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नंगेपन को आधुनिकता और दिगम्बरत्व को अश्लीलता समझने की भूल में भारतीय समाज

नंगेपन को आधुनिकता और दिगम्बरत्व को अश्लीलता समझने की भूल में भारतीय समाज प्रो.डॉ अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली   दिगंबर जैन सम्प्रदाय के परम आराध्य जिनेन्द्र देव या तीर्थंकरों की खड्गासन मुद्रा में निर्वस्त्र और नग्न प्रतिमाओं को लेकर तथा दिगम्बर जैन मुनियों के नग्न विहार पर खासे संवाद और विवाद होते रहते हैं | नग्नता को अश्लीलता के परिप्रेक्ष्य में भी देखकर पीके जैसी फिल्मों में इसे मनोविनोद के केंद्र भी बनाने जैसे प्रयास होते रहते हैं |  आये दिन आज के शिक्षित और ज्ञान युक्त विकसित समाज के बीच भी त्याग तपस्या की मूर्ति स्वरूप दिगम्बर जैन मुनि जब सम्पूर्ण भारत में नंगे पैर पैदल बिहार करके जगत को अध्यात्म, अहिंसा ,शांति और भाई चारे का संदेश देते हैं तब कई बार असामाजिक तत्त्व उन्हें अपमानित करने और कष्ट पहुंचाने का कार्य करके अपने अज्ञान का और अशिष्टता का परिचय देते रहते हैं । दिगम्बर साधना के पीछे,दिगंबर जैन मूर्तियों के पीछे जो दर्शन है ,जो अवधारणा है उसे समझे बिना ही अनेक अज्ञानी लोग कुछ भी कथन करने से पीछे नहीं रहते | इस विषय को आज के विकृत समाज को समझाना असं...

facebook विचार संकलन

अच्छा है हमारी तरह प्रकृति एकांतवादी नहीं है

'अच्छा है हमारी तरह प्रकृति एकांतवादी नहीं है' कुछ ,कभी भी ,सब कुछ नहीं हो सकता |प्रकृति संतुलन बैठाती रहती है|वह हमारी तरह भावुक और एकान्तवादी नहीं है |हम भावुकता में बहुत जल्दी जीवन के किसी एक पक्ष को सम्पूर्ण जीवन भले ही घोषित करते फिरें पर ऐसा होता नहीं हैं | जैसे हम बहुत भावुकता में आदर्शवादी बन कर यह कह देते है कि १.प्रेम ही जीवन है| २.अहिंसा ही जीवन है | ३. जल ही जीवन है | ४.अध्यात्म ही जीवन है | ५.परोपकार ही जीवन है । ६.संघर्ष ही जीवन है । ७.ध्यान योग ही जीवन है । ८.बदला लेना ही जीवन का लक्ष्य है । ९.मेरा सम्प्रदाय/मत/पक्ष ही जीवन है । १०.मेरा दर्शन ही सही जीवन है । आदि आदि ............. यथार्थ यह है कि ये चाहे कितने भी महत्वपूर्ण क्यूँ न हों किन्तु सब कुछ नहीं हैं | ये जीवन का एक अनिवार्य पक्ष ,सुन्दर पक्ष हो सकता है लेकिन चाहे कुछ भी हो सम्पूर्ण जीवन नहीं हो सकता |इसीलिए कायनात इन्साफ करती है क्यूँ कि हमारी तरह वह सत्य की बहुआयामिता का अपलाप नहीं कर सकती | इसीलिए विश्व के इतिहास में दुनिया के किसी  भी धर्म को कायनात उसकी  कुछ एक विशेषताओं के कारण एक बार उसे छा जाने क...

The Vīra Nirvāṇa Saṁvat: Ancient India's Oldest Calendar System

The Vīra Nirvāṇa Saṁvat: Ancient India's Oldest Calendar System Prof Anekant KumarJain In the rich tapestry of India's chronological traditions, one calendar system stands as a testament to the antiquity of Jain civilization yet remains relatively unknown in mainstream historical discourse. The Vīra Nirvāṇa Saṁvat, commemorating the spiritual liberation of 24th Tȋrthankara Bhagwān Mahāvīra, represents not merely a method of time-reckoning but a profound marker of cultural continuity that predates many of the world's most recognized calendrical systems. Recent archaeological discoveries and epigraphic evidence have brought renewed attention to this ancient era, challenging conventional assumptions about the development of systematic time-keeping in the Indian subcontinent. Historical Origins and Establishment Teerthankar Mahaveera attained Nirvāṇa (spiritual salvation) on the New Moon of Kartik Krishna month, coinciding with what is now celebrated as Diwali, in 5...

वीर निर्वाण दीपोत्सव और सबसे प्राचीन संवत्

वीर निर्वाण दीपोत्सव और सबसे प्राचीन संवत्   प्रो.डॉ.अनेकांत कुमार जैन  आचार्य-जैन दर्शन विभाग  श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय             नई दिल्ली-16 दीपावली भारत का एक ऐसा पवित्र पर्व है जिसका सम्बन्ध भारतीय संस्कृति की सभी परम्पराओं से है ।भारतीय संस्कृति के प्राचीन जैन धर्म में इस पर्व को मनाने के अपने मौलिक कारण हैं ।आइये आज हम इस अवसर पर दीपावली के जैन महत्त्व को समझें ।ईसा से लगभग ५२७  वर्ष पूर्व कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के समापन होते ही स्वाति नक्षत्र में जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर का वर्तमान में बिहार प्रान्त में स्थित पावापुरी से निर्वाण हुआ था। भारत की जनता  ने अमावस्या को   प्रातः काल जिनेन्द्र भगवान की पूजा कर निर्वाण लाडू (नैवेद्य) चढा कर पावन दिवस को उत्साह पूर्वक मनाया । यह उत्सव आज भी अत्यंत आध्यात्मिकता के साथ देश विदेश में मनाया जाता है । इसी दिन रात्रि को शुभ-बेला में भगवान महावीर के प्रमुख प्रथम शिष्य गणधर गौतम ...

क्या सभी एकान्त मिलकर अनेकान्त बन जाता है?

*क्या सभी एकान्त मिलकर अनेकान्त बन जाता है?*  -प्रो. वीरसागर जैन अनेकांतवाद की चर्चा करते समय प्राय: यह प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या सभी एकांतों को मिला देने से अनेकांत बन जाता है और इस प्रश्न का उत्तर विद्वानों में अंत तक मतभेदपूर्ण ही बना रहता है, कोई समाधान नहीं निकल पाता है । कुछ विद्वान कहते हैं कि हाँ, सभी एकांतों को मिलाने से ही तो अनेकांत बनता है, एकांतों के समूह को ही तो अनेकांत कहते हैं । किन्तु इसके विपरीत कुछ विद्वान कहते हैं कि नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता, एकांतों को मिला देने से अनेकांत नहीं बन सकता, क्योंकि एकांत तो मिथ्या होते हैं और मिथ्याओं का समूह मिथ्या ही रहेगा, सम्यक् नहीं हो सकता, दस-दस वर्ष के दो लड़के मिलकर बीस वर्ष का एक नहीं बन सकता । दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी बात दृढ़ता से प्रस्तुत करते हैं और समर्थन में कुछ गाथा, श्लोक, उदाहरण आदि भी प्रस्तुत करते हैं । शास्त्रों में भी इन दोनों के संकेत मिल जाते हैं । इस प्रकार इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न के सम्बन्ध में विद्वानों तक में मतभेद बना रहता है, बात स्पष्ट नहीं होती कि आखिर सही बात क्या है । सभी एकांतों के मिलने से...

प्रो.अनेकान्त आचार्य हस्ती स्मृति सम्मान 2025 से सम्मानित

 प्रो.अनेकान्त आचार्य हस्ती स्मृति सम्मान 2025 से सम्मानित अखिल भारतीय श्री जैन रत्न हितैषी श्रावक संघ द्वारा प्रवर्तित संघ के सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक अवार्ड 'आचार्य हस्ती स्मृति सम्मान 2025' जैनदर्शन और प्राकृत भाषा के युवा मनीषी प्रो अनेकान्त कुमार जैन ,आचार्य - जैनदर्शन विभाग,श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,नई दिल्ली को उनके साहित्यिक अवदान के लिए दिनाँक 27/09/2025 को  संघ द्वारा विशाल स्तर पर जोधपुर में आयोजित गुणी अभिनंदन समारोह में मुख्य अतिथि विधायक श्री अतुल भंसाली जी  ,संघ संरक्षक श्री मोफतराज जी मुणोत , अध्यक्ष श्री नवरत्न डागा,मुख्य अतिथि प्रो प्रेमसुमन जैन जी गुणी अभिनंदन चयन समिति की अध्यक्ष श्रीमती सुशीला बोहरा ,राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आनंद चोपड़ा  ने शाल ,माला ,शील्ड तथा चेक से सम्मानित किया ।  ज्ञातव्य है कि पूर्व में राष्ट्रपति तथा उ.प्र. राज्यपाल द्वारा सम्मानित प्रो.अनेकान्त कुमार जैन लब्ध प्रतिष्ठित वरिष्ठ मनीषी प्रो डॉ फूलचंद जैन प्रेमी जी ,तथा  विदूषी डॉ मुन्नीपुष्पा जैन ,वाराणसी के ज्येष्ठ सुपुत्र हैं ...

वर्तमान में स्वाध्याय परम तप क्यों है ?

