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*जब मोह अपने आप नष्ट हो जाएगा* ( समयसार पताका -४)


*जब मोह अपने आप नष्ट हो जाएगा*
                        ( समयसार पताका -४)
उभयनयविरोधध्वंसिनि स्यात्पदाङ्के ,
जिनवचसि रमन्ते ये स्वयं वान्तमोहा: ।
सपदि समयसारं ते परं ज्योति रूच्चै -
रनवमनयपक्षाक्षुण्णमीक्षन्त एव ।।
(समयसार कलश -04)
सरलार्थ -
मुख्यत दो आध्यात्मिक नय हैं - निश्चय और व्यवहार । इन दोनों नयों में उभय रूप से जो विरोध प्रतिभासित होता है ,उस प्रतिभास का शमन करने वाली तथा स्यात् पद से विभूषित अर्थात् सापेक्ष कथन करने वाले तीर्थंकर जिनेन्द्र  के वचनों की गंगा में जो रमण करता है , अर्थात् उनकी वाणी में जिस तत्व का वर्णन हुआ है सच्ची श्रद्धा पूर्वक उसे सुनता , पढ़ता है, उसमें डूब जाता है उसका मोह स्वयं छूूट जाता है । फिर ऐसा जीव शीघ्र ही उस उत्कृष्ट ज्ञान ज्योति स्वरूप अपने शुद्ध आत्म तत्व रूपी समयसार का अनुभव कर लेता है जो वास्तव में अनादि से  सभी नयों के पक्षपात से परे है और अनंतकाल तक रहेगा।
अनेकांत पताका टीका -
कहने का तात्पर्य यह है कि मोह को छोड़ने के लिए अनेक प्रकार के बाहरी यत्न तो करते हैं और उसके लिए घर,परिवार, परिग्रह भी छोड़ देते हैं लेकिन सापेक्ष कथन करने वाली तीर्थंकर की वाणी में वर्णित आत्मतत्व का सच्चे मन से श्रवण और स्वाध्याय नहीं करते हैं । जिसका परिणाम यह होता है कि किसी न किसी बहाने,किसी न किसी रूप में हम मोह को पाले रखते हैं । यदि जिनेन्द्र भगवान के वचनों को हम सच्चे अर्थों में डूबकर समझेंगे तो मोह स्वयं ही समाप्त हो जाएगा उसके लिए अलग से कुछ करना नहीं पड़ेगा । फिर जब मोह स्वयं ही समाप्त हो जाएगा तो आत्म तत्व को समझने के लिए जिन नयों का आश्रय लिया जाता है ,अनुभूति के काल में उन नयों का विकल्प भी छूट जाता है और निर्विकल्प शुद्धात्म अनुभव होने लगता है ।
                      - प्रो अनेकांत कुमार जैन

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