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उत्तम आकिंचन्य

दशलक्षण धर्म : एक झलक


नवम् दिवस

उत्तम आकिंचन्य

' यह मेरा है ' इस प्रकार के अभिप्राय का त्याग करना आकिंचन्य है । जिसका कुछ नहीं  है वह आकिंचन्य है । आध्यात्मिक दृष्टि से समस्त पर पदार्थ और पर के लक्ष्य से आत्मा में उत्पन्न होने वाले मोह राग द्वेष के भाव आत्मा के नहीं हैं - इस प्रकार जानकर और मानकर अपनी शुद्ध आत्मा के आश्रय से मोह राग द्वेष छोड़ना ही उत्तम आकिंचन्य धर्म है ।

व्यवहार से सभी प्रकार के अंतरंग और बहिरंग परिग्रहों का त्याग करना आकिंचन्य धर्म है ।

शास्त्रों में मूर्छा अर्थात् आसक्ति को परिग्रह कहा गया है । अल्प परिग्रह का धारी जीव ही मनुष्य जन्म को प्राप्त कर पाता है ।

अंतरंग में मिथ्यात्व (मिथ्या दृष्टिकोण ) सबसे बड़ा परिग्रह है और अन्य सभी परिग्रहों का यह सबसे बड़ा कारण है ।

आचार्य कुंदकुंद कहते हैं कि बाह्य परिग्रहों का त्याग भावों की विशुद्धि के लिए किया जाता है इसलिए मिथ्या भाव ,राग द्वेष के त्याग के बिना मात्र बाह्य परिग्रह का त्याग निष्फल हो जाता है ।

अधिक परिग्रह दुख का सबसे बड़ा कारण है । आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह हमें परेशानी में डाल देता है । हम उसमें ही उलझे रहते हैं , अपनी शुद्धात्मा का ध्यान ही नहीं कर पाते हैं ।
किसी कवि ने ठीक ही कहा है

*आगाह अपनी मौत से कोई वशर नहीं ।*
*सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं ।।*

हम जरूरत से ज्यादा बेजान वस्तुओं और मशीनों से घिरे हुए एक ऐसे चेतन हो गए हैं जो अपने स्वभाव और आनंद को भूल कर इन्हीं अचेतन पदार्थों में ही सुख खोज रहा है । इस प्रतियोगिता में हमने अपने अन्य चेतन साथियों को भी भुला दिया है जो ज्ञान और दर्शन की प्रेरणा देते हैं ।

पैसा और अन्य बेजान सुविधा प्रदान करने वाली वस्तुएं हमें उपयोग करने के लिए मिली थीं लेकिन हम उनसे प्रेम करने लगे हैं । अन्य चेतन साथी हमें प्रेम और सद्भाव के लिए मिले ,लेकिन हम उनका उपयोग करने लगे हैं ।
अचेतन से प्रेम और चेतन का उपयोग आज के युग की सबसे बड़ी विडम्बना बन गया है । पैसे जैसे अचेतन पदार्थ के लिए किसी जीव को दुःख पहुंचाना,  उसे परेशान करना अब हमें अनैतिक नहीं लगता है ।

यह तो साफ है कि जिस वस्तु के प्रति हमारी जितनी ज्यादा आसक्ति रहेगी उसके वियोग में उतना ही ज्यादा दुख होगा । अतः दुख कम करने का सबसे आसान तरीका यह है कि आसक्ति खत्म नहीं कर सकते तो सीमित अवश्य की जाए ।

इसका प्रबंधन इस प्रकार किया जा सकता है कि प्रथम वस्तुएं उतनी ही रखी जाएं जितनी उपयोगी हों और अनावश्यक वस्तुओं को  या तो जरूरतमंदों को दान दे दिया जाय या छोड़ दिया जाय ।

जिन अचेतन वस्तुओं का परिग्रह है उनसे ज्यादा मोह न रखा जाय । उन पर *यूज एंड थ्रो* की मान्यता रखी जाए ।

जो पति,पत्नी, बच्चे , नौकर आदि चेतन परिग्रह हैं उनसे भी ज्यादा आसक्ति न रख कर मात्र अनासक्त प्रेम भाव रखकर यथा शक्ति अपने कर्त्तव्य की ईमानदारी से पूर्ति की जाय ।

ये जीवन जीने की कला है । अपने आनंदस्वरुप शुद्ध स्वभाव को विस्मृत करके यदि हम सदैव पर भावों में रहेंगे तो आकिंचन्य उत्पन्न ही नहीं होगा ।

जगत का क्षणभंगुर स्वरूप समझकर ,अनित्य भावना पूर्वक हम संसार में निर्वहन करेंगे तो आसक्ति विकसित ही नहीं होगी और हम आकिंचन्य बने रहेंगे ।

डॉ अनेकांत कुमार जैन
drakjain2016@gmail.com

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