वर्तमान में स्वाध्याय परम तप क्यों है ?      - प्रो अनेकान्त कुमार जैन ,नई दिल्ली  वर्तमान में पंचकल्याणक , महामस्तकाभिषेक,चातुर्मास आदि और बड़े बड़े धार्मिक आयोजन करवाना फिर भी आसान लगता है किंतु नियमित शास्त्र स्वाध्याय चलाना बहुत कठिन दिखाई देता है ।  जबकि स्वाध्याय शास्त्र सभा में कम से कम सिर्फ चार चीजें चाहिए 1. एक शास्त्र चाहिए 2.एक पढ़ने वाला 3.कम से कम दो सुनने वाले 4.सुनने सुनाने वाले की पवित्र भावना, बस । इसके लिए तो करोड़ो की बोली,लाखों के टेंट और स्पीकर साउंड,भोजन व्यवस्था ,पोस्टर ,बैनर,पूजन सामग्री के खर्च आदि आदि भी जरूरी नहीं होती ।  जब कि अन्य कार्यक्रम के लिए ये बहुत जरूरी और अनिवार्य हैं । फिर भी मात्र इन चार सहज चीजों का संयोग आज के समय में कितना कठिन है । यह बहुत गंभीरता से विचारणीय है ।  शायद यही कारण है कि स्वाध्याय को परम तप कहा गया है । मगर इसे 'परम' तो छोड़ो कोई सामान्य तप भी मानने को तैयार नहीं है ।  प्रसन्नता की बात है कि श्रावक के छह कर्तव्यों में  देव पूजा- अभिषेक न हो , गुरु पूजा न हो , दान न हो तो तो थोड़...

आत्मानुभूति का पर्व

Youtube 10 lectures on Dashlakshan by Prof Anekant Jain

On the holy occasion of Dashlakshan Mahaparva from 28 Aug. to 6 September 2025 listen An eye opening Pravachan cum lectures by famous spiritual motivational speaker  *Prof Anekant Kumar Jain* (Awarded by President Of India) SLBSNS University ,New Delhi  LECTURE TOPICS: *Day 1:क्षमा Forgiveness for Peace of Mind* https://youtu.be/jGOveJxcL44?si=Q3hVQSHXROCxg11d Day 2: मार्दव Humility and the Transformation of Hearts https://youtu.be/LpEP99qTbsY?si=H_0D2RkjCmUQX0NS Day 3: आर्जव The Key to Success in Worldly Life https://youtu.be/Lppti-HhxiE?si=TCE3uyjWj7MnbbZC Day 4: शौच Cleansing Your Inner Self https://youtu.be/GbdfVapKAJQ?si=LsgtNezc7HroQf50  Day 5:  सत्य Truthfulness for Purity in Your Life https://youtu.be/_V9pLaaRGEw?si=UridFweTxfkzBXpk Day 6: संयम Mastery Over Oneself https://youtu.be/nAeLVIm1TPE?si=RbV1GpPZCExtdoI_ Day 7: तप Destroying Accumulated Karmas https://youtu.be/b0XKhRW1Cww?si=Ej1S2JMwsBZ3Szrl Day 8: त्याग The Strength of Determination Over Acquisition...

'वीतराग विज्ञान' और 'अर्हं योग' दोनों आगम सम्मत वाक्य हैं

'वीतराग विज्ञान' और 'अर्हं योग' दोनों  आगम सम्मत वाक्य हैं* प्रो अनेकान्त कुमार जैन अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम, त्वद्भक्ति-रेव-मुखरी-कुरुते बलान्माम् । जिनेन्द्र सिद्धांत कोष में आगम को लेकर जिनेन्द्र वर्णी जी ने एक भूमिका लिखी है जो मेरे इस लघु लेख का अभिप्राय  प्रगट करने के लिए पर्याप्त है - *जैनागम यद्यपि मूल में अत्यंत विस्तृत है पर काल दोष से इसका अधिकांश भाग नष्ट हो गया है। उस आगम की सार्थकता उसकी शब्द रचना के कारण नहीं बल्कि उसके भाव प्रतिपादन के कारण है। इसलिए शब्द रचना को उपचार मात्र से आगम कहा गया है। इसके भाव को ठीक-ठीक ग्रहण करने के लिए पाँच प्रकार से इसका अर्थ करने की विधि है - शब्दार्थ, नयार्थ, मतार्थ, आगमार्थ व भावार्थ। शब्द का अर्थ यद्यपि क्षेत्र कालादि के अनुसार बदल जाता है पर भावार्थ वही रहता है, इसी से शब्द बदल जाने पर भी आगम अनादि कहा जाता है।* मुगल काल में और उसके बाद भी मूल जिन शासन की रक्षा करने वाले हमारे प्राचीन मनीषी पंडित बनारसी दास जी ,पंडित दौलतराम जी ,पंडित टोडरमल जी ,पंडित सदासुखदास जी ,पंडित जयचंद जी छाबड़ा आदि आदि अनेक विद्वान् जिनके...