन्होंने अपने पूरे अध्ययन काल में एक लेख नहीं लिखा , किसी विषय पर दस बीस पेज भी लिखने का कौशल नहीं है,विषय की कोई एक प्रसिद्ध पुस्तक पूरी नहीं पढ़ी और वे चाहते हैं कि phd में प्रवेश हो जाए तब हम लिखना पढ़ना सीखेंगे। 

अध्ययन का उद्देश्य ज्ञानार्जन था है और रहेगा । अपनी अनंत जिज्ञासाओं के समाधान की तलाश में जब एक विद्यार्थी विनम्रता पूर्वक गुरु सान्निध्य प्राप्त करता है तब उसकी तड़प ही गुरु को ज्ञान दान हेतु प्रेरित करती है । स्पष्ट दिख रहा है कि अब वो तड़प है ही नहीं ,क्यों कि जिज्ञासाएं नहीं हैं , सिर्फ एक इच्छा है आजीविका की और यही उद्देश्य है । आजीविका का तर्क इतना शक्तिशाली दिखाई देता है कि हम उसे साधन की जगह साध्य समझने और समझाने लगे हैं ।अगर हम शिक्षा को मात्र एक व्यवसाय और उद्योग की तरह देखते हैं तब उसके भीतर की शुचिता को सुरक्षित रखने का स्वप्न भी हमें नहीं देखना चाहिए ।

इस द्वंद्व का भी समाधान अंततोगत्वा एक ही निकलेगा कि साधन को साधन तक तवज्जो दी जाय उसे साध्य नहीं बनाया जाय । 
विशेषज्ञ के रूप में विगत कई वर्षों के साक्षात्कारों के अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ -
*जो ज्ञान के लिए नहीं नौकरी के लिए पढ़ते हैं वे न ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं और न नौकरी ।* 

किसी तरह भाग्यवश नौकरी के उद्देश्य की पूर्ति हो भी जाय तो अनिच्छित ज्ञान की धारा वहीं रुक जाती है क्यों कि उद्देश्य की पूर्ति हो चुकी है । फिर प्रोन्नति के मानदंडों को वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता से पूरा करता है क्यों कि जिज्ञासा और ज्ञानार्जन का उद्देश्य न तो पहले था और न अभी । 

अनन्त जिज्ञासा और उसके समाधान के लिए ज्ञानार्जन एक विद्यार्थी के लिए अनिवार्य शर्त है । स्थाई सफलता का कोई भी रास्ता सरल नहीं होता । तप पूर्वक ज्ञानार्जन ही वास्तविक सफलता है । सिर्फ़ ज्ञानार्जन भी अधूरा रहता है यदि उसकी प्रस्तुति का कौशल नहीं है । 
ज्ञानार्जन और ज्ञान की प्रस्तुति और प्रयोग का कौशल ये दोनों सफलता की अनिवार्य शर्त है । 
साक्षात्कार में  प्रथम स्तर पर विशेषज्ञों को आपकी तपस्या का तेज पहली नज़र में समझ आ जाता है फिर आपकी स्वाभाविक और कृत्रिम प्रस्तुति का भेद भी स्पष्ट नजर आ जाता है । आपके वस्त्र विन्यास और केश विन्यास द्वितीय स्तर पर प्रभाव दिखाते हैं । 

दूरस्थ शिक्षा और नियमित डिग्री का ज्ञान से दूरत्व और निकटत्व , ऑनलाइन डिग्री का आभासत्व भी भांपने में विशेषज्ञ को विलंब नहीं लगता । 

साक्षात्कार के समय आपसे कोई कुछ नहीं कहता है , लेकिन भाँप सबकुछ लिया जाता है ,बल्कि प्रशंसा पूर्वक आपको वंचित कर दिया जाता है । आप सोचते हैं इंटरव्यू तो बहुत अच्छा गया था पता नहीं चयन क्यों नहीं हुआ । आप ' अच्छे ' की परिभाषा उसका स्तर समझ ही नहीं पाते हैं।

' भाग्य ' के बारे में कुछ लिखने की जरूरत इसलिए नहीं है क्यों कि वह हमारे आधीन नहीं है ,हमारे आधीन पुरुषार्थ है और जो पुरुषार्थ को भी भाग्यधीन समझते हैं - उनसे मुझे कुछ नहीं कहना है ।

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