Wednesday, December 11, 2013

आचार्य तुलसी और मैं

आचार्य तुलसी और मैं
डॉ अनेकान्त कुमार जैन


ऐसा महसूस होता है कि राजस्थान के लाडनूं जैसे सांस्कृतिक नगर से मेरा सम्बन्ध किसी पूर्व जन्म से रहा हो | मेरा जन्म मध्यप्रदेश के एक छोटे से गाँव दलपतपुर में हुआ था किन्तु पिताजी ( प्रो.डॉ.फूलचंद जैन प्रेमी जी ) पारमार्थिक शिक्षण संस्थान ,जैन विश्व भारती ,लाडनूं में मुमुक्षु बहनों को प्राकृत एवं जैन आगमों का अध्यापन कार्य कर रहे थे | मात्र चार माह की अवस्था में अपनी माँ (डॉ मुन्नी पुष्पा जैन ) के साथ मैं लाडनूं आ गया था | लगभग तब से ही तेरापंथ के प्रमुख युग प्रधान गणाधिपति आचार्य तुलसी के सानिध्य में रहा | पिताजी अक्सर आचार्य श्री के पास तत्त्व चर्चा करते और साथ में मुझे ले जाते , उनका आशीर्वाद और स्नेह मुझे सहज ही प्राप्त हो जाता | पता नहीं कब और कैसे उस महामानव के पवित्र परमाणु मेरे भीतर भी प्रवेश करते चले गए | बाद में पिताजी वाराणसी के सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में जैन दर्शन के प्राध्यापक बन कर आ गए और मैं भी विद्वानों की नगरी काशी में अध्ययन करने लगा | लाडनूं और जैन विश्व भारती से हमारा और हमारे परिवार का सम्बन्ध बना रहा | एक बार आचार्य प्रवर के सानिध्य में किसी संगोष्ठी में भाग लेने के उद्देश्य से पिताजी लाडनूं गए साथ में मैं भी गया ,तब जैन विश्व भारती विश्व विद्यालय का निर्माण हो चुका था ,आचार्य तुलसी जी ने मुझ से जीवन का उद्देश्य पूछा ,मुझे याद है उनके शब्द – तुम जीवन में क्या करना चाहते हो ? मैं यह नहीं पूछ रहा हूँ कि तुम क्या बनना चाहते हो ? क्यों कि क्या करना है यह निश्चित होगा तो क्या बनना है यह भी निश्चित हो जायेगा | उनकी आत्मीयता पूर्ण प्रश्नावली ने मुझे बहुत प्रभावित किया | मैं जिनवाणी की सेवा करना चाहता हूँ –मेरा उत्तर था | मैंने यह विश्वविद्यालय तुम्हारे लिए ही तो खोला है –उन्होंने तुरंत कहा , यहीं प्रवेश ले लो और कार्य करो | हम तुम्हें यहाँ से जाने नहीं देंगे | इतने बड़े आचार्य और मुझ बालक से इतने अधिकार से ऐसा क्यों कह रहे हैं ? महापुरुषों की हर बात में जीवन के रहस्य छुपे होते हैं –यही सोच कर मैंने जैन दर्शन में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से यहाँ प्रवेश ले लिया |  
जैन परिवार का से होने से मुझे जैन विश्व भारती में सबसे बड़ी समस्या भोजन की हुयी  | मुझे रात्रिभोजन और जमीकंद का त्याग था और यहाँ के छात्रावास में यही मिलता था | मेरा यहाँ रहना मुश्किल हो गया | मैंने यहाँ से जाने का निश्चय किया किन्तु मेरे मन में एक बात आई कि यह कितनी बड़ी बिडम्बना है कि एक जैन संस्था में मुझे पढ़ने के लिए अपने पारंपरिक जैन मूल्यों की तिलांजलि देनी पड़े या फिर छोड़ कर जाना पड़े | मैंने अपनी समस्या आचार्य श्री को कहने का निर्णय किया,जा पहुंचा भिक्षु विहार,उस समय वे किसी से चर्चा में व्यस्त थे,मैं  दूर बैठ गया | थोड़ी देर मैं उन्होंने मुझे इशारे से करीब बुलाया ,कहा - क्या समस्या है ?मैं आश्चर्य में कि इन्हें कैसे मालूम कि मैं समस्या लेकर आया हूँ ? मैंने निवेदन किया कि- आचार्य जी ! विश्व भारती ही नहीं पूरे लाडनूं की हर दीवार पर लिखा है –संयमः खलु जीवनं , और यदि बचपन से लिया हुआ कोई संयम मैं पालना चाहता हूँ तो अपनी ही जैन संस्था में रहना मुझे मुश्किल हो रहा है,और मैंने पूरी रामायण कह दी | उन्होंने तुरंत कहा कि तुम्हें यहाँ से जाने की जरूरत नहीं है ये समस्या अब नहीं रहेगी | अगले दिन मेरी व्यवस्था नीडं में हो गयी और मैंने अपना अध्ययन जारी रखा | उनसे इतनी आत्मीयता प्राप्त कर मैं भी कई विषयों पर उनसे खुल कर चर्चा करने लगा |
संस्थान में एक परंपरा थी कि यहाँ के सभी अध्यापकों तथा छात्रों को दस दिन का आवासीय प्रेक्षाध्यान शिविर सत्र के प्रारंम्भ में करना अनिवार्य होता था |यह शिविर आचार्य तुलसी तथा आचार्य महाप्रज्ञ जी के सानिध्य में चला |मैंने देखा कि संस्थान के अधिकांश लोगों ने यह शिविर मजबूरी में किया | समापन वाले दिन जब अपने अनुभव सुनाने का मौका आया तो कई लोग कसीदे पढ़ने बैठ गए | मुझे चाटुकारिता करना कभी पसंद नहीं रहा और मैं ऐसा मानता हूँ कि चूँकि ऐसे लोग मुखिया को यथार्थ से भटका कर हमेशा प्रशंसा के शब्द जाल में उलझा कर रखते हैं और सही सुधार या विकास नहीं होने देते अतः सही प्रशासक ऐसे लोगों से दूरी बना कर रखता है | मुझे जहाँ तक मैं आचार्य तुलसी को समझ पाया था वे बड़े यथार्थवादी नज़र आते थे अतः अपना अनुभव सुनाते समय मैंने शिविर का यथार्थ चित्रण किया ,मन में एक भय भी था कि कहीं यह दुस्साहस मेरे लिए भारी ना पड़ जाये | सच को कहने के साहस और सलीके इन दोनों का प्रशिक्षण मुझे अपने पिता से पूर्व से ही प्राप्त था अतः मैं डरा नहीं | मुझे यह देख कर आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि आचार्य श्री ने मेरा अंतिम वाक्य पूरा होने से पहले ही मेरी प्रशंसा शुरू कर दी और कहा मुझे ऐसे ही सही अनुभव पसंद हैं ,बनावटी अनुभव नहीं | बाद में उन्होंने मुझे अलग से कई बार बुलवाया और कई चीजों का साक्षात् प्रशिक्षण दिया ,वे चीजें आज भी मुझे काम आती हैं |  
मैं दिगंबर परंपरा से था किन्तु मुझे उनके विशाल ह्रदय में अपनी जगह बनाने में कहीं तकलीफ नहीं हुई | उनकी विशालता और उदारता का क्षितिज मैं कभी नाप नहीं सका | वे ऐसे चुम्बकीय व्यक्तित्व थे कि उनके अनुशासन में रहने को लोग अपनी स्वतंत्रता समझते थे |लोग जब उनके द्वारा दिए गए दंड को भी आशीर्वाद समझते थे तब उनकी एक कृपा दृष्टि भी मिल जाये तो कहना ही क्या ? लोग अपने आपको धन्य समझते थे | उनके और आचार्य महाप्रज्ञ के साहित्य को मैंने खूब पढ़ा और खूब सीखा | आज वो हमारे सामने नहीं हैं | उनके बाद बहुत सालों तक मैंने आचार्य महाप्रज्ञ जी से निर्देशन और आशीर्वाद प्राप्त किया | आज पूरे विश्व में जैनविद्या जिस मुकाम पर है उसमें आचार्य तुलसी ,आचार्य महाप्रज्ञ और आचार्य महाश्रमण का अप्रतिम योगदान है | और ठीक यही बात मैं अपने जीवन के लिए भी कह सकता हूँ | आचार्य तुलसी के जिन शब्दों ने मेरे जीवन निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है वे हैं –
चिंता नहीं,चिंतन करो
व्यथा नहीं,व्यवस्था करो
प्रशंसा नहीं,प्रस्तुति करो


सहायक प्रोफ़ेसर - जैन दर्शन विभाग,श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ
(मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आधीन मानित विश्व विद्यालय)
क़ुतुब संस्थानिक क्षेत्र , नई दिल्ली-११००६
संपर्क सूत्र – ०९७११३९७७१६

